रविवार, 24 फ़रवरी 2008

संगमरमरी जादू की दुनिया - वाकई गजब है धुआंधार

धुआंधार जल प्रपात : जबलपुर

धुआंधार जलप्रपात : जबलपुर
धुआंधार जलप्रपात : जबलपुर
धुआंंधार : उपर रोप वे से लिया गया चित्र
हली बार जाना की प्रकृति की गोद में जाने के मायने क्या होते हैं। क्या होता है जब आप इंसानों की भीड़ से भागकर कुछ पल के लिए नदियों की लहरों से बात करते हैं, चट्टानों की मौन सुनते हैं, संगमरमरी चट्टानों पर पड़ रही दूधिया रौशनी से अठखेली करते हैं। इस बार जबलपुर जाना मेरे लिए ऐसे ही अनुभवों से दो चार होने की कहानी रही। आमतौर पर फुर्सत पा कर मैं कमरे में बैठ कर कुछ पढ़ने या सोने में बिताता रहा हूं। लेकिन इस बार जब जबलपुर अपने ससुराल आया तो लोगों ने ठेल ठाल कर भेड़ाघाट भेजा। न चाहते हुए भी चला गया। जा कर देखा तो समझ में आया कि न जाने ऐसे कितने आनंददायक मौके का मैं साक्षी हो सकता था लेकिन अपनी काहिली की वज़ह से वंचित रह गया।
बहरहाल मेरे लिए तो जैसे एक अलग दुनिया खुलती जा रही थी। एक दुनिया संगेमरमर की .... एक दुनिया नदियों की चंचल लहरों की..... एक दुनिया धुंआधार में नर्मदा की पवित्र लहरों पर पड़ रही सतरंगी इन्र्दधनुषी सरीखा........।

भेड़ाघाट - जबलपुर



ससे पहले की आगे की राम कहानी सुनाऊँ बता दूं कि जबलपुर मध्यप्रदेश का बड़ा ही प्यारा शहर है जहाँ इत्मीनान से आप पहाड़ों से बात कर सकते हैं। जबलपुर मुख्य शहर से थोड़ी ही दूरी पर तकरीबन बीस एक किलोमीटर की दूरी पर बसा है भेड़ाघाट.... नमामि नर्मदे के तीरे। जबलपुर में नर्मदा के पावन जल से आपका साक्षात्कार तीन जगहों पर खासतौर पर हो सकता है ... इसमें ग्वारिघाट , लम्हेटाघाट और भेड़ाघाट प्रमुख हैं। अगर आप ययावर हैं तो पहले दो पर जा सकते हैं और अगर आप ययावर होना चाहते हैं तो निसंदेह आपको भेड़ाघाट और धुँआधार जलप्रपात ज़रूर देखना चाहिए। जबलपुर से भेड़ाघाट जाने के तमाम साधन उपलब्ध हैं।

बहरहाल मैं भी पहुँचा। धुँआधार पर खड़ा घंटों नर्मदा के इठलाते जल को देखता रहा। उपर से नीचे चट्टान पर गिर रहा पानी .... पानी की एक अलग ही आवाज ..... ख़ासतौर पर जिससे हम मैदानी इलाके के लोग वाकिफ नहीं ... ऐसी आवाज जिसमें आप खो जाएंगे। ऐसी आवाज जहाँ खड़े होकर आपको और कोई आवाज़ सुनाई नहीं देगी। घंटों खड़े रहकर.... कुछ देर नर्मदा में पैर रखकर बैठा रहा, मन बिल्कुल शांत हो गया। फिर पंचवटी से नाव पर सवार होकर निकले उस पहाड़ी नदी की सैर पर। चट्टानी कंदराओं के बीच चल रही नाव में हम दस एक लोग सवार थे। घाट से थोड़ी ही दूर आने के साथ ही निस्तब्धता छा गई। तमाम लोग ऐसे खो गए .... मानों वहाँ हो हीं नहीं। सबकी आँखों प्रकृति के उस शाश्वत सौंदर्य को निहार कर निहाल हुई जा रही थीं। संगमरमर की चट्टानों पर पड़ रही सूर्यकिरणों की आभा से सबका मन विभोर हुआ जा रहा था। गाइड बताता जा रहा था यहाँ नदी तीन सौ, यहाँ चार सौ फीट गहरी है। यहाँ राजकपूर की जिस देश में गंगा बहती है, यहाँ प्रेमनाथ की यहाँ शाहरूख की रात का नशाँ और न जाने कौन कौन सी फिल्मों की शूटिंग हुई थी। लेकिन नाव में सवार लोग शायद सून कम रहे थे देख ज्यादा रहे थे और उससे भी ज्यादा खो रहे थे। करीब एक घंटे हमारी नाव नर्मदा के जल पर सैर करती रही, हम मंत्रमुग्ध से संगमरमर की चट्टानों के बीच कल कल बहती नर्मदा के जल पर प्रकृति की अद्भभूत छटा का आनंद लेते रहे। ऐसा लग रहा था मानों यहीं बैठे रहें और जीवन की शाम हो जाए। कौन जाए लौट कर उस अमानवीय दुनिया में।




हरहाल लौटे और लौट कर आँखे और भी विस्फरित हो गईं जब वहाँ मौजूद दुकानों में संगमरमर की तमाम कलाकृतियाँ देखीं। वहाँ के स्थानीय लोगों के हाथों से बनी वो महान कलाकृतियाँ। ये उन्हीं संगमरमर से बनी थी जिन्हें हम अभी नदियों के बीच देखकर आए थे। ऐसा लगा जैसा जादू है .... कलाकार नहीं संगेमरमर के जादूगर थे वो। राधा कृष्ण से लेकर समाधिस्थ बुद्ध तक और आधुनिक टेलिफोन से लेकर महिलाओँ के बाल में खोसने वाला हेयर पीन तक। महीन से महीन काम संगमरमर पर। कलकल जल की शांति और नर्मदा की गहराई साथ लिए लौट आए इंसानों की भीड़ में। वैसे आप अगर नर्मदा तट पर जाने की सोच रहे हैं तो मेरी मानिए चाँदनी रात में जाइएगा।


शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2008

एक रहैं नरसिंह पंडित जी....


एक थे नरसिंह पंडित जी। पहले गोवर्धन साहित्य महाविद्यालय, देवघर के प्राचार्य रहे बाद में हिन्दी विधापी‌ठ यानि के राजेंद्र शोध संस्थान, देवघर के प्राचार्य हुए। हिन्दी के अकादमिक और विद्वानों के लिए हिन्दी विधापीठ किसी मक्का से कम नहीं है। बहरहाल ये इनका अकादमिक परिचय है। बाँकि का परिचय जानने के लिए आपको किसी देवघरिए से मिल कर बात करना होगा या देवघर जाना होगा। वैसे मैं बता दूं कि अगर आप किसी देवघरिया से पंडित जी के बारे में बात करेंगे तो कुछ इस अंदाज़ में उनको बारे में आपको बताएगा...जैसा आगे मैं बताने जा रहा हूं।
दरअसल पंडित जी से पहला सामना कब हुआ कुछ ‌ठीक ठाक याद नहीं। हाँ इतना याद है कि झक झक धोती कुर्ता पहने तेज चाल में चलता हुआ एक व्यक्ति घर के पास वाले चौक से एक निश्चित समय पर रोज गुजरता। उन्हें देखते ही आस पास जो भी होता झुक कर पैर छुता और अलग हट जाता। बहरहाल अपने घर के आस पास के बड़ों को उस उज्जवल धवल व्यक्तित्व के पाँव छुता देखकर , मैं भी उनके पाँव छुने लगा... बिना जाने के कौन हैं वो। अच्छा लगता था .... वो भी तेज कदमों से चलते हुए अचानक मेरे पीछे से आकर पाँव छुने वक्त ठीठकते और मुझे कलेजे से लगाकर आर्शिवाद देकर तेज कदमों से अपने रास्ते पर चल पड़ते। ये तब की बात है जब मैं कक्षा एक या दो में पढ़ता था।
बाद में मैं आर मित्रा हाईस्कूल चला गया। तब तक पैर छुकर आर्शिवाद लेने का सिलसिला ज़ारी रहा। बहरहाल एक दिन मित्रों से बातचीत में पता चला कि अगर आर्टस विषयों में अच्छा करना हो तो नरसिंह पंडित जी के पास पढ़ने के लिए जाना चाहिए। मुझे नहीं पता था कि ये नरसिंह पंडित कौन हैं लेकिन बातों ही बातों में पता लगा कि बड़े खड़ुस शिक्षक हैं लेकिन पढ़ाते बहुत जबरदस्त हैं। मुझे भी लगा कि उनके पास पढ़ना चाहिए। लिहाज़ा मैंने भी मित्रों से कहा कि भई मुझे भी जाना है उनसे पढ़ने के लिए तो उनका जबाव था .... ठीक है चले आओ लेकिन बात करने के लिए अभिभावकों को भेजना होगा। वरना पढ़ाएंगें तो नहीं ही उल्टे धमकाएंगें अलग से। इससे मेरी चिंता बढ़ गई। क्योंकि मेरे पिता जी अपने रोजमर्रा के कामों में इतने व्यस्त होते कि उनके पास इस काम के लिए वक्त शायद ही हो। ऐसे भी पिता जी ने हमें बचपन से अपने काम के लिए स्वतंत्र छोड़ रखा था।
बहरहाल तय हुआ कि अकेले ही चला जाए। मित्रों ने बता रखा था कि सुबह पाँच बजे पढ़ाते हैं। घर का पता भी पता दिया था। सुबह चार बजे उठा गया। पौने पाँच तक साइकिल चलाता हुआ उनके घर के बाहर पहुँच गया। अंदर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अपने अराध्यों को याद करता अंदर दाखिल हुआ। बरामदे में आकर खड़ा हो गया कि घर से कोई बाहर आए तो अपनी बात बताई जाए। थोड़ी देर में कोई संस्कृत का श्लोक कानों में सुनाई दिया। सामने देखा तो भौंचक ये तो वही व्यक्ति थे जिनके पाँव छुता रहा था रास्ते में बिना ये जाने कि ये कौन हैं। उनकी नज़र मुझ पर पड़ी ..... जय हो जय हो जय हो करते हुए तेजी से बाहर आए। मेरी घिग्गी बँध गई। पुछा क्या काम है। आदतवश मैंने पाँव छुकर प्रणाम किया .... कहा सर आपसे पढ़ना चाहता हूं। थोड़ी देर के लिए गंभीर हो गए ... मैंने सोचा मैं तो गया आज .... ज़रूर पूछेंगे पिता जी क्यों नहीं आए। बहरहाल कुछ ही पल में उन्होंने कहा ठीक है.... जाओ पंद्रह मिनट में कापी किताब लेकर आ जाओ। मैं जल्दी जल्दी दुबारा आया। जब आया तो देखा हालनुमा कमरा पूरा भरा हुआ था। सबसे पीछे बैठा।
बहरहाल उनके सानिध्य में हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, इतिहास, और भूगोल आदि विषयों का रोचक रूप से वाक़िक हुआष। बाद में पता चला कि उन्होंने अपनी पढ़ाई गणित विषय के साथ पूरी की है। आश्चर्य हुआ कि गणित और मानविकी का क्या संबंध। लेकिन उनकी पढ़ाई का मुझ पर ये असर हुआ कि गणित से भागने वाला मैं कब गणित से दोस्ती कर बैठा और कब मानविकी मुझे आकर्षित करने लगा .....पता ही नहीं चला। परिणाम ग्याहरवी बारहवी में गणित और कालेज में इतिहास विषय। हिन्दी से आकर्षण तो उन्हीं की वजह से शुरू हुआ। बाद में उनके सानिध्य में हिन्दी विद्यापीठ लाइब्रेयरी में रखी हिन्दी की तकरीबन सभी नामी हस्ताक्षरों को पढ़ा।
बहुत बाद में पता चला कि वो जाति के कुम्हार थे। आश्चर्य हुआ कि कुम्हार इतना विद्वान। दरअसल देवघर वो शहर है जहाँ ब्राह्मणों की आबादी आज भी बहुत है। एक तरह से शहर ब्राह्मणों और पूजा पाठ की वजह से ही जाना जाता। आश्चर्य हुआ कि इतने पुरातनपंथी शहर में एक कुम्हार प्राचार्य को इतना सम्मान। दरअसल सच कहुँ तो ये बाते उस दौरान दिमाग में आई हो ऐसा भी नहीं है। ये बातें तो तब दीमाग में आईं जब जातिव्यवस्था और दलितों पिछड़ों के बारें में जानने समझने को मिला। दरअसल मुझे क्या हर देवघरिए को शहर के इस विरासत पर गर्व होगा।
दरअसल अविनाश जी के मोहल्ले पर दलित साहित्य और दलित चेतना पर चल रही बहस को पढ़ कर नरसिंह पंडित जी का चेहरा कौंध गया था। इसी के साथ कौंधा था उनसे वो अंतिम भेंट जब बीए करने के तत्काल बाद सड़क पर उनसे मुलाकात हुई। आदतवश पैरों पर झुक गया था। सीने से लगा कर उन्होंने पूछा था अब क्या करने का इरादा है। मैंने कहा था पत्रकार बनना चाहता हूं। उनकी आँखों में चमक आ गई थी। आर्शिवाद देते हुए कहा था बहुत अच्छा सोचा है तुमने। मेरे इस फैसले पर अकेले पंडित जी थे जिन्होंने न केवल सकारात्मक बातें कहीं बल्कि उनकी आँखों की चमक देख कर मेरा हौसला दुगुणा हो गया था। बाद में मेरे दिल्ली आने के बाद खबर आई कि पंडित जी नहीं रहे .... अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाया। आज भी उनकी याद आती है तो आँखे नम हो जाती हैं ... स्रद्धा से दिल भर आता है। लगता है अभी झुक कर प्रणाम कर आर्शिवाद ले लूं।