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| Source : Parliament |
पिछले चार दशकों में पहली बार किसी सरकार
को अपने तईं बहुमत मिला। भाजपा पहली बार बहुमत के आंकड़ों के साथ सरकार बनाने में
सफल हुई। निस्संदेह सदियों से मुख्य विपक्षी दल का तमगा झेल रही भाजपा के लिए
सोलहवीं लोकसभा की शुरूआत इससे बेहतर नहीं हो सकती थी। ऐसे वक्त में जब पूर्ववर्ती
सरकार नीतिगत पंगुता ( Policey Paralysis )की शिकार
हो चुकी हो, मंहगाई उफान पर हो, सरकार की छवि घोटाले दर घोटाले से बुरी तरह झुलसी
हुई हो। अपने जीवन में बेहतरी की संभावनाओं की उम्मीद लगाए जनता ने बैलेट के जरिए न
केवल नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया बल्कि तीन दशकों में सियासत की पहचान
बन चुकी गठबंधन की मजबूरी को भी ठेंगा दिखा दिया। जनज्वार से उपज़ा अभूतपूर्व
जनादेश ही नई सरकार के लिए पहली चुनौती भी है। अभूतपूर्व जनादेश के स्वप्निल बौछार
में भींगते – भींगते ही नरेंद्र मोदी सरकार के छह महीने बीत गए। अब
शीतकालीन सत्र में सरकार की नीति और नियत की पहली अग्नि परीक्षा होनी है।
24 नवंबर से शुरू हो रही संसद की
शीतकालीन सत्र में कुल मिलाकर 22 बैठकें आयोजित होनी है। संसद के समक्ष पहले से ही
67 विधेयक लंबित हैं। लोकसभा में आठ और शेष 59 राज्यसभा में। ऐसे में जबकि वित्त
मंत्री लगातार ये कहते नजर आ रहे हैं कि छह फ़ीसदी विकास दर का लक्ष्य बनाए रखना
भी चुनौतीपूर्ण लग रहा है। ऐसे में सरकार का ऐजेंडा क्या होगा , समझना बहुत कठीन
नहीं। वो भी तब झारखंड और जम्मू कश्मीर के चुनाव निपट जाने के बाद लगभग एक साल तक
चुनावी रणनीति बनाए रखने से भी सरकार को निजात मिली हुई है। जनता के नज़र में खरे
उतरने की चुनौती से निपटने के लिए सरकार इस सत्र में आर्थिक सुधार के एजेंडे को
प्राथमिकता में रखेगी, इसमें कोई शक नहीं है लेकिन सरकार के लिए इस एजेंडा को लागू
करना ही बड़े इम्तिहान से गुजरने सरीखा होगा। संसद के भीतर कांग्रेस और गैर एनडीए
दलों के साथ के साथ कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर फ्लोर कार्डिनेशन करने में सरकार के
प्रबंधकों को पसीने आ जाएंगें। खासतौर पर तब जबकि सत्ता पक्ष राज्यसभा में अब भी
बहुमत के आंकड़ों से दूर है।
कांग्रेस के साथ भाजपा के रिश्ते बीते एक पखवाड़े में कुछ और तल्ख हुए हैं।
नेता विपक्ष की कुर्सी से दूरी और नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल विस्तार में सोनिया
गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की अनुपस्थिति खुद ही दोनों दलों के
बीच संबंधों की कटुता की कहानी बयां कर रही है। इस पर जवाहर लाल नेहरू , ईंदिरा
गांधी और सरदार पटेल की विरासत पर दोनों दलों के बीच हुई खिंचतान ने आग में घी का
काम किया है।
यही नहीं अभूतपूर्व जनादेश के बाद देश भर में क्षेत्रीय दलों में एक
तरह की सनसनी है, ज़ाहिर है भविष्य में सियासत में खुद को अप्रसांगिक होने से
बचाने के लिए कभी जनता दल का कुनबा रहे सभी क्षेत्रीय दलों ने एक बार फिर साथ
बैठने की कवायद शुरू कर दी है। इनमें जनता दल युनाइट, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल
सेक्युलर, इंडियन नेशनल लोक दल और समाजवादी पार्टी खास हैं। हालांकि लोकसभा में
इनके साथ बैठने से सरकार के सेहत में शायद ही फर्क पड़े क्योंकि लोकसभा में इनकी
कुल संख्या 15 है लेकिन राज्यसभा में पहले से ही परेशानी महसूस कर रही सरकार के
लिए इनका साथ बैठना और असहज़ करेगा क्योंकि राज्यसभा में इनका आंकड़ा 25 बैठता है।
ऐसे में संसदीय कार्यमंत्री के इस बयान से कि सरकार विपक्षी दलों को साथ लेने के
लिए कुछ अतिरिक्त कदम चलने में गुरेज नहीं करेगी , के जरिए सत्ता पक्ष की जरूरत और
मजबूरी दोनों को परखा जा सकता है।
ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि तनी हुई रस्सी
पर चल रही सरकार महत्वपूर्ण संशोधनों और विधेयकों को इस सत्र में सदन में चर्चा के
लिए लेकर आती है या नहीं। खास तौर पर ऐसे विधेयक जो आर्थिक सुधार के एजेंडे के
लिहाज से मह्त्वपूर्ण हैं। मसलन नई भूमि अधिग्रहण कानून के संशोधन को लेकर विधेयक,
रियल इस्टेट को नियमित करने वाली विधेयक या श्रम सुधार से जुड़े विधेयक। सरकार हर
हाल में टकराव से बचना चाहेगी और अधिकांश मुद्दे पर आम सहमति के रास्ते ही आगे
बढ़ने का रूख करेगी। वस्तु और सेवाकर ( जीएसटी ) विधेयक जैसे बिल जिसे पास कराने
के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी सरकार के पास आम सहमति के रास्ते से आगे
बढ़ने के अलावा शायद ही कोई विकल्प है। सरकार ऐसे तकरीबन 86 विधेयकों पर पहले ही
चर्चा कर चुकी है जो बिल बनने के विभिन्न चरणों में हैं। कोल माइन्स स्पेशल
प्रोभिजन्स बिल जिस पर पहले ही सरकार अध्यादेश ला चुकी है, इंश्योरेंस बिल जो लोकसभा
से पारित होकर राज्यसभा की सेलेक्ट कमिटी के पास है, ऐसे कई विधेयकों पर सरकार को
इसी सत्र में फैसला लेना है। हालांकि सरकार के पास इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर आगे
बढ़ने के लिए संसद के संयुक्त सत्र का भी रास्ता है। एनडीए के पास दोनों सदनों में
कुल 393 सांसद हैं जो कुल सांसदों के आधे 392 से एक ज्यादा है। लेकिन महाराष्ट्र
में शिवसेना के रूठने मनाने के खेल में लगे होने से सरकार के पास शिवसेना के
समर्थन को लेकर उतना स्थायित्व नहीं है जितना जरूरी है । लिहाज़ा सरकार के लिए
संयुक्त सत्र का रास्ता भी बहुत आसान नहीं लगता है, और मौजुदा परिस्थितियों को
देखते हुए सरकार शायद इस रास्ते पर चलना पसंद करे। बिलों और संशोधनों के अलावा
काला धन, महंगाई , इंश्योरेंस सेक्टर में एफडीआई , उद्योंगों के सहुलियत के लिए
जमीन खरीद के नियमों को अनुकूल बनाना, सब्सिडी हटाने, देश के कई हिस्सों में हुए
सांप्रदायिक दंगे और अदानी समूह को एसबीआई की ओर से ऋण उपलब्ध कराने जैसे अनेकों
मुद्दों हैं जिस पर टुकड़ों में बंटी विपक्ष एक मंच पर आकर सरकार को घेरने की
कोशिश करेगी।
ऐसे में बिल्कुल साफ है कि शीतकालीन सत्र मोदी सरकार के लिए
घरेलु मोर्चे पर पहली बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होगी और सरकार के प्रबंधकों को सदन
में कई कदम आगे बढ़कर इनसे आगे निकलने का रास्ता ढूंढ़ना होगा।

