रविवार, 7 अक्टूबर 2007

उजाले उनकी यादों के .....


बहनों और भाइयों ....आवाज़ की दुनिया के दोस्तों .... सभी सुनने वालों को
कमल शर्मा का नमस्कार... और न जाने कितने कार्यक्रम ... हवा महल, जयमाला, पिटारा, सेहत नामा , हैलो $$$$ फ़रमाइश, सेल्युलायड के सितारे, बाइस्कोप की बातें , मंथन, उजाला उनकी यादें के ... और न जाने क्या क्या ... बस आंख खुलते ही विविध भारती सुनते और देर रात को सोने तक कमरे के एक कोने में पड़ा रेडियो अपनी ध्वनी तरंगों के ज़रिए बक बक करता रहता , दुनिया भर की बातें बताता ... और साथ में होता हिन्दी फिल्मों का एक से बढ़कर एक गीत। इसके साथ हम कब बड़े होते गए पता ही नहीं चला। उम्र तेज़ी से भागती गयी। वो यादें पीछे छुट गयीं ... अपने तमाम खट्टे मीठे अनुभवों के साथ.... पंचरंगी कार्यक्रम के पचास साल के ज़रिए उन्हीं यादों को आप एक बार फिर जी सकते हैं ... बस उठाइए कलम लिख डालिए उन यादों को जिसमें आप हैं और आपके साथ ही आपका प्यारा पंचरंगी कार्यक्रम विविध भारती ... इंतजार रहेगा ... लिखिएगा ज़रूर

2 टिप्‍पणियां:

Manjit Thakur ने कहा…

कई लोग रेडियो सुन-सुनकर जवान हुए हैं.. मैं भी.. लेकिन मेरी यादें कुछ अलग तरह की हैं। मेरे घर में किसिम-किसिम के रेडियो मौजूद रहते थे। एक बेहद बड़ा-सा रेडियो, स्साला बहुत बैटरी खाता था। हम बच्चे थे, बड़े भईया उसकी बैटरी का खर्च अपने पाकेट मनी- आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि कितनी होती होगी- से निकालेते थे। बाद में बैटरीखउका रेडियो हमारे घर के कबाड़ वाले कमरे में पहुंच गया। हमेशा के लिए..वैसे ही जैसे घर के बेहद बुजुर्ग दालान पर पहुंच जाते हैं।
अगला रेडियो आया.. साइज़ में छोटा प्यारा-सा। संतोष कंपनी का। लोकल मेड। फिलिप्स वगैरह लेना उस वक्त अय्याशी समझी जाती। हामेर हाथ से कई-कई बार गिर कर हाथ पैर तुड़वा बैठा। बाद में उसमें रबर के बैंड वगैरह लगा कर अस्थिपंजर जोड़े गए। लेकिन उस रेडियों के लिए कान पकड़कर उठक-बैठक लगवाई गई.. वह आज तक याद है। रेडियों में भाई साहब समाचार सुनते...यह आकाशवाणी है, अब आप देवकी नंदन पांडेय से समाचार सुनिए.. प्रधानमंत्री ने फलां कहा.. ढिमका कहा...ऐसा हो गया, वैसा हो गया।
खेल समाचार संजोय बैनर्जी से.... मेरी याद्दाश्त ज़्यादा अच्छी नहीं.... कार्यक्रमों में युववाणी.. जयमाला वगैरह ही याद हैं। युववाणी को मैं बहुत दिनों तक युगवाणी जानता रहा। .... एक बात और... हमारे घर बहुत दिनों तक टीवी नहीं था। टीवी आया सन ८८ में। तब तक हम क्रिकेट मैच, रामायण, समाचार या चित्रहार देखने पड़ोस के घरों में जाया करता। आमतौर पर बिजली नहीं होती, होती भी क्रिकेट मैचों और समाचारों में पडो़सी की रूचि नहीं होती। बैटरी वह किसी और प्रोग्राम के लिए बचाकर रखता । ऐसी विषम स्थितियों में मुझे एक प्रेयसी की तरह शरण देती।
सच तो यह है कि बहुत बुद्धिजीवी नहीं होने की वजह से आज भी चालू न्यूज़ चैनलों पर मैं एफएम चैनलों को तरज़ीह देता हूं। ज़ाहिर है, गोल्ड और रेनबो को। बाकी के एफएम तो उनकी तरह ही चालू हैं।....शेष तो अशेष है...

Manjit Thakur ने कहा…

कई लोग रेडियो सुन-सुनकर जवान हुए हैं.. मैं भी.. लेकिन मेरी यादें कुछ अलग तरह की हैं। मेरे घर में किसिम-किसिम के रेडियो मौजूद रहते थे। एक बेहद बड़ा-सा रेडियो, स्साला बहुत बैटरी खाता था। हम बच्चे थे, बड़े भईया उसकी बैटरी का खर्च अपने पाकेट मनी- आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि कितनी होती होगी- से निकालेते थे। बाद में बैटरीखउका रेडियो हमारे घर के कबाड़ वाले कमरे में पहुंच गया। हमेशा के लिए..वैसे ही जैसे घर के बेहद बुजुर्ग दालान पर पहुंच जाते हैं।
अगला रेडियो आया.. साइज़ में छोटा प्यारा-सा। संतोष कंपनी का। लोकल मेड। फिलिप्स वगैरह लेना उस वक्त अय्याशी समझी जाती। हामेर हाथ से कई-कई बार गिर कर हाथ पैर तुड़वा बैठा। बाद में उसमें रबर के बैंड वगैरह लगा कर अस्थिपंजर जोड़े गए। लेकिन उस रेडियों के लिए कान पकड़कर उठक-बैठक लगवाई गई.. वह आज तक याद है। रेडियों में भाई साहब समाचार सुनते...यह आकाशवाणी है, अब आप देवकी नंदन पांडेय से समाचार सुनिए.. प्रधानमंत्री ने फलां कहा.. ढिमका कहा...ऐसा हो गया, वैसा हो गया।
खेल समाचार संजोय बैनर्जी से.... मेरी याद्दाश्त ज़्यादा अच्छी नहीं.... कार्यक्रमों में युववाणी.. जयमाला वगैरह ही याद हैं। युववाणी को मैं बहुत दिनों तक युगवाणी जानता रहा। .... एक बात और... हमारे घर बहुत दिनों तक टीवी नहीं था। टीवी आया सन ८८ में। तब तक हम क्रिकेट मैच, रामायण, समाचार या चित्रहार देखने पड़ोस के घरों में जाया करता। आमतौर पर बिजली नहीं होती, होती भी क्रिकेट मैचों और समाचारों में पडो़सी की रूचि नहीं होती। बैटरी वह किसी और प्रोग्राम के लिए बचाकर रखता । ऐसी विषम स्थितियों में मुझे एक प्रेयसी की तरह शरण देती।
सच तो यह है कि बहुत बुद्धिजीवी नहीं होने की वजह से आज भी चालू न्यूज़ चैनलों पर मैं एफएम चैनलों को तरज़ीह देता हूं। ज़ाहिर है, गोल्ड और रेनबो को। बाकी के एफएम तो उनकी तरह ही चालू हैं।....शेष तो अशेष है...