पंद्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र में तो विपक्ष बड़ा शांत नज़र आया और सत्ता पक्ष एतिहासिक जनादेश की खुशफहमी में डुबकी ही लगाता नज़र आया। लेकिन विपक्षी बेंच पर बैठे दिग्गज़ों पर एक नज़र दौड़ाने के बाद से ही स्पष्ट हो गया था कि सत्ता पक्ष के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी। और जैसे ही तकनीकि तौर पर दूसरा यानि कि बजट सत्र शुरू हुआ ये बात सदन की कार्यवाही के दौरान दिखने लगी। कई मौके ऐसे आए जब सत्ता पक्ष विपक्ष के तीखे सवालों पर सदन की हरी कालीन पर लोटता नज़र आया। ऐसा लगता रहा कि सत्ता पक्ष अब भी जीत की खुमारी से उबर नहीं पाया है। उधर सत्ता पक्ष को समर्थन दिए नेताओं मसलन लालु, मुलायम, बीजद और बसपा भी सरकार की खाल उतारती ही नजर आई। भाजपा में यशवंत सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों ने अपनी मनमुटाव के बावजूद सरकार को विभिन्न मुद्दों पर आड़े हाथ लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।सत्ता पक्ष की हालत इस बात से समझी जा सकती है कि महत्वपूर्ण बहस को अगर छोड़ भी दें तो प्रश्न काल के दौरान विपक्ष के नीतिगत संबंधी साधारण प्रश्नों पर भी दिग्गज मंत्री बगले झांकते नजर आते हैं। सरकार की किरकिरी कराने में इनका बड़ा हाथ रहा है। इनमें एस एम कृष्णा ( विदेश मंत्री ) , बी के हांडिक ( खनन मंत्री ), कमलनाथ ( सड़क परिवहन ), डीएमके कोटे के मंत्री अझागिरी आदि के नाम प्रमुख हैं। अझागिरी ने तो कमाल ही कर दिया, उनके मंत्रालय से संबंधित सवाल पर तो वो उठ कर सदन से बाहर ही चले गए। बी के हांडिक इतने हड़बड़ाए कि सदन में मौजुद सोनिया गांधी तक के चेहरे पर झेंप साफ देखने को मिली। गृह मंत्री चिदंबरम तक उन्हें समझाते रहे तब उनकी नैय्या पार लगती दिखी। यहां तक की आसन की तरफ से भी कई बार मंत्रियों को मुश्किल परिस्थितियों से निकालने की कोशिश हुई। इन सबके बीच समुचा विपक्ष मजा लेता रहा।
यहां तक कि गृह मंत्रालय के अनुदान मांगों पर हुई चर्चा के जबाव में चिदंबरम जैसे दिग्गज भी असहज नज़र आए। शिवराज पाटिल के चले जाने के बाद चिदंबरम की छवि गृह मंत्रालय के ऐसे मंत्री के रूप में सामने आई थी जो ऐसा दिख रहा था कि अब घरेलु ( नक्सलवाद आदि ) और विदेशी मोर्चे पर आंतरिक सुरक्षा के मामले में बेहतर काम हो रहा है। लेकिन चर्चा के दौरान सुषमा स्वराज के आरोपों ने जहाँ उनकी इस बनी बनाई छवि को तोड़ने में कुछ हद तक सफलता पाई वहीं उनके हमलों का यथोचित उत्तर देने में चिदंबरम भी लड़खड़ाते नज़र आए।
बांकि रही सही कसर प्रधानमंत्री की हाल के विदेश दौरे ने पूरी कर दी। शर्म अल शेख में भारत पाकिस्तान संयुक्त वक्तव्य पर विपक्ष की घेरेबंदी ने पूरे सत्ता पक्ष को हिला कर रख दिया। विपक्ष ने संयुक्त वक्तव्य में आतंकवादी घटनाओं और बातचीत को साथ साथ रखने के अलावा ब्लुचिस्तान के जिक्र पर ऐसा बवाल काटा की सरकार को नानी याद आ गई। ऐसे समय में जब सरकार को सत्ताधारी पार्टी की सहायता की ज़रूरत थी, कांग्रेस के प्रवक्ता भी इस सवाल पर बचते नज़र आए। बाद में विदेश राज्यमंत्रियों की कानूनी बैधता की बयानबाजी और विदेश सचिव की ड्राफ्टिंग में गलती की स्वीकारोक्ति ने रही सही कसर भी निकाल दी। साफ लगा कि इस मुद्दे पर न तो सरकार के विभिन्न धड़े एकमत हैं बल्कि सरकार और पार्टी भी अपने किए का एकमत से बचाव नहीं कर पा रही है। उधर विपक्ष यशवंत सिन्हा, शरद यादव, मुलायम सिंह और सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों के रूप में सरकार पर लगातार कोड़े बरसाता नज़र आया। इस मुद्दे पर बुधवार को शुरू हुई चर्चा में हस्तक्षेप करने वाले प्रधानमंत्री के बयान देखकर भी ऐसा लगता है कि सरकार बहुत कुछ स्पष्ट नहीं कर पाई। खासतौर पर सरकार पर लगे आरोप अब भी बरकरार हैं।
1 टिप्पणी:
good post...this time BJP has good leaders in lower house and the party can make good use of them.
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