
.... दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी ने राज्य चुनाव में जीत हासिल करने के लिए बड़ी सुनियोजित तैयारी की थी। ये तैयारी कांग्रेस की तरह अंत के एक महीने की मशक्कत नहीं थी बल्कि सत्ता में आने के अगले दिन से राज्य में अगले विधानसभा की तैयारी शुरू हो गई थी। कहा ये जाता है कि नरेंद्र मोदी ने राज्य में प्रत्येक दस घर पे एक कार्यकर्ता लगा रखा है। यानि उस दस घर की सुख दुख उस कार्यकर्ता के जिम्मे। क्या कांग्रेस ने वाकई राज्य में ऐसी मेहनत की थी। इसके अलावा नरेंद्र मोदी की सबसे पहले अपनी छवि एक काम करने वाले मुख्यमंत्री यानि विकास पुरूष के रूप में खुद को स्थापित करने की थी। इसके लिए नरेंद्र मोदी ने न केवल काम किया बल्कि उस काम को कार्यकर्ताओं के जरिए मतदाताओं तक पहुंचाने में सफलता भी हासिल की। आप भले ही ये कह कर ढोल पींटे कि ये तो हम तो बस काम करते हैं प्रचार नहीं तो शायद आप खुद को भुलावे में रख रहे हैं। दरअसल आप जितना काम करते हैं उससे ज्यादा उसकी मार्केटिंक की जानी चाहिए आज यही सफलता का मूल मंत्र है।
आम जरूरत की चीजें मसलन बिजली पानी और सड़क जैसी समस्याओँ के समाधान को को तो गुजरात में जमीनी स्तर पर देखा जा सकता है। और इस बात की तारीफ न केवल जनता बल्कि विरोधी तक करते हैं। बिजली सुधार को लेकर गुजरात में शुरू किए गए ज्योतिग्राम योजना की सफलता से भी भाजपा कार्यकर्ता उत्साहित थे। इन मुद्दों पर कांग्रेस तो राज्य में भाजपा को कोस नहीं ही सकती थी ( हालांकि उसने कोसा भी जिसका मतदाताओं में कांग्रेस के प्रति नकारात्मक संदेश गया) उल्टे कांग्रेस इस पूरे मुद्दे पर अजीब दुविधा की शिकार दिखी। जसदण और गाँधीधाम की चुनावी रैली में जहाँ कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने ज्योतिग्राम योजना को पूरी तरह से लागू न कर पाने के लिए राज्य सरकार पर निशाना साधा वहीं केंद्र में यूपीए सरकार के बिजली मंत्री और महाराष्ट्र में कांग्रेस के दलित चेहरा सुशील कुमार शिंदे ने राजकोट में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में ज्योतिग्राम को राजीव गांधी ग्रामीण विधुतिकरण मिशन से जोड़ कर इसकी सफलता का स्रेय केंद्र के कंधों पर रखा। ज़ाहिर है ये विरोधाभासी वक्तव्य था। एक ओर सोनिया जी ज्योतिग्राम योजना की कमियाँ गिना रहीं हैं तो दूसरी ओर उन्हीं के मंत्री इसे केंद्र की योजना बताकर उसकी तारीफ कर रहे हैं। आखिर मतदाता किसे सही माने।
इसमें कोई शँका नहीं कि पानी बिजली और सड़क पर गुजरात में अच्छा काम हुआ जिसकी तस्दीक जनता ने भी की। पानी के मुद्दे पर राजकोट जैसे शहर में दो साल पहले लड़ाई होती थी। जब हम चुनाव कवरेज के लिए राजकोट पहुंचे तो वहाँ पानी कोई मुद्दा बचा ही नहीं था। राजकोट से पिछले तेइस सालों से जीत रहे गुजरात के वित्त मंत्री वजुभाई वाला को पानी वाला मेयर के नाम से पुकारा जाता है। पानी की समस्या के निराकरण के लिए राजकोट में वजुभाई के विरोध में खड़ी कांग्रेस प्रत्याशी कश्मीरा नथवाणी भी उनकी प्रशँसा करती हैं। यही नहीं राजकोट से ढाई सौ किलोमीटर दूर कच्छ के गाँधीधाम जैसे शहरों और आस पास के ग्रामीण इलाकों तक पीने का पानी पहुंचा गया है। जो उस इलाके से वाकिफ हैं वो इस बात का महत्व समझ सकते हैं क्योंकि ये पूरा इलाका मरूस्थलीय है।
हालाँकि राज्य में भाजपा ने अपने किए गए पिछले सभी वादे पूरे किए हों ऐसा भी नहीं हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी ने बड़ी चतुराई से ( या कांग्रेस की नासमझी से ) उन वादों की चर्चा ही नहीं होने दी।
लेकिन चेक डैमों की भरमार और पीने के पानी की मौजूदगी से जनता को इस बात का विश्वास ज़रूर बना कि आने वाले समय में कच्छ जैसे इलाकों तक सिंचाई का पानी भी मिलने लगेगा।काँग्रेस मुद्दा बना रही थी बिजली बिल जमा नहीं करने की वजह से जिन्हें सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा उनके अंसंतोष को। ज़ाहिर है ये नकारात्मक राजनीति थी। वज़ह साफ है जिन्हें सरकार बिजली पानी मुहैय्या करा रही है उससे बिल भी वसुल करेगी। लेकिन बिल जमा नहीं करने वालों के लिए कठोर सजा का भी प्रावधान किया गया था। जिसकी वजह से कुछ किसान नाराज़ जरूर थे। और इसको लेकर चुनाव से पूर्व के दिनों कई जगह धरने प्रदर्शन भी हुए थे। लेकिन इन सबसे राज्य प्रशासन की छवि एक कठोर प्रशासक की बनीं जिसका कोई भी विवेकबान व्यक्ति विरोध नहीं करेगा। लोकलुभावन राजनीति की तुलना में ये बेहतर उपाय है चुनाव जीतने के लिए... शायद इस बार कांग्रेस को गुजरात में ये सबक भी मिला होगा।
लेकिन चेक डैमों की भरमार और पीने के पानी की मौजूदगी से जनता को इस बात का विश्वास ज़रूर बना कि आने वाले समय में कच्छ जैसे इलाकों तक सिंचाई का पानी भी मिलने लगेगा।काँग्रेस मुद्दा बना रही थी बिजली बिल जमा नहीं करने की वजह से जिन्हें सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा उनके अंसंतोष को। ज़ाहिर है ये नकारात्मक राजनीति थी। वज़ह साफ है जिन्हें सरकार बिजली पानी मुहैय्या करा रही है उससे बिल भी वसुल करेगी। लेकिन बिल जमा नहीं करने वालों के लिए कठोर सजा का भी प्रावधान किया गया था। जिसकी वजह से कुछ किसान नाराज़ जरूर थे। और इसको लेकर चुनाव से पूर्व के दिनों कई जगह धरने प्रदर्शन भी हुए थे। लेकिन इन सबसे राज्य प्रशासन की छवि एक कठोर प्रशासक की बनीं जिसका कोई भी विवेकबान व्यक्ति विरोध नहीं करेगा। लोकलुभावन राजनीति की तुलना में ये बेहतर उपाय है चुनाव जीतने के लिए... शायद इस बार कांग्रेस को गुजरात में ये सबक भी मिला होगा।
ज़ाहिर है इन गए कामों का प्रचार भी उतना ही जबरदस्त था विरोधी भी प्रशंसा करते नहीं अघा रहे थे ।अगर आप इन भुलावे में हैं कि नरेंद्र मोदी इतना काम करने के बाद संतुष्ट बैठ गए तो आप उन्हें कम करके आंक रहे हैं। दरअसल चुनाव जीतने के लिए नरेंद्र मोदी ने राज्य में विरोधियों के खिलाफ साम दाम दंड भेद हर उस नीति को आजमाया। प्रचार की कमान अपने हाथ में रख उन्होंने कार्यकर्ताओं को आगे किया। तीन बार से सत्ता में बने रहने से जो सत्ता विरोधी लहर ( एंटी इनकंबेंसी) थी उस बात को ध्यान में रखा गया। यही वजह थी कि पचास पूर्व विधायकों के टिकट काटे गए ... अस्सी से भी अधिक नए चेहरे आजमाए गए और रिबेल्स के विरोध में महिलाओं को टिकट दिए गए। इस बात से राजनीतिक पंडितों और विरोधियों ने उन्हें आटोक्रेट जैसे शब्दों से भी नवाज़ा। किसे फिक्र है आप चाहें जो कहें असली काम चुनाव जीतना है।
ज़ाहिर है नरेंद्र मोदी ने अपने सभी योद्धाओँ को सही समय पर सही चाल से उतारा था। मतदान के दिन कई जगहों से ऐसी भी खबरें आईं कि कुछ गाँवों में पहचान पत्र खरीदे जा रहे हैं पंद्रह सौ रूपए में। हालांकि इसकी पुष्टि मैंने तो नहीं की लेकिन ऐसी बात वहां के स्थानीय पत्रकारों के बीच भी चर्चा का केंद्र बना था। दूसरी तरफ राजकोट में एक बूथ पर कई वोहरा सोसाइटी में रहने वाले मतदाताओं ने मीडिया के सामने बड़ी संख्या में ये शिकायतें भी की कि उनके पहचान पत्र तो हैं लेकिन मतदाता सूची से उनके नाम ही गायब हैं। ज़ाहिर है चुनाव जीतने के लिए हर तरह की तैयारी थी भाजपा और नरेंद्र मोदी की तरफ से। लेकिन काँग्रेसी योद्धा बस हवा में ही तलवारें भाँज रहे थे। इसलिए मेरे मन में ये ख्याल आया था ... मैदान में हार जीत तो किस्मत की बात है , टूटी है किसके हाथ में तलवार देखिए । शायद अब काँग्रेस देख पाए।।।।।।।।।।।।

