रविवार, 23 नवंबर 2014

शीतकालीन सत्र – घर में मोदी सरकार की पहली अग्नि परीक्षा

Source : Parliament
पिछले चार दशकों में पहली बार किसी सरकार को अपने तईं बहुमत मिला। भाजपा पहली बार बहुमत के आंकड़ों के साथ सरकार बनाने में सफल हुई। निस्संदेह सदियों से मुख्य विपक्षी दल का तमगा झेल रही भाजपा के लिए सोलहवीं लोकसभा की शुरूआत इससे बेहतर नहीं हो सकती थी। ऐसे वक्त में जब पूर्ववर्ती सरकार नीतिगत पंगुता ( Policey Paralysis )की शिकार हो चुकी हो, मंहगाई उफान पर हो, सरकार की छवि घोटाले दर घोटाले से बुरी तरह झुलसी हुई हो। अपने जीवन में बेहतरी की संभावनाओं की उम्मीद लगाए जनता ने बैलेट के जरिए न केवल नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया बल्कि तीन दशकों में सियासत की पहचान बन चुकी गठबंधन की मजबूरी को भी ठेंगा दिखा दिया। जनज्वार से उपज़ा अभूतपूर्व जनादेश ही नई सरकार के लिए पहली चुनौती भी है। अभूतपूर्व जनादेश के स्वप्निल बौछार में भींगते भींगते ही नरेंद्र मोदी सरकार के छह महीने बीत गए। अब शीतकालीन सत्र में सरकार की नीति और नियत की पहली अग्नि परीक्षा होनी है।


24 नवंबर से शुरू हो रही संसद की शीतकालीन सत्र में कुल मिलाकर 22 बैठकें आयोजित होनी है। संसद के समक्ष पहले से ही 67 विधेयक लंबित हैं। लोकसभा में आठ और शेष 59 राज्यसभा में। ऐसे में जबकि वित्त मंत्री लगातार ये कहते नजर आ रहे हैं कि छह फ़ीसदी विकास दर का लक्ष्य बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण लग रहा है। ऐसे में सरकार का ऐजेंडा क्या होगा , समझना बहुत कठीन नहीं। वो भी तब झारखंड और जम्मू कश्मीर के चुनाव निपट जाने के बाद लगभग एक साल तक चुनावी रणनीति बनाए रखने से भी सरकार को निजात मिली हुई है। जनता के नज़र में खरे उतरने की चुनौती से निपटने के लिए सरकार इस सत्र में आर्थिक सुधार के एजेंडे को प्राथमिकता में रखेगी, इसमें कोई शक नहीं है लेकिन सरकार के लिए इस एजेंडा को लागू करना ही बड़े इम्तिहान से गुजरने सरीखा होगा। संसद के भीतर कांग्रेस और गैर एनडीए दलों के साथ के साथ कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर फ्लोर कार्डिनेशन करने में सरकार के प्रबंधकों को पसीने आ जाएंगें। खासतौर पर तब जबकि सत्ता पक्ष राज्यसभा में अब भी बहुमत के आंकड़ों से दूर है। 

कांग्रेस के साथ भाजपा के रिश्ते बीते एक पखवाड़े में कुछ और तल्ख हुए हैं। नेता विपक्ष की कुर्सी से दूरी और नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल विस्तार में सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की अनुपस्थिति खुद ही दोनों दलों के बीच संबंधों की कटुता की कहानी बयां कर रही है। इस पर जवाहर लाल नेहरू , ईंदिरा गांधी और सरदार पटेल की विरासत पर दोनों दलों के बीच हुई खिंचतान ने आग में घी का काम किया है।

 यही नहीं अभूतपूर्व जनादेश के बाद देश भर में क्षेत्रीय दलों में एक तरह की सनसनी है, ज़ाहिर है भविष्य में सियासत में खुद को अप्रसांगिक होने से बचाने के लिए कभी जनता दल का कुनबा रहे सभी क्षेत्रीय दलों ने एक बार फिर साथ बैठने की कवायद शुरू कर दी है। इनमें जनता दल युनाइट, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल सेक्युलर, इंडियन नेशनल लोक दल और समाजवादी पार्टी खास हैं। हालांकि लोकसभा में इनके साथ बैठने से सरकार के सेहत में शायद ही फर्क पड़े क्योंकि लोकसभा में इनकी कुल संख्या 15 है लेकिन राज्यसभा में पहले से ही परेशानी महसूस कर रही सरकार के लिए इनका साथ बैठना और असहज़ करेगा क्योंकि राज्यसभा में इनका आंकड़ा 25 बैठता है। ऐसे में संसदीय कार्यमंत्री के इस बयान से कि सरकार विपक्षी दलों को साथ लेने के लिए कुछ अतिरिक्त कदम चलने में गुरेज नहीं करेगी , के जरिए सत्ता पक्ष की जरूरत और मजबूरी दोनों को परखा जा सकता है। 

ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि तनी हुई रस्सी पर चल रही सरकार महत्वपूर्ण संशोधनों और विधेयकों को इस सत्र में सदन में चर्चा के लिए लेकर आती है या नहीं। खास तौर पर ऐसे विधेयक जो आर्थिक सुधार के एजेंडे के लिहाज से मह्त्वपूर्ण हैं। मसलन नई भूमि अधिग्रहण कानून के संशोधन को लेकर विधेयक, रियल इस्टेट को नियमित करने वाली विधेयक या श्रम सुधार से जुड़े विधेयक। सरकार हर हाल में टकराव से बचना चाहेगी और अधिकांश मुद्दे पर आम सहमति के रास्ते ही आगे बढ़ने का रूख करेगी। वस्तु और सेवाकर ( जीएसटी ) विधेयक जैसे बिल जिसे पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी सरकार के पास आम सहमति के रास्ते से आगे बढ़ने के अलावा शायद ही कोई विकल्प है। सरकार ऐसे तकरीबन 86 विधेयकों पर पहले ही चर्चा कर चुकी है जो बिल बनने के विभिन्न चरणों में हैं। कोल माइन्स स्पेशल प्रोभिजन्स बिल जिस पर पहले ही सरकार अध्यादेश ला चुकी है, इंश्योरेंस बिल जो लोकसभा से पारित होकर राज्यसभा की सेलेक्ट कमिटी के पास है, ऐसे कई विधेयकों पर सरकार को इसी सत्र में फैसला लेना है। हालांकि सरकार के पास इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर आगे बढ़ने के लिए संसद के संयुक्त सत्र का भी रास्ता है। एनडीए के पास दोनों सदनों में कुल 393 सांसद हैं जो कुल सांसदों के आधे 392 से एक ज्यादा है। लेकिन महाराष्ट्र में शिवसेना के रूठने मनाने के खेल में लगे होने से सरकार के पास शिवसेना के समर्थन को लेकर उतना स्थायित्व नहीं है जितना जरूरी है । लिहाज़ा सरकार के लिए संयुक्त सत्र का रास्ता भी बहुत आसान नहीं लगता है, और मौजुदा परिस्थितियों को देखते हुए सरकार शायद इस रास्ते पर चलना पसंद करे। बिलों और संशोधनों के अलावा काला धन, महंगाई , इंश्योरेंस सेक्टर में एफडीआई , उद्योंगों के सहुलियत के लिए जमीन खरीद के नियमों को अनुकूल बनाना, सब्सिडी हटाने, देश के कई हिस्सों में हुए सांप्रदायिक दंगे और अदानी समूह को एसबीआई की ओर से ऋण उपलब्ध कराने जैसे अनेकों मुद्दों हैं जिस पर टुकड़ों में बंटी विपक्ष एक मंच पर आकर सरकार को घेरने की कोशिश करेगी।

ऐसे में बिल्कुल साफ है कि शीतकालीन सत्र मोदी सरकार के लिए घरेलु मोर्चे पर पहली बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होगी और सरकार के प्रबंधकों को सदन में कई कदम आगे बढ़कर इनसे आगे निकलने का रास्ता ढूंढ़ना होगा।

रविवार, 28 सितंबर 2014

पीएम @ संयुक्त राष्ट्र महासभा -- चुनिंदा अंश

सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संयुक्त राष्ट्र संघ में दिए गए भाषण पर समर्थन और विरोध में टिप्पणियां पढ़ने को मिल रही हैं। दोनों ही तरह की टिप्पणियां कहीं न कहीं एकांगी होने का आभास करा रही हैं। मोटे तौर पर प्रधानमंत्री का भाषण दुनिया के सामने बदली हुई परिस्थितियां के लिए तैयार होने और मुकाबला करने पर केंद्रित रहा है। इसी क्रम में जाने अनजाने उन्होंने वैश्विक संस्थाओं के अब तक के सफर और भविष्य की चुनौतियों के लिए मुकाबले करने के स्तर पर उनमें अपेक्षित बदलाव को भी स्वर दिया। ज़ाहिर है इन बदलावों को स्वीकार करके ही उन्हें बदली हुई परिस्थितियों में प्रासंगिक भी बनाए रख सकने में सफलता मिल पाएगी। प्रधानमंत्री की बातों को समग्रता में देखने पर ही उनके मायने खुलते हैं। लिहाज़ा अपने मित्रों और सहयोगियों के लिए प्रधानमंत्री के भाषण की मुख्य बातों को रख रहा हूं। उसके बाद टिप्पणी के लिए आप स्वतंत्र हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संयुक्त राष्ट्र संघ में दिए गए भाषण के मुख्य अंश
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11.भारत का दर्शन -- प्रत्‍येक राष्‍ट्र की, विश्‍व की अवधारणा उसकी सभ्‍यता एवं धार्मिक परंपरा के आधार पर निरूपित होती है। भारत चिरंतन विवेक समस्‍त विश्‍व को एक कुटंब के रूप में देखता है। और जब मैं यह बात कहता हूं तो मैं यह साफ करता हूं कि हर देश की अपनी एक philosophy होती है। मैं ideology के संबंध में नहीं कह रहा हूं। और देश उस फिलोस्‍फी की प्रेरणा से आगे बढ़ता है। भारत एक देश है, जिसकी वेदकाल से वसुधैव कुंटुम्‍बकम परंपरा रही है। भारत एक देश है, जहां प्रकृति के साथ संवाद, प्रकृति के साथ कभी संघर्ष नहीं ये भारत के जीवन का हिस्‍सा है और इसका कारण उस philosophy के तहत, भारत उस जीवन दर्शन के तहत, आगे बढ़ता रहता है। प्रत्‍येक राष्‍ट्र की, विश्‍व अवधारणा उसकी सभ्‍यता और उसकी दार्शनिक परंपरा के आधार पर निरूपित होती है। भारत का चिरंतन विवेक समस्‍त विश्‍व को, जैसा मैंने कहा वसुधैव कुटुंबमकम एक कुटुम्‍ब के रूप में देखता है। भारत एक ऐसा राष्‍ट्र है, जो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि विश्‍व पर्यंत न्‍याय, गरिमा, अवसर और समृद्धि के हक में आवाज उठाता रहा है। अपनी विचारधारा के कारण हमारा multi-literalism में दृढ़ विश्‍वास है।

22अगली सदी एशिया और लैटिन अमेरिका की -- हमें एशिया और उसके पूरे अभूतपूर्व समृद्धि का अभ्‍युदय देखा है। जिसके आधार में शांति एवं स्थिरता की शक्ति समाहित है। अपार संभावनाओं से समृद्ध महादेश लैटिन अमेरिका स्थिरता एवं समृद्धि के साझा प्रयास में एकजुट हो रहा है। यह महादेश विश्‍व समुदायों के लिए एक महत्‍वपूर्ण आधार स्‍तंभ सिद्ध हो सकता है।

33.पाकिस्तान के साथ संबंध -- मेरी सरकार ने पहले ही दिन से पड़ोसी देशों से मित्रता और सहयोग बढ़ाने पर पूरी प्राथमिकता दी है। और पाकिस्‍तान के प्रति भी मेरी यही नीति है। मैं पाकिस्‍तान से मित्रता और सहयोग बढ़ाने के लिए गंभीरता से शांतिपूर्ण वातवारण में बिना आतंक के साये के साथ द्विपक्षीय वार्ता करना चाहते हैं।लेकिन पाकिस्‍तान का भी यह दायित्‍व है कि उपयुक्‍त वातावरण बनाये और गंभीरता से द्विपक्षीय बातचीत के लिए सामने आये।
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44.  द्वपक्षीय मामलों पर यूएन के मंच के इस्तेमाल पर पाकिस्तान को खरी खरी -- इसी मंच पर बात उठाने से समाधान के प्रयास कितने सफल होंगे, इस पर कइयों को शक है। आज हमें बाढ़ से पीडि़त कश्‍मीर में लोगों की सहायता देने पर ध्‍यान देना चाहिए, जो हमने भारत में बड़े पैमाने पर आयोजित किया है। इसके लिए सिर्फ भारत में कश्‍मीर, उसी का ख्‍याल रखने पर रूके नहीं हैं, हमने पाकिस्‍तान को भी कहा, क्‍योंकि उसके क्षेत्र में भी बाढ़ का असर था। हमने उनको कहा कि जिस प्रकार से हम कश्‍मीर में बाढ़ पीडि़तों की सेवा कर रहे हैं, हम पाकिस्‍तान में भी उन बाढ़ पीडि़तों की सेवा करने के लिए हमने सामने से प्रस्‍ताव रखा था।

55. यूरोप के समक्ष संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ता आतंकवाद -- यूरोप के सम्‍मुख नए वीजा विभाजन का खतरा मंडरा रहा है। पश्चिम एशिया में विभाजक रेखाएं और आतंकवाद बढ़ रहे हैं। हमारे अपने क्षेत्र में आतंकवादी स्थिरतावादी खतरे से जूझना जारी है। हम पिछले चार दशक से इस संकट को झेल रहे हैं। आतंकवाद चार नए नए रूप और नाम से प्रकट होता जा रहा है। इसके खतरे से छोटा या बड़ा, उत्‍तर में हो या दक्षिण में, पूरब में हो या पश्चिम में, कोई भी देश मुक्‍त नहीं है।
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66.आतंकवाद पर सियासत --- मुझे याद है, जब मैं 20 साल पहले विश्‍व के कुछ नेताओं से मिलता था और आतंकवाद की चर्चा करता था, तो उनके यह बात गले नहीं उतरती थी। वह कहते थे कि यह law and order problem है। लेकिन आज धीरे धीरे आज पूरा विश्‍व देख रहा है कि आज आतंकवाद किस प्रकार के फैलाव को पाता चला जा रहा है। परंतु क्‍या हम वाकई इन ताकतों से निपटने के लिए सम्मि‍लित रूप से ठोस अंतरराष्ट्रीय प्रयास कर रहे हैं और मैं मानता हूं कि यह सवाल बहुत गंभीर है। आज भी कई देश आतंकवादियों को अपने क्षेत्र में पनाह दे रहे हैं और आतंकवादियों को अपनी नीति का उपकरण मानते हैं और जब good terrorism and bad terrorism , ये बातें सुनने को मिलती है, तब तो आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की हमारी निष्‍ठाओं पर भी सवालिया निशान खड़े होते हैं।
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77.  पश्चिम एशिया बना आतंक की पाठशाला, दुनिया के लिए चुनौती -- पश्‍चिम एशिया में आतंकवाद पाश्विकता की वापसी तथा दूर एवं पास के क्षेत्र पर इसके प्रभाव को ध्‍यान में रखते हुए सम्मिलित कार्रवाई का स्‍वागत करते हैं। परंतु इसमें क्षेत्र के सभी देशों की भागीदारी और समर्थन अनिवार्य है। अगर हम terrorism से लड़ना चाहते हैं तो क्‍यों न सबकी भागीदारी हो, क्‍यों न सबका साथ हो और क्‍यों न उस बात पर आग्रह भी किया जाए।
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88. आतंकवाद के नए मंच -- sea, space एवं cyber space साझा समृद्धि के साथ साथ संघर्ष के रंगमंच भी बने हैं। जो समुद्र हमें जोड़ता था, उसी समुद्र से आज टकराव की खबरें शुरू हो रही हैं। जो स्‍पेस हमारी सिद्धियों का एक अवसर बनता था, जो सायबर हमें जोड़ता था, आज इन महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में नए संकट नजर आ रहे हैं।
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99.  दुनिया की संस्थाओं को नए और बदले मायनों में परिवर्तित करना होगा-- उस अंतरराष्‍ट्रीय एकजुटता की, जिसके आधार पर संयुक्‍त राष्‍ट्र की स्‍थापना हुई, जितनी आवश्‍यकता आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी। आज अब हम interdependence world कहते हैं तो क्‍या हमारी आपसी एकता बढ़ी है। हमें सोचने की जरूरत है। क्‍या कारण है कि UN जैसा इतना अच्‍छा प्‍लेटफार्म हमारे पास होने के बाद भी अनेक जी समूह बनाते चले गए हम। कभी G 4 होगा, कभी G 7 होगा, कभी G 20 होगा। हम बदलते रहते हैं और हम चाहें या न चाहें, हम भी उन समूहों में जुड़े हैं। भारत भी उसमें जुड़ा है। लेकिन क्‍या आवश्‍यकता नहीं है कि हम G 1 से आगे बढ़ कर के G-All की तरफ कदम उठाएं। और जब UN अपने 70 वर्ष मनाने जा रहा है, तब ये G-All का atmosphere कैसे बनेगा। फिर एक बार यही मंच हमारी समस्‍याओं के समाधान का अवसर कैसे बन सके। इसकी विश्‍वसनीयता कैसे बढ़े, इसका सामर्थ्‍य कैसे बढ़े, तभी जा कर के यहां हम संयुक्‍त बात करते हैं। लेकिन टुकड़ों में बिखर जाते हैं, उसमें हम बच सकते हैं, एक तरफ तो हम यह कहते हैं कि हमारी नीतियां परस्‍पर जुड़ी हुई हैं और दूसरी तरफ हम जीरो संघ के नजरिये से सोचते हैं। अगर उसे लाभ होता है तो मेरी हानि होती है, कौन किसके लाभ में है, कौन किसके हानि में है, यह भी मानदंड के आधार पर हम आगे बढ़ते हैं।
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110.  संयुक्त राष्ट्र संघ को और प्रासंगिक बनाना होगा -- 20वीं सदी की अनिवार्यताओं को प्रतिविदित करने वाली संस्‍थाएं 21वीं सदी में प्रभावी सिद्ध नहीं होंगी। इनके सम्‍मुख अप्रासंगिक होने का खतरा प्रस्तुत होगा, और भी आग्रह से कहना चाहता हूं कि पिछली शताब्‍दी के आवश्‍यकताओं के अनुसार जिन बातों पर हमने बल दिया, जिन नीति-नियमों का निर्धारण किया वह अभी प्रासंगिक नहीं है। 21वीं सदी में विश्‍व काफी बदल चुका है, बदल रहा है और बदलने की गति भी बड़ी तेज है। ऐसे समय यह अनिवार्य हो जाता है कि समय के साथ हम अपने आप को ढालें। हम परिवर्तन करें, हम नए विचारों पर बल दें। अगर ये हम कर पायेंगे तभी जाकर के हमारा relevance रहेगा। प्रत्येक युग अपनी विशेषताओं से परिभाषित होता है। प्रत्येक पीढी इस बात से याद की जाती है कि उसने अपनी चुनौतियों का किस प्रकार सामना किया। अब हमारे सम्मुख चुनौतियों के सामने खड़े होने की जिम्मेदारी है। अगले वर्ष हम 70 वर्ष के हो जाएंगे। हमें अपने आप से पूछना होगा कि क्या हम तब तक प्रतीक्षा करें तब हम 80 या 100 के हो जाएं। मैं मानता हूं कि UN के लिए अगला साल एक opportunity है। जब हम 70 साल की यात्रा के बाद लेखाजोखा लें, कहां से निकले थे, क्यूं निकले थे, क्या मकसद था, क्या रास्ता था, कहां पहुंचे हैं, कहां पहुंचना है। सदी के कौन से प्रकार हैं, कौन से challenges हैं, उन सबको ध्यान में रखते हुए पूरा एक साल व्यापक विचार मंथन हो। हम universities को जोडें, नई generation को जोड़ें जो हमारे कार्यकाल का विगत से मूल्यांकन करे, उसका अध्ययन करे और हमें वो भी अपने विचार दें। हम नई पीढ़ी को हमारी नई यात्रा के लिए कैसे जोड़ सकते हैं और इसलिए मैं कहता हूं कि 70 साल अपने आप में एक बहुत बड़ा अवसर है। इस अवसर का उपयोग करें और उसे उपयोग करके एक नई चेतना के साथ नई प्राणशक्ति के साथ, नए उमंग और उत्साह के साथ, आपस में एक नए विश्वास साथ हम UN की यात्रा को हम नया रूप रंग दें। इस लिए मैं समझता हूं कि ये 70 वर्ष हमारे लिए बहुत बड़ा अवसर है। आइए, हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार लाने के अपने वादे को निभाएं। यह बात लंबे अरसे से चल रही है लेकिन वादों को निभाने का सामर्थ्‍य हम खो चुके हैं। मैं आज फिर से आग्रह करता हूं कि आज इस विषय में गंभीरता से सोचें। आइए, हम अपने Post 2015 development agenda के लिए अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करें।
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111.  आंतक से लड़ने का सामूहिक प्रयास वक्त की मांग -- हमें अपने सभी मतभेदों को दरकिनार कर आतंकवाद से लड़ने के लिए सम्मिलित अंतरराष्‍ट्रीय प्रयास करना चाहिए। मैं आपसे यह अनुरोध करता हूं कि इस प्रयास के प्रतीक के रूप में आप comprehensive convention on international terrorism को पारित करें। यह बहुत लंबे अरसे से pending mark है। इस पर बल देने की आवश्‍यकता है। terrorism के खिलाफ लड़ने की हमारी ताकत का वो एक परिचायक होगा और इसे हमारा देश, जो terrorism से इतने संकटों से गुजरा है, उसको समय लगता है कि जब तक वे इसमें initiative नहीं लेता है, और जब तक हम comprehensive convention on international terrorism को पारित नहीं करते हैं, हम वो विश्‍वास नहीं दिला सकते हैं। और इसलिए, फिर एक बार भारत की तरफ से इस सम्‍माननीय सभा के समक्ष बहुत आग्रहपूर्वक मैं अपनी बात बताना चाहता हूं। हमें outer space और cyber space में शांति, स्थिरता एवं व्‍यवस्‍था सुनिश्चित करनी होगी। हमें मिलजुल कर काम करते हुए यह सुनिश्चित करना है कि सभी देश अंतरराष्‍ट्रीय नियमों, मानदंडों का पालन करें। 

112.  दुनिया के सामने मूल चुनौती -- जब हम विश्‍व के अभाव के स्‍तर के विषय में सोचते हैं, आज basic sanitation 2.5 बिलियन लोगों के पहुंच के बाहर है। आज 1.3 बिलियन लोगों को बिजली उपलब्‍ध नहीं है और आज 1.1 बिलियन लोगों को पीने का शुद्ध पानी उपलब्‍ध नहीं है। तब स्‍पष्‍ट होता है कि अधिक व्‍यापक व संगठित रूप से अंतरराष्‍ट्रीय कार्यवाही करने की प्रबल आवश्‍यकता है। हम केवल आर्थिक वृद्धि के लिए इंतजार नहीं कर सकते। भारत में मेरे विकास का एजेंडा के सबसे महत्‍वपूर्ण पहलू इन्‍हीं मुद्दों पर केंद्रित हैं। मैं यह मानता हूं कि हमें post 2015 development agenda में इन्‍हीं बातों को केन्‍द्र में रखना चाहिए और उन पर ध्‍यान देना चाहिए। रहने लायक तथा टिकाऊ sustainable विश्‍व की कामना के साथ हम काम करें। इन मुद्दों पर ढेर सारे विवाद एवं दस्‍तावेज उपलब्‍ध हैं। लेकिन हम अपने चारों ओर ऐसी कई चीजें देखते हैं, जिनके कारण हमें चिंतित व आगाह हो जाना चाहिए। ऐसी भी चीजें हैं जिन्‍हें देखने से हम चिंतित होते जा रहे हैं। जंगल, पशु-पक्षी, निर्मल नदियां, जज़ीरे और नीला आसमान।
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113.  प्रकृति और ज़िदा रहने के वैकल्पिक और स्थायी साधन -- हम प्रकृति की देन को पवित्र           मानते हैं और मैं आज एक और विषय पर भी ध्‍यान आकर्षित करना चाहता हूं कि हम           climate change की बात करते हैं। हम होलिस्टिक हेल्‍थ केयर की बात करते हैं। जब हम back             to basic की बात करते हैं तब मैं उस विषय पर विशेष रूप से आप से एक बात कहना चाहता       हूं। योग हमारी पुरातन पारम्‍परिक अमूल्‍य देन है। योग मन व शरीर, विचार व कर्म, संयम व       उपलब्धि की एकात्‍मकता का तथा मानव व प्रकृति के बीच सामंजस्‍य का मूर्त रूप है। यह         स्‍वास्‍थ्‍य व कल्‍याण का समग्र दृष्टिकोण है। योग केवल व्‍यायाम भर न होकर अपने आप से       तथा विश्व व प्रकृति के साथ तादम्‍य को प्राप्त करने का माध्यम है। यह हमारी जीवन शैली       में परिवर्तन लाकर तथा हम में जागरूकता उत्पन्न करके जलवायु परिवर्तन से लड़ने में           सहायक हो सकता है। आइए हम एक अंतरराष्ट्रीय योग दिवसको आरंभ करने की दिशा में       कार्य करें। 
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114.  सफर का प्रस्थान बिंदू बनाएं -- आइए 2015 को हम विश्व की प्रगति प्रवाह को एक नया मोड़ देने वाले एक वर्ष के रूप में हम अविस्मरणीय बनायें और 2015 एक नितांत नई यात्रा के प्रस्थान बिंदु के रूप में मानव इतिहास में दर्ज हो। यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।


बुधवार, 9 जुलाई 2014

भाजपा के नए शाह - अमित भाई अनिल चंद्र शाह

16 वीं लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले अभूतपूर्व जनादेश ने राजनीतिक पंडितों को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर दिया। चुनाव परिणामों के पहले तक राजनीतिक विश्लेषण के दिग्गज़ माने जाने वाले लोग भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के इस अभूतपूर्व विजय की कल्पना भी नहीं कर पाए थे। उससे भी हैरत अंगेज रहा उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रदर्शन जहां 81 लोकसभा सीटों में से पार्टी ने 71 सीटें अपनी झोली में डाल लीं। मजे की बात ये रही कि राज्य की सत्रह सुरक्षित सीटों में से एक भी किसी अन्य दल के खाते में नहीं गईं। पार्टी का ये प्रदर्शन हैरतअंगेज करने वाला था। कमंडल के लहर पर सवार भाजपा भी सफलता के ये झँडे नहीं गाड़ पाई थी। पार्टी के इस रिकार्डतोड़ प्रदर्शन के पीछे आखिर था क्या ..। निस्संदेह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के चमत्कारिक असर को ज़मीन पर आम जनता के मन में बिठाने के पीछे एक व्यक्ति और था जिनका नाम है अमित भाई अनिल चंद्र शाह यानि की अमित शाह। संगठन को अभूतपूर्व सफलता दिलाने की दिशा में दरअसल अमित शाह का ये कारनामा न तो पहला है और न आखिरी। अमित शाह 1995 से ही गुजरात विधानसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व करते रहे लेकिन अपनी सांगठनिक क्षमता से पार्टी के दिग्गज़ों का ध्यान अमित शाह ने दिसंबर 2002 में तब खिंचा जब 182 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 126 सीटें जीत कर कांग्रेस को धूल धूसरीत कर दिया। खुद अमित शाह ने सरखेज़ विधानसभा सीट से रिकार्ड तोड़ 1, 60, 000 मतों के अंतर से जीत कर विधानसभा में कदम रखा। जीत के इस अंतर को 2007 में फिर बढ़ा कर दो लाख चालीस हजार मतों के अंतर तक ले गए।
1964 में बांबे में जन्में अमित शाह कल तक पार्टी में महासचिव थे। अमित शाह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वसनीयतम सहयोगी के रूप में देखा जाता रहा है। मृदुभाषी और चमक दमक से दूर रहने वाले अमित शाह के परदे के पीछे की भूमिकाओं ने लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए राह आसान बनाने में अहम किरदार निभाया है। यही वजह रही कि अमित शाह पहले पार्टी में महासचिव बनाए गए और फिर 16 वीं लोकसभा के चुनाव घमासान में उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में चुनाव प्रचार की कमान सौंपी गईं और अपने करिश्में से उन्होंने मृतप्राय हो चुकी पार्टी में प्राण फूंक दिए। पांच बार के विधायक रहे बायो कैमेस्ट्री के बैचलर डिग्री धारी अमित शाह का सामाजिक राजनीतिक सफर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के एक कार्यकर्ता के तौर पर शुरू हुआ। छात्र नेता के तौर पर अमित शाह ने लंबा वक्त अखिल भारतीय विधार्थी परिषद में भी बिताया। मार्च 2010 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उन्हें विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर बुलाया गया।
उत्तर प्रदेश में अभूतपूर्व प्रदर्शन के जरिए ही न केवल बल्कि एक बार फिर अमित शाह ने अपने मौन से सबको चौंका दिया। यही वजह रही कि परिणाम के बाद से लगातार पार्टी की कई राज्य इकाईयों की ओर से पार्टी नेतृत्व के सामने अमित शाह को उनके राज्यों की जिम्मेदारी सौंपे जाने की डिमांड लगातार बढ़ने लगी थी। ऐसे में पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए अमित शाह का चयन निस्संदेह पार्टी के अतीत और भविष्य के लिए एक बेहतर संधि काल साबित होगा।

शनिवार, 7 जून 2014

मोदी मंत्र - खुद बदलो फिर जग बदलेगा

शुक्रवार को भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल की बैठक संसद भवन के सेंट्रल हाल में हुई। बैठक के बाद जो जानकारियां छन कर सामने आ रही हैं वो चौंकाने वाली हैं। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी स्कूल टीचर की तरह सांसदों को प्रशिक्षित कर रहे हैं और उन्हें एक सांसद के तौर पर किस तरह का व्यवहार करना चाहिए इसकी शिक्षा दी गई। सूत्रों के मुताबिक कुछ ऐसी बातों की सलाह अपने नव निर्वाचित सांसदों को दिया गया जो उन्हें हर हाल में करना है और कुछ करने की किसी भी कीमत पर मनाही की गई। जिस प्रकार पिछले कुछ दशकों में आम जनता का भरोसा जनप्रतिनिधियों से उठता गया है और लोकतांत्रिक व्यवस्था का नेतृत्व करने वाली विधायिका जिस तरह से विश्वास के संकट से जूझ रही हैं उसको देखते हुए सत्ताधारी पार्टी की तरफ से अपने सांसदों को दिए गए इन सुझावों का स्वागत ही होना चाहिए। पहली सलाह है कि आपके सामने लाए गए किसी भी दस्तावेज या कागज़ पर बिना पढ़े और पूरी तरह संतुष्ट बगैर हस्ताक्षर न करें। अगर सामने वाला व्यक्ति आपके परिचय के दायरे में हो तो भी पढ़े बगैर हस्ताक्षर नहीं करना है। संसदीय दल की बैठक में जो दूसरी सलाह सामने आई कि सांसदो को सरकार की ओर से जो रिहायश दी जाती है उसके किसी भी हिस्से को भाड़े पर किसी अन्य को न दें यहां तक की गैराज़ या सर्वेंट क्वार्टर को भी भाड़े पर उठाने से बचना है।

तीसरी सलाह गौर करने वाली है, आमतौर पर लोकसभा चुनाव में जीत कर आने के बाद जनप्रतिनिधि पांच साल के लिए निश्चिंत हो जाते हैं और एक अलग ठसक उनके व्यवहार और जीवनशैली का हिस्सा हो जाता है। तीसरी सलाह के मुताबिक संसद में बेकार की गप्पबाजी और बैठकी से बचें और अगर खाली समय मिलता है तो संसद की पुस्तकालय में कुछ पढ़ने में उस वक्त का उपयोग करें। चौथी सलाह है कि अगर किसी सहयोगी सांसद से बातें करना भी हो तो लॉबी में करें न कि संसद में कार्यवाही के दौरान और सत्रावसान के बाद दिल्ली प्रवास से बेहतर है अपने संसदीय क्षेत्र की ओर प्रस्थान किया जाए ताकि उन इलाकों में ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताया जा सके और लोगों की समस्याओं से रू ब रू होकर उसका समाधान खोजा जाए।
अगली सलाह ये दी गई कि अगर आपने ट्रेन टिकट ले लिया है सफर के लिए और किसी वजह से नहीं जा पा रहे हैं तो तुरंत रेलवे अधिकारियों को सूचना दे दी जाए ताकि उस सीट को सामान्य यात्रियों की सुविधा के लिए छोड़ा जा सके। सांसदों को हर वक्त अपने क्षेत्र की चिंता करनी है औऱ इसी क्रम में ये नसीहत भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से सामने आई कि दिल्ली प्रवास के दौरान इलाके से आए पार्टी कार्यकर्ताओं और निवासियों के फोन कॉल्स को नज़रअंदाज सांसदों को नहीं करना है। यानि की प्राथमिकता सूची में कार्यकर्ताओं और क्षेत्र की जनता को सर्वोच्च रखा जाना चाहिए।

बेवजह हर मुद्दों पर मीडिया में चेहरा चमकाने का शौक रखने वाले सांसदों को इससे बचने की सलाह दी गई है। जानकार इसे मीडिया से बचने की सलाह के तौर पर देख रहे हैं लेकिन पार्टी के सूत्र बताते हैं कि दरअसल ये मीडिया से बचने के लिए सलाह नहीं है बल्कि उन सांसदों को सलाह है जो किसी दूसरे इलाके का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन किसी दूसरे इलाके की समस्या पर भी मीडिया में जम कर बयानबाजी करते हैं। मसलन बिहार के किसी सांसद को असम के किसी मुद्दे पर बोलने से बचना चाहिए बेहतर होगा कि असम का ही कोई सांसद उस पर मीडिया में अपनी बात रखे।

सबसे महत्वपूर्ण नसीहत जो निर्वाचित सांसदों को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की तरफ से आया वो ये कि लुटियन जोन में सत्ता के दलालों से सावधान रहें। जो दिल्ली में सत्ता के गलियारे से वाकिफ नहीं हैं उनके लिए इस नसीहत का मतलब बहुत स्पष्ट नहीं हो पाएगा। लेकिन जो लोग सत्ता के गलियारे का चरित्र जानते हैं वो बखुबी वाकिफ हैं इन दलालों से। दरअसल लोगों का एक समूह लुटियन जोन में सक्रिय होता है जो सरकार किसी की भी हो सत्ता का मजा उठाना जानते हैं। इस सलाह पर की ऐसे लोगों सांसदों को बचना है, देखना होगा कि इस नसीहत पर कितना अमल हो पाता है। क्योंकि आखिर में सरकार की बदनामी और छवि के धूमिल होने में इन दलालों का खासा योगदान होता है। जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव सन्निकट हैं उसके लिए अभी से काम करने के लिए सांसदों को कहा गया है। साथ ही ये चेतावनी भी जोड़ी गई है कि जिन नेताओं को इन राज्यों में जिम्मेदारी दी जाएगी उनका उत्तरदायित्व भी निर्धारित किया जाएगा। यानि की सिर्फ जीत का ष्रेय ही नहीं हार का ठीकरा भी सर पर फूटेगा।

जो सबसे महत्वपूर्ण बात इस बैठक में सामने आई वो ये कि बदलते वक्त के साथ अपना सामंजस्य बिठाइए यानि संचार के नए नए साधनों के जरिए आम जनमानस से जुड़िए। मसलन अपने कार्यों , उपलब्धियों, सरकार की योजनाओं , उपलब्धियों और अपने अपने संसदीय क्षेत्र को लेकर पांच साल के लिए आपकी क्या सोच है , क्या योजना है , कैसे उसको क्रियान्वित करने की योजना है, कब तक वो ज़मीन पर दिखना शुरू होगा ये सारी बातें ट्वीटर और फेसबुक के जरिए आम जनमानस तक पहुंचाने की लाह भी वरिष्ठ नेताओं की ओर से नवनिर्वाचित सांसदों को दिया गया है।

ज़ाहिर है यूपीए सरकार की नाकामी और असफलता से सबक लेते हुए भाजपा अब एक नई राह की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही है। साथ ही अटल जी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में भी जो सबक सिखा गया था उसको ज़मीन पर उतारने की कोशिश हो रही है। पार्टी विथ डिफरेंस का नारा पार्टी के उपर हाल के दिनों में व्यंग्य के तीर के रूप में इस्तेमाल होना शुरू हो गया था... इन नसीहतों के जरिए पार्टी की कोशिश है कि एक डिफरेंट चेहरा तो कम से कम जरूर आम आदमी के दिलों में उतारा जाए। ज़ाहिर है ज़मीन पर कारगर ढंग से इन नसीहतों को उतार पाने के लिए साधन की पवित्रता के साथ साथ साध्य की पवित्रता को भी साधना होगा। ऐसे में अपनी राय कायम करने के लिए हमें कुछ दिन तो इंतजार करना होगा।

शुक्रवार, 6 जून 2014

नेता प्रतिपक्ष की लड़ाई पर भारी कांग्रेस का अतीत

इंदौर से भाजपा की सांसद सुमित्रा महाजन के लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने के बाद अब सबकी नज़रें सदन में नेता प्रतिपक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव की ओर उठना स्वाभाविक है। हालांकि इस पर अब भी सत्ता पक्ष की ओर से औपचारिक तौर पर कुछ भी सामने नहीं आया है और विपक्ष सिर्फ अनुमान ही लगा पा रही है। आमतौर पर लोकसभा उपाध्यक्ष का पद सदन में विपक्ष के खाते में जाता रहा है लेकिन अब तक यही स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि 16 वीं लोकसभा में विपक्षी दल का दर्जा किसे मिलेगा। निश्चित तौर पर अध्यक्ष के चुनाव के बाद इस पर फैसले की उम्मीद की जा सकती है। सत्ता पक्ष अनौपचारिक तौर पर इस मुद्दे पर पूर्व में जवाहर लाल नेहरू , ईंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर में इस तरह की नियुक्ति नहीं की गई थी, का हवाला देते हुए कांग्रेस को किसी भी तरह का आश्वासन देने से बच रहा है। इन सभी प्रधानमंत्रियों के दौर में किसी भी दल के पास सदन का कोरम यानि की कुल संख्या का दसवां हिस्सा सदस्य के तौर पर मौजुद नहीं था। दरअसल इस पूरे दौर में लोकसभा के पहले अध्यक्ष जी वी मावलंकर द्वारा दिए गए निर्देश का पालन किया जा रहा था। 
सत्ता पक्ष इस मदुदे पर मावलंकर जी द्वारा अध्यक्ष को दिए गए निर्देश में से निर्देश संख्या 121 की चर्चा अनौपचारिक तौर पर प्रमुखता से कर रही है जिसमें किसी भी दल को सदन के भीतर विपक्षी दल की मान्यता के लिए सदन की संख्या का दसवां हिस्सा उस दल के पास होना जरूरी है। इस मुद्दे पर एनडीए की ओर से कोई औपचारिक संकेत नहीं देना अपने आप में कई बातें स्पष्ट कर देता है। बहरहाल कांग्रेस के पास लोकसभा में 44 सांसद हैं जो अपेक्षित कोरम यानि सदन के दसवें हिस्से 55 से कम है। ज़ाहिर है सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर कांग्रेस नेता विपक्ष का पद मांग सकती है लेकिन सत्ता पक्ष इस मांग को स्वीकार करेगा ऐसा कोई संकेत उधर से अभी तक तो नहीं मिला है।  
इसी क्रम में उपाध्यक्ष का पद भी फंसता दिख रहा है जो आम तौर पर सदन में विपक्षी दल के खाते में ही दर्ज होता है लेकिन ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा इस पद के लिए किसी क्षेत्रीय दल के व्यक्ति का नाम प्रस्तावित कर सकती हैं। 
हालांकि इस पूरे मामले पर कांग्रेस, निर्देश 121 को नेता विपक्ष के लिए वेतन और भत्ते संबंधी कानून के साथ पढ़ने का सुझाव दे रही है जिसमें साफ तौर पर ये लिखा गया है कि सदन में नेता प्रतिपक्ष उस दल से होता है जिसके पास विपक्ष दलों में से सबसे ज्यादा संख्या में सांसद होते हैं।  हालांकि सरकार का तर्क है कि अतीत में निर्देश 121 के तहत ही ये फैसला किया गया है, लिहाज़ा इस मुद्दे पर मामला बहुत जल्दी सुलझता नहीं दिख रहा है। हालांकि इस पर अब तक कुछ भी तय नहीं हो पाया है ऐसे में इस मुद्दे से जुड़े नियमों पर बहस गर्म है। भ्रम के हालात इस लिए भी पैदा हो रहे हैं क्योंकि इस पर दो प्रमुख कानून हैं जिसमें अलग अलग तथ्य स्थापित किए गए हैं। 1998 में बनाए गए संसद में मान्यता प्राप्त दल या समूह के नेता और मुख्य सचेतक की सुविधा का कानून, लोकसभा में उन सभी दलों को जिसके पास कम से कम 55 सदस्य हों, को मान्यता प्राप्त दल के रूप में व्याख्या करता है। जबकि दूसरा नेता प्रतिपक्ष के वेतन और भत्ते से संबंधित 1977 का कानून है जो नेता प्रतिपक्ष की व्याख्या उस व्यक्ति के तौर पर करता है जो लोकसभा में विपक्षी दलों में से सबसे बड़ी संख्या वाले दल का नेता हो जिसे अध्यक्ष मान्यता देता हो। ज़ाहिर है कांग्रेस को 1977 के कानून का हवाला दे रही है जबकि एनडीए 1998 का कानून याद दिला रही है।    
दरअसल नेता प्रतिपक्ष का पद भारतीय लोकतंत्र के लिए कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण होता। लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को निरंकुशता की हद तक चले जाने से बचने के लिए भी ये जरूरी है। इसके साथ ही कार्यपालिका और न्यायपालिका में बेहतर समन्वय बना रहे और वो लोक के हित में काम करें इसमें भी नेता प्रतिपक्ष की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। कार्यपालिका और न्यायपालिका में कई नियुक्तियों मसलन, सीबीआई , सीवीसी, मानवाधिकार आयोग आदि के प्रमुख और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में भी नेता प्रतिपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका है।  
ऐसे में अब जबकि सदन के नए अध्यक्ष का चुनाव हो गया लिहाज़ा सबकी नज़रें सुमित्रा महाज़न की ओर हैं कि आखिर वो इस मुद्दे पर क्या फैसला लेती हैं।