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| धुआंधार जल प्रपात : जबलपुर |
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| धुआंधार जलप्रपात : जबलपुर |
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| धुआंधार जलप्रपात : जबलपुर |
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| धुआंंधार : उपर रोप वे से लिया गया चित्र |
बहरहाल मेरे लिए तो जैसे एक अलग दुनिया खुलती जा रही थी। एक दुनिया संगेमरमर की .... एक दुनिया नदियों की चंचल लहरों की..... एक दुनिया धुंआधार में नर्मदा की पवित्र लहरों पर पड़ रही सतरंगी इन्र्दधनुषी सरीखा........।
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| भेड़ाघाट - जबलपुर |
इससे पहले की आगे की राम कहानी सुनाऊँ बता दूं कि जबलपुर मध्यप्रदेश का बड़ा ही प्यारा शहर है जहाँ इत्मीनान से आप पहाड़ों से बात कर सकते हैं। जबलपुर मुख्य शहर से थोड़ी ही दूरी पर तकरीबन बीस एक किलोमीटर की दूरी पर बसा है भेड़ाघाट.... नमामि नर्मदे के तीरे। जबलपुर में नर्मदा के पावन जल से आपका साक्षात्कार तीन जगहों पर खासतौर पर हो सकता है ... इसमें ग्वारिघाट , लम्हेटाघाट और भेड़ाघाट प्रमुख हैं। अगर आप ययावर हैं तो पहले दो पर जा सकते हैं और अगर आप ययावर होना चाहते हैं तो निसंदेह आपको भेड़ाघाट और धुँआधार जलप्रपात ज़रूर देखना चाहिए। जबलपुर से भेड़ाघाट जाने के तमाम साधन उपलब्ध हैं।
बहरहाल मैं भी पहुँचा। धुँआधार पर खड़ा घंटों नर्मदा के इठलाते जल को देखता रहा। उपर से नीचे चट्टान पर गिर रहा पानी .... पानी की एक अलग ही आवाज ..... ख़ासतौर पर जिससे हम मैदानी इलाके के लोग वाकिफ नहीं ... ऐसी आवाज जिसमें आप खो जाएंगे। ऐसी आवाज जहाँ खड़े होकर आपको और कोई आवाज़ सुनाई नहीं देगी। घंटों खड़े रहकर.... कुछ देर नर्मदा में पैर रखकर बैठा रहा, मन बिल्कुल शांत हो गया। फिर पंचवटी से नाव पर सवार होकर निकले उस पहाड़ी नदी की सैर पर। चट्टानी कंदराओं के बीच चल रही नाव में हम दस एक लोग सवार थे। घाट से थोड़ी ही दूर आने के साथ ही निस्तब्धता छा गई। तमाम लोग ऐसे खो गए .... मानों वहाँ हो हीं नहीं। सबकी आँखों प्रकृति के उस शाश्वत सौंदर्य को निहार कर निहाल हुई जा रही थीं। संगमरमर की चट्टानों पर पड़ रही सूर्यकिरणों की आभा से सबका मन विभोर हुआ जा रहा था। गाइड बताता जा रहा था यहाँ नदी तीन सौ, यहाँ चार सौ फीट गहरी है। यहाँ राजकपूर की जिस देश में गंगा बहती है, यहाँ प्रेमनाथ की यहाँ शाहरूख की रात का नशाँ और न जाने कौन कौन सी फिल्मों की शूटिंग हुई थी। लेकिन नाव में सवार लोग शायद सून कम रहे थे देख ज्यादा रहे थे और उससे भी ज्यादा खो रहे थे। करीब एक घंटे हमारी नाव नर्मदा के जल पर सैर करती रही, हम मंत्रमुग्ध से संगमरमर की चट्टानों के बीच कल कल बहती नर्मदा के जल पर प्रकृति की अद्भभूत छटा का आनंद लेते रहे। ऐसा लग रहा था मानों यहीं बैठे रहें और जीवन की शाम हो जाए। कौन जाए लौट कर उस अमानवीय दुनिया में।
बहरहाल लौटे और लौट कर आँखे और भी विस्फरित हो गईं जब वहाँ मौजूद दुकानों में संगमरमर की तमाम कलाकृतियाँ देखीं। वहाँ के स्थानीय लोगों के हाथों से बनी वो महान कलाकृतियाँ। ये उन्हीं संगमरमर से बनी थी जिन्हें हम अभी नदियों के बीच देखकर आए थे। ऐसा लगा जैसा जादू है .... कलाकार नहीं संगेमरमर के जादूगर थे वो। राधा कृष्ण से लेकर समाधिस्थ बुद्ध तक और आधुनिक टेलिफोन से लेकर महिलाओँ के बाल में खोसने वाला हेयर पीन तक। महीन से महीन काम संगमरमर पर। कलकल जल की शांति और नर्मदा की गहराई साथ लिए लौट आए इंसानों की भीड़ में। वैसे आप अगर नर्मदा तट पर जाने की सोच रहे हैं तो मेरी मानिए चाँदनी रात में जाइएगा।













