बीते दिनों केंद्रीय कैबिनेट की सुरक्षा संबंधी समिति ने चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सेना की युद्ध क्षमता को प्रोत्साहन देने के लिए एक पर्वतीय कोर के गठन को हरी झंडी दी है, जिसमें 65,000 करोड़ रुपये के खर्च से चीन की सीमा पर 50,000 अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की जाएगी। ये फैसला कई सालों से लंबित था और कई साल के ढुलमुल रुख के बाद आखिरकार पर्वतीय आक्रमण कोर ( माउंटेन स्ट्राइक कोर ) के गठन के प्रस्ताव को हरी झंडी दी गई है। सीसीएस ने जिस प्रस्ताव को मंजूरी दी उसके तहत सेना करीब 50 हजार नए सैनिकों की भर्ती करेगी। आजादी के पैंसठ साल में भारतीय सेना ने इतनी बड़ी संख्या में अपने सैनिक बल में वृद्धि नहीं की है। ज़ाहिर है इसके अपने सामरिक और रणनीतिक मायने हैं।
पर्वतीय युद्ध के लिए पहली हमलावर कोर बनाने के प्रस्ताव को सरकार ने ऐसे समय मंजूरी दी है जब चीन सीमा रक्षा सहयोग समझौते (बीडीसीए) को अंतिम रूप देने पर जोर दे रहा है जिसमें सैन्य सूत्रों के अनुसार परस्पर एवं समान सुरक्षा के सिद्धांत पर खास प्राथमिकता दी गई है। इस सिद्धांत के तहत दो पड़ोसी देश अपनी सरहद पर शांति बनाए रखने और सीमा सहयोग के लिए सीमावर्ती क्षेत्र में एक समान सैन्य तैनाती पर राजी होते हैं। ऐसे समय में जब भारत और चीन के बीच चल रही सीमा सुरक्षा सहयोग करार पर एक सार्थक चर्चा चल रही है, भारत द्वारा लिए गए इस फैसले को जानकार दूरगामी रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं जहां सैन्य ताकत का इस्तेमाल रणनीतिक और सामरिक हित की सुरक्षा के लिए एक डिटरेंट के रूप में किया जाता है।
प्रस्ताव के अनुसार स्ट्राइक कोर का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के पानागढ़ में होगा और चीनी हमले की स्थिति में यह पूरे तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में दुश्मन के इलाके में घुसकर पर्वतीय युद्ध छेड़ने में सक्षम होगी। इसकी दो इन्फेंट्री डिवीजन असम में मिसामारी और लेखापानी से अपने संचालन चला रही हैं। नई स्ट्राइक कोर की यूनिटें लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक के इलाके में फैली होंगी। दो डिविजनों से लैस इस नई टुकड़ी में पर्वतीय युद्धकौशल से लैस 15000 सैनिकों की इंफैटरी ( पैदल सैनिक ) होगें जो भारी तोपखाना ब्रिगेड से लैस होगी। हालांकि दोनों डिविजन की लोकेशन बाद में तय की जाएगी। एक हवाई सुरक्षा ब्रिगेड होगी जो दुश्मनों की ओर से आकाशीय हमले को नाकाम कर सकेगा। हवाई ब्रिगेड में हेलिकाफ्टर, जे सुपर हरक्युलस जैसे एयरक्राफ्ट तैनात होंगे जो सैनिकों को तत्काल कहीं भी उतार सकती है या किसी भी दुर्गम इलाकों से उठा सकती है। पर्वतीय कोर में एक विमानन ब्रिगेड भी होगा जिसमें दो तरह की सैन्य ताकत होगी। एक तो आक्रमण करने की और दूसरे भारी हेलिकाप्टर को चलाने की। एक उच्च प्रशिक्षित इंजीनियरिंग ब्रिगेड होगी जो खराब होने पर उपकरणों को सही करेगा और खतरनाक हिमालयी क्षेत्र में पुलों का या अन्य सुविधाओं का त्वरित निर्माण कर सकेगा।
बोफोर्स तोप और अल्ट्रा लाइट होवित्ज़र से लैस तीन आर्टिलरी ब्रिगेड होंगी जिन्हें प्रत्येक डिविजन के साथ लगाया जाएगा। आर्टिलरी की तीसरी ब्रिगेड को रिजर्व में रखा जाएगा। एक परिवहन ब्रिगेड भी इसका हिस्सा हो सकता है। इस पर्वतीय कोर के सपोर्ट के लिए वायु सेना के साथ सामंजस्य पर खास जोर दिया गया है। चीन के खिलाफ 1962 की जंग में भारतीय वायुसेना ने हिस्सा नहीं लिया था और वायुसेना प्रमुख मान चुके हैं कि अगर उस समय हवाई ताकत इस्तेमाल की गई होती तो जंग का नतीजा कुछ और होता। हवाई ताकत के लिए वायुसेना ने तेजपुर और छाबुआ में सुखोई विमानों की तैनाती कर दी है जबकि हाशीमारा, जोरहाट, बागडोगरा और मोहनबाडी के एयरबेस को उन्नत बनाया जा रहा है। पर्वतीय कोर की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए इस तरह की बुनियादी ढांचों की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता है। हालांकि ये सभी संसाधन स्थापित करने में भारत को तकरीबन पांच से सात साल का वक्त लग सकता है। तब तक ज़ाहिर है चीन अपने सैन्य संसाधन में दोगुणी तिगुनी बढ़ोत्तरी कर चुका होगा।
जानकार इस फैसले का स्वागत करते हैं लेकिन ये भी कहते हैं कि ये बहुत देर से उठाया गया कदम है। ऐसे में जबकि चीन भारत से सटे अपने इलाकों में पिछले एक डेड़ दशकों में सैन्य संसाधनों में लगातार मजबूती भर रहा था भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान और राजनीतिक नेतृत्व मंथर गति से अपनी सीमावर्ती ढांचे में सुधार कर रहा था। बीते कुछ सालों में चीन ने अपने सरहदी इलाके में सामरिक महत्व की 72 सड़कों सहित कुल 58,000 किलोमीटर की सड़कों का जाल बिछा लिया और विशाल रेल लिंक एवं दस हवाई पट्टियों सहित पांच पूरी तरह से सक्रिय हमलावर हवाई बेस भी कायम कर लिए। सूत्रों के अनुसार चीन ने भारतीय सीमा के आस-पास पीपुल्स लिबेरशन आर्मी की दर्जन भर से अधिक रक्षा रेजीमेंट के तीन लाख सैनिक तैनात किए हुए हैं और प्रत्येक में पंद्रह हजार सैनिकों वाली 30 से अधिक चीनी डिवीजनें बेहद कम समय में वह सीमा पर ला सकता है।
भारत का ये फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब तक जो हमारी सुरक्षा तैयारी रही है वो कहीं न कहीं पाकिस्तान केंद्रित रही है। इस समय भारत के पास तीन आक्रमण कोर हैं जो मथुरा में, अम्बाला में और भोपाल में स्थित है। लेकिन मुख्यत: ये तीनों पाकिस्तान से मुकाबले के लिए बनाए गए हैं। लेकिन जिस तरह से चीन लगातार भारत की घेरेबंदी कर रहा है ऐसे में चीन केंद्रित रक्षा नीति और ज़मीनी स्तर पर उसको लागू करने की जरूरत लंबे वक्त से थी। अब योजनाबद्ध तरीके से बनने वाला पर्वतीय आक्रमण कोर बहुउद्देशीय होगा जो भारत के लिए त्वरित मुकाबले वाली ताकत होगी। इस कोर के अस्तित्व में आने के बाद से केवल भारत की सैन्य ताकत में इज़ाफा होगा ऐसी बात नहीं है, बल्कि इससे सीमांत इलाकों में मूलभूत ढांचे के निर्माण के लिए इसका कई मायनों में उपयोग हो सकेगा, जैसे सीमांत जिलों में सड़कों का निर्माण, क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी और उन भारतीयों में आत्मविश्वास जगाना जो मूल नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास रहते हैं और देश जिनकी जरूरतों और सुरक्षा का ध्यान रखता है।
इस फैसले में देरी के लिए जानकार बहुत हद तक देश में राजनीतिक नेतृत्व में दृढ़ता की कमी को दोष देते हैं। 2010 में ही भारतीय सेना की ओर से ये प्रस्ताव मंजूरी के लिए भारत सरकार के समक्ष भेजा गया था। लेकिन सरकार ने इसे वापस सेना को ये कह कर भेज दिया कि इस पर व्यापक तौर से विचार किया जाए। सरकार लगातार फँड का रोना रोती रही। लेकिन बीते सालों में चीन की तरफ से जिस तरह उकसाने वाली कार्यवाहियां होती रहीं उसने कहीं न कही भारत के राजनैतिक नेतृत्व को इस फैसले को आनन फानन में अमली जामा पहनाने के लिए प्रेरित किया। चाहे देवसांग में चीनी सेना की घुसपैठ का मामला हो , या भारतीय रक्षा मंत्री ए के एंटनी के चीन दौरे के वक्त चीनी रक्षा प्रतिष्ठान की तरफ से दिये गए भड़काउ बयान। इन सभी घटनाओं ने इस फैसले की पृष्ठभूमि का निर्माण किया। सीसीएस के सदस्य और भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद इस फैसले पर सधी हुई प्रतिक्रिया देते हैं। बकौल सलमान “ये एक व्यवहारिक फैसला है। देश शांति के साथ-साथ कठिन समय के लिए भी तैयारी करता है। राष्ट्रीय हित में उचित स्तर पर जो भी जरूरत होगी उसे हम करेंगे। हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जो सिद्धांतों के साथ व्यावहारिकता को जोड़ता है। हम अपनी नीतियों में विवेकपूर्ण और अच्छा संतुलन कायम रखते हैं।" लेकिन सरकार इस मुद्दे पर कितनी व्यवहारिक है , इस बात की पोल महज़ दस सालों में चीन से सटे सीमावर्ती इलाकों में सामरिक महत्व की योजनाओं की मंथर गति देखकर ही समझी जा सकती है। ज़ाहिर है सरकार को व्यवहारिकता की समझ देर से आई।
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