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| Pic Courtesy : NDTV |
दरअसल इस रहस्य के पीछे है बैंकिग सॉफ्टवेयर। आयकर विभाग के सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से आठ नवंबर को नोटबंदी के एलान के बहुत पहले ही बैंकों के कम्युटर सॉफ्टवेयर में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए थे। इस बदलाव के बाद अपग्रेड किए गए इन सॉफ्टवेयर में नए सीरिज के नोट के छपने और बाद में उसके वितरण के डाटा संग्रहित हैं।
देश के अंदर विभिन्न इलाकों के लिए अलग अलग सिरीज की नकदी छापी गईं। इसलिए जब देश के एक राज्य का नोट किसी दूसरे राज्य में स्थित बैंक के पास पहुंचता है तो बैंक इस सूचना के जरिए आयकर विभाग और वित्त विभाग की खुफिया शाखा को सतर्क करती है। सॉफ्टवेयर की मदद से इस बात का पता बड़ी आसानी से लग जाता है कि किस खाताधारक को ये नोट जारी किए गए थे जिसके बाद छापे की कार्रवाई शुरू की जाती है और किसी भी तरह का संदेह होने पर वो धर लिए जाते हैं। इसलिए नोटबंदी के बाद धड़ाधड़ धरे जा रहे नए नोटों के पीछे हमारी वित्तीय इंटेलिजेंस, पुलिस और प्रौद्योगिकी के बीच समन्वय के जरिए इस सफलता की गाथा लिखी जा रही है।
दवाइयों के बोतल या टेब्लेट के पत्तों पर एक बैच नंबर लिखा होता है जिससे उसके थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेताओं की पहचान थोड़ी सी ही मशक्कत के बाद साफ की जा सकती है। नए सिरीज के इन नकदी के साथ भी बिल्कुल इसी तरह की प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया गया है। इससे ये पता बड़ी आसानी से लग जाता है कि किस राज्य के कौन से जिले की किस बैंक की कौन सी शाखा से ये नोट निकाले गए हैं। अगर किसी बैंक की शाखा से बड़ी संख्या में नोटों के बंडल जारी किए जाते हैं तो उपर बैठे इंटेलिजेंस के लोगों के पास खतरे की घंटी टन टना जाती है।
आयकर विभाग के सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय के अंदर वित्तीय मामलों का खुफिया सेल बैंक की संदिग्ध शाखाओं और खाताधारकों पर कड़ी नजर बनाए हुए है। जैसे ही संदिग्ध ट्रांजेक्सन का अंदेशा होता है आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय राजस्व विभाग, खुफिया विभाग और पुलिस हरकत में आ जाती है।
देश भर में फैले पुलिस के गुप्तचरों के जाल का भी नोटबंदी के बाद बड़े पैमाने पर पकड़े जा रहे नकदी के पीछे बड़ा हाथ बताया जा रहा है। कई मामलों में समाज में अमीरों और गरीबों की बीच की बड़ रही खाई से उपजे असंतोष ने भी बड़े पैमाने पर पकड़ी जा रही नकदी के पीछे अपनी भूमिका निभाई है। मसलन अवैध तरीकों से कमाए धन से नवधनाढ्य बने लोगों को ड्राइवरों या नौकरों का असंतोष भी खुफिया अधिकारियों या पुलिस के लिए बड़े पैमाने पर सूचना जुटाने के लिए उपयोगी साबित हुआ है।

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