रविवार, 30 सितंबर 2007

आसमान में धान


शेखर पेशे से पत्रकार हैं। स्टार न्यूज़ में काम करते हैं। अक्सर मुझे कविताएं भेजते रहते हैं। ये कविताएं विभिन्न विषयों पर होती हैं। इन सबमें इंसानियत के प्रति उनकी संवेदना का अहसास तारी होता है। एक बार फिर उन्होंने ये कविता मुझे भेजी है। मुझे अच्छी लगी। आप भी इसे पढ़ सकते हैं...

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मैं किसान हूँ.........
आसमान में धान बो रहा हूँ.........
कुछ लोग कह रहे हैं कि पगले !
आसमान में धान नहीं जमा करता.........
मैं कहता हूँ पगले !
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है तो
आसमान में धान भी जम सकता है.............
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा..............
या आसमान में धान जमेगा......................

शुक्रवार, 28 सितंबर 2007

क्या आप बिमल और विलियम को जानते हैं ....


जीत गए भई जीत गए... के गगनभेदी नारों के बीच भारतीय क्रिकेट टीम का मुंबई वासियों ने जम कर स्वागत किया। किसी चैनल में कोई एंकर गले फाड़ फाड़ कर बता रहा था सैंतीस लाख लोगों की भीड़ उमड़ी धोनी के धुरंधरों के स्वागत में ... मुंबई की हर गली मानो भारतीय टीम के स्वागत में पलक पाँवड़े बिछाए बैठी थी! मुंबई ही क्यों सारा देश मानों उन्हीं नारों के साथ अपनी सुर में सुर मिला रहा था। चौबीस साल के अंतराल के बाद हमने विश्व कप को चूमा था। एक पूरी पीढ़ी (पुरानी वाली) इस पल को देख कर नास्टेलजिक हुई जा रही थी और दूसरी अपेक्षाकृत नई पीढ़ी उस क्षण को इस पल में जीने की कोशिश कर रही थी। बहरहाल टीम की शोभा यात्रा देखने वालों की भीड़ शायद सभी रिकार्ड तोड़ने पर आमदा थी। उसी पल किसी चैनल ने न्यूज़ ब्रेक किया भारतीय क्रिकेट टीम के सम्मान पर खेल पदाधिकारियों के दोगले रवैय्ये से आहत भारतीय हाकी टीम के कुछ खिलाड़ी भूख हड़ताल पर। समाचार चैनल वालों के लिए तो मानों बिन मांगे मुराद पूरी हो गई । सुबह से जो मुंबई शो पर आठ आठ विंडो काट कर पगलाए जा रहे थे उन्हें स्टोरी में नया एंगल जुड़ता दिखा। फिर तुलना शुरू हुई ... विश्व कप और एशिया कप हाकी में जीत की। बहरहाल कुछ देर में ही अधिकांश चैनलों पर हाकी विलाप (?) दम तोड़ता नज़र आया। लेकिन इन सबमें एक बात जो वाकई अखरने वाली थी ... वो ये कि क्या सचमुच देश में क्रिकेट की तुलना में हाकी या अन्य भारतीय खेलों की हालत खास्ता नहीं है ? क्या सचमुच ऐसा नहीं है कि रांची के धोनी को तो बच्चा बच्चा जानता है जबकि उसी झारखंड के बिमल लाकड़ा को शायद ही कोई जानता हो? क्रिकेट में कल के छोकरों को तो हम सर आँखों पर बिठाए घुम रहे हैं लेकिन राष्ट्रीय खेल हाकी की तरफ जब देखते हैं तो अतीत के चंद सुपर स्टारों के अलावा हम किसी को पहचानते तक नहीं। क्या चेन्नई में आयोजित एशिया कप हाकी में भारतीय टीम का प्रदर्शन ऐसा नहीं था कि हमें सुनहरे अतीत की याद अनायास हो आई थी? बीस शून्य के अंतर से थाईलैंड को कूटने और ऐसे ही एक दो भारी अंतरों से अन्य टीमों को कूटने के बाद क्या हमें रूप सिंह और ध्यान चंद जैसे दिग्गजों की याद नहीं आने लग गई थी? क्या हम फिर आपस में हिटलर और ध्यानचंद के बीच हुए उस एतिहासिक गल्प को एक दूसरे को बढ़ चढ़कर नहीं सुना रहे थे जिसमें ध्यानचंद को हिटलर की तरफ से दी गई पेशकश , उसको ध्यानचंद की तरफ से ठुकराने और फिर ध्यानचंद की स्टीक को जादू की छड़ी कह कर बदलने की कथाएं शामिल थीं? इतना सब होने के बाद भी क्या भारतीय हाकी टीम हमारे प्यार और इज्ज़त की हकदार नहीं थी? क्या उन्हें भी वो सब सम्मान नहीं मिलना चाहिए था जो बीसबिसया विश्व कप जीत कर आने वाली भारतीय टीम को दिया गया? मज़ा तो देखिए जब भारतीय हाकी टीम अपनी अभियान में लगी हुई थी उसी दौरान हाकी संघ में बैठे कुछ सनकी अधिकारियों ने ये बयान दे डाला कि हरेक गोल पर एक हज़ार का इनाम और गोल खाने पर दो हज़ार की कटौती खिलाड़ी के खाते से। चलिए हाकी के गरीब गुरबा खिलाड़ियों को चाहें आप जितना आँखें दिखा लें ... किसी की ये सवाल युवराज सिंह से पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि भई तुमने छह छक्के मारे तो एक करोड़ हसोत लिए ... उन पांच छक्कों का क्या जो तुम्हारे एक ओवर में किसी बल्लेबाज ने तुमपे जड़ दिए थे? क्या इसके लिए युवराज की कमाई का हिस्सा काटने की हिम्मत क्रिकेट संघ में बैठा कोई सनकी साँड़ नुमा पदाधिकारी कर सकता था? कुछ लोग ज़ाहिरा तौर पर जो बिकता है वो दिखता है ... एड जगत की अपनी मजबूरियों और कारपोरेट दलीलों का सहारा लेकर आसान रास्ते के ज़रिए इन सवालों से कन्नी काट लें लेकिन इसके बावजूद हम इस सवाल से बचने का कोई ठोस तर्क ढूंढ़ पाने में शायद असफल ही रहेंगें या फिर यक्ष प्रश्न की भांति ये सवाल हमें मुंह चिढ़ाता ही रहेगा कि क्या आप बिमल और विलियम को जानते हैं ...?????

बुधवार, 26 सितंबर 2007

जीत गए भई जीत गए .........


क्रिकेट के नए मैगी... बस दो मिनटिया ट्वेंटी ट्वेंटी संस्करण में भारत विश्वविजेता बन गया। हरफ़नमौला खिलाड़ियों से लबरेज धोनी के नेतृत्व में युवाओं की टीम ने चमत्कार कर दिया। चौबीस साल के अंतराल पर हमने देखा विश्व कप में कैसा जीता जाता है। एक पूरी पीढ़ी ने महसूस किया विश्व कप की जीत के बाद भारतीय तिरंगा का लहराना कैसा होता है। एक पूरी पीढ़ी मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि हममें से कई नौजवान ऐसे थे जिन्होंने १९८३ में कपिलदेव की टीम को लार्डस में जितते नहीं देखा था बस सुना था ... उस वक्त वाकई देश भर में लगभग ऐसा ही कुछ माहौल रहा होगा। बहरहाल धोनी की टीम ने देखते ही देखते इतिहास रच दिया। इसके साथ ही विश्व कप में पाकिस्तान को लगातार पटखनी देने का अपना रिकार्ड भी अक्षुण्ण बना रहा। बहरहाल इन सबमें एक बात जो मुझे निरंतर खल रही है... पाकिस्तानी कप्तान को वो बयान जिसमें हार के बाद रवि शास्त्री से बात करते हुए अपनी हार के लिए दुख का इज़हार करते हुए उनने पूरे मुस्लिम जगत से माफी मांगी। क्या पाकिस्तानी कप्तान का ये बयान जायज़ था ? क्या पाकिस्तानी टीम पूरे मुस्लिम जगत का प्रतिनिधित्व करती है ? दरअसल ये बयान कुछ वैसा ही है जो पाकिस्तान के राजनेताओं का रहता आया है। पाकिस्तानी राजनेताओं के इस तरह के बयानों का मतलब तो आसानी से समझा जा सकता है। एक राष्ट्र राज्य के रूप में पाकिस्तान की असफलता को तो आसानी से इस्लामी मुखौटे के पीछे छिपाया जा सकता है। क्योंकि पाकिस्तानी के नीति नियंताओं के पास इसके अलावा और कोई विकल्प भी नहीं। चोरी छिपाए चलाए जा रहे पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को इस्लामी बम कहने तक को राजनीतिक रूप से जायज माना लेते हैं ये सोच कर कि चलो उनकी मजबूरी है। लेकिन क्रिकेट के मैदान में हार जीत को धार्मिक स्वरूप देने की बात कहाँ तक जायज़ है ? क्या भारत के विरूद्ध क्रिकेट मैच को धर्मयुद्ध या ज़िहाद के चश्मे से देखा जाना उचित है ? ऐसे में जबकि भारत में मुसलमानों की जनसंख्या पाकिस्तान जैसे देशों से कहीं अधिक है। इस लिहाज़ से जब युसूफ पठान पाकिस्तानी गेंदबाजों की लपलपाती गेंद को बाउंड्री के दर्शन करा रहे तब तो वो इस्लाम के विरूद्ध काम कर रहे थे ??? पाकिस्तानी गेंदबाजों को उन्हें आउट करने से पहले फिर तो सोचना चाहिए था ... आखिर वो एक मुसलमान को आउट करके इस्लाम विरूद्ध काम कर रहे थे। फिर इरफ़ान पठान की गेंद का तो हर पाकिस्तानी गेंदबाज को सम्मान करना चाहिए था ... आख़िर वो एक मुसलमान की गेंद को कैसे पीट सकते हैं ??? हे भगवान पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने पूरे मैच में इस्लाम के विरूद्ध काम किया । अब वो किस मूंह से खुद को इस्लाम के बंदे कह पाएंगें ??? दरअसल जो भी ऐसे बयान दे कर अपनी असफलता को छिपाने का कुत्सित प्रयास करते आये हैं वो न तो इस्लाम को जानते हैं न हीं धर्म के मर्म को। जिस धरम के नाम पर मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान बनवाने में सफल रहे उसी धरम का वो कभी भी सम्मान नहीं कर पाए। ज़िन्ना कितने आधार्मिक किस्म के थे और किस तरह से शराब और सिगार के शौकिन थे ये किसी से छिपी नहीं है। आज़ाद भारत और पाकिस्तान के हुक्मरानों को कम से कम अब छह दशक के बाद ये बात आसानी से समझ में आ जाना चाहिए था कि पाकिस्तान का जन्म एक राजनीतिक कदम था न कि धार्मिक ... बहरहाल पाकिस्तान के कप्तान का इस तरह का बयान न केवल फिजुल था बल्कि अपनी असफलता को छिपाने की कुत्सित प्रयास के रूप में भी इसे देखा जाना चाहिए। ऐसे में क्या क्रिकेट की अंतर्राष्ट्रीय संस्था आईसीसी इस पूरे मामले में कोई कार्रवायी करेगी ?