रविवार, 30 दिसंबर 2007

भाग तीन - टूटी है किसके हाथ में तलवार देखिए


.... दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी ने राज्य चुनाव में जीत हासिल करने के लिए बड़ी सुनियोजित तैयारी की थी। ये तैयारी कांग्रेस की तरह अंत के एक महीने की मशक्कत नहीं थी बल्कि सत्ता में आने के अगले दिन से राज्य में अगले विधानसभा की तैयारी शुरू हो गई थी। कहा ये जाता है कि नरेंद्र मोदी ने राज्य में प्रत्येक दस घर पे एक कार्यकर्ता लगा रखा है। यानि उस दस घर की सुख दुख उस कार्यकर्ता के जिम्मे। क्या कांग्रेस ने वाकई राज्य में ऐसी मेहनत की थी। इसके अलावा नरेंद्र मोदी की सबसे पहले अपनी छवि एक काम करने वाले मुख्यमंत्री यानि विकास पुरूष के रूप में खुद को स्थापित करने की थी। इसके लिए नरेंद्र मोदी ने न केवल काम किया बल्कि उस काम को कार्यकर्ताओं के जरिए मतदाताओं तक पहुंचाने में सफलता भी हासिल की। आप भले ही ये कह कर ढोल पींटे कि ये तो हम तो बस काम करते हैं प्रचार नहीं तो शायद आप खुद को भुलावे में रख रहे हैं। दरअसल आप जितना काम करते हैं उससे ज्यादा उसकी मार्केटिंक की जानी चाहिए आज यही सफलता का मूल मंत्र है।
आम जरूरत की चीजें मसलन बिजली पानी और सड़क जैसी समस्याओँ के समाधान को को तो गुजरात में जमीनी स्तर पर देखा जा सकता है। और इस बात की तारीफ न केवल जनता बल्कि विरोधी तक करते हैं। बिजली सुधार को लेकर गुजरात में शुरू किए गए ज्योतिग्राम योजना की सफलता से भी भाजपा कार्यकर्ता उत्साहित थे। इन मुद्दों पर कांग्रेस तो राज्य में भाजपा को कोस नहीं ही सकती थी ( हालांकि उसने कोसा भी जिसका मतदाताओं में कांग्रेस के प्रति नकारात्मक संदेश गया) उल्टे कांग्रेस इस पूरे मुद्दे पर अजीब दुविधा की शिकार दिखी। जसदण और गाँधीधाम की चुनावी रैली में जहाँ कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने ज्योतिग्राम योजना को पूरी तरह से लागू न कर पाने के लिए राज्य सरकार पर निशाना साधा वहीं केंद्र में यूपीए सरकार के बिजली मंत्री और महाराष्ट्र में कांग्रेस के दलित चेहरा सुशील कुमार शिंदे ने राजकोट में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में ज्योतिग्राम को राजीव गांधी ग्रामीण विधुतिकरण मिशन से जोड़ कर इसकी सफलता का स्रेय केंद्र के कंधों पर रखा। ज़ाहिर है ये विरोधाभासी वक्तव्य था। एक ओर सोनिया जी ज्योतिग्राम योजना की कमियाँ गिना रहीं हैं तो दूसरी ओर उन्हीं के मंत्री इसे केंद्र की योजना बताकर उसकी तारीफ कर रहे हैं। आखिर मतदाता किसे सही माने।
इसमें कोई शँका नहीं कि पानी बिजली और सड़क पर गुजरात में अच्छा काम हुआ जिसकी तस्दीक जनता ने भी की। पानी के मुद्दे पर राजकोट जैसे शहर में दो साल पहले लड़ाई होती थी। जब हम चुनाव कवरेज के लिए राजकोट पहुंचे तो वहाँ पानी कोई मुद्दा बचा ही नहीं था। राजकोट से पिछले तेइस सालों से जीत रहे गुजरात के वित्त मंत्री वजुभाई वाला को पानी वाला मेयर के नाम से पुकारा जाता है। पानी की समस्या के निराकरण के लिए राजकोट में वजुभाई के विरोध में खड़ी कांग्रेस प्रत्याशी कश्मीरा नथवाणी भी उनकी प्रशँसा करती हैं। यही नहीं राजकोट से ढाई सौ किलोमीटर दूर कच्छ के गाँधीधाम जैसे शहरों और आस पास के ग्रामीण इलाकों तक पीने का पानी पहुंचा गया है। जो उस इलाके से वाकिफ हैं वो इस बात का महत्व समझ सकते हैं क्योंकि ये पूरा इलाका मरूस्थलीय है।
हालाँकि राज्य में भाजपा ने अपने किए गए पिछले सभी वादे पूरे किए हों ऐसा भी नहीं हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी ने बड़ी चतुराई से ( या कांग्रेस की नासमझी से ) उन वादों की चर्चा ही नहीं होने दी।
लेकिन चेक डैमों की भरमार और पीने के पानी की मौजूदगी से जनता को इस बात का विश्वास ज़रूर बना कि आने वाले समय में कच्छ जैसे इलाकों तक सिंचाई का पानी भी मिलने लगेगा।काँग्रेस मुद्दा बना रही थी बिजली बिल जमा नहीं करने की वजह से जिन्हें सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा उनके अंसंतोष को। ज़ाहिर है ये नकारात्मक राजनीति थी। वज़ह साफ है जिन्हें सरकार बिजली पानी मुहैय्या करा रही है उससे बिल भी वसुल करेगी। लेकिन बिल जमा नहीं करने वालों के लिए कठोर सजा का भी प्रावधान किया गया था। जिसकी वजह से कुछ किसान नाराज़ जरूर थे। और इसको लेकर चुनाव से पूर्व के दिनों कई जगह धरने प्रदर्शन भी हुए थे। लेकिन इन सबसे राज्य प्रशासन की छवि एक कठोर प्रशासक की बनीं जिसका कोई भी विवेकबान व्यक्ति विरोध नहीं करेगा। लोकलुभावन राजनीति की तुलना में ये बेहतर उपाय है चुनाव जीतने के लिए... शायद इस बार कांग्रेस को गुजरात में ये सबक भी मिला होगा।
ज़ाहिर है इन गए कामों का प्रचार भी उतना ही जबरदस्त था विरोधी भी प्रशंसा करते नहीं अघा रहे थे ।अगर आप इन भुलावे में हैं कि नरेंद्र मोदी इतना काम करने के बाद संतुष्ट बैठ गए तो आप उन्हें कम करके आंक रहे हैं। दरअसल चुनाव जीतने के लिए नरेंद्र मोदी ने राज्य में विरोधियों के खिलाफ साम दाम दंड भेद हर उस नीति को आजमाया। प्रचार की कमान अपने हाथ में रख उन्होंने कार्यकर्ताओं को आगे किया। तीन बार से सत्ता में बने रहने से जो सत्ता विरोधी लहर ( एंटी इनकंबेंसी) थी उस बात को ध्यान में रखा गया। यही वजह थी कि पचास पूर्व विधायकों के टिकट काटे गए ... अस्सी से भी अधिक नए चेहरे आजमाए गए और रिबेल्स के विरोध में महिलाओं को टिकट दिए गए। इस बात से राजनीतिक पंडितों और विरोधियों ने उन्हें आटोक्रेट जैसे शब्दों से भी नवाज़ा। किसे फिक्र है आप चाहें जो कहें असली काम चुनाव जीतना है।
ज़ाहिर है नरेंद्र मोदी ने अपने सभी योद्धाओँ को सही समय पर सही चाल से उतारा था। मतदान के दिन कई जगहों से ऐसी भी खबरें आईं कि कुछ गाँवों में पहचान पत्र खरीदे जा रहे हैं पंद्रह सौ रूपए में। हालांकि इसकी पुष्टि मैंने तो नहीं की लेकिन ऐसी बात वहां के स्थानीय पत्रकारों के बीच भी चर्चा का केंद्र बना था। दूसरी तरफ राजकोट में एक बूथ पर कई वोहरा सोसाइटी में रहने वाले मतदाताओं ने मीडिया के सामने बड़ी संख्या में ये शिकायतें भी की कि उनके पहचान पत्र तो हैं लेकिन मतदाता सूची से उनके नाम ही गायब हैं। ज़ाहिर है चुनाव जीतने के लिए हर तरह की तैयारी थी भाजपा और नरेंद्र मोदी की तरफ से। लेकिन काँग्रेसी योद्धा बस हवा में ही तलवारें भाँज रहे थे। इसलिए मेरे मन में ये ख्याल आया था ... मैदान में हार जीत तो किस्मत की बात है , टूटी है किसके हाथ में तलवार देखिए । शायद अब काँग्रेस देख पाए।।।।।।।।।।।।

बुधवार, 26 दिसंबर 2007

भाग दो -- टूटी है किसके हाथ में तलवार देखिए ...


... कांग्रेस पूरे चुनाव के दौरान ... अंत के दो एक दिनों को छोड़ दें तो नरेंद्र मोदी के विकास के दावे को मुद्दा बनाकर इसकी असलियत गुजरात की जनता के सामने लाने की कवायद में थी। बाद में मौत के सौदागर और हिन्दु आतंकवाद के विवाद को को अगर परे रख दें तो कांग्रेस के पास इस असलियत को भी सामने लाने के लिए कोई खास रणनीति रही हो ऐसा लगता नहीं है। दरअसल विकास के मुद्दे पर या विकास की परिभाषा के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी को सही तरीके से घेरा जा सकता था लेकिन कांग्रेस यहां भी चूक गई। जिस पार्टी ने पिछले पांच साल की ही अगर बात करें तो राज्य में जनता की सुख दुख का कोई जायजा नहीं लिया वो अगर चुनाव के दौरान असमान विकास और विकास के कथित खोखले दावों की पोल खोलने में लगे तो जनता उसे कितनी गंभीर ढंग से लेगी। नतीजा सामने था। कांग्रेस पिछले साल में एक अदद नेता ही खड़ा कर लेती गुजरात में तो सांप्रदायिकता और विकास के खोखले दावों से लड़ने की उसकी सच्चाई पर कुछ हद तक भरोसा किया जा सकता था। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस गुजरात से नरेंद्र मोदी को बाहर का दरबाजा दिखाना ही नहीं चाहती थी। शायद कांग्रेस के लिए नरेंद्र मोदी का गुजरात में बने रहना राष्ट्रीय राजनीति में सेक्युलर सेक्युलर खेलने में मदद करे। बहरहाल कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी से लड़ाई के लिए जो योद्धा चुने ज़रा उसकी एक बानगी देखिए ... केंद्र में खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्री सुबोध कांत सहाय ( सांसद, झारखंड), महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ( सांसद आंध्र प्रदेश), गृह राज्य मंत्री स्री प्रकाश जायसवाल ( सांसद, उत्तर प्रदेश), माग्रेट अल्वा, मोहसिना किदवई, प्रिया दत्त और ऐसे ही कितने अनजान चेहरे जिन्हें गुजरात की जनता क्या देश की बांकि हिस्सों में कितना लोग पहचानते हैं या इनकी क्या विश्ववसनीयता है किसी से छुपी नहीं। सोनिया गाँधी को अगर छोड़ दें जिन्होंने राज्य में कुल दस ग्यारह जनसभाएं की जिसमें तीन चार तो सिर्फ कच्छ और सौराष्ट्र में ही थे तो दूसरे राहुल बाबा भी अंतिम दिनों में रोड शो के ज़रिए चुनाव प्रचार में कूदे। उत्तर प्रदेश में राहुल अपनी कितनी विश्ववसनीयता साबित कर पाए किसी से छुपी नहीं है। उन्हें गुजरात में नरेंद्र मोदी की सुनियोजित रणनीति से लड़ने के लिए भेजा गया। बहरहाल कांग्रेस के रणनीतिकारों के पास इन नामों के अलावा कोई विकल्प क्या सचमुच में नहीं था। क्या अर्जुन मोडवाडिया, भरत सिंह सोलंकी या शंकर सिंह बाघेला को पहले दिन से मोदी के खिलाफ एक नाम के तौर पर प्रोजेक्ट करना कांग्रेस के लिए सही रणनीति नहीं होती। शंकर सिंह बाघेला तो मोदी के लिए सबसे सही प्रोजेक्शन हो सकते थे। लेकिन ऐसा बताया जा रहा है कि उनकी संघ पृष्ठभूमि को देखते हुए ऐसा करने से बचती रही कांग्रेस इसलिए भी अंत समय में मणिनगर में मोदी के खिलाफ दिनशा पटेल को ला कर फिजां में कुछ और भी प्रोजेक्ट करने की कोशिश की गई । पर मुझे ये नहीं समझ में आया कि जो काग्रेस चंद दिनों पहले भाजपा से बड़ी संख्या में कांग्रेस में आई नेताओं को चुनाव मैदान में अपनी टिकट पर उतार सकती है उसे शँकर सिंह बाघेला को मुख्यमंत्री प्रत्याशी प्रोजेक्ट करने में इतनी बैचेनी क्यों महसूस हो रही थी।बहरहाल जब नेता ही नहीं प्रोजेक्ट हो पाया तो योद्धाओँ की दशा तो आसानी से समझी जा सकती है। राजकोट में टिकट नहीं मिलने से नाराज एक नेता जो वहाँ शायद जिला अध्यक्ष भी थे पार्टी के उन्होंने तो चुनाव प्रचार के दिनों में तो जिला कार्यालय पर ही ताला जड़ दिया ये कहकर कि ये उनकी ज़मीन पर बना है। जब उन्हें टिकट ही नहीं मिला तो कैसी पार्टी और कैसा कार्यालय। लिहाजा उन्हें पार्टी आफिस को अपनी संपत्ती घोषित कर ताला जड़ दिया। अंत के दिनों में ही वो ताला खुल पाया। लिहाजा कांग्रेस चुनाव प्रचार के दिनों में भी मोदी से टक्कर लेने के लिए कितनी तैयार थी , इन सब घटनाओं से इसका अंदाज साफ साफ लगाया जा सकता है। रही बात सोनिया गांधी के गुजरात में चुनाव प्रचार की तो कांग्रेस के रणनीतिकारों को अब ये समझना होगा कि जब तक प्रदेशों में कांग्रेस क्षत्रपों को खड़ा नहीं करेगी तब तक सिर्फ सोनिया गांधी के दम पर उन्हें अपने सुनहरे अतीत का सिर्फ ख्वाब ही देखने का अधिकार है। जमीन स्तर पर वो कुछ उम्मीद न ही करे तो बेहतर है। वैसे भी ज़माने से नेताओं के लिए कांग्रेस तरस ही रही है। पार्टी को अब चारण युग से बाहर निकल कर भी देखना होगा।..... (जारी)

सोमवार, 24 दिसंबर 2007

टूटी है किसके हाथ में तलवार देखिए ...

जिनको ज़मीं पर रहने का शउर नहीं , उन्हीं को जिद है आसमां लेंगें.... दरअसल गुजरात में नरेंद्र मोदी की जीत के बाद कांग्रेस पार्टी और देश के कथित सेक्युलर जमात के लिए ये पंक्ति बार बार मेरे ज़ेहन में घूम रही है। ज़ाहिर है गुजरात में बहुत कुछ दांव पर था। आम लोगों के लिए भले ही ये एक पार्टी या व्यक्ति की एक राज्य में जीत भर रही हो लेकिन अंदर ही अंदर ये जीत कहीं न कहीं कई मुद्दों सिद्धातों पर एक जनमत सर्वेक्षण की तरह रहा।
बहरहाल नरेंद्र मोदी गुजरात में हैट्रिक मार चुके हैं , कांग्रेस और सेक्युलर जमात ( ख़ास तौर पर मीडिया का वो हिस्सा जो राज्य में अपना एजेंडा पहले दिन से पेल रहे थे ) इस आत्मचिंतन में लग गए हैं कि आखिर गेंद गलत कैसे पड़ गई। दरअसल नरेंद्र मोदी राज्य में पहली बार विकास की पिच पर खेल रहे थे जबकि ये बुद्धजीवी अब भी गोधरा - गोधरा ही खेलना चाह रहे थे। राज्य में विकास के मुद्दे पर दबे मुंह ( मीडिया की भाषा में आफ द रिकार्ड ) ये भी स्वीकार करते थे कि विकास के मामले में राज्य बाँकि कई सेक्युलर राज्यों को बहुत पीछे छोड़ चुका था.. सांप्रदायिक हिंसा के मामले में भी राज्य अपने अतीत से पीछा छुड़ाकर पांच साल आगे निकल चुका है और ये पूरा सफर नरेंद्र मोदी की अगुवाई में गुजरात ने तय किया था। ज़ाहिर है इसका स्रेय नरेंद्र मोदी को मिलना चाहिए था जो जनादेश के रूप में मतदाताओं ने दिया भी लेकिन सेक्युलर जमात किसी भी कीमत पर ये स्रेय नरेंद्र मोदी को देने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे जिनका नतीजा उन्हें गुजरात में भुगतना भी पड़ा। आख़िर कांग्रेस को ये बातें शुरूआत में समझ में क्यों नहीं आई। अयातित नेताओं, हवाई मुद्दों और बागियों के भरोसे गुजरात की वैतरणी किस मुँह से पार करना चाह रही थी कांग्रेस।
जिन असन्तुष्ट नेताओं के लिए नरेंद्र मोदी कल तक सिर सम्राट थे उनके साथ अंतिम समय में ऐसा क्या हो गया कि वो नरेंद्र मोदी के कट्टर दुश्मन हो गए। क्या उनका विरोध सिद्धांतों और नीतियों का विरोध था। क्या कांग्रेस ने उनके सिद्धांतों से प्रभावित होकर उन्हें टिकट दिया था। कांग्रेस के पास इसका जबाव नहीं था। ज़ाहिर है होना भी नहीं था। इसका जबाव चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने बार बार दिया और जिसे गुजरात की साढे पांच करोड़ जनता भी स्वीकार कर रही थी --- खातो नती खावा देतो नती ... यानि न तो खाउँगा और न ही खाने दूंगा। मतलब साफ था कि ये तमाम बागियों की नरेंद्र मोदी से अलग होने की वजह ... खाने नहीं देना था और यही मैसेज जनता के बीच से भी आ रहे थे। खासकर गुजरात घुम रहे दिल्ली के सेक्युलर रिपोटरों को भी ऐसे संकेत साफ मिल रहे थे.. फिर भी उनके लिए असंतुष्ट एक बड़ा मुद्दा था। फिर ऐसे नेताओं को टिकट देकर कांग्रेस कौन सी लड़ाई जितने का दम भर रही थी।
इन असंतुष्टों के साथ साथ परिणामों से पूर्व केशुभाई पटेल को भी एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही थी। तमाम चैनलों पर गुजरात शोहर गा रहे चमचमाते पत्रकार बता रहे थे कि अब तो राज्य में भाजपा और नरेंद्र मोदी को कौन बचा सकता है। अब तो केशुभाई यानि बापा भी मोदी के खिलाफ हो गए हैं।... फिर परिणाम अपेक्षित क्यों नहीं रहा। दरअसल केशुभाई पटेल गुजरात में बाबा बनने की इच्छा रखते थे जो पूरा नहीं हो पाया। होता भी कैसे जिस राज्य के १८ हज़ार गांवों में से एक तिहाई मुखिया को राज्य का प्रमुख नाम से जानता हो और सीधे बात करता हो उस प्रमुख के लिए किसी अतीत को बाबा के रूप में स्वीकार करना राजनीतिक रूप से कितना सही माना जाए। ऐसा नहीं था कि केशुभाई पहली बार असंतुष्ट हुए थे। गुजरात में नरेंद्र मोदी के सत्ताशीन होने के बाद से ही केशुभाई लगातार असंतुष्ट बने हुए हैं। इसके पहले भी चुनाव में उन्होंने अपना रंग दिखाया था लेकिन जमा नहीं था तो फिर इस चुनाव में ऐसा क्या था कि पूरी जमात उनसे नरेंद्र मोदी के खिलाफ बड़ा उम्मीद लगाए बै‌ठी थी .......( ज़ारी)