शनिवार, 24 मई 2014

जंबो कैबिनेट या सुपर कैबिनेट !

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को मिला जनादेश कई मायनों में अभूतपूर्व है। नतीजे आने के पहले तक विरले राजनीतिक पंडित ही इस निश्कर्ष पर पहुंच पाए थे कि ये जनादेश अस्सी के दशक के उत्तरार्ध से चली आ रही गठबंधन सरकारों के दौर को खत्म कर देगा और भाजपा को अपने दम पर उन विशेषणों से मुक्त कर देगा जो अब तक भारत की मुख्य विपक्छी दल और उग्र हिन्दु राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में व्याख्या देती थी। लिहाज़ा ये जनादेश गठबंधन की उन मज़बूरियों से भी मुक्त है जो शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए क्छेत्रीय दलों के तुष्टिकरण की नीति को बढ़ावा देती थी। जानकार इन्हीं पंक्तियों में कहीं न कहीं नरेंद्र मोदी के कैबिनेट का स्वरूप भी छुपा हुआ देख सकते हैं। ज़ाहिर है गठबंधन की मज़बूरियों से मुक्ति नरेंद्र मोदी को जंबो कैबिनेट की मजबूरियों से मुक्त कर एक सुपर कैबिनेट या  यूं कहें कि एक कसा हुआ कैबिनेट बनाने की प्रेरणा दे सकता है जहां बने रहने के लिए डिलिवरी या दूसरे शब्दों में परिणाम देना जरूरी होगा। इसके लिए मंत्रिमंडल के स्वरूप के पूनर्गठन बेहद जरूरी माना जा रहा है। माना जा रहा है कि मोदी सरकार देश के इतिहास की सबसे कसी हुई सरकार होगी। एक ऐसी सरकार जिसे न तो गठबंधन की मजबूरियों के नाम पर मनमाफिक मंत्रालय लेने के सहयोगी दलों के दबाव के आगे झुकने की मजबूरी है और न ही पार्टी के अंदरूनी समीकरणों में संतुलन बिठाने के लिए बुजुर्ग नेताओं को एडजस्ट करने का दबाव झेलना है। पचहत्तर पार कर चुके नेताओं के लिए राजभवनों के दरवाजे खोलने की तैयारी है। खुद मोदी 63 साल के हैं और उनकी सरकार में एक-दो अपवादों को छोड़ उम्र में उनसे बड़ा कोई नेता शायद ही मंत्री बनाया जाए। सरकारी खर्चों में कटौती करने और काम में दक्षता और कुशलता बढ़ाने के लिए मंत्रालयों में कांट-छांट और उन्हें आपस में मिलाने की सबसे बड़ी कवायद की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक मोदी सरकार के संभावित स्वरूप को लेकर कई महीनों से तैयारियां चल रही हैं।  इसके तहत कई गैरज़रूरी मंत्रालयों को खत्म किया जा सकता है। कई मंत्रालयों को आपस में मिलाने औऱ कई मंत्रालयों को निगमों में तब्दील किया जा सकता है, कई गैर ज़रूरी मंत्रालयों को खत्म करने का भी प्रस्ताव है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को भी आगे जा कर निगम में बदला जा सकता है। जबकि नदियों को जोड़ने या उन्हें साफ करने के लिए एक अलग मंत्रालय या निगम बनाने का भी प्रस्ताव है।

अगर सत्ताधारी दल भाजपा से आ रहे संकेतों को सही मानें तो अभी मौजुद सत्तर से भी ज्यादा मंत्रालयों को घटाकर दो दर्जन के आ
सपास लाया जा सकता है जिसका नेतृत्व कैबिनेट मंत्री के हाथ में होगा। इसके साथ ही प्रत्येक मंत्रालयों में दो चार राज्य मंत्री बनाकर चुनावी जरूरतों को भी पूरा किया जा सकता है। ज़ाहिर है ऐसे में मंत्रिमंडल का कोर यानि महत्वपूर्ण मंत्रालय यानि की लुटियन्स की दभुजाएं साउथ ब्लाक औऱ नार्थ ब्लाक के हिस्से शायद ही सहयोगियों के पास जाएं। विदेश , वित्त, गृह और रक्छा मंत्रालय का जिम्मा पार्टी अपने ही वरिष्ठ और अनुभवी साथियों के हवाले करेगी। इन मंत्रालयों के लिए लुटियन्स की हवा में अरूण जेटली , राजनाथ सिंह सुषमा स्वराज , अरूण शौरी और रविशंकर प्रसाद जैसे नाम परिणाम आने के दिन से ही तैरने लगे हैं। इसी तरह नरेंद्र मोदी भाजपा के विस्तारवादी नीतियों के मद्देनज़र उन राज्यों से आए सांसदों को भी अपने मंत्रीमंडल में जगह दे सकते हैं जहां चुनाव आसन्न हैं। मसलन महाराष्ट्र , हरियाणा, बिहार , उत्तर प्रदेश आदि राज्य संख्या बल के लिहाज से बांकि राज्यों पर भारी पड़ेगें।

भाजपा को अपने बूते बहुमत है। लेकिन सहयोगी दलों के साथ ये आंकड़ा तीन सौ के पार जाता है। लिहाजा मंत्री पदों के चयन में पार्टी सहयोगियों की भावनाओं का ध्यान भी बखुबी रखेगी और सूत्रों की मानें तो इसके लिए जिस फार्मुले को आधार बनाया जा सकता है उसमें  हर सहयोगी दल के न सिर्फ कैबिनेट और राज्य मंत्रियों की संख्या तय की जा रही है बल्कि ये भी तय हो रहा है कि किस पार्टी के कितने मंत्री बनाए जा सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक अभी तक के फार्मूले के मुताबिक लोक सभा के तेरह सांसदों पर एक कैबिनेट मंत्री मिल सकता है। अगर मंत्रिमंडल का आकार छोटा कर सिर्फ पचास का रखा जाएगा तो हर सात सांसदों पर एक मंत्री बनेगा। जबकि सत्तर के मंत्रिमंडल पर यह संख्या पांच हो सकती है। तेलुगु देशम पार्टी को लोक सभा में 16 सीटें मिली हैं। इस लिहाज़ से उसका एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री बनता है। जबकि 18 सीटें हासिल करने वाली शिवसेना को एक कैबिनेट और दो राज्य मंत्री मिल सकते हैं। वैसे वाजपेयी सरकार में शिवसेना को ज्यादा हिस्सेदारी दी गई थी। लेकिन तब बीजेपी की सीटें 182 थीं। अब जबकि बीजेपी के पास 282 सीटें हैं, सहयोगी दलों की हिस्सेदारी अपने-आप कम हो जाएगी।इस फार्मूले के मुताबिक सहयोगी दलों में शिवसेना और टीडीपी को छोड़ किसी अन्य दल के सांसद को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया जा सकता। अन्य सहयोगी दलों में लोक जनशक्ति पार्टी को छह, अकाली दल को चार, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को तीन, अपना दल को दो सीटें मिली हैं। जबकि नगा पीपुल्स फ्रंट, नेशनल पीपुल्स पार्टी, पीएमके, स्वाभिमानी पक्ष और ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस को एक-एक सीटें मिली हैं।

भाजपा के अलावा एनडीए की ऐसी ग्यारह पार्टियां और हैं जिन्होंने लोक सभा में सीटें जीती हैं। इनमें शिवसेना और तेलुगु देशम पार्टी की संख्या दहाई में है। टीडीपी को एक कैबिनेट और दो राज्य मंत्री मिल सकते हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता अशोक गणपति राजू का नाम आगे है। बिहार में मध्यावधि चुनावों की संभावना के मद्देनज़र राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को हिस्सेदारी मिल सकती है। जबकि उत्तर प्रदेश से अपना दल की अनुप्रिया पटेल को भी बतौर राज्य मंत्री सरकार में लिया जा सकता है। अकाली दल एकमात्र ऐसा सहयोगी दल है जिसने सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया है। हालांकि बीजेपी उसे सरकार में शामिल होने का न्योता दे सकती है।  

इस तरह मोदी को ये तय करना होगा कि लोक सभा में संख्या बल कम होने के बावजूद क्या सहयोगी पार्टियों को क्षेत्रीय संतुलन और उनके नेताओं के कद के हिसाब से मंत्रिमंडल में जगह मिलनी चाहिए। मिसाल के तौर पर तेरह सांसदों पर एक कैबिनेट मंत्री के फार्मूले के मुताबिक छह सांसदों वाले राम विलास पासवान को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया जा सकता। लेकिन बिहार में संभावित मध्यावधि चुनाव, पासवान वोटों से मिली बीजेपी को शानदार कामयाबी और पासवान के अनुभव और वरिष्ठता को देखते हुए उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है। मोदी ने दलित एजेंडे पर खास ध्यान दिया है ऐसे में पासवान के दावे को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होगा।

इसी तरह उत्तर पूर्व में असम से आए बेहतरीन परिणामों , सात बहनों में मिले नए सहयोंगियों मसलन नेफ्यु रियो के नेतृत्व में नगा पिपुल्स फ्रंट और पी ए संगमा के रूप में मिले नए सहयोगियों को सरकार में उचित प्रतिनिधित्व से नवाजा जा सकता।तमिलनाडु से बीजेपी के अपने एक सांसद हैं जबकि पीएमके ने भी एक सीट जीती है। जबकि बगल के पुड्डुचेरी से भी बीजेपी के सहयोगी दल ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस को कामयाबी मिली है। इसीलिए क्षेत्रीय संतुलन बिठाने के लिए ऊपर दिए फार्मूले को नज़रअंदाज़ भी किया जा सकता है। इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण बात होगी कि ऐसे राज्य जो आमतौर पर भाजपा के सियासत के अनुकूल नहीं रहे लेकिन इस बार पार्टी वहां भी खाता खोल पाने में कामयाब रही है मसलन बंगाल, उडिसा, तमिलनाडु जैसे राज्यों को भी  सियासी बंजर में कमल खिलाने का पुरस्कार मिल सकता है।

ये बात बिल्कुल साफ है कि नरेंद्र मोदी भारी भरकम कैबिनेट से बचेंग . ‘मोदी मीन्स बिज़नेस’ के मंत्र के साथ आने वाले पाँच साल में काम का खाका तैयार किया जा रहा है। एक ऐसी सरकार की नींव रखी जा रही है जो 21वीं सदी में भारत को एक आर्थिक महाशक्ति बनाने के रास्ते पर मजबूती और तीव्र गति से लेकर जाए। इसीलिए कहा जा रहा है कि 26 तारीख को मंत्रिमंडल में जगह न मिलने से बीजेपी और सहयोगी दलों के कई नेताओं के चेहरे अगर लटके नज़र आएं तो हैरानी नहीं होगी।

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