शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

१५ वीं लोकसभा - प‍टकनी खाता सत्ता पक्ष - २


दरअसल लोकसभा में प्रधानमंत्री के हाल के विदेश दौरे पर नियम १९३ के तहत चर्चा कराने का विपक्ष की तरफ से दिया गया नोटिस स्वीकार कर लिया गया था। लेकिन चर्चा कराने के कई दिन पूर्व ही लोकसभा में शून्य काल में भाजपा के हजारीबाग से सांसद और पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने इस मुद्दे को उठाकर सरकार को बैक फूट पर ला दिया था। शून्य काल में मामला उठाते हुए यशवंत सिन्हा ने भारत पाक साझा बयान में ब्लुचिस्तान के जिक्र का मुद्दा , आतंकवाद को डिलिंक कर पाकिस्तान से बातचीत करने पर सहमति, एंड यूजर एग्रीमेंट और संवर्द्धन और परिशोधन तकनीक पर जी आठ की भूमिका का जिक्र करते हुए भारत की संप्रभूता बेचने का आरोप लगाते हुए एक तरह से आने वाले चर्चा के दौरान विपक्ष का टोन सेट कर चुके थे। लिहाज़ा आने वाली चर्चा पर जबाव देने के लिए सरकार के पास बहुत वक्त था , इन सवालों पर पूरी तरह से तैयार होकर आने के लिए। लेकिन उसके बाद जितने दिन बीते सरकार के विभिन्न धड़ों की तरफ से आने वाले जबाव ने सरकार के लिए और मुश्किलें ही पैदा की। मसलन विदेश राज्य मंत्री शशी थरूर का सदन के बाहर दिया गया ये बयान कि साझा वक्तव्य की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। और उस पर विदेश सचिव मेनन का ड्राफ्टिंग में गलती की स्वीकारोक्ति वाले बयान ने सरकारी की पेशानी पर पसीने की बूंद और बढ़ाई ही , कम करने में कोई सहयोग नहीं दे पाई। रही सही कसर सत्ताधारी कांग्रेस से दबे स्वर से आने वाले विरोध ने कर दिखाया। कांग्रेसी प्रवक्ताओं की तरफ से प्रधानमंत्री के समर्थन में दो एक वाक्य क्या निकलते , अपनी पिंड छुड़ाने के लिए उन्होंने ये कह कर पल्ला झाड़ लिया कि प्रधानमंत्री आशंकाओं का जबाव देंगे। ज़ाहिर है टोन दोनों तरफ से सेट हो चुके थे। विपक्ष मजबूत दिखने लगा था। मैसेज जा चुका था ... कुछ न कुछ गलती हुई है जिसे सरकार छुपा रही है। ये मैसेज खतरनाक था। जिसे ख़ारिज करने में सत्ता पक्ष को अब तक सफलता नहीं मिल पाई।


बहरहाल लोकसभा में इस मुद्दे पर होने वाली चर्चा की शुरुआत सदन में भाजपा की उपनेता सुषमा स्वराज को करना था लेकिन ऐन मौके पर पार्टी ने इसके लिए यशवंत सिन्हा को चुन कर अपने आंतरिक अंतर्विरोध को कम करने में भी कुछ हद तक सफलता पाई। हालांकि इसके लिए यशवंत सिन्हा ने अपने भाषण की शुरूआत में ही पार्टी पर भी व्यंग्य वाण सनित चुटकी लेकर मजा ले लिया। ( इस पर चर्चा बाद में )। बहरहाल शुरआत से यशवंत सिन्हा आक्रामक नज़र आए। विदेश नीति की तुलना मेट्रो के खंभे से करते हुये उन्होंने सरकार पर आरोप लगाए कि शर्म अल शेख जो कुछ भी हुआ उससे विदेश नीति के खंभे भी मेट्रों की तरह क्रैक हो गए हैं। उन्होंने कहा कि मेट्रो के क्रैक तो फिर भी भर लिए जाएंगे लेकिन विदेश नीति में ये दरार शायद ही भरा जा सकेगा।


उनका कहना था कि तेरह जुलाई को पाकिस्तानी राष्ट्रपति ज़रदारी से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री का बयान था कि जब तक पाकिस्तान २६ नवंवर के मुबंई हमलावरों पर ठोस कार्रवायी नहीं करता तब तक पाकिस्तान से सार्थक बातचीत संभव नहीं है । फिर शर्म अल शेख में गिलानी के साथ मुलाकात के बाद एक महीने के अंदर क्या बदल गया कि साझा बयान में भारत आतंकवाद को परे रखकर पाकिस्तान से बातचीत के लिए राजी हो गया। जाहिर है ये २६ नवंवर को मुबंई हमलों के बाद पाकिस्तान से किसी भी तरह की बातचीत नहीं करने की भारत सरकार के पोजिशन से डेविएशन है। सरकार को इस पर अपना रूख स्पष्ट करने की मांग उन्होंने की। इससे भी करारा वार उन्होंने साझा बयान में ब्लुचिस्तान के जिक्र पर किया। इस पर सरकारी प्रतिक्रिया कि ब्लुचिस्तान में भारत को छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है, का उल्लेख करते हुए उन्होंने सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि कई मुद्दों और जगहों पर हमारे लिए छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है तो फिर सरकार को उसका भी उल्लेख कर लेना चाहिए था। उनका साफ तौर पर कहना था कि शर्म अल शेख में ब्लुचिस्तान के जिक्र बाले साझा बयान की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि पाकिस्तान इसका अपने पक्ष में इस्तेमाल करने लगा। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि प्रधानमंत्री जो कर आए हैं उसको सातों समुद्र के पानी से भी नहीं धोया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि ब्लुचिस्तान का ये जिक्र आने वाले वक्त में भारत को बहुत तकलीफ देने वाला है।


विदेश सचिव के बैड ड्राफ्टिंग वाली बात भी उनके भाषण में प्रमुखता से छाया रहा। उन्होंने कहा कि साझा बयान की ड्राफ्टिंग बहुत सोच समझ और तैयारी के साथ होती है। एक एक शब्द पर घंटो खपाया जाता है। आगरा शिखर वार्ता इसी साझा बयान पर एकमत नहीं होने की वजह से टूट गई थी। फिर सरकार की क्या मजबूरी थी कि आखिर ब्लुचिस्तान का जिक्र करना पड़ा। और उस पर तुर्रा ये कि बैड ड्राफ्टिंग को स्वीकार करने वाला अधिकारी अब तक अपने पद पर बना हुआ है। या तो वो अधिकारी सही या सरकार सच बोल रही है। क्या ब्लुचिस्तान के संदर्भ में पाकिस्तान ने भारत को कोई दस्तावेज सौंपे हैं जिसके वजह से उसका जिक्र लाजिमी हो गया। अगर ऐसा है तो सरकार को बताना चाहिए। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, संवर्द्धन और शोधन तकनीक, और अंतिम उपयोगकर्ता निगराणी समझौता ( एंड यूजर मानिटरिंग एग्रिमेंट ) का जिक्र करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री पर देश की संप्रभुता गिरवी रखने का आरोप लगाया। ज़ाहिर है सारा विपक्ष उनके इन आरोपों पर एक मत था। ( ज़ारी )

गुरुवार, 30 जुलाई 2009

१५ वीं लोकसभा - प‍टकनी खाता सत्ता पक्ष

पंद्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र में तो विपक्ष बड़ा शांत नज़र आया और सत्ता पक्ष एतिहासिक जनादेश की खुशफहमी में डुबकी ही लगाता नज़र आया। लेकिन विपक्षी बेंच पर बै‌ठे दिग्गज़ों पर एक नज़र दौड़ाने के बाद से ही स्पष्ट हो गया था कि सत्ता पक्ष के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी। और जैसे ही तकनीकि तौर पर दूसरा यानि कि बजट सत्र शुरू हुआ ये बात सदन की कार्यवाही के दौरान दिखने लगी। कई मौके ऐसे आए जब सत्ता पक्ष विपक्ष के तीखे सवालों पर सदन की हरी कालीन पर लोटता नज़र आया। ऐसा लगता रहा कि सत्ता पक्ष अब भी जीत की खुमारी से उबर नहीं पाया है। उधर सत्ता पक्ष को समर्थन दिए नेताओं मसलन लालु, मुलायम, बीजद और बसपा भी सरकार की खाल उतारती ही नजर आई। भाजपा में यशवंत सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों ने अपनी मनमुटाव के बावजूद सरकार को विभिन्न मुद्दों पर आड़े हाथ लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

सत्ता पक्ष की हालत इस बात से समझी जा सकती है कि महत्वपूर्ण बहस को अगर छोड़ भी दें तो प्रश्न काल के दौरान विपक्ष के नीतिगत संबंधी साधारण प्रश्नों पर भी दिग्गज मंत्री बगले झांकते नजर आते हैं। सरकार की किरकिरी कराने में इनका बड़ा हाथ रहा है। इनमें एस एम कृष्णा ( विदेश मंत्री ) , बी के हांडिक ( खनन मंत्री ), कमलनाथ ( सड़क परिवहन ), डीएमके कोटे के मंत्री अझागिरी आदि के नाम प्रमुख हैं। अझागिरी ने तो कमाल ही कर दिया, उनके मंत्रालय से संबंधित सवाल पर तो वो उठ कर सदन से बाहर ही चले गए। बी के हांडिक इतने हड़बड़ाए कि सदन में मौजुद सोनिया गांधी तक के चेहरे पर झेंप साफ देखने को मिली। गृह मंत्री चिदंबरम तक उन्हें समझाते रहे तब उनकी नैय्या पार लगती दिखी। यहां तक की आसन की तरफ से भी कई बार मंत्रियों को मुश्किल परिस्थितियों से निकालने की कोशिश हुई। इन सबके बीच समुचा विपक्ष मजा लेता रहा।

यहां तक कि गृह मंत्रालय के अनुदान मांगों पर हुई चर्चा के जबाव में चिदंबरम जैसे दिग्गज भी असहज नज़र आए। शिवराज पाटिल के चले जाने के बाद चिदंबरम की छवि गृह मंत्रालय के ऐसे मंत्री के रूप में सामने आई थी जो ऐसा दिख रहा था कि अब घरेलु ( नक्सलवाद आदि ) और विदेशी मोर्चे पर आंतरिक सुरक्षा के मामले में बेहतर काम हो रहा है। लेकिन चर्चा के दौरान सुषमा स्वराज के आरोपों ने जहाँ उनकी इस बनी बनाई छवि को तोड़ने में कुछ हद तक सफलता पाई वहीं उनके हमलों का यथोचित उत्तर देने में चिदंबरम भी लड़खड़ाते नज़र आए।


बांकि रही सही कसर प्रधानमंत्री की हाल के विदेश दौरे ने पूरी कर दी। शर्म अल शेख में भारत पाकिस्तान संयुक्त वक्तव्य पर विपक्ष की घेरेबंदी ने पूरे सत्ता पक्ष को हिला कर रख दिया। विपक्ष ने संयुक्त वक्तव्य में आतंकवादी घटनाओं और बातचीत को साथ साथ रखने के अलावा ब्लुचिस्तान के जिक्र पर ऐसा बवाल काटा की सरकार को नानी याद आ गई। ऐसे समय में जब सरकार को सत्ताधारी पार्टी की सहायता की ज़रूरत थी, कांग्रेस के प्रवक्ता भी इस सवाल पर बचते नज़र आए। बाद में विदेश राज्यमंत्रियों की कानूनी बैधता की बयानबाजी और विदेश सचिव की ड्राफ्टिंग में गलती की स्वीकारोक्ति ने रही सही कसर भी निकाल दी। साफ लगा कि इस मुद्दे पर न तो सरकार के विभिन्न धड़े एकमत हैं बल्कि सरकार और पार्टी भी अपने किए का एकमत से बचाव नहीं कर पा रही है। उधर विपक्ष यशवंत सिन्हा, शरद यादव, मुलायम सिंह और सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों के रूप में सरकार पर लगातार कोड़े बरसाता नज़र आया। इस मुद्दे पर बुधवार को शुरू हुई चर्चा में हस्तक्षेप करने वाले प्रधानमंत्री के बयान देखकर भी ऐसा लगता है कि सरकार बहुत कुछ स्पष्ट नहीं कर पाई। खासतौर पर सरकार पर लगे आरोप अब भी बरकरार हैं।