मंगलवार, 12 मई 2009

चलो पीम बोएं उगाएं और काटे .... लोकतंत्र है भई

पंद्रहवीं लोकसभा के चुनावी महासमर के दौरान जिस पर सबसे ज़्यादा रार मची और ये कि जिसे आने वाले वक्त में शायद सबसे ज़्यादा याद किया जाएगा ... पहली बार चुनाव परिणाम आने से पहले देश ने प्रधानमंत्री पद के सबसे ज्यादा दावेदार देखे। राष्ट्रीय पार्टियों से लेकर इलाकाई क्षत्रपों तक ने देश के इस सर्वोच्च पद के लिए अपनी अपनी तालें ठोंकी। दिल्ली का तख्तो- ताज किस राजनैतिक दल को मिलेगा, ये सवाल अहम है बावजूद इसके एकबारगी ऐसा लगने लगा कि ये सवाल कहीं न कहीं पीछे चला गया और अहम ये हो गया कि आखिर इस सरकार का मुखिया कौन होगा।

इस सवाल के पीछे राजनीतिक दलों की भूमिका जितनी अहम थी राजनीतिक विश्लेषकों की भूमिका कहीं भी उससे कम नहीं थी। प्रेक्षक शुरूआत से ही मान कर चल रहे थे कि प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह केयरटेकर पीएम हैं जिन्हें सरकार के मुखिया के तौर पर भरत की भूमिका निभानी है। इसलिए बार बार ये सवाल उठता रहा कि पंद्रहवीं लोकसभा के दौरान कांग्रेस डा मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चुनावी समर में जाएगी या कि धीरे धीरे दलीय प्रतिबद्धता को बखुबी निभा ( पार्टी प्रवक्ताओं के मुताबिक ) रहे राहुल गांधी सही वक्त पर समर का नेतृत्व अपने हाथ में लेंगे। बहरहाल कांग्रेस नेतृत्व ने कई मंचों पर अपना स्टैंड मजबूती से साफ करने का अभिनय किया।

यूपीए में प्रधानमंत्री पद का मुद्दा यहीं नहीं थमा। कभी लालू , पासवान और मुलायम की तिकड़ी इस कोशिश में रही कि एनसीपी के शरद पवार यूपीए के भीतर बने इस चौथे मोर्चे का नेतृत्व थाम लें। इसके पीछे ये धारणा थी कि चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की सीटें कम होती हैं और ये क्षत्रप अपना गढ़ बचा पाने में सफल रहते हैं तो शरद पवार के पीछे गोलबंद हुआ जा सकता है। इसको लेकर एनसीपी में भी गुदगुदाहट होती रही, वो शरद पवार को पीएम मैटेरियल मानते रहे और इसको मूर्त रूप देने के लिए कभी कभी मराठा मुखिया की बात को भी हवा देते रहे। अंतत शरद पवार की इस स्वीकारोक्ति ने कि उनके पास पर्याप्त संख्या नहीं है , काफी हद तक यूपीए के भीतर प्रधानमंत्री पद को लेकर भ्रम साफ कर दिया। दरअसल ये साफगोई शरद पवार की शातिर अंदाज का एक नमूना है। ये शरद पवार भी जानते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिए घोड़े नहीं चाहिए होते बल्कि घोड़े पर दांव लगाने वाले चाहिए होते हैं। अपनी पार्टी के इकलौते सांसद चंद्रशेखर अगर इस देश में प्रधानमंत्री हो सकते हैं तो शरद पवार क्यों नहीं , ये बात वो भी बखूबी समझते हैं और सही वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं। दरअसल इसीलिए भी उन्होंने सन्यास के बाद भी पीच पर बैटिंग करने को उतरने मतलब चुनाव लड़े। इसके पीछे की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। लेकिन उनके इस मह्त्वाकांक्षा को अगर तीसरा मोर्चा चार चांद लगा सकता है तो कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी है जो हर कीमत पर इसे होने से रोकना चाहेगी।


बहरहाल एनडीए के अंदर लालकृष्ण आडवानी की ताज़पोशी भी कम उतार चढ़ाव से भरी नहीं रही। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सन्यास की घोषणा ने एनडीए के मुखिया के तौर पर कई नाम हवा में उछाले। आडवानी सबसे आगे ज़रूर थे लेकिन उनके राजनीतिक सफरनामे और भाजपा के भीतर ही चल रही खिंचतान को देखकर कई प्रेक्षकों को ऐसा लगता रहा कि शायद एनडीए में अपनी स्वीकार्यता को लेकर उन्हें लंबी लड़ाई लड़नी पड़े। बहरहाल जसवंत सिंह , शरद यादव, नीतिश कुमार आदि नामों की चर्चा के बीच अंतत आडवानी पीएम इन वेटिंग बनाए गए। लेकिन राजस्थान में पटकनी खाने के बाद भाजपा में भैरों सिंह शेखावत और वसुंधरा राजे के बीच टकराव ने पीएम इन वेटिंग आडवानी की सर्व स्वीकार्यता को भी अपने लपेटे में ले लिया। उप राष्ट्रपति पद से निवृत होकर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की गंगा स्नान करने की सलाह के बीच भैरों सिंह शेखावत ने लोकसभा चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। प्रेक्षकों ने इस हुंकार को आडवानी के खिलाफ उनके बगावत के रूप में देखा।

चुनावी महाभारत के दौरान अरूण शौरी के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री मैटेरियल बताने से रही सही कसर भी निकल गई। यूएनपीए से बदल कर लेफ्ट के आलंबन में तीसरे मोर्चे का स्वरूप अख्तियार करने वाली कथित विकल्प की राजनीतिक धारा में भी इस बात पर खुब हो हल्ला है। दरअसल यूएनपीए से तीसरे मोर्चे के रूप में चोला बदलने की नींव ही प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की घोषणा के बीच हुई। जब कई पार्टियां राष्ट्रीय हित में स्थानांतरित हुईं ,उसी वक्त लेफ्ट ने यूएनपीए की कमान संभाली और बसपा के साथ तीसरे मोर्चे का गठन किया। पहली बैठक में ही उत्तर प्रदेश में अपनी सफलता की हाथी पर सवार मायावती ने साफ कर दिया वो पीएम बनने के लिए तीसरे मोर्चे की हम सफर हुई हैं। बाद में मोर्चे में इस पर हुए ना नुकूर पर नाराज हुई मायावती ने तुमकूर की रैली में ना जाकर अपनी नाराज़गी का भी इज़हार कर दिया। तीसरे मोर्चे में मायावती के समर्थन में बड़े नेता खुलकर नहीं आए, इसके पीछे शायद वामपंथियों के मन में अतीत में किए गए एतिहासिक भूल सुधारने के लिए अवसर बनाने की कवायद और जयललिता जैसी कुछ अन्य नेता भी हैं जो ये मानती हैं कि इस बार केंद्र की राजनीति तमिलनाडु तय करेगा।

ये तीसरा मोर्चा एतिहासिक रूप से कई बार गुजराल और देवेगौड़ा जैसे डार्क हार्स पैदा कर चुका है। क्या पता वक्त की मजबूत पतवार पकड़ कर शरद पवार, नीतिश कुमार, मुलायम सिंह, प्रकाश करात, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू जैसे नेताओं में से ही कोई इस बार के डार्क हार्स बन जाएं। लेकिन इसके लिए ज़रूरी होगा कि क्षत्रप मजबूत बनकर उभरे साथ ही कि राष्ट्रीय दलों के कमज़ोर होने की उनकी प्रार्थना ईश्वर के दरबार में स्वीकार हो जाए। इंतज़ार कीजिए मतगणना का।

यूपीए एनडीए - बहुत कठिन है डगर पनघट की

देश में चुनावी हलचल अपने अंजाम के करीब पहुंचता जा रहा है। राजनीतिक दल अपने कमान से हर तरह के तरकश का इस्तेमाल कर रहे है जिससे वे अपने प्रत्याशियों और समर्थक उम्मीदवारों को चुनाव जीता सके। इस चुनाव में बहुत कुछ दांव पर है। पर सबसे ज्यादा दांव पर है राष्ट्रीय राजनीति के दो दिग्गज गठबंधनों यूपीए और एनडीए की प्रतिष्ठा। इन दोनों ही गठबंधनों के लिए तीसरा मोर्चा बहुत बड़ा सिर दर्द बन कर उभरा है। ज़ाहिर है इसलिए भी यूपीए और एनडीए की रणनीति का इम्तिहान इस बार कड़ा है।
दरअसल 2004 में चुनाव पूर्व बने यूपीए गठबंधन में बिहार से राष्ट्रीय जनता दल और लोकजनशक्ति पार्टी, महाराष्ट्र से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और आरपीआई, तमिलनाडु से पीएमके, डीएमके और एमडीएमके और आंध्र प्रदेश से टीआरएस सरकार बनाने में शामिल थे। इसके साथ ही वाम दलों ने यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दिया था।14वीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अकेले 145 सीट प्राप्त कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई थी और उसके सहयोगी दलों को कुल मिलाकर 70 सीटें हासिल हुई थी। लेकिन बाहर से समर्थन देनेवाले दल में सीपीएम को 43, सीपीआई को 10, फारवार्ड ब्लाक को 3, आरएसपी 3, केईसी 1 और एक अन्य निर्दलीय सांसद का समर्थन प्राप्त था।

कांग्रेस को आंध्र प्रदेश , असम, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु , झारखंड और केंद्र शासित प्रदेशों अंडमान निकोबार, चंडीगढ़, दमन दीव और दिल्ली के 203 सीटों में से 97 सीटें हासिल हुई थी यानि इन राज्यों की कुल सीटों की तकरीबन पचास फ़ीसदी के करीब सीटें कांग्रेस के खाते में गई थी जबकि इन्हीं राज्यों में भाजपा को महज़ 31 सीटें हासिल हुई थी। ज़ाहिर है पिछली बार कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने में इन राज्यों की भूमिका बहुत बड़ी थी, लिहाज़ा इस बार वापसी के लिए कांग्रेस का यहां बहुत कुछ दांव पर है। अब भाजपा के बेहतर प्रदर्शन वाले राज्यों पर नज़र डालें तो मध्य प्रदेश , राजस्थान , छत्तीसगढ़ , गुजरात, महाराष्ट्र और उड़ीसा जैसे राज्यों की कुल 160 सीटों में से 90 सीटों पर कब्ज़ा जमाने में सफल रही थी यानि कुल सीटों की पचास फ़ीसदी से भी अधिक। ज़ाहिर है भाजपा के समक्ष इन राज्यों में अपनी इन सफलता को दोहराने के साथ साथ कांग्रेस के उन राज्यों में भी अपनी स्थिति मजबूत करने की दोहरी चुनौती है। ज़ाहिर है कांग्रेस और भाजपा के बीच असली मुकाबला इन्हीं राज्यों में देखने को मिलेगा।
अब चौदहवीं लोकसभा में कांग्रेस की सहयोगी दलों के प्रदर्शन पर नज़र डालें तो बिहार और झारखंड में राष्ट्रीय जनता दल, लोकजनशक्ति पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा, महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और आरपीआई, तमिलनाडु पांडिचेरी में डीएमके, पीएमके और एमडीएमके जैसी पार्टियों ने कुल 142 सीटों में से 68 सीटों पर कब्ज़ा जमा कर कांग्रेस के लिए केंद्र में सरकार बनाने की राहें आसान कर दी थी। लेकिन इसके विपरीत भाजपा के सहयोगी दलों पंजाब में अकाली दल, महाराष्ट्र में शिवसेना, तमिलनाडु में जयललिता, उड़िसा में बीजु जनता दल और बिहार में जनता दल युनाइटेड जैसी सहयोगी दलों ने 161 सीटों में महज़ सैंतीस सीटें हासिल कर केंद्र में सरकार बनाने की कवायद में एनडीए की असफलता की पटकथा लिख दी थी। ज़ाहिर है इस बार भाजपा और कांग्रेस की केंद्र में सरकार बनाने का दारमोदार बहुत हद तक पुराने सहयोगियों के प्रदर्शन और नए सहयोगी बना पाने में उनकी सफलता पर निर्भर करेगा। इसके अलावा देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सिर्फ अहसास तक सीमट कर रह गई राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के प्रदर्शन पर भी प्रेक्षकों की निगाहें होंगी।

इन सबके बीच पंद्रहवी लोकसभा चुनाव के पूर्व एनडीए ने हरियाणा में चौटाला , असम में असम गण परिषद और उत्तर प्रदेश में चौधरी अजीत सिंह को अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल की । इसके साथ ही लुधियाना की रैली में टीआरएस को अपने खेमे में खड़ा कर पटनायक को अपने खेमे में लेकर खुशी मना रहे तीसरे मोर्चे को भी करारा ज़बाव दे दिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस अब तक ऐसी कोई भी कदम बढ़ा पाने में नाकाम रही है। इसके वीपरीत उसे बिहार और उत्तर प्रदेश में राजद, लोजपा और सपा जैसी अपनी सहयोगी पार्टियों का ही सामना करना पड़ा रहा है। साथ ही समय प्रेक्षकों के मुताबिक वक्त से पहले किए गए कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेस ने द्रमुक और राजद जैसी पार्टियों को उल्टे नाराज़ कर दिया है। हालांकि चुनाव बाद की रणनीति पर कांग्रेस एक साथ कई संकेत देती है जिसमें नीतिश के साथ साथ तीसरे मोर्चे के नायडु पर भी डोरे डालने की रणनीति का खुल कर इज़हार है। लेकिन लुधियाना की रैली में नीतिश और नरेंद्र मोदी की गलबहियां ने शायद राहुल के बचपने का जबाव अपने अंदाज में दे दिया। ज़ाहिर बिना किसी तैयारी के हवा में बात करने के लिए प्रेस कांफ्रेस बुलाने का जो नतीज़ा कांग्रेस को भुगतना था तो वो भुगत रही है। नाराज़ द्रमुक को मनाने के लिए तमिलनाडु में सोनिया गांधी को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा गया। ज़ाहिर है चुनाव बाद के हालात बहुत हद तक आने वाले चुनाव परिणामों पर निर्भर होंगे लेकिन फिलहाल भाजपा राहुल के ऐसे विचारों को कांग्रेस की कपोल कल्पना कह कर अगर ख़ारिज कर रही तो कुछ भी गलत नहीं है उसमें। कांग्रेस को अब भी बहुत होमवर्क करना होगा।

हालांकि इस बीच एनडीए को तीसरे मोर्चे से झटका भी लगा जब ग्यारह साल पुराने सहयोगी बीजू जनता दल ने उड़िसा और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी राह बदल ली। हालांकि इसका विकल्प जैसा कि लुधियाना में टीआरएस को अपने खेमे में लाकर भाजपा ने तीसरे मोर्चे को करारा जबाव दे तो दिया है लेकिन उन्हें भी पता है वो नवीन पटनायक का स्थायी स्थानपन्न नहीं हो सकता। हाँ इतना जरूर है कि इसके बांकि दलों को अपने ओर खिंचने के लिए टर्निंग प्वांइट के रूप में भाजपा इस्तेमाल कर सकती है। दरअसल केंद्रीय राजनीति की शतरंज पर भाजपा और कांग्रेस दो बड़े मोहरे ज़रूर है लेकिन दिल्ली की तख्त पर सत्तानशीं के लिए राज्यों के इन मोहरे के प्रदर्शन पर न केवल प्रेक्षकों की निगाहें होंगी बल्कि इन राष्ट्रीय दलों की भविष्य भी बहुत हद तक इन्हीं से तय होगा। ज़ाहिर है यूपीए एनडीए के लिए बहुत कठिन है डगर पनघट की।

सोमवार, 11 मई 2009

X - फैक्टर क्षेत्रीय दल

गठबंधन राजनीति के इन दिनों में केंद्र में सरकार के गठन की जिम्मेदारी बहुत हद तक क्षेत्रीय दलों के हाथों में है। यही वजह रही कि पंद्रहवीं लोकसभा के गठन की प्रक्रिया के घोषणा के साथ ही राष्ट्रीय दलों में क्षत्रपों को एक दूसरे के पाले में लाने की होड़ मच गई। दरअसल राजनीति की ये पटकथा नब्बे के दशक में ही लिख दी गई जिसका उत्कर्ष 13वीं लोकसभा में एनडीए सरकार और उसके बाद यूपीए के सरकारों के रूप में सामने आया। पंद्रहवीं लोकसभा के दौरान भी हालात बहुत बदलेगा , इसकी संभावना कम है। आने वाले समय में क्षत्रप ही अगली लोकसभा की रूपरेखा तय करने जा रहे हैं। या फिर कहें कि इनमें से ही कोई डार्क होर्स भी हो सकता है। यही वो तथ्य है जिस पर राष्ट्रीय दलों के साथ साथ क्षेत्रीय दलों के लिए भी रणनीति का निर्धारण होना है।

दरअसल 14वीं लोकसभा में भविष्य की राजनीति को ध्यान में रख कर इसकी शुरूआत तब हुई जब वामपंथी दलों ने परमाणु करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस लिया। तभी से क्षत्रपों को अपने पाले में करने और पहले से ही अपने कुनबे में मौजूद क्षत्रपों को जोड़े रखने की कवायद शुरू हुई। इस दौरान मायावती, जयललिता, चंद्रबाबू नायडु , चौटाला, वृंदावन गोस्वामी, देवेगौड़ा और बाबू लाल मरांडी जैसे क्षत्रपों ने जहां तीसरे मोर्चे के ठोस स्वरूप को सामने रखा वहीं पहले से तीसरे मोर्चे के साथ रही सपा कांग्रेस के साथ आ गई जबकि एनडीए को अपने गठबंधन को बनाए रखने के लिए काफी पसीना बहाना पड़ा। और ये कि पहले से ही यूपीए में मौजूद शिबू सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चे ने अंतिम समय तक कांग्रेस को अपनी ओर ताकने को मजबूर किया।

दरअसल ये शुरूआत थी , उसके बाद भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए कई क्षत्रप अपना पाला बदल चुके हैं। ये साफ तौर पर तमिलनाडु में देखने को मिला जहां पहले डीएमके और यूपीए के साथ रहे रामदौस और वाइको अब जयललिता के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं। चुनाव के ठीक पहले बिहार में लालू और पासवान का दबे स्वर में ही सही कांग्रेस से किनारा करना और असम गण परिषद और हरियाणा में चौटाला का का एनडीए के पाले में चले जाना। साथ ही एनडीए के पाले से खिसक कर बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस के साथ महाजोट की रणनीति और उडिसा में बीजू जनता दल का एनडीए से खिसक कर तीसरे मोर्चे में शामिल होना सब इसी का हिस्सा है।

दरअसल ये सारे गठबंधन अपने अपने इलाकों में अपनी लाभप्रद राजनीतिक जरूरत के मुताबिक किया गया। गठबंधन की राजनीति में स्थायी कुछ भी नहीं होता। ये बहुत कुछ चुनाव परिणामों पर निर्भर करता है। अगर पंद्रहवी लोकसभा के चुनाव परिणाम यूपीए या एनडीए के अनुकूल नहीं रहा तो अब तक यूपीए या एनडीए के पाले में नज़र आ रहे क्षेत्रीय दल तीसरे मोर्चे का रूख कर सकते हैं। यही वजह है कि एनडीए में रहते हुए भी शरद यादव घर पर सीताराम येचुरी से मुलाकात करते हैं और लालू और पासवान यूपीए में रह कर भी कांग्रेस से दूरी बढ़ा लेते हैं या कि शिवसेना एनडीए में होते हुए भी मराठा प्रधानमंत्री के नाम पर कभी कभी एनडीए की राजनीतिक जरूरत के विपरीत संकेत देती है। यहां ये बताता चलुं कि अगर सबसे बड़ी पा‍र्टी के रूप में उभर भी जाती है जैसा कि लग रहा तो भी अगर उसके पास खुद के १७० से ज़्यादा सांसद नहीं हुए तो कांग्रेस तीसरे मोर्चे के किसी डार्क हार्स को समर्थन दे कर सरकार बनवा सकती है। इस संभावना की बड़ी वज़ह इसलिए भी है कि सेकुलर सेकुलर चिल्लाते हुए ये सभी सिद्धांत बघारने वाली पार्टियां एक हो सकती हैं। लेकिन इन सब संभावनाओं के लिए जरूरी है कि अपने अपने इलाके के ये क्षत्रप अपने अपने किले को बचा पाने में सफल हों।


ज़ाहिर है इन क्षत्रपों के लिए अपने अपने इलाके में बेहतर प्रदर्शन करना सिर्फ अपनी ताकत बढ़ाने के लिए ज़रूरी नहीं है बल्कि दिल्ली में राष्ट्रीय दलों को अपने मुताबिक साधने के लिए भी जरूरी है। लेकिन अगर ये कमज़ोर पड़ते हैं फिर ऐसे हालात में इनके लिए केंद्रीय राजनीति में अस्तित्व का संकट भी आ सकता है। इसलिए हर हाल में इनकी कोशिश ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल कर केंद्रीय राजनीति को अपने मुताबिक मोड़ने की होगी। आप यों कह सकते हैं कि पंद्रहवी लोकसभा का स्वरूप बहुत कुछ राज्यों के इन धुरंधरों के मुताबिक तय होगा।

ललबबुआ कहां जहइएं ......



आजाद भारत की राजनीति में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकाधिपत्य को चुनौती देने वाले राजनीतिक दलों में कम्युनिस्टों का योगदान महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि पचास के दशक में ही ई एम एस नंबुदरीपाद ने केरल में पहली बार कांग्रेसवाद के नारे को आप्रसांगिक बना दिया। ये पूरे देश में किसी राज्य की पहली गैर कांग्रेसी सरकार ही नहीं थी बल्कि इसने ये अहसास भी दिलाया था कि कांग्रेस अपराजेय नहीं हैं और ये कि विकल्प की राजनीति भारत में हमेशा अपना वजुद बनाये रखेगी। भविष्य में कई मौकों पर देश में वाम धारा की राजनीति के लिए ये बीज वाक्य साबित हुआ। दरअसल ये तथ्य अपने आप में एतिहासिक इसलिए भी है कि राजनीति में मौजूद वामपंथी धारा ने हमेशा देश की राजनीति को दशा और दिशा देने का काम किया। केरल से शुरू हुई गैर कांग्रेसवाद की लड़ाई बंगाल और त्रिपुरा होते हुए केंद्रीय राजनीति में भी अपने वजुद का अहसास कराने लगा। जब भी दिल्ली में गैर कांग्रेसी सरकार बनाई गई कामरेड उसके अहम घटक रहे।


अगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के छह साल के शासन को छोड़ दे तो वर्ष 1977 से लेकर अब तक जितनी भी गैर कांग्रेसी सरकार बनी उसमें वामपंथियों की भूमिका ज़रूर रही। यहां तक की संपूर्ण क्रांति अभियान पर सवार जब जनता पार्टी ने लोहियावादियों के साथ मिलकर पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनाई उसको भी वामपंथियों का समर्थन हासिल था। उस वक्त अब की तरह शायद सेकुलर शब्द राजनीति में इस कदर प्रचलित नहीं हुआ होगा। 1989 से लेकर अब तक यह गठबंधन केन्द्र में सरकार के गठन में अपनी अहम भूमिका निभाता रहा। चाहे वह विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार हो या चंद्रशेखर की सरकार । सन् 96 में जब एनडीए सरकार के बहुमत नहीं साबित कर पाई तब एच डी देवगौड़ा की सरकार बनाने में लेफ्ट ने अहम रोल अदा किया और इस सरकार में सीपीआई के इंद्रजीत गुप्ता और चतुरानन मिस्रा शामिल हुए। और फिर इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने तो भी सीपीआई के दोनों सांसद सरकार में बने रहे। ये पहला मौका था जब लेफ्ट केंद्र में सरकार में हिस्सेदारी कर रही थी। वरना हाल के यूपीए सरकार के दौरान तो बिना सरकार में रहे ही मजे लेते रहे और शायद विपक्षी एनडीए से ज़्यादा सरकार को अंगूली किया।

आम चुनाव के बाद जब एनडीए की सरकार बनी तो उस वक्त वाम मोर्चा प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका निभाता रहा। और वर्ष 2004 में आम चुनाव के बाद कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सामने आया जिसने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन बनाया और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तब इस सरकार को वाम मोर्चा ने बाहर से समर्थन दिया। और केन्द्र में नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हुआ। राजनीतिक के दिग्गज और वामपंथी नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने इसमें अपनी अहम भूमिका निभाई और उन्हीं का प्रयास था जिन्होंने कथित धर्मनिरपेक्ष दलों को एक साथ कर उन्हें गोलबंद किया और सभी को एक झंडे के तले किया। और इसी के परिणामस्वरूप केन्द्र में यूपीए सरकार के गठन का रास्ता साफ हो पाया।

केन्द्र में सरकार को चलाने के लिए संयुक्त घोषणा पत्र बनाया गया जिसके तहत सरकार को चलाने की बात कही गई लेकिन अमरीका के साथ हुए परमाणु करार के बाद वाम मोर्चा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। आप इसे सैद्धांतिक विरोध कह सकते हैं लेकिन कई विश्लेषक इसे इस रूप में देखते हैं कि आखिर लेफ्ट को चुनाव भी लड़ना था और वो भी अपने ही गढ़ में उस कांग्रेस के खिलाफ जिसे वो अब तक केंद्र में समर्थन देती आई थी लिहाज़ा समर्थन वापस लेने की घटना को कुछ लोग लेफ्ट की सोची समझी रणनीति में मानते हैं। ज़ाहिर है पूरे यूपीए सरकार के दौरान लेफ्ट पार्टियां ज्यादा असर दार भूमिका में रहे।

लेकिन अगर अगर हम वर्ष 1991 से लेकर अब तक हुए लोकसभा चुनाव के परिणामों पर एक नज़र डालते है तो नतीजा यही निकलता है कि लेफ्ट अब तक अपने गढ़ को बचाए रखने में कामयाब रहा और केन्द्र की राजनीति में उसका दबदबा बरकरार रहा। पिछले परिणाम को देखे तो सीपीएम ने 1991 में 35 पर तो 1996 में 32 पर 1998 में 32, 1999 में 33, 2004 में 43 सीटों पर जीत दर्ज की।

लेकिन पंद्रहवीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव प्रक्रिया चल रही है। एक बार फिर वामपंथी गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई , विकल्प देने की कवायद में जुट गए हैं। लेकिन इसकी संभावना कम ही लगती है। हां ये ज़रूर हो सकता है एनडीए को सरकार बनने के करीब देखते ही सेकुलर सेकुलर चिल्लाते हुए लेफ्ट या तो तीसरे मोर्चे की सरकार बनवाते हुए कांग्रेस को समर्थन देने के लिए कह सकती है, या फिर ये कि बाद में फिर मनमोहन सिंह की गोद में जाकर बैठ जाएं। परमाणु करार जैसे मुद्दे पर यूपीए से समर्थन वापस लेकर कामरेडों ने ये जताने की कोशिश तो जरूर की कि सत्ता के नजदीक रहने के लिए उन्होंने सिद्दांतों से समझौता नहीं किया।

बहरहाल परिणाम जिस करवट बैठे इस पर सबकी निगाहें जरूर होंगी कि हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे बेहतरीन रणनीतिकार के अभाव में वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति में अपनी कोई छाप छोड़ पाएगें। ज़ाहिर है परिणाम से ज्यादा रणनीति पर सबकी निगाहें होंगी। इस चुनाव में शायद वामपंथियों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती भी है।

क्षेत्रीय दलों के जलवे

भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के जलवे आज़ादी के पहले भी रहे लेकिन आजादी के तकरीबन तीन चार दशक के बाद इनकी धमक राष्ट्रीय राजनीति में साफ तौर पर दिखाई पड़ने लगी। इसकी शुरूआत देश में धुर दक्षिण से हुई जहां हिन्दी विरोधी आंदोलन के अगुवा सी एम अन्नादुरई ने 1967 में पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को राज्य की सत्ता से अपदस्थ कर तमिलनाडु के राजनीति की दशा और दिशा दोनों ही बदल दी। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की इस लहर ने करूणानिधि , एम जी रामचंद्रन और जे जयललिता जैसे कई दिग्गज़ों को तमिलनाडु की राजनीति में न केवल स्थापित नाम बना दिया बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति में राष्ट्रीय दल महज मूक दर्शक बन कर रह गए। राज्य की पूरी राजनीति इन्हीं क्षत्रपों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई।

हिन्द महासागर से उठे इस राजनीतिक चक्रवात ने धीरे धीरे ही सही देश की राजनीति में क्षत्रपों को न केवल लोकप्रिय विकल्प के तौर पर खड़ा किया बल्कि केंद्रीकृत होती जा रही राजनीति को सही मायने में जन जन की राजनीति में तब्दील करने में अहम भूमिका निभाई। दरअसल धुर दक्षिण के साथ साथ धुर उत्तर यानि कश्मीर और पंजाब में भी क्षेत्रीय दलों ने अपना दबदबा आजादी के बाद से ही बनाया रखा। पंजाब में तो अकाली दल को पूरी तरह से उभरने में कुछ वक्त लगा जबकि इसके विपरीत जम्मू कश्मीर की राजनीति में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कांफ्रेस का दबदबा आरंभ से ही बना रहा। पंजाब और कश्मीर दोनों ही राज्यों में राष्ट्रीय दलों को दोनों ही क्षेत्रीय दलों ने लगभग लंबे वक्त तक हाशिए पर रखा।
अस्सी के दशक में आंध्र प्रदेश में तेलुगू सिनेमा के सुपरस्टार एन टी रामाराव का राजनीतिक अवतार न केवल प्रदेश की राजनीति बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी मील का पत्थर साबित हुआ। हैदराबाद हवाई अड्डे पर तत्कालीन सांसद राजीव गांधी के राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री को अनदेखा करने की बात केंद्र के सौतेले रवैय्ये के खिलाफ तेलुगू सिनेमा के इस महानायक के अभियान ने पहली बार प्रदेश में तेलुगूदेशम पार्टी का नेतृत्व करते हुए अपनी सरकार बनाई बल्कि भविष्य में राष्ट्रीय मोर्चे के रूप में केंद्रीय राजनीति में जो सफल प्रयोग हुआ उसके भी अगुवा एन टी आर ही रहे।
सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के खिलाफ खड़ा हुआ संपूर्ण क्रांति का अभियान केंद्र में भले ही दो साल में दम तोड़ गया लेकिन राज्यों की राजनीति में इसने कई क्षत्रपों को जन्म दिया और केंद्रीय राजनीति में इनके ही जलवे छाने लगे। खास तौर पर हिन्दी पट्टी के दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार, पूर्व में उड़िसा , पश्चिम भारत में गुजरात और दक्षिण भारत के कर्नाटक जैसे राज्यों में समाजवादियों ने पहली बार सरकारें बनाई। बाद में मतांतर की वजह से समाजवादियों की एकता भले ही खंडित हो गईं, लेकिन अपने अपने राज्यों में इन क्षत्रपों का वर्चस्व बरकरार रहा। बिहार में लालू यादव, उत्तर प्रदेश में विश्वनाथ प्रताप सिंह, चौधरी चरण सिंह, मुलायम सिंह यादव , उड़िसा में बिजू पटनायक, कर्नाटक में राम कृष्ण हेगड़े और एच डी देवेगौड़ा जैसे नेता इसी दशक में उफान पर आए।
यही नहीं इनकी एकता का उफान केंद्रीय राजनीति में 1989 में पहले राष्ट्रीय मोर्चे और चंद्रशेखर की सरकारों के रूप में दिखा और बाद में एच डी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल संयुक्त मोर्चे की सरकारों के रूप में सामने आया। इन सरकारों में प्रमुखता से अपनी भूमिका निभाने वाले जनता दल , लोक दल, द्रमुक, टीडीपी जैसे क्षेत्रीय दल आज भी विभिन्न राज्यों में अपनी महत्ती भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं।

पिछले एक दशक से भी अधिक वक्त से इन क्षेत्रीय दलों ने अपनी भूमिका का इस कदर विस्तार किया है कि केंद्र में कोई भी गठबंधन बिना इन क्षेत्रीय दलों के अपने मुकाम तक नहीं पहुंच सकता। दरअसल भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका सिर्फ विकल्प देने तक ही सीमित नहीं है बल्कि सही मायनों में सामाजिक न्याय और लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण को इन्होंने अंजाम तक पहुंचाया है। अब जबकि पंद्रहवी लोकसभा के लिए चुनाव सिरे चढ़ रहा है एक बात बिल्कुल साफ है राष्ट्रीय कहे जाने वाले दलों के लिए केंद्र में सरकार बनाना तब तक दूर की कौड़ी होगी जब तक कि ये क्षेत्रीय कहे जाने वाले दलों को साथ न ले लें। ज़ाहिर है क्षेत्रीय दलों की भूमिका सिर्फ सरकार बनाने तक ही सीमित नहीं है।