नरेंद्र मोदी की जीत की रणनीति और एतिहासिक जनादेश के मायने अब खोजे जा रहे हैं और इसकी व्याख्या आगे भी होती रहेगी। लेकिन अगर इस जनादेश को मोटे तौर पर ही देखेंगे तो नरेंद्र मोदी की जीत की एतिहासिक क्रमिकता ( Historical Continuity ) का धागा तो आपके पकड़ में आएगा ही साथ ही सरकार अपने कार्यकाल के दौरान किस तरह के एजेंडे के साथ आगे बढ़ेगी ये भी समझना बहुत मुश्किल नहीं है।
सुत्रों की अगर मानें तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अगली सरकार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर देश भर के शहरों और ग्रामीण इलाकों के लिए लाखों करोड़ रूपए की "स्वच्छ भारत कार्यक्रम" शूरू कर सकती है। इस कार्यक्रम का मकसद होगा गांवों और शहरों में स्वच्छता, गंदे पानी के निकासी के लिए उचित नालों की व्यवस्था, ग्रामीण इलाकों में शौचालयों का निर्माण, पीने के पानी का इंतजाम, ठोस कचरों का प्रबंधन, शहरी इलाकों में सड़क, यातायात और स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था करना, मैला ढोने की प्रथा को पुरी तरह से समाप्त करना। सूत्रों के मुताबिक 2019 में कार्यक्रम के पहले चरण की समाप्ति तक देश के साढ़े तीन लाख से अधिक घरों में ये इंतजाम कर दिए जाएंगें। पांच हजार से भी अधिक गांवों में दो लाख शौचालय बनाए जाने और देश के पांच सौ से एक हजार शहरों में यातायात प्रबंधन सड़कों और स्ट्रीट लाइट की उचित व्यवस्था कर दी जाएगी। ये शहर निर्माण नगर के रूप में जाने जाएंगे और नारी सम्मान और नारी गौरव की चर्चा करने वाले देश में महिलाओं के लिए दो लाख से उपर शौचालय बनाए जाएंगे। पूरा कार्यक्रम पिपुल , पब्लिक, प्राइवेट पार्टनरशील यानी पी4 माडल पर चलाया जाएगा जिसके तहत 2022 तक माडल शहरों को कार्यरूप में परिणत कर दिया जाएगा। ये एक बानगी भर है, जनादेश किस रूप में काम करेगा। इसकी एक और बानगी अगर आप देखना चाहेंगे तो आपको नदी जोड़ो परियोजना और नदियों की सफाई के रूप में एक अलग मंत्रालय के गठन के रूप में दिख जाएगा। इसके तहत न केवल नदियों को यातायात के साधन के तौर पर विकसित किया जा सकेगा, बल्कि बाढ़ के पानी का समुचित प्रबंधन और नदियों की इकोलाजी को बचाए और खुबसुरत बनाए रखने की महत्ती जिम्मेदारी निभाई जाएगी। जिस दक्षिणपंथ पर कारपोरेट घरानों के लिए काम करने का आरोप लगता रहा है वो अपने कार्यक्रम की शुरूआत अगर एक आम हिन्दुस्तानी के दैनिक जीवन की कठिनाइयों को आसान करने से अपने सफर की शुरूआत करना चाहता है तो निस्संदेह जो जनादेश नरेंद्र मोदी को मिला है उसकी गहराई और एतिहासिक क्रमिकता को समझने की जरूरत है।
दरअसल भारतीय जनता पार्टी के सफर की शुरूआत संपूर्ण क्राति के जरिए व्यवस्था परिवर्तन की असफलता से उपजी निराशा से हुई थी। अस्सी के दशक में दो सांसदों से शुरू हुआ सफर इस जनादेश के पहले तक कमंडल के रथ पर सवार होकर आडवाणी जोशी और वाजपेयी के नेतृत्व में 184 तक पहुंचा था और पहली बार देश में एक सफल गठबंधन सरकार चला पाने का अपना पड़ाव पूरा कर पाया था। लेकिन उस जनादेश की अपनी सीमा थी , यही वजह थी कि कमंडल आंदोलन के प्रचंड रथ पर सवार होकर भी सवारी साधारण बहुमत तक के आंकड़ों से दूर थी। हिन्दुस्तान का सामाजिक यथार्थ इस राजनीतिक सफर की सीमा बन गई थी। यानि कमंडल के अश्वमेघ को विश्वनाथ प्रताप के नेतृत्व में मंडल की राजनीति ने बहुमत के आंकड़ों से दूर रखने में न केवल सफलता पाई थी बल्कि देश भर में प्रांतीय क्षत्रपों के तौर पर मंडल के मसीहा पैदा हुए थे। जनता दल का चक्का दिल्ली के तख्तोताज पर ही केवल नहीं आसीन हुआ बल्कि बिहार में लालू यादव, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, या देश भर में जनता दल के नेतृत्व में बनी सरकारें थीं जिसने आगे न केवल कांग्रेस की एकछत्र राजनीति फलक को भी तोड़ कर गठबंधन सरकार चलाने के लिए मजबूर किया बल्कि भाजपा के सपने को भी पूरा नहीं होने दिया। भाजपा को अपने पीछे लगे मुख्य विपक्षी दल के विशेषण से आगे बढ़कर सत्ताधारी दल तक के विशेषण के सफर के लिए ये सबसे बड़ी चुनौती थी और भाजपा की व्यवहारिक गलतियों ने कई बार मंडल के राजनीतिक बिसात को और मजबूत किया। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह , मध्य प्रदेश में उमा भारती या भाजपा और दक्षिणपंथ के थिंक टैंक माने जाने वाले गोविंदाचार्या का हश्न कहीं न कहीं मंडल के मसिहाओं को मजबूत करता गया। लेकिन अपने राजनीतिक सफर में मंडल के मसिहा राजनीतिक उत्थान के पहले पड़ाव पर भी दम तोड़ गए। नारों के रूप में सदियों से दलित और पिछड़ों के लिए वो गौरव की आवाज तो बने लेकिन उनकी अगली पीढ़ी के लिए दैनिक जरूरत पूरी करने, आर्थिक या प्रशासनिक भागीदारी सुनिश्चित करने में नाकाम रहे। यहीं बाज़ी फिर भाजपा के राज्य सरकारों द्वारा खड़े किए गए विकास माडल के पास वापिस चली आई। इन विकास माडल के सीमा और परिणामों पर बहस हो सकती है लेकिन मौजुदा माडल में ये सबसे उपयोगी साबित हुए हैं और लोगों ने हाथो हाथ लिया है इस माडल को। गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ की सरकारों का बारंबार सत्ता में आना कहीं न कहीं इस माडल के सफलता की कहानी बयां करता है।
इसे नेतृत्व नरेंद्र मोदी के हाथ में आने और नरेंद्र मोदी के इस एतिहासिक जनादेश का प्रस्थान बिंदू माना जा सकता है। परिस्थितियां भी उनके अनुकूल थी जहां मंडल और कमंडल के साथ आकर खड़े होने की पटकथा लिखनी शूरू हो गई थी। 2014 के जनादेश के परिणामों को अगर देखें तो उत्तर प्रदेश में 42.3 फ़ीसदी वोटों के साथ 80 में से 71 सीटें भाजपा की झोली में गईं । मंडल के मसीहा मुलायम और बहुजन की आवाज बनी मायवती खेत रहीं। राज्य में सत्रह लोकसभा सीटें अनुसूचित जातियों के लिए सुरक्षित हैं। सारी की सारी सीटें भाजपा की झोली में गईं।
यही नहीं उत्तर और पश्चिम भारत की 75 सुरक्षित सीटों में से भाजपा के खाते में 63 सीटें जाना ही ये अहसास करा देता है कि भाजपा तीन चार दशकों के बाद ही सही अपनी एतिहासिक गलती को दूर कर पाने में कामयाब रही है और पहली बार मंडल और कमंडल साथ आ गये। पटकथा को इस रूप में उतार पाना भारत के दक्षिणपंथ के लिए आसान भी नहीं था। इसके लिए
भारतीय दक्षिणपंथ पिछले एक दशक से प्रतीकों के सहारे उसी रूपक को गढ़ने में लगा था। अति पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाले नरेंद्र मोदी को नायक बनाया जाना, उस नायक के रूपक के लिए उत्तराधिपति रामचंद्र की बजाए काशी के विश्वनाथ का चुना जाना, इसी रणनीति का हिस्सा था। दरअसल महादेव सनातन समझी जाने वाली हिन्दुस्तानी सभ्यता का एकमात्र नायक है जो भूतों प्रेतों मसानियों यानि समाज में हाशिए पर खड़े लोगों के देवता हैं। विकास के माडल और रूपक के जरिए दक्षिणपंथ साधारण बहुमत के जादुई आंकड़ों को पार करने में सफल रहा है और अब इस जनादेश को अपने कार्यव्यवहार में परिणत कर सबका साथ सबका विकास के जरिए दो तिहाई बहुमत तक ले जाने की रणनीति बनाए जाने का वक्त आ गया है। इसमें गलतियां करने का ऐश्वर्य दक्षिणपंथ के नायक नरेंद्र मोदी के पास नहीं है लिहाजा डिलिवरी मैकेनिज्म को दुरस्त करना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी।

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