इंदौर से भाजपा की सांसद सुमित्रा महाजन के लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने के बाद अब सबकी नज़रें सदन में नेता प्रतिपक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव की ओर उठना स्वाभाविक है। हालांकि इस पर अब भी सत्ता पक्ष की ओर से औपचारिक तौर पर कुछ भी सामने नहीं आया है और विपक्ष सिर्फ अनुमान ही लगा पा रही है। आमतौर पर लोकसभा उपाध्यक्ष का पद सदन में विपक्ष के खाते में जाता रहा है लेकिन अब तक यही स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि 16 वीं लोकसभा में विपक्षी दल का दर्जा किसे मिलेगा। निश्चित तौर पर अध्यक्ष के चुनाव के बाद इस पर फैसले की उम्मीद की जा सकती है। सत्ता पक्ष अनौपचारिक तौर पर इस मुद्दे पर पूर्व में जवाहर लाल नेहरू , ईंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर में इस तरह की नियुक्ति नहीं की गई थी, का हवाला देते हुए कांग्रेस को किसी भी तरह का आश्वासन देने से बच रहा है। इन सभी प्रधानमंत्रियों के दौर में किसी भी दल के पास सदन का कोरम यानि की कुल संख्या का दसवां हिस्सा सदस्य के तौर पर मौजुद नहीं था। दरअसल इस पूरे दौर में लोकसभा के पहले अध्यक्ष जी वी मावलंकर द्वारा दिए गए निर्देश का पालन किया जा रहा था।
सत्ता पक्ष इस मदुदे पर मावलंकर जी द्वारा अध्यक्ष को दिए गए निर्देश में से निर्देश संख्या 121 की चर्चा अनौपचारिक तौर पर प्रमुखता से कर रही है जिसमें किसी भी दल को सदन के भीतर विपक्षी दल की मान्यता के लिए सदन की संख्या का दसवां हिस्सा उस दल के पास होना जरूरी है। इस मुद्दे पर एनडीए की ओर से कोई औपचारिक संकेत नहीं देना अपने आप में कई बातें स्पष्ट कर देता है। बहरहाल कांग्रेस के पास लोकसभा में 44 सांसद हैं जो अपेक्षित कोरम यानि सदन के दसवें हिस्से 55 से कम है। ज़ाहिर है सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर कांग्रेस नेता विपक्ष का पद मांग सकती है लेकिन सत्ता पक्ष इस मांग को स्वीकार करेगा ऐसा कोई संकेत उधर से अभी तक तो नहीं मिला है।
इसी क्रम में उपाध्यक्ष का पद भी फंसता दिख रहा है जो आम तौर पर सदन में विपक्षी दल के खाते में ही दर्ज होता है लेकिन ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा इस पद के लिए किसी क्षेत्रीय दल के व्यक्ति का नाम प्रस्तावित कर सकती हैं।
हालांकि इस पूरे मामले पर कांग्रेस, निर्देश 121 को नेता विपक्ष के लिए वेतन और भत्ते संबंधी कानून के साथ पढ़ने का सुझाव दे रही है जिसमें साफ तौर पर ये लिखा गया है कि सदन में नेता प्रतिपक्ष उस दल से होता है जिसके पास विपक्ष दलों में से सबसे ज्यादा संख्या में सांसद होते हैं। हालांकि सरकार का तर्क है कि अतीत में निर्देश 121 के तहत ही ये फैसला किया गया है, लिहाज़ा इस मुद्दे पर मामला बहुत जल्दी सुलझता नहीं दिख रहा है। हालांकि इस पर अब तक कुछ भी तय नहीं हो पाया है ऐसे में इस मुद्दे से जुड़े नियमों पर बहस गर्म है। भ्रम के हालात इस लिए भी पैदा हो रहे हैं क्योंकि इस पर दो प्रमुख कानून हैं जिसमें अलग अलग तथ्य स्थापित किए गए हैं। 1998 में बनाए गए संसद में मान्यता प्राप्त दल या समूह के नेता और मुख्य सचेतक की सुविधा का कानून, लोकसभा में उन सभी दलों को जिसके पास कम से कम 55 सदस्य हों, को मान्यता प्राप्त दल के रूप में व्याख्या करता है। जबकि दूसरा नेता प्रतिपक्ष के वेतन और भत्ते से संबंधित 1977 का कानून है जो नेता प्रतिपक्ष की व्याख्या उस व्यक्ति के तौर पर करता है जो लोकसभा में विपक्षी दलों में से सबसे बड़ी संख्या वाले दल का नेता हो जिसे अध्यक्ष मान्यता देता हो। ज़ाहिर है कांग्रेस को 1977 के कानून का हवाला दे रही है जबकि एनडीए 1998 का कानून याद दिला रही है।
दरअसल नेता प्रतिपक्ष का पद भारतीय लोकतंत्र के लिए कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण होता। लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को निरंकुशता की हद तक चले जाने से बचने के लिए भी ये जरूरी है। इसके साथ ही कार्यपालिका और न्यायपालिका में बेहतर समन्वय बना रहे और वो लोक के हित में काम करें इसमें भी नेता प्रतिपक्ष की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। कार्यपालिका और न्यायपालिका में कई नियुक्तियों मसलन, सीबीआई , सीवीसी, मानवाधिकार आयोग आदि के प्रमुख और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में भी नेता प्रतिपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका है।
ऐसे में अब जबकि सदन के नए अध्यक्ष का चुनाव हो गया लिहाज़ा सबकी नज़रें सुमित्रा महाज़न की ओर हैं कि आखिर वो इस मुद्दे पर क्या फैसला लेती हैं।

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