शुक्रवार, 30 मई 2014

मोदी के महारथी - सुषमा स्वराज

भाजपा में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के मुद्दे पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में मतभेद की खबरें खुलकर सामने आ रही थीं। सुषमा स्वराज का नाम भी उन संतुष्टों में लिया जा रहा था। लेकिन कहते हैं कि राजनीति में अनुभव का अपना कद होता है। देश की नई विदेश और अप्रवासी मामलों की मंत्री सुषमा स्वराज के संबंध में ये कथन कहीं न कहीं बड़ा ही सटीक मालुम पड़ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभवत इसी राजनीतिक कद को देखते हुए सुषमा स्वराज़ को इतनी महत्ती जिम्मेदारी सौंपी है।

 पार्टी के पितृपुरूष और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से ही सुषमा स्वराज पार्टी की दूसरी पीढ़ी के नेताओं के बीच अग्रिम पंक्ति की नेता मानी जाती रही हैं। अंग्रेजी और हिन्दी दोनों ही भाषाओँ की मुखर वक्ता के रूप में मशहूर सुषमा स्वराज सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक की भी पसंदीदा नेत्रियों में से एक हैं। स्वदेशी आंदोलन और अन्य सांस्कृतिक मुद्दों पर अपनी मुखर विचारों के लिए जानी जाने वाली सुषमा स्वराज ने  सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के मुद्दे पर भी अपने कठोर रूख की सार्वजनिक अभिव्यक्ति के ज़रिए राष्ट्रवादियों की खूब तारीफ बटोरी थी। उससे पहले 1999 में कर्नाटक के बेल्लारी सीट पर हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ खड़े होने के फैसले और उनके धुआंधार प्रचार अभियान ने  , हार के बावजूद भी सुषमा जी के राजनीतिक कद में बढ़ोत्तरी ही की। 

राजनीति में सुषमा स्वराज़ का सफर भी कम लोमहर्षक नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता के घर में जन्म लेने वाली सुषमा स्वराज का राजनीतिक सफर छात्र संगठन अखिल भारतीय विधार्थी परिषद से 1970 में शुरू हुआ था। पहली बार अंबाला कैंट से जीत कर हरियाणा विधानसभा पहुँची सुषमा स्वराज ने चौधरी देवीलाल की सरकार में सबसे कम उम्र में कैबिनेट मंत्री बनने का भी गौरव हासिल किया। सुषमा स्वराज का ये सफर यहीं नहीं रूका , उन्हें सत्ताइस साल की छोटी से उम्र में जनता पार्टी प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया और 1987-90 के बीच राज्य में बनी भाजपा लोकदल गठबंधन की सरकार में शिक्षा मंत्री बनाईं गईं। बाद में राज्यसभा के जरिए राष्ट्रीय राजनीति में उनका पदार्पण हुआ। वो 1996 में 11 वीं लोकसभा चुनाव में दक्षिणी दिल्ली सीट से जीत कर लोकसभा पहुंची। तेरह दिन के लिए बनी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में सुषमा स्वराज ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय का जिम्मा संभाला। हालांकि 1998 में वाजपेयी जी के तेरह महीनों वाली सरकार में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देकर दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री होने का जिम्मा संभाला। हालांकि इसके बाद भी दिल्ली में पार्टी की करारी हार को वो संभाल नहीं पाईं। बाद में उन्हें केंद्र सरकार में स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के अभूतपूर्व जीत के पहले तक श्रीमति स्वराज लगातार लोकसभा में नेता विपक्ष के पद पर रहकर कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की मुखर आलोचना की जिम्मेदारी निभाती रही हैं। सुषमा स्वराज के सौम्य व्यक्तित्व के बीच उनका ओजस्वी भाषण देश के सामने मौजुद नेताओं की पीढ़ी में उन्हें एक अलग मुकाम देता है।

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