अनिल जी पेशे से पत्रकार हैं या कहें कि यायावार हैं। घुमना इनकी मूल प्रवृति है। इनकी संवेदना का दायरा बहुत घना है। परम मित्र हैं मेरे। मेरे लिए इन्होंने रज़ा साहब की एक बेहतरीन कविता भेजी है। गुजरात चुनाव सर पर हैं। मुझे लगा आपको भी पढ़ना चाहिए।
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझको क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
मेरे उस कमरे को लूटो जिसमें मेरी बयाजें जाग रही हैं
और मैं जिस में तुलसी की रामायाण से सरगोशी करके
कालिदास के मेघदूत से कहता हूं - मेरा भी एक संदेशा है
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझे क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
लेकिन मेरी रग - रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है
मेरे लहू से चुल्लू भर कर महादेव के मुँह पर फेंको
और उस जोगी से कह दो .... महादेव
अब इस गंगा को वापस ले लो
यह ज़लील तुर्कोँ के बदन में गढ़ा गया
लहू बन कर दौड़ रही है ............
राही मासुम रज़ा