
... कांग्रेस पूरे चुनाव के दौरान ... अंत के दो एक दिनों को छोड़ दें तो नरेंद्र मोदी के विकास के दावे को मुद्दा बनाकर इसकी असलियत गुजरात की जनता के सामने लाने की कवायद में थी। बाद में मौत के सौदागर और हिन्दु आतंकवाद के विवाद को को अगर परे रख दें तो कांग्रेस के पास इस असलियत को भी सामने लाने के लिए कोई खास रणनीति रही हो ऐसा लगता नहीं है। दरअसल विकास के मुद्दे पर या विकास की परिभाषा के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी को सही तरीके से घेरा जा सकता था लेकिन कांग्रेस यहां भी चूक गई। जिस पार्टी ने पिछले पांच साल की ही अगर बात करें तो राज्य में जनता की सुख दुख का कोई जायजा नहीं लिया वो अगर चुनाव के दौरान असमान विकास और विकास के कथित खोखले दावों की पोल खोलने में लगे तो जनता उसे कितनी गंभीर ढंग से लेगी। नतीजा सामने था। कांग्रेस पिछले साल में एक अदद नेता ही खड़ा कर लेती गुजरात में तो सांप्रदायिकता और विकास के खोखले दावों से लड़ने की उसकी सच्चाई पर कुछ हद तक भरोसा किया जा सकता था। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस गुजरात से नरेंद्र मोदी को बाहर का दरबाजा दिखाना ही नहीं चाहती थी। शायद कांग्रेस के लिए नरेंद्र मोदी का गुजरात में बने रहना राष्ट्रीय राजनीति में सेक्युलर सेक्युलर खेलने में मदद करे। बहरहाल कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी से लड़ाई के लिए जो योद्धा चुने ज़रा उसकी एक बानगी देखिए ... केंद्र में खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्री सुबोध कांत सहाय ( सांसद, झारखंड), महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ( सांसद आंध्र प्रदेश), गृह राज्य मंत्री स्री प्रकाश जायसवाल ( सांसद, उत्तर प्रदेश), माग्रेट अल्वा, मोहसिना किदवई, प्रिया दत्त और ऐसे ही कितने अनजान चेहरे जिन्हें गुजरात की जनता क्या देश की बांकि हिस्सों में कितना लोग पहचानते हैं या इनकी क्या विश्ववसनीयता है किसी से छुपी नहीं। सोनिया गाँधी को अगर छोड़ दें जिन्होंने राज्य में कुल दस ग्यारह जनसभाएं की जिसमें तीन चार तो सिर्फ कच्छ और सौराष्ट्र में ही थे तो दूसरे राहुल बाबा भी अंतिम दिनों में रोड शो के ज़रिए चुनाव प्रचार में कूदे। उत्तर प्रदेश में राहुल अपनी कितनी विश्ववसनीयता साबित कर पाए किसी से छुपी नहीं है। उन्हें गुजरात में नरेंद्र मोदी की सुनियोजित रणनीति से लड़ने के लिए भेजा गया। बहरहाल कांग्रेस के रणनीतिकारों के पास इन नामों के अलावा कोई विकल्प क्या सचमुच में नहीं था। क्या अर्जुन मोडवाडिया, भरत सिंह सोलंकी या शंकर सिंह बाघेला को पहले दिन से मोदी के खिलाफ एक नाम के तौर पर प्रोजेक्ट करना कांग्रेस के लिए सही रणनीति नहीं होती। शंकर सिंह बाघेला तो मोदी के लिए सबसे सही प्रोजेक्शन हो सकते थे। लेकिन ऐसा बताया जा रहा है कि उनकी संघ पृष्ठभूमि को देखते हुए ऐसा करने से बचती रही कांग्रेस इसलिए भी अंत समय में मणिनगर में मोदी के खिलाफ दिनशा पटेल को ला कर फिजां में कुछ और भी प्रोजेक्ट करने की कोशिश की गई । पर मुझे ये नहीं समझ में आया कि जो काग्रेस चंद दिनों पहले भाजपा से बड़ी संख्या में कांग्रेस में आई नेताओं को चुनाव मैदान में अपनी टिकट पर उतार सकती है उसे शँकर सिंह बाघेला को मुख्यमंत्री प्रत्याशी प्रोजेक्ट करने में इतनी बैचेनी क्यों महसूस हो रही थी।बहरहाल जब नेता ही नहीं प्रोजेक्ट हो पाया तो योद्धाओँ की दशा तो आसानी से समझी जा सकती है। राजकोट में टिकट नहीं मिलने से नाराज एक नेता जो वहाँ शायद जिला अध्यक्ष भी थे पार्टी के उन्होंने तो चुनाव प्रचार के दिनों में तो जिला कार्यालय पर ही ताला जड़ दिया ये कहकर कि ये उनकी ज़मीन पर बना है। जब उन्हें टिकट ही नहीं मिला तो कैसी पार्टी और कैसा कार्यालय। लिहाजा उन्हें पार्टी आफिस को अपनी संपत्ती घोषित कर ताला जड़ दिया। अंत के दिनों में ही वो ताला खुल पाया। लिहाजा कांग्रेस चुनाव प्रचार के दिनों में भी मोदी से टक्कर लेने के लिए कितनी तैयार थी , इन सब घटनाओं से इसका अंदाज साफ साफ लगाया जा सकता है। रही बात सोनिया गांधी के गुजरात में चुनाव प्रचार की तो कांग्रेस के रणनीतिकारों को अब ये समझना होगा कि जब तक प्रदेशों में कांग्रेस क्षत्रपों को खड़ा नहीं करेगी तब तक सिर्फ सोनिया गांधी के दम पर उन्हें अपने सुनहरे अतीत का सिर्फ ख्वाब ही देखने का अधिकार है। जमीन स्तर पर वो कुछ उम्मीद न ही करे तो बेहतर है। वैसे भी ज़माने से नेताओं के लिए कांग्रेस तरस ही रही है। पार्टी को अब चारण युग से बाहर निकल कर भी देखना होगा।..... (जारी)
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