शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2007

शबनम हाशमी को गुस्सा क्यों आता है



गुजरात में चुनाव की दुदंभी बज चुकी है। सारे संगठन चुनाव के लिए कमर कस चुके हैं। गुजरात में होने वाला चुनाव कोई आम सा चुनाव नहीं है। कई कथित जानकारों का मानना है कि गुजरात चुनाव देश की सेक्युलर छवि के लिए भी एक इम्तहान की तरह है। ऐसा मानने वालों में अधिकांश के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी किसी सांप्रदायिक शैतान से कम नहीं। इनका मानना है कि दरअसल मोदी गोधरा के बाद के घटनाओं की वजह से हुई हिन्दु मतों के ध्रुवीकरण का फायदे लेकर सोमनाथ के सिंहासन तक पहुंच गए। वरना वो तो एक खाकी निकर पहनने वाले किसी सांप्रदायिक फासीवादी नाजीवादी और न जाने क्या क्या वादी की तरह हैं जो समाज को बांट कर उसी समाज पर तानाशाही चलाते हैं। खैर उनकी समझ पर तो मैं तुच्छ सा प्राणी कुछ कह पाने की हैसियत में नहीं हूं। बहरहाल आए दिन अखबारों पत्रिकाओँ में मोदी को देश का नंबर एक मुख्यमंत्री घोषित करते देखता हूं तो उन सेक्युलरों की तरह मुझे भी लगने लगता है साले ये सारे अखबार पत्रिका और संगठन (खासतौर राजीब गांधी फाउंडेशन) भी मोदी की तरह फासिस्ट सोच वाले होंगे। अरे इन्हें तो सोचना चाहिए कि गुजरात के करोड़ों लोग जो तय करेंगे वो थोड़े ही होगा ... होना तो वो चाहिए जो हमारे सेक्युलर सिविल सोसायटी के लोग सोचें और कहें। इस हिसाब से मोदी को सभी मुख्यमंत्रियों में से सबसे कम नंबर मिलने चाहिए। बहरहाल इसी कड़ी में कल शबनम जी ने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेस आयोजित किया था ... गुजरात में किसानों द्वारा किए जा रहे आत्महत्याओं को लेकर। उनका दावा था कि मोदी के शासनकाल में गुजरात में तकरीबन पांच सौ किसानों ने सरकार की जन विरोधी नीतियों की वजह से आत्महत्या कर ली । इन आत्महत्या के गवाह के तौर पर गुजरात के सोलह सत्रह किसान भी वो साथ लाईं थी। सबकी दारूण कहानी थी। सब दुखी थे आहत थे और सबसे बढ़कर निराश हो चुके थे। शबनम जी का कहना था कि इन हालात के लिए राज्य सरकार जिम्मेवार है। सोलह आने सच बोल रही थीं वो । आत्महत्याओं का पूरा लिस्ट था उनके पास जो उनके शब्दों में गुजरात सरकार ने खुद स्वीकार किये हैं। दरअसल किसी भी शासन में अगर किसान खुश नहीं होगें उस शासन को सफल कहना कम्युनिस्टों की शब्दावली में जनविरोधी ही नहीं दक्षिणपंथियों के मुताबिक पाप भी है। बहरहाल इसके लिए मोदी को सबक मिलना ही चाहिए। आगे उनका ये भी कहना था कि दरअसल वो मोदी के खिलाफ इसलिए भी हैं कि वो फासिस्ट सोच वाले हैं। थोड़ा धक्का लगा... लगा जैसे अभी किसानों के लिए थोड़ी देर पहले जो आंसू दिखाए जा रहे थे वो दरअसल घड़ियाली थे । उन्हें किसानों की समस्या से मतलब उतना नहीं था जितना मोदी को हटाने से था। खैर ऐसे नामुराद मुख्यमंत्री को पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार है ... मैं तो कम से कम ऐसा नहीं समझता। बहरहाल बातें होती रहीं.... पत्रकार बंधुओं ने उनसे ये भी पूछा कि चुनाव की घोषणा के बाद आप ये प्रेस कांफ्रेस क्यों बुला रही हैं। कोई साफ जबाव तो उन्होंने नहीं दिया लेकिन उनके जबाव से मुझे ये ज़रूर लगा कि अभी नहीं कहेंगी अपनी बात तो फिर कब कहेंगी। लिहाजा इस बात पर तो मैं उनके साथ था। आगे फिर किसी नामुराद ने पूछ लिया कि आखिर आप मोदी के खिलाफ तो हैं लेकिन किसके पक्ष में हैं। तो उनका कहना था कि मोदी के विरोध का फायदा तो कांग्रेस के खाते में ही जाएगा। सीधे सीधे उन्होंने ये नहीं कहा कि वो चाहती हैं कि कांग्रेस सत्ता में आए पर उनका आशय कुछ ऐसा ही था। लिहाज़ा जो बात मेरे सीने में उस प्रेस कांफ्रेंस के दौरान खाए गए पकौड़े की तरह गड़ती रही वो ये कि आखिर कांग्रेस के आने से गुजरात में किसानों की समस्याएं कैसे खतम हो सकती हैं। वही कांग्रेस जिसके राज्य महाराष्ट् में विदर्भ के किसान दुर्दिन झेल रहे हैं। बहरहाल बाद में उन्होंने फिर साफ किया कि दरअसल वो कांग्रेस के सेक्युलर क्रेडेंशियल की वजह से उन्हें सत्ता में देखना चाहती हैं। फिर एक बार स्पष्ट हुआ कि वो किसान की समस्याओं की वजह से उतनी चिंतित नहीं हैं जितनी मोदी के शासन में होने से चिंतित हैं। लेकिन मेरे लिए मुसीबत और बढ़ गई ... मेरे दिमाग में लगातार घंटे की तरह ये शब्द बजने लगे कि आखिर ये कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष कैसे। दरअसल मेरे दीमाग में सवाल इसलिए कौंधा क्योंकि गोधरा की बात तो मैंने अपने आंखों से नहीं देखी लेकिन मुझे ये भरोसा जरूर हुआ कि प्रशासन अल्पसंख्यकों के कत्लेआम में जरूर लगी होगी, लेकिन दुर्भाग्यवश भागलपुर का दंगा मैंने जरूर देखा और भोगा है। वहां प्रशासन द्वारा किए गए कत्लेआम से भी मैं वाकिफ था। हालांकि उस वक्त कांग्रेस ही बिहार में राज कर रही थी। लेकिन उस वक्त उस कांग्रेसी मुख्यमंत्री को किसी ने फासिस्ट नहीं कहा था। इसलिए जब शबाना जी कांग्रेस को सेक्युलर जैसे विशेषण नवाज रही थी तो उनका पकोड़ा कहीं जा कर गड़ रहा था मुझे। बहरहाल सवाल जबाव होते रहे ... दरअसल पत्रकार शबनम जी को घेर रहे थे... उनका चेहरा तमतमा रहा था। मैं उठ कर चला आया। मेरे पेट में अब भी कुछ गड़ रहा था... गांधी नेहरू को छोड़ दें तो कांग्रेस सेक्युलर कैसे ।।। दरअसल शबनम जी के तमतमाए चेहरे पर ये प्रश्न मैं फेंक नहीं पाया। आपको मिले तो पूछिएगा जरूर... अरे नहीं आपको कहाँ मिलेंगी... वो तो पिछले पांच महीने से गुजरात में हैं .... ऐसा उन्होंने ही बताया था प्रेस कांफ्रेस में। आखिर उन्हें गुजरात में सेक्युलर सरकार जो बनबानी है। इति श्री

सोमवार, 8 अक्टूबर 2007

उजाले उनकी यादों के .... मंजीत की जुबानी



कई लोग रेडियो सुन-सुनकर जवान हुए हैं॥ मैं भी॥ लेकिन मेरी यादें कुछ अलग तरह की हैं। मेरे घर में किसिम-किसिम के रेडियो मौजूद रहते थे। एक बेहद बड़ा-सा रेडियो, स्साला बहुत बैटरी खाता था। हम बच्चे थे, बड़े भईया उसकी बैटरी का खर्च अपने पाकेट मनी- आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि कितनी होती होगी- से निकालेते थे। बाद में बैटरीखउका रेडियो हमारे घर के कबाड़ वाले कमरे में पहुंच गया। हमेशा के लिए..वैसे ही जैसे घर के बेहद बुजुर्ग दालान पर पहुंच जाते हैं। अगला रेडियो आया.. साइज़ में छोटा प्यारा-सा। संतोष कंपनी का। लोकल मेड। फिलिप्स वगैरह लेना उस वक्त अय्याशी समझी जाती। हमारे हाथ से कई-कई बार गिर कर हाथ पैर तुड़वा बैठा। बाद में उसमें रबर के बैंड वगैरह लगा कर अस्थिपंजर जोड़े गए। लेकिन उस रेडियों के लिए कान पकड़कर उठक-बैठक लगवाई गई.. वह आज तक याद है। रेडियों में भाई साहब समाचार सुनते...यह आकाशवाणी है, अब आप देवकी नंदन पांडेय से समाचार सुनिए.. प्रधानमंत्री ने फलां कहा.. ढिमका कहा...ऐसा हो गया, वैसा हो गया। खेल समाचार संजोय बैनर्जी से.... मेरी याद्दाश्त ज़्यादा अच्छी नहीं.... कार्यक्रमों में युववाणी.. जयमाला वगैरह ही याद हैं। युववाणी को मैं बहुत दिनों तक युगवाणी जानता रहा। .... एक बात और... हमारे घर बहुत दिनों तक टीवी नहीं था। टीवी आया सन ८८ में। तब तक हम क्रिकेट मैच, रामायण, समाचार या चित्रहार देखने पड़ोस के घरों में जाया करता। आमतौर पर बिजली नहीं होती, होती भी क्रिकेट मैचों और समाचारों में पडो़सी की रूचि नहीं होती। बैटरी वह किसी और प्रोग्राम के लिए बचाकर रखता । ऐसी विषम स्थितियों में मुझे एक प्रेयसी की तरह शरण देती। सच तो यह है कि बहुत बुद्धिजीवी नहीं होने की वजह से आज भी चालू न्यूज़ चैनलों पर मैं एफएम चैनलों को तरज़ीह देता हूं। ज़ाहिर है, गोल्ड और रेनबो को। बाकी के एफएम तो उनकी तरह ही चालू हैं।....शेष तो अशेष है...

रविवार, 7 अक्टूबर 2007

उजाले उनकी यादों के .....


बहनों और भाइयों ....आवाज़ की दुनिया के दोस्तों .... सभी सुनने वालों को
कमल शर्मा का नमस्कार... और न जाने कितने कार्यक्रम ... हवा महल, जयमाला, पिटारा, सेहत नामा , हैलो $$$$ फ़रमाइश, सेल्युलायड के सितारे, बाइस्कोप की बातें , मंथन, उजाला उनकी यादें के ... और न जाने क्या क्या ... बस आंख खुलते ही विविध भारती सुनते और देर रात को सोने तक कमरे के एक कोने में पड़ा रेडियो अपनी ध्वनी तरंगों के ज़रिए बक बक करता रहता , दुनिया भर की बातें बताता ... और साथ में होता हिन्दी फिल्मों का एक से बढ़कर एक गीत। इसके साथ हम कब बड़े होते गए पता ही नहीं चला। उम्र तेज़ी से भागती गयी। वो यादें पीछे छुट गयीं ... अपने तमाम खट्टे मीठे अनुभवों के साथ.... पंचरंगी कार्यक्रम के पचास साल के ज़रिए उन्हीं यादों को आप एक बार फिर जी सकते हैं ... बस उठाइए कलम लिख डालिए उन यादों को जिसमें आप हैं और आपके साथ ही आपका प्यारा पंचरंगी कार्यक्रम विविध भारती ... इंतजार रहेगा ... लिखिएगा ज़रूर

सोमवार, 1 अक्टूबर 2007

वे विचार माफिया हैं .....


सुशांत मेरे परम मित्रों में से हैं। नाम पर मत जाइए या कि चेहरे से धोखा खाइए। चेहरे पर असीम शांति लिए सुशांत जी दरअसल भीतर कहीं गहरे तक उद्वेलित रहते हैं। इन्हें जानने वाले उनके स्वभाव के इस पहलु से ज़रूर परिचित हैं। एक तरह से अगर कहना चाहूं कि समाजवाद इनके बचपन का झुला और जवानी की फुलवारी रही है तो कुछ भी गलत नहीं होगा। इन्होंने समाजवाद को आग उगलते भी देखा और सत्ता के गलियारों में चरते खाते भी देखा है। हालांकि लोग इन्हें दक्षिणपंथी कहते रहे हैं लेकिन मेरा मानना है कि ये बाबा नागार्जुन की तरह ... न हम दक्षिण न हम वाम... में ज्याद भरोसा करते हैं। विरोध ही इनकी लेखनी की धार है। खासकर तब जब मुकावला छद्म धर्मनिरपेक्षों से हो। बहरहाल इन्होंने हाल ही में एक कविता भेजी है ... जो पेशे नज़र है आपके लिए...

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वे बहुत गंभीर हैं

संवेदनशील हैं

उनकी बुद्धि तीक्ष्ण है

वे सोचते हैं, विचारते हैं

मुद्दे उछालते हैं

वैचारिक आधार पर

लोगों को तौलते हैं, तोड़ते हैं, जोड़ते हैं
उनके पीछे लोग हैं

क्योंकि वे मौलिक हैं

(मेरा नहीं, यह उनका दावा है

गोया बौद्धिक संपदा क़ानून के वे देसी

संस्करण यानी डंकल के वंशज हैं)

बुद्धिजीवी मंडी में उनकी साख है

वे बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ते हैं

डिनर चरते हैं

कालाहांडी पर बहस करते हैं

कभी-कभी वे इराक, क्यूबा, सोमालिया बोलते हैं

वे सिद्धांत बोते हैं

और तर्कों के हंसिए से

आंदोलन की फसल काटते हैं


सावधान!

वे विचार माफिया हैं।