मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

कन्याकुमारी के तट पर सियासी शून्यता

Pic Courtesy: Twitter Account of PM Narendra Modi
फाइटर जयललिता नहीं रहीं। एमजीआर की समाधी के बगल में ही पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार आज किया गया। अपनी बीमारी से लड़ती जयललिता जीवन और मौत के संघर्ष की आखिरी और संभवत पहली लड़ाई हार गईं और इसी के साथ संभवत तमिलनाडू के एक और सियासी युग का पटाक्षेप हो गया।
93 वर्षीय द्रमुक प्रमुख करूणानिधि अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं। ज़ाहिर है करूणानिधी भी अब बहुत सक्रिय नहीं रह पाएंगे। ऐसे में तमिलनाडु के दूसरे प्रमुख राजनीतिक दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम के लिए भी उत्तर करूणानिधी युग किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
अपनी बीमारी से लड़ती जयललिता के इस पूरे दौर में जिस तरह उनकी पुरानी सहयोगी और मित्र शशिकला एक बार फिर सक्रिय हुईं वो सक्रियता परदे पर पहली बार जयललिता की मौत के बाद दुनिया के सामने तब आया जब जयललिता के मृत शरीर के साथ उनके आवास पर शशिकला को पुरे समय तक लोगों ने खड़े देखा। अंतिम यात्रा में ट्रक पर शशिकला साथ थीं और मुख्यमंत्री जयललिता का अंतिम संस्कार की रस्मों को भी उनकी सखी रहीं शशिकला ने ही पूरा किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जयललिता को श्रद्धांजली देने पहुंचे। जिस तरह से जयललिता के शव के पास खड़ी और सिसक रही शशिकला के सिर पर हाथ फेरकर प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें सांत्वना दिया वो तस्वीर पुरे देश ने देखा। जयललिता को श्रद्धांजली देने पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी को देखकर आधी रात को मुख्यमंत्री बने ओ पनीरसेल्वम जिस तरह सिसक पड़े औऱ प्रधानमंत्री ने उन्हें सांत्वना दिया वो वाकया भी टेलीविजन न्यूज चैनलों के लगातार प्रसारण के जरिए पूरे देश ने देखा।
पीएम मोदी ने मुख्यमंत्री पनीर सेल्वम और जयललिता की सबसे करीबी रही शशिकला को सांत्वना देने के साथ जयललिता के सम्मान में कुछ ऐसे फैसले किये जो अभूतपूर्व हैं। जयललिता के निधन पर प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय शोक का एलान किया है जो आमतौर पर किसी मुख्यमंत्री के निधन पर नहीं किया जाता है। इसके अलावा आज संसद के दोनों सदनों को स्थगित करके सरकार ने जयललिता के प्रति अपना सम्मान जाहिर किया। जब जयललिता अस्पताल में भर्ती थीं, तब भी बीजेपी के तमाम बड़े नेता उनका हालचाल जानने के लिए चेन्नई जाते थे।
जयललिता के साथ बीजेपी के रिश्ते उतार चढ़ाव भरे रहे हैं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनके व्यक्तिगत रिश्ते शुरू से अच्छे रहे हैं। बीजेपी के लिए अच्छी बात ये है कि जयललिता की पार्टी के साथ उसका रिश्ता काफी अच्छा रहा है।
यूपीए सरकार के दिनों में आँध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद जगन मोहन रेड्डी के साथ तत्कालीन केंद्र सरकार का व्यवहार देखकर और उसके बाद आंध्र प्रदेश में हुई पार्टी की दुर्गति से वर्तमान केद्र सरकार के इस सावधान रवैये को आसानी से समझा जा सकता है।
जयललिता की मौत के एक घंटे के भीतर मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम के साथ 30 से अधिक मंत्रियों ने शपथ ग्रहण कर सरकार के स्तर पर उपजी शून्यता को तत्काल भर दिया। अब सवाल पार्टी के महासचिव पद के लिए जयललिता के उत्तराधिकारी चुने जाने का है। समर्थकों के बीच चिनम्मा के नाम से मशहूर शशिकला क्या इस जिम्मेदारी को संभालेंगी?  क्या अम्मा की जगह चिनम्मा होंगी? जाहिर है इस पूरे दौर में जो संकेत उभरे हैं उससे तो ऐसा ही लगता है। हालांकि अगर ऐसा होता भी है तो शशिकला के लिए आगे की राह आसान है ऐसा भी नहीं।
यहीं से शायद केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए तमिलनाडु में सियासी संभावनाओं के द्वार खुले सके। यही वजह है कि जयललिता की बीमारी के इस पुरे दौर में केंद्र सरकार ने भी बड़ी ही फूंक फूंक कर सावधानी से कदम उठाए। जयललिता के जाने से कमजोर पड़ी अन्नाद्रमुक के लिए ये बेहतर विकल्प होगा कि पार्टी केंद्र सरकार और भाजपा के साथ अच्छे संबंध रख कर पार्टी के समक्ष आई इस बड़ी चुनौती से पार पाए।
कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद रॉक से हार्दिक संबंध रखने वाले इस देश के दक्षिणपंथ को भी संभवत कन्याकुमारी के तट तक अपने पांव पसारने के लिए यही मुफीद मौका दिख रहा है। तमिलनाडु के आने वाले भविष्य की राजनीति बहुत कुछ इन्हीं दांव पेंचों के जरिए तय होगी क्योंकि वहां पिछले चार पांच दशकों की ‘कल्ट’ सियासत दम तोड़ती नजर आ रही है और राज्य के नए सियासी योद्धा अब तक खुद को कल्ट में तब्दील नहीं कर पाए हैं। 

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