अरूण जेटली -भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में शायद कुछ ही नेता ये दावा कर सकते हैं कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आंख और कान हैं। 2002 के बाद के परिदृश्य में जब कभी नरेंद्र मोदी की राह में मुश्किलें बढ़ी, अरूण जेटली ने हमेशा उन मुश्किलों का सामना करने में नरेंद्र मोदी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यही वजह है कि पहली बार लोकसभा के मुश्किल महासमर में उतरे इकसठ वर्षीय अरूण जेटली के लिए परिणाम सकारात्मक न होने के बाद भी प्रधानमंत्री ने उन्हें वित्त, कंपनी मामले और रक्षा मंत्रालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। अरूण जेटली जन नेता कभी नहीं रहे लेकिन एक रणनीतिकार के तौर पर पार्टी में उनका कोई सानी नहीं है। यही वजह है कि केवल भाजपा के अंदर ही नहीं बल्कि अन्य दलों के भीतर भी अरूण जेटली को लेकर बेहद सम्मान है। 2014 के चुनावी महासमर में भी जहाँ चुनाव प्रचार बहुत हद तक व्यक्तित्व केंद्रित था , अरूण जेटली अमृतसर के अपने चुनावी अभियान से इतर अपने चुनावी डायरी और ब्लाग्स के जरिए नरेंद्र मोदी के महारथी की भूमिका बखुबी निभाई।पेशे से बड़े वकील माने जाने वाले अरूण जेटली पार्टी के लिए ऐसा चेहरा बन गए हैं जो एक ही वक्त में बाज़ार में सुधारवादी एजेंडे और संघ के पारंपरिक एजेंडे दोनों पर ही बखुबी चल सकते हैं। निस्संदेह अरूण जेटली प्रगतिशील और आधुनिक विचारों से लैस एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जाने जाते हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कसी हुई सरकार और चुस्त प्रशासन के एजेंडे को बखुबी अमल में लाते हैं।
पंजाब के एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले अरूण जेटली को राजनीति विरासत में नहीं मिली थी। सत्तर के दशक में अरूण जेटली का राजनीतिक सफर संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से शुरू हुआ और 1974 में वो दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संगठन के अध्यक्ष चुने गए। केंद्र की तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के भ्रष्टाचारी और तानाशाही रवैय्ये के विरोध में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू किए गए संपूर्ण क्रांति आंदोलन में अपनी सक्रियता की वजह से अरूण जेटली को तकरीबन दो साल जेल में बिताने पड़े। न केवल राजनीति के क्षेत्र में अपनी सक्रियता से अरूण जेटली ने अपनी पहचान बनाई बल्कि कानून के पेशे में वरिष्ट अधिकवक्त के तौर पर भी उन्होंने बखुबी नाम कमाया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में अरूण जेटली को कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी दी गई। गुजरात में 2002 और फिर 2007 में नरेंद्र मोदी के चुनावी प्रचार के लिए भी अरूण जेटली ने महत्वपूर्ण रणनीतिकार की भूमिका निभाकर केंद्रीय स्तर पर उन्हें एक सर्वमान्य नेता के तौर पर खड़ा करने का भी खाका खिंचा। ज़ाहिर है अभूतपूर्व जनादेश प्राप्त करने के बाद सरकारी नीतियों को ज़मीन पर उतार पाने में उनकी भूमिका आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगी।
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नितिन गडकरी - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में नितिन गडकरी एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके लिए अभिनव दृष्टिकोण वाले उपयुक्त प्रशासक सबसे उपयुक्त विशेषण है । ये अनायास नहीं था कि महाराष्ट्र की राजनीति में लो प्रोफाइल रहने वाले नितिन गडकरी ने सबसे कम उम्र में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का मुकाम हासिल किया। लोकसभा के महासमर में नितिन गडकरी नागपुर सीट से चुन कर पहली बार आए हैं। एक ऐसी सीट जो कांग्रेस की परंपरागत सीट मानी जाती रही है। कांग्रेस के प्रत्याशी विलास मुत्तमवार जो लगातार सात बार से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, गडकरी ने उन्हें तकरीबन तीन लाख मतों के अंतर से मात दी है। आजादी के बाद से नागपुर सीट सिर्फ एक बार भाजपा के खाते में आई जब बनवारी लाल पुरोहित पार्टी के टिकट पर चुन कर आए थे। निस्संदेह नितिन गडकरी की इस जीत के मायने बहुत हैं। यही नहीं पूरे महाराष्ट्र में भाजपा शिव सेना गठबंधन ने 48 में से 42 सीटों पर सफलता अर्जित की जिसमें विदर्भ इलाके की सभी दस सीटें शामिल हैं।
अपने काम करने के अभिनव तरीकों के लिए जाने जाने वाले नितिन गडकरी के राजनीतिक जीवन की शुरूआत छात्र के नेता तौर पर अखिल भारतीय विधार्थी परिषद से हुई। आरएसएस के विचारों से गहरे प्रभावित नितिन गडकरी बाद में भाजपा युवा मोर्चे में शामिल हुए। 1975 में इंदिरा गांधी की ओर से आपातकाल की घोषणा उनके जीवन के लिए अहम मोढ़ साबित हुआ जिसके बाद उन्होंने अपने वकालत के पेशे को ठुकराकर समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा। पहली बार लोकसभा में कदम रख रहे गडकरी ने महाराष्ट्र की प्रदेश राजनीति में बतौर मंत्री और विधान परिषद में नेता विपक्ष के तौर पर लंबा सफर तय किया है। मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्में 57 वर्षीय नितिन गडकरी ने अपने विकास कार्यों के जरिए अपने शहर को एक नया चेहरा प्रदान कर पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर न केवल लोगों का ध्यान खिंचा बल्कि पीडब्ल्यूडी मंत्री के तौर मुंबई में बनाए गए फ्लाईओवरों की बदौलत फ्लाईओवर मैन का उपनाम भी हासिल किया। मुंबई - पुणे एक्सप्रेस हाइवे की सफलता ने प्रधानमंत्री वाजपेयी का ध्यान भी खिंचा और इन्हें राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का खाका खिंचने की जिम्मेदारी दी गई। निस्संदेह बुनियादी ढांचे के निर्माण और उनके अभिनव कार्यशैली की बदौलत ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाज रानी मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे और विजन में इन मंत्रालयों की भूमिका महत्वपूर्ण होनी है लिहाज़ा सबकी नज़रे भी नितिन गडकरी की ओर है कि आखिर उम्मीदों के बोझ तले वो कितना खरा उतर पाते हैं।
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एम वेंकैया नायडू - मुप्पावारामु वेंकैया नायडू भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष। आप उन्हें दक्षिण भारत में भाजपा का चेहरा कह सकते हैं। अपनी चतुराई और बेहतरीन संवाद कौशल के लिए जाने जाने वाले वेंकैया नायडू के लिए ये दूसरा मौका है जब केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्हें महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में शहरी विकास और संसदीय कार्यमंत्रालय की जिम्मेदारी खुद ही पार्टी के भीतर और बाहर उनके राजनीतिक कद की कहानी है। इससे पहले अटल जी की कैबिनेट में उन्हें ग्रामीण विकास जैसे अहम ओहदे की जिम्मेदारी दी गई थी। जानकार उस दौरान उन्हें ग्रामीण विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के प्रवर्तक के रूप में याद करते हैं।
1 जुलाई 1949 को आंध्र प्रदेश के नेल्लौर ज़िले के चावटपालेम गांव के एक कम्मा परिवार में जन्में श्री नायुडू अल्पायु में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंद्ध हो गए थे। अपना राजनीतिक सफर उन्होंने अखिल भारतीय विधार्थी परिषद से तब शुरू किया जब 1973 - 74 में उन्हें आंध्र विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष चुना गया। 1972 में शुरू किए जय आंध्र आंदोलन के दौरान उनकी महत्वपूर्ण भूमिका ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खिंचा। के वेंकेटरत्नम ने विजयवाड़ा से इस आंदोलन का नेतृत्व किया था जबकि वेंकैया नायडू नेल्लोर में इस अभियान में खासे सक्रिय थे। सन 1974 में श्री नायडू लोकनायक जयप्रकाश नारायण छात्र संघर्ष समिति के प्रदेश संयोजक बनाए गए और आपातकाल के खिलाफ देशव्यापी अभियान का हिस्सा बने। 1977-80 तक उन्हें भाजपा युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया। दो बार राज्य के उदयगिरी विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले वेंकैया नायडू तीन बार से पड़ोसी राज्य कर्नाटक से राज्य सभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। तेलंगाना और सीमांध्र के रूप में अलग राज्यों के उदय के बाद ज़ाहिर है वेंकैया नायडू के सामने अपनी नई भूमिका में इन राज्यों की आकांक्षाओं को पूरा करने की भी अतिरिक्त जिम्मेदारी होगी।



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