
आजाद भारत की राजनीति में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकाधिपत्य को चुनौती देने वाले राजनीतिक दलों में कम्युनिस्टों का योगदान महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि पचास के दशक में ही ई एम एस नंबुदरीपाद ने केरल में पहली बार कांग्रेसवाद के नारे को आप्रसांगिक बना दिया। ये पूरे देश में किसी राज्य की पहली गैर कांग्रेसी सरकार ही नहीं थी बल्कि इसने ये अहसास भी दिलाया था कि कांग्रेस अपराजेय नहीं हैं और ये कि विकल्प की राजनीति भारत में हमेशा अपना वजुद बनाये रखेगी। भविष्य में कई मौकों पर देश में वाम धारा की राजनीति के लिए ये बीज वाक्य साबित हुआ। दरअसल ये तथ्य अपने आप में एतिहासिक इसलिए भी है कि राजनीति में मौजूद वामपंथी धारा ने हमेशा देश की राजनीति को दशा और दिशा देने का काम किया। केरल से शुरू हुई गैर कांग्रेसवाद की लड़ाई बंगाल और त्रिपुरा होते हुए केंद्रीय राजनीति में भी अपने वजुद का अहसास कराने लगा। जब भी दिल्ली में गैर कांग्रेसी सरकार बनाई गई कामरेड उसके अहम घटक रहे।
अगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के छह साल के शासन को छोड़ दे तो वर्ष 1977 से लेकर अब तक जितनी भी गैर कांग्रेसी सरकार बनी उसमें वामपंथियों की भूमिका ज़रूर रही। यहां तक की संपूर्ण क्रांति अभियान पर सवार जब जनता पार्टी ने लोहियावादियों के साथ मिलकर पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनाई उसको भी वामपंथियों का समर्थन हासिल था। उस वक्त अब की तरह शायद सेकुलर शब्द राजनीति में इस कदर प्रचलित नहीं हुआ होगा। 1989 से लेकर अब तक यह गठबंधन केन्द्र में सरकार के गठन में अपनी अहम भूमिका निभाता रहा। चाहे वह विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार हो या चंद्रशेखर की सरकार । सन् 96 में जब एनडीए सरकार के बहुमत नहीं साबित कर पाई तब एच डी देवगौड़ा की सरकार बनाने में लेफ्ट ने अहम रोल अदा किया और इस सरकार में सीपीआई के इंद्रजीत गुप्ता और चतुरानन मिस्रा शामिल हुए। और फिर इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने तो भी सीपीआई के दोनों सांसद सरकार में बने रहे। ये पहला मौका था जब लेफ्ट केंद्र में सरकार में हिस्सेदारी कर रही थी। वरना हाल के यूपीए सरकार के दौरान तो बिना सरकार में रहे ही मजे लेते रहे और शायद विपक्षी एनडीए से ज़्यादा सरकार को अंगूली किया।
आम चुनाव के बाद जब एनडीए की सरकार बनी तो उस वक्त वाम मोर्चा प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका निभाता रहा। और वर्ष 2004 में आम चुनाव के बाद कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सामने आया जिसने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन बनाया और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तब इस सरकार को वाम मोर्चा ने बाहर से समर्थन दिया। और केन्द्र में नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हुआ। राजनीतिक के दिग्गज और वामपंथी नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने इसमें अपनी अहम भूमिका निभाई और उन्हीं का प्रयास था जिन्होंने कथित धर्मनिरपेक्ष दलों को एक साथ कर उन्हें गोलबंद किया और सभी को एक झंडे के तले किया। और इसी के परिणामस्वरूप केन्द्र में यूपीए सरकार के गठन का रास्ता साफ हो पाया।केन्द्र में सरकार को चलाने के लिए संयुक्त घोषणा पत्र बनाया गया जिसके तहत सरकार को चलाने की बात कही गई लेकिन अमरीका के साथ हुए परमाणु करार के बाद वाम मोर्चा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। आप इसे सैद्धांतिक विरोध कह सकते हैं लेकिन कई विश्लेषक इसे इस रूप में देखते हैं कि आखिर लेफ्ट को चुनाव भी लड़ना था और वो भी अपने ही गढ़ में उस कांग्रेस के खिलाफ जिसे वो अब तक केंद्र में समर्थन देती आई थी लिहाज़ा समर्थन वापस लेने की घटना को कुछ लोग लेफ्ट की सोची समझी रणनीति में मानते हैं। ज़ाहिर है पूरे यूपीए सरकार के दौरान लेफ्ट पार्टियां ज्यादा असर दार भूमिका में रहे।
लेकिन अगर अगर हम वर्ष 1991 से लेकर अब तक हुए लोकसभा चुनाव के परिणामों पर एक नज़र डालते है तो नतीजा यही निकलता है कि लेफ्ट अब तक अपने गढ़ को बचाए रखने में कामयाब रहा और केन्द्र की राजनीति में उसका दबदबा बरकरार रहा। पिछले परिणाम को देखे तो सीपीएम ने 1991 में 35 पर तो 1996 में 32 पर 1998 में 32, 1999 में 33, 2004 में 43 सीटों पर जीत दर्ज की।
लेकिन पंद्रहवीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव प्रक्रिया चल रही है। एक बार फिर वामपंथी गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई , विकल्प देने की कवायद में जुट गए हैं। लेकिन इसकी संभावना कम ही लगती है। हां ये ज़रूर हो सकता है एनडीए को सरकार बनने के करीब देखते ही सेकुलर सेकुलर चिल्लाते हुए लेफ्ट या तो तीसरे मोर्चे की सरकार बनवाते हुए कांग्रेस को समर्थन देने के लिए कह सकती है, या फिर ये कि बाद में फिर मनमोहन सिंह की गोद में जाकर बैठ जाएं। परमाणु करार जैसे मुद्दे पर यूपीए से समर्थन वापस लेकर कामरेडों ने ये जताने की कोशिश तो जरूर की कि सत्ता के नजदीक रहने के लिए उन्होंने सिद्दांतों से समझौता नहीं किया।बहरहाल परिणाम जिस करवट बैठे इस पर सबकी निगाहें जरूर होंगी कि हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे बेहतरीन रणनीतिकार के अभाव में वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति में अपनी कोई छाप छोड़ पाएगें। ज़ाहिर है परिणाम से ज्यादा रणनीति पर सबकी निगाहें होंगी। इस चुनाव में शायद वामपंथियों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती भी है।
1 टिप्पणी:
गुरूजी अपने संवाद के जरिए आपने बामपंथी जलबे का अच्छा नमूना पेश किया है । लेकिन केवल सरकार चला लेने भर से काम नही हो जाता है आप सरकार बनाने में अहम भूमिका में रहे तो अचरज की क्या बात है । सत्ता लोलुप्ता तो सभी दल को पसंद है । रही विकास की बात तो आपने तो पश्चिम बंगाल में लगभग ३० साल से अधिक राज किया है फिर ऐसा क्या किया है वहां की जनता के लिए । नंदीग्राम में आपने जो किया अब जगजाहिर है । सत्ता का स्वाद चखते हुए भी आपके विरोध में क्या छुपा होता है शायद इस बार के कांग्रेसी सरकार को मालूम पड़ गया होगा । इस बार भी आप अपनी जुगाड़ में लगे हुए है । भले लंबी-चौड़ी दास्तान आप जनता के बीच भेज रहे है लेकिन लोगो को पता है कि आप किधर जांएगे । आपके विचार से लोगो में कोई सस्पेश नही है । जहां तक केरल से लेकर बंगाल तक जनता के बीच जो छबी बनी है वह केवल एक बिचौलिए की बनी है जो अपनी बात मनवाने के लिए सरकार को मजबूर करती है । शायद इसका खुलासा इसी बार की गिनती में हो जाएगा कि आपको जनता कितना पसंद करती है । शायद यही वजह है कि इस बार महाश्वेता देवी ने भी हिन्दुस्तान के जरिए जनता के बीच यह संदेश दिया था कि बंगाल की बामपंथी पाटीॆ को हराना चाहिए । खासकर आज के ये बामपंथी संशोधनवाद के नाम पर केवल संसदीय राजनीति कर रहे है । बाकी कुछ नही बचा है ।
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