गुरुवार, 3 मई 2018

काशी से कठुवा तक - कठघरे में कांग्रेस !

ठुवा कांड के बहाने एक बार पुन देशद्रोहियों ने भयानक षड्यंत्र के तहत नारी सम्मान को मुद्दा बनाया। क्योंकि इन्हें एक बात ठीक प्रकार से पता है कि भारतीय इतिहास में दो युद्ध, जो अमर प्रबंध काव्य है, वह नारी स्वाभिमान के लिए ही लड़े गए। भारतीय संस्कृति के स्त्री प्रधान होने के कारण एक आठ वर्षीय बालिका की हत्या एवं उसके बलात्कार के कहानी को गढ़ कर जिस प्रकार षड्यंत्र के केंद्र बिंदु में खड़ा किया गया और दिल्ली के इंडिया गेट पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका के नेतृत्व में कैंडिल मार्च निकला, इस पूरे प्रकरण ने कांग्रेस के बीते इतिहास की याद दिला दी।
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कांग्रेस पार्टी के इतिहास पर अगर आप नजर डालेंगें तो पाएंगे कि चाहे कांग्रेस के अंदर आंतरिक कमजोरियों के कारण सत्ता संघर्ष हुआ हो अथवा विपक्ष मजबूत हुआ हो और ऐसे हालात में कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई हो तो ये पार्टी स्त्री स्वाभिमान को मुद्दा बनाकर समाज के अंदर ऐसा वातावरण निर्मित करती रही है कि जिससे ये लगे कि हिन्दुस्तान चरित्रवानों का देश न होकर हवस के दरिंदों का देश होकर रह गया है। और तो और ऐसे लोगों को विरोध में उतारा गया जिन्हें देश के अंदर नग्नता एवं विकृति परोसने के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
सन् 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव नेता जी सुभाष चंद्र बोस v/s सीताराम पट्टाभिरमैय्या के बीच हुआ जिसमें गांधी जी का यह कथन कि पट्टाभिरमेय्या की हार मेरी व्यक्तिगत हार होगी, इसके बावजूद सुभाष चंद्र बोस का चुनाव जीत जाना एक एतिहासिक तथ्य है। 
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जिसके बाद गांधी जी और नेहरू ने कार्यसमिति के सभी सदस्यों से इस्तीफा दिलवा कर सुभाष चंद्र बोस को इस्तीफा देने के लिए विवश कर दिया। जिन लोगों ने लोकतांत्रिक तरीके से जीते हुए सुभाष चंद्र बोस को अपना अध्यक्ष स्वीकार नहीं किया। वो लोग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप कैसे स्वीकार कर सकते हैं ? ये घटना तो उन दिनों का है जब देश को आजादी दिलाने की लड़ाई लड़ने का दंभ भरने वाली कांग्रेस, जहां पर दुश्मन विदेशी था और देश के लिए लड़ना था तब तो दल के अंदर कोई गैर अध्यक्ष हो जाए ये तो स्वीकार न हो सका क्योंकि सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों की दलाली नहीं कर सकते थे और उनका राष्ट्रप्रेम निष्कलंक था। 
फिर शुरू हुआ भारतीय संस्कृति के आधार स्तम्भ मंदिरों के विरुद्ध भयानक षड्यंत्र का अभियान। कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं को यह पता था कि मंदिर शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्पर्क एवं संस्कारों के केंद्र होते हैं और कांग्रेस के शीर्ष नेता सीताराम पट्टाभिरमैया ने औरंगजेब के द्वारा काशी विश्वनाथ के मंदिर तोड़े जाने के औचित्य को सही ठहराया। पट्टाभिरमैया ने अपनी पुस्तक में इसका जिक्र करते हुए यह कहा कि काशी के ब्राह्मण दुराचारी हो गए थे और उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में एक राजकुमारी का अपहरण कर बलात्कार किया। इस कारण औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ का मंदिर तोड़वाया। जब उनसे पूछा गया कि यह तथ्य आपको कहा से मिला तो उन्होंने बताया कि उनसे मिलने वाले एक मौलाना के पिता ने अरबी भाषा में पांडुलिपि में इसका जिक्र किया है। 
जब उस पांडुलिपि को दिखाने की बात आई तो मौलाना भी मुकर गए। परंतु एक तथ्य जो वामपंथियों के साथ मिलकर कांग्रेसी नेताओं ने स्थापित करने की कोशिश कि हिंदूस्तान के जितने भी हिंदू मंदिर तोड़े गए, उन सभी में दुराचार हो रहे थे। अयोध्या, मथुरा, काशी एवं सोमनाथ के मंदिरों को विदेशी आक्रांताओं द्वारा तोड़े जाने की घटनाओं का भी कांग्रेस के नेताओं ने बचाव किया। सन् 1939 से लेकर 2018 तक कांग्रेस की इस लाइन में परिवर्तन होता नहीं दिख रहा।
तिहासिक घटनाक्रम में मूल बात ये है कि मंदिर तोड़ने का कारण भी नारी अस्मिता को ही बनाया गया। फिर नब्बे के दशक में सोमनाथ मंदिर को गजनवी ने क्यों तोड़ा इस पर वामपंथी इतिहासकार जो कहानी लेकर आए उसका भी सार सार-संक्षेप भी यही था। 1975 इलाहाबाद हाईकोर्ट से चुनाव दुरूपयोग का मुकदमा हारने के बाद इमरजेंसी से जो त्राही हुई और इंदिरा गांधी का सत्ताच्युत होना कांग्रेस को खल गया। पुन कांग्रेस ने एक साजिश रची। उसे यह पता था 85 लोकसभा सीटों वाली यूपी में दिल्ली के सत्ता की चाभी है। सन 1979 में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में गोरखपुर से कुशीनगर जा रही एक बस से नारायणपुर गांव में एक बकरी कुचल कर मर गई। चूंकि वह बकरी अल्पसंख्यक समुदाय के किसी व्यक्ति की थी। उस गांव में बस को रोककर तोड़फोड़ की गई। बस में बैठी महिलाओं के साथ दुव्र्यवहार किया गया। बस के पीछे से उस क्षेत्र के तत्कालीन थानाध्यक्ष ललित नारायण चतुर्वेदी अपनी जीप से आ रहे थे। उन्होंने रोकने की कोशिश की, उनके साथ भी मारपीट की गई। फिर पीएसी ने बल प्रयोग करके वातावरण को शांत किया।
 
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तीन चार दिनों के अंदर बगैर प्रशासन को सूचना दिए चुपके से श्रीमति इंदिरा गांधी वहां पहुंची और कहानी में एक नया मोड़ आया। इस पूरे घटनाक्रम में नारायणपुर के अल्पसंख्यक परिवार की महिलाओं के साथ बलात्कार की बात जोड़ दी गई। दूसरे दिन पूरे देश में कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का मुद्दा बनाकर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री बनारसीदास गुप्त से इस्तीफा ले लिया। बाद में पता चला कि महिलाओं के साथ दुव्र्यवहार जैसी कोई घटना हुई ही नहीं थी।
इसी प्रकार काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने के लिए काशी के ब्राह्मण और विद्वानों को जिम्मेदार ठहराने वाले बयान के बाद देश के प्रमुख मंदिरों के साथ कोई न कोई षड्यंत्र करके इसका सरकारी अधिग्रहण किया गया। ढाई साल मोरारजी, छह साल अटल जी अथवा नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में किसी भी हिन्दु मंदिर का सरकारी अधिग्रहण नहीं हुआ। देश में जितने भी हिन्दू मंदिरों का सरकारी अधिग्रहण हुआ वो सभी कांग्रेस के शासन काल में ही हुआ। 
वाराणसी (वर्तमान में चंदौली) जिले के रघुनाथपुर ग्राम के दो भाइयों मार्कंडेय एवं विभूति सिंह ने काशी विश्वनाथ मंदिर का सोना चोरी किया। पकड़े गए, जेल गए और इसको आधार बनाकर 1983 में काशी विश्वनाथ मंदिर का अधिग्रहण कर लिया गया। बाद में जेल से छुटने के बाद दोनों भाइयों में से एक अपने गांव का प्रधान भी बना और इनकी कांग्रेस नेताओं से नजदीकी कोई छुपी बात नहीं रही। सनातन हिन्दू धर्म और मंदिरों से घृणा कांग्रेस नेताओं के लिए छुपाने जैसी बात नहीं है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान दीपावली के दिन हिन्दूओं के सर्वोच्च धर्मगुरू शंकराचार्य की गिरफ्तारी और कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी का यह कथन की मंदिरों में तो लोग लड़कियां छेड़ने के लिए जाते हैं, कांग्रेस और खासतौर पर गांधी परिवार की सनातन हिन्दू समाज के प्रति सोच को नंगा करता है। कांग्रेस ने 1939 से लेकर 2018 तक अपने हिन्दु विरोध और नारी को केंद्र बिंदु बनाकर षड्यंत्र रचने के मूल स्वभाव को छोड़ा नहीं है। 
काशी से कठुवा तक आधारहीन आरोपों के द्वारा हमेशा मंदिर एवं हिन्दू आस्था के केंद्रों को निशाना बनाने की कोशिश की गई। कठुवा के घटना के सम्बंध में कुछ तथ्य हम रख रहे हैं।
1. घटना जम्मू के कठुवा में सम्भवतः जनवरी में घटित हुई। ये मुद्दा 3 महीने बाद उठा।
2. जम्मू का यह इलाका कश्मीर घाटी के विपरीत शांत और हिन्दू बहुल है।
3. पीड़िता बंजारा प्रवृत्ति वाले बकरवाल मुस्लिम समुदाय से थी। उसके माता-पिता का निधन हो चुका था और वह अपने रिश्तेदार के साथ रहती थी। उसके नाम थोड़ी पारिवारिक सम्पत्ति भी थी।
4. कठुवा के इस इलाके में कुछ वर्षों से अवैध रोहिंग्या बसाहट हो रही है।
5. जनवरी में पीड़िता के लापता हो जाने के कुछ दिनों बाद उसका शव मंदिर में पाया गया।
6. पहली पोस्टमार्टम एवं फाॅरेंसिक जांच की रिपोर्ट में पीड़िता के साथ बलात्कार की घटना से इनकार किया गया।
7. मंदिर आबादी के बीच है जहां कोई बंद करने योग्य दरवाजा नहीं है। मंदिर हमेशा खुला रहता है, यहां रोज लोग आते हैं, यहां किसी को आठ दिनों तक बंधक बनाये रखना असम्भव है।
8. पीड़िता के शरीर पर गीली मिट्टी लिपटी हुई थी, अर्थात उसकी हत्या के पूर्व उसे मिट्टी पर लिटाया और घसीटा गया था। मंदिर मार्बल का है, जहां कीचड़ नहीं होता है और पोस्टमार्टम में बताये गए मृत्यु के समय पर आसपास कहीं बारिश नहीं हुई थी। हत्या कहीं और कर उसका शव कुछ समय पहले मंदिर में डाला गया।
9. मंदिर जिस तरह आबादी के बीच है, सम्भव नहीं है कि वहां 8 दिनों तक शव सड़ता रहे और लोगों को पता न चले।
10. घटना के बाद जब स्थानीय पत्रकार वहां पहुंचे तब रोहिंग्या लोगों ने उनके साथ मारपीट की।
11. मिडिया के एक तबके ने घटना के साथ हिन्दू आरोपी और घटनास्थल के रूप में मंदिर शब्द विशेष रूप से उछला।
12. भाजपा के विधायकों ने राज्य सरकार से के सीबीआई जांच करने का केंद्र से अनुरोध करने को कहा।
13. मुफ्ती सरकार ने सीबीआई जांच का अनुरोध न करते हुए जाँच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया।
14. कश्मीर में घटना के विरोध में आंदोलनों का नेतृत्व गुलाम नबी आजाद के प्रमुख सहयोगी कर रहे हैं।
15. जम्मू रीजन के पुलिस कर्मियों का नाम भी बलात्कारियों की लिस्ट में डाला गया ताकि जांच टीम में सिर्फ कश्मीर रीजन के (मुस्लिम पढ़े) अधिकारियों की नियुक्ति को उचित सिद्ध किया जा सके।
16. एसआईटी ने तत्काल रिपोर्ट दी कि उस बच्ची को 8-9 दिन तक मंदिर के तहखाने में बन्द रखा गया जबकि उस मंदिर में कोई तहखाना हैं ही नहीं। 
17. पुजारी ने अपने बेटे से भी बलात्कार करवाया और अपने भतीजे को 400 किलोमीटर से उस बच्ची का रेप करने बुलाया, ये डॉक्यूमेंट्री सिद्ध हो गया हैं कि बताए गए दिन वो लड़का घटनास्थल से 400 किमी. दूर अपने शहर में एक परीक्षा दे रहा था। 

18. बकरवाल मुस्लिम भारतीय सेना के प्रमुख सहयोगी हैं जो सेना के लिए दुर्गम स्थानों पर खच्चर पर लाद कर रसद पहुंचाने का काम करते हैं। कारगिल युद्ध में भी उनकी सेवा विशेष उल्लेखनीय है। अब उनमें भारतीय सेना और भारत के खिलाफ आक्रोश भड़काया जा रहा है।
19. पूर्व में लगभग 2003 में शोपियां में 22 वर्षीय नीलोफर जान और उसकी 17 वर्षीय ननद अपने सेव के बगीचे से गायब हो गयीं थी और उनके शव समीप के नाले में मिले थे।
20. स्थानीय पुलिस ने जांच में पाया कि अचानक बादल फटने और बाढ़ आने से दोनों युवतियां बहकर मारी गयीं।
21. अलगाववादियों ने कहा कि भारतीय सेना ने उनका बलात्कार कर हत्या की है।
22. उमर अब्दुल्ला ने स्थानीय पुलिस की जांच को नकारते हुए 17 अधिकारियो को सस्पेंड कर जेल भेजा और जांच के लिए न्यायिक कमेटी का गठन किया।
23. न्यायिक कमेटी ने बताया कि दोनों युवतियों के साथ बलात्कार कर हत्या की गयी।
24. सेना की ओर से दबाव बढ़ने पर सीबीआई जांच करवाई गयी, फोरेंसिक नमूने तीन भिन्न देशों में भेजे गए। किसी भी रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई।
25. सभी 17 निलंबित अधिकारीयों को दोषमुक्त पाया गया।
26. किन्तु इस घटना से कश्मीर में व्यापक हिंसा, प्रदर्शन और असंतोष के चलते 47 दिनों तक कफ्र्य लागू रहा।
काशी से प्रारम्भ होकर कठुवा तक यही सिद्ध करने की कोशिश की गई कि इन मंदिरों के पुजारी चरित्रहीन और भ्रष्ट थे, उन्हीं तर्कों को पाकिस्तान के टीवी चैनलों पर बैठ कर भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार को हटाने के लिए सहयोग मांगने वाले नेताओं के साथ पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी की प्रोपेगैंडा शाखा (आईएसपीआर) ने दिल्ली में बैठे ऐसे राष्ट्रद्रोही पत्रकार जिन्हें विभिन्न एजेंसियों के द्वारा धन मुहैय्या कराया जाता है, के साथ मिलकर आंशिक रूप से अपने षड्यंत्रों में सफल रहे और जम्मू कश्मीर के अंदर मुसलमानों की बेटियां सुरक्षित नहीं हैं, यह बात अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कहने में सफलता पाई।’ कठुआ बालिका हत्या के विषय में फॉरेंसिक रिपोर्ट आ चुकी है, उस परिस्थिति में जिनलोगों ने हिन्दुस्तान के संस्कृति के आधार स्तंभ मंदिर, पुजारी, चरित्र, सबको दांव पर लगाकर देशद्रोह का काम किया, क्या ऐसे लोगों को कानून के घेरे में लेने का वक्त नहीं आ गया है? 
लेखक -  स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती, राष्ट्रीय महामंत्री अखिल भारतीय संत समिति
acharya_jeetendra@Yahoo.com

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