मंगलवार, 22 सितंबर 2009

झारखंड में संभावित सिंगूर की आशंका में मित्तल चले टाटा की राह

झारखंड से खबर आ रही है कि इस्पात आईकान मित्तल टाटा की राह पर चल निकले हैं। झारखंड की खूंटी ज़िले के टोरपा में मित्तल की प्रस्तावित चालीस हज़ार करोड़ की एकीकृत स्टील प्लांट की योजना को पलिता लग सकता है। दरअसल विस्थापन विरोधी समुहों द्वारा स्टील प्लांट के पुरज़ोर विरोध की वजह से मित्तल ने प्लांट को झारखंड में ही कहीं और ले जाने का तो फैसला कर लिया है लेकिन अगर बात फिर भी नहीं बनी तो हो सकता है राज्य को चालीस हज़ार करोड़ रूपए की इस महत्वपूर्ण परियोजना से हाथ धोना पड़ जाए।

मित्तल को अपनी इकाई लगाने के लिए छह हज़ार एकड़ जमीन की जरूरत थी लेकिन विस्थापन विरोधी कुछ आंदोलनकारियों ने इसके लिए ज़मीन देने से ये कह कर इंकार कर दिया है कि वो किसी प्लांट की स्थापना के लिए किसी भी कीमत पर अपनी खेतिहर ज़मीन नहीं देंगे। लिहाज़ा मामल फंस गया है। वर्ष २००५ में मित्तल ने झारखँड सरकार के साथ १२ मिलियन टन उत्पादन वाली स्टील प्लांट लगाने संबंधी एक समझौते पत्र पर हस्ताक्षर किया था। हालांकि फिलहाल प्लांट के लिए किसी वैकल्पिक स्थान का चयन नहीं किया गया है।

सोमवार, 21 सितंबर 2009

बिहार में खुलेगा एएमयू का कैंपस

मुख्यमंत्री ने दिए सौ एकड़ जमीन

किशनगंज में होगा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

उन्नीस सितंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उप कुलपति प्रो. पी के अब्दुल अजीस को पत्र लिखकर राज्य के किशनगंज ज़िले में विश्वविद्यालय को सौ एकड़ ज़मीन देने का प्रस्ताव किया है। मुख्यमंत्री ने उप कुलपति को लिखे अपने पत्र में कहा है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के बिहार में सेंटर खोलने के प्रस्ताव से उन्हें खुशी हुई है और इसके लिए उनकी सरकार बिहार के मुस्लिम बहुल किशनगंज ज़िले में सौ एकड़ का जमीन मुफ्त उपलब्ध कराने को तैयार है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े रह गए इस ज़िले को और ख़ासतौर पर अल्पसंख्यक समुदाय को लाभ होगा। ज़ाहिर है शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ते गए बिहार के लिए सरकार की तरफ से ईद का तौहफा है। इसके साथ ही उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से अपील की है कि वो इस कार्य को जल्द से जल्द मुकाम तक पहुंचाएं।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

नीतिश जी संभलिए वरना ...


बिहार विधानसभा की 18 सीटों के लिए हुए उपचुनावों के परिणाम को देखते हुए ये कहने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि लालू प्रसाद और रामविलास पासवान ने अच्छा प्रदर्शन किया है जबकि सत्तारुढ़ जद (यू) और बीजेपी को झटका लगा है । 18 सीटों पर हुए उपचुनावों में आरजेडी को छह और लोक जनशक्ति पार्टी को तीन सीटें मिली हैं । दूसरी तरफ़ पिछले लोकसभा चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली जद यू को मात्र तीन और बीजेपी को दो सीटें मिली हैं। इसके अलावा कांग्रेस दो सीटें निकालने में कामयाब रही तो बहुजन समाज पार्टी भी एक पर जीत दर्ज़ करने में सफल रही जबकि एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई।


बिहार में पिछले लोकसभा चुनावों में जद यू और बीजेपी के गठबंधन ने 40 में से 33 सीटें जीती थीं जबकि राजद को मात्र तीन सीटों से संतोष करना पडा था। रामविलास पासवान की लोजपा का सुफड़ा साफ हो गया था। इसके मद्देनज़र विधानसभा उपचुनाव के परिणाम काफ़ी चौंकाने वाले हैं। कुछ प्रेक्षक इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन की ख़ामियों और लालू प्रसाद की वापसी के तौर पर देख रहे हैं। परिणाम इसलिए भी चौंकाने वाले हैं कि इसमें लालू और रामविलास की जीत जीतना नहीं दिख रहा है उतना नीतिश की हार दिख रही है। ज़ाहिर छवि गढ़ने में माहिर नीतिश को बिहार की जनता की तरफ से पहला झ‍टका मिला है। इसका महत्व इस बात में नीहित है कि नीतिश अपने कार्यकाल में काम के जो दावे कर रहे हैं उससे बिहार की जनता उतनी प्रभावित नहीं है जितनी कि मीडिया।


परिणामों के बाद नीतीश कुमार का कहना था कि वो अपने काम से नहीं डिगेंगे और विनम्रता से परिणामों को स्वीकार करते है । उनका कहना था कि वो अपने बाकी के कार्यकाल में पूरी लगन से काम करते रहेंगे और फिर जनता के पास काम के साथ जाएंगे। ज़ाहिर है ये बेहतरीन स्परीट है लेकिन ये काम दिखता भी रहना जरूरी है। नीतिश जी को समझना होगा कि विकास के प्रति बिहार की जनता की भूख बढ़ चुकी है। पुराने समीकरणों से बिहारी अब संतुष्ट नहीं होने वाले। सड़क और कानून व्यवस्था शुरूआत के लिए तो ठीक है लेकिन यही मंजील नहीं हो सकती। जिस तरह लोगों ने लालू से आज़िज आ कर नीतिश को कुर्सी थमाई उन्हें लगा कि उन्हें कूंजी मिल गई लेकिन कूंजी के पीछे की सच्चाई बदलाव को वो पूरी तरह नहीं समझ पा रहे लगता है। राजनीति के उन्हीं पुराने समीकरणों से बिहारियों की क्षुधा संतुष्ट नहीं की जा सकती नीतिश जी। साथ ही बिहारी जनता अब बीस साल इंतजार करने के मूड में भी नहीं है। डेलिवर कीजिए नहीं तो रास्ता नापिए।
कल तक राजद की मलाई चाट रहे श्याम रजक और रमई राम किस क्राइटेरिया में आपकी पार्टी के टिकट के अनुरूप हो गए। भाई भतीजा को टिकट नहीं देने की बात तो समझ में आई लेकिन पुराने घाघों को जिनसे आज़िज आ कर आपका कुर्सी दी थी , उन्हीं को फिर से स्थापित करने में आपने कौन सी समझदारी दिखाई ? जिस जातिवादी राजनीति से बिहार तंग आ चुका था आप भी महा - आयोग आदि कदम उठा कर कहीं न कहीं उसी को मजबूत करते दिख रहे हैं। किसी पत्रकार मित्र ने ये तो कहा कि तमाम ठेकों , जनवितरण प्रणाली आदि के ठेकों तक में आप इस बात का ध्यान रख रहे हैं। मुझे नहीं पता कि हकिकत क्या है लेकिन आप तो छवि गढ़ने में माहिर हैं जरा ध्यान रखिएगा। जिन पुराने रास्तों पर चलकर लालू रसातल पहुंचे उस पर चलना अच्छा या कि नए रास्ते चुने जाएं। पांच साल का वक्त एक राष्ट्र के इतिहास में मायने नहीं रखता है लेकिन संदेश देने के लिए ही सही, बहुत ज़्यादा है। भरोसा जीतने के लिए ये लंबा समय होता है। शेरशाह इन्हीं पांच सालों में इतिहास में अमर हो गए। आप पर ज़िम्मेदारी ज्यादा है नीतिश जी, बिहार के लिए इतिहास के इस संक्रमण काल में नेतृत्व आप के हाथ में है ... इतिहास के कूड़ेदान में जाना है या मगध की गौरवकीर्ती वापस लानी है .... आपको ही तय करना है। हमारा क्या हम तो लिखते रहेंगे कुछ न कुछ .... आप तो गौरवशाली अतीत का पुननिर्माण कर रहे हैं। आपकी हार से आप से ज्यादा हम व्यथित हैं। संभालिए वरना ....


दूसरी तरफ़ लालू प्रसाद इन परिणामों से प्रसन्न दिखे और अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा कि ये सेमी फ़ाइनल है और अगले विधानसभा चुनावों में राज्य में राजद की सरकार बनेगी. ज़ाहिर है बैकफूट पर खेल रहे लालू विकास की टीआरपी भी समझ चुके हैं। ऐसे में लालू हो या नीतिश मायने नहीं रखता है जो विकास की राह पर दौड़ने का माद्दा दिखाएगा सत्ता उसकी होगी। लड़ाई व्यक्तित्व के खांचे से निकल कर कृतित्व के दायरे में आ चुका है। नीतिश को ये सोचना होगा कि बिहार में उनको जनादेश किस लिए मिला है ? अगर वो राजनीति के उन्हीं पुराने प्रतिमानों को आज़माना चाहते हैं जिनका मुलम्मा छुट चुका है तो वो भुलावे में हैं। बिहार में नीतिश को मिला जनादेश बदलाव के लिए था न कि उनके व्यक्तित्व पर वो जनमत सर्वेक्षण था। उन्हें आगे जीतते रहना है तो ये सोचना होगा कि बदलाव की अभिव्यक्ति के लिए कौन से नए मुहावरे गढ़े जाएं। ज़ाहिर है उपचुनाव के ये परिणाम नीतिश को सही राह पर लाने के लिए बिहार की जनता की तरफ से एक झ‍टका है , अगर फिर भी नहीं संभले तो इससे भी बूरे परिणाम के लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए।