रविवार, 24 फ़रवरी 2008

संगमरमरी जादू की दुनिया - वाकई गजब है धुआंधार

धुआंधार जल प्रपात : जबलपुर

धुआंधार जलप्रपात : जबलपुर
धुआंधार जलप्रपात : जबलपुर
धुआंंधार : उपर रोप वे से लिया गया चित्र
पहली बार जाना की प्रकृति की गोद में जाने के मायने क्या होते हैं। क्या होता है जब आप इंसानों की भीड़ से भागकर कुछ पल के लिए नदियों की लहरों से बात करते हैं, चट्टानों की मौन सुनते हैं, संगमरमरी चट्टानों पर पड़ रही दूधिया रौशनी से अठखेली करते हैं। इस बार जबलपुर जाना मेरे लिए ऐसे ही अनुभवों से दो चार होने की कहानी रही। आमतौर पर फुर्सत पा कर मैं कमरे में बैठ कर कुछ पढ़ने या सोने में बिताता रहा हूं। लेकिन इस बार जब जबलपुर अपने ससुराल आया तो लोगों ने ठेल ठाल कर भेड़ाघाट भेजा। न चाहते हुए भी चला गया। जा कर देखा तो समझ में आया कि न जाने ऐसे कितने आनंददायक मौके का मैं साक्षी हो सकता था लेकिन अपनी काहिली की वज़ह से वंचित रह गया।
बहरहाल मेरे लिए तो जैसे एक अलग दुनिया खुलती जा रही थी। एक दुनिया संगेमरमर की .... एक दुनिया नदियों की चंचल लहरों की..... एक दुनिया धुंआधार में नर्मदा की पवित्र लहरों पर पड़ रही सतरंगी इन्र्दधनुषी सरीखा........।

भेड़ाघाट - जबलपुर



इससे पहले की आगे की राम कहानी सुनाऊँ बता दूं कि जबलपुर मध्यप्रदेश का बड़ा ही प्यारा शहर है जहाँ इत्मीनान से आप पहाड़ों से बात कर सकते हैं। जबलपुर मुख्य शहर से थोड़ी ही दूरी पर तकरीबन बीस एक किलोमीटर की दूरी पर बसा है भेड़ाघाट.... नमामि नर्मदे के तीरे। जबलपुर में नर्मदा के पावन जल से आपका साक्षात्कार तीन जगहों पर खासतौर पर हो सकता है ... इसमें ग्वारिघाट , लम्हेटाघाट और भेड़ाघाट प्रमुख हैं। अगर आप ययावर हैं तो पहले दो पर जा सकते हैं और अगर आप ययावर होना चाहते हैं तो निसंदेह आपको भेड़ाघाट और धुँआधार जलप्रपात ज़रूर देखना चाहिए। जबलपुर से भेड़ाघाट जाने के तमाम साधन उपलब्ध हैं।

बहरहाल मैं भी पहुँचा। धुँआधार पर खड़ा घंटों नर्मदा के इठलाते जल को देखता रहा। उपर से नीचे चट्टान पर गिर रहा पानी .... पानी की एक अलग ही आवाज ..... ख़ासतौर पर जिससे हम मैदानी इलाके के लोग वाकिफ नहीं ... ऐसी आवाज जिसमें आप खो जाएंगे। ऐसी आवाज जहाँ खड़े होकर आपको और कोई आवाज़ सुनाई नहीं देगी। घंटों खड़े रहकर.... कुछ देर नर्मदा में पैर रखकर बैठा रहा, मन बिल्कुल शांत हो गया। फिर पंचवटी से नाव पर सवार होकर निकले उस पहाड़ी नदी की सैर पर। चट्टानी कंदराओं के बीच चल रही नाव में हम दस एक लोग सवार थे। घाट से थोड़ी ही दूर आने के साथ ही निस्तब्धता छा गई। तमाम लोग ऐसे खो गए .... मानों वहाँ हो हीं नहीं। सबकी आँखों प्रकृति के उस शाश्वत सौंदर्य को निहार कर निहाल हुई जा रही थीं। संगमरमर की चट्टानों पर पड़ रही सूर्यकिरणों की आभा से सबका मन विभोर हुआ जा रहा था। गाइड बताता जा रहा था यहाँ नदी तीन सौ, यहाँ चार सौ फीट गहरी है। यहाँ राजकपूर की जिस देश में गंगा बहती है, यहाँ प्रेमनाथ की यहाँ शाहरूख की रात का नशाँ और न जाने कौन कौन सी फिल्मों की शूटिंग हुई थी। लेकिन नाव में सवार लोग शायद सून कम रहे थे देख ज्यादा रहे थे और उससे भी ज्यादा खो रहे थे। करीब एक घंटे हमारी नाव नर्मदा के जल पर सैर करती रही, हम मंत्रमुग्ध से संगमरमर की चट्टानों के बीच कल कल बहती नर्मदा के जल पर प्रकृति की अद्भभूत छटा का आनंद लेते रहे। ऐसा लग रहा था मानों यहीं बैठे रहें और जीवन की शाम हो जाए। कौन जाए लौट कर उस अमानवीय दुनिया में।




बहरहाल लौटे और लौट कर आँखे और भी विस्फरित हो गईं जब वहाँ मौजूद दुकानों में संगमरमर की तमाम कलाकृतियाँ देखीं। वहाँ के स्थानीय लोगों के हाथों से बनी वो महान कलाकृतियाँ। ये उन्हीं संगमरमर से बनी थी जिन्हें हम अभी नदियों के बीच देखकर आए थे। ऐसा लगा जैसा जादू है .... कलाकार नहीं संगेमरमर के जादूगर थे वो। राधा कृष्ण से लेकर समाधिस्थ बुद्ध तक और आधुनिक टेलिफोन से लेकर महिलाओँ के बाल में खोसने वाला हेयर पीन तक। महीन से महीन काम संगमरमर पर। कलकल जल की शांति और नर्मदा की गहराई साथ लिए लौट आए इंसानों की भीड़ में। वैसे आप अगर नर्मदा तट पर जाने की सोच रहे हैं तो मेरी मानिए चाँदनी रात में जाइएगा।


शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2008

एक रहैं नरसिंह पंडित जी....


एक थे नरसिंह पंडित जी। पहले गोवर्धन साहित्य महाविद्यालय, देवघर के प्राचार्य रहे बाद में हिन्दी विधापी‌ठ यानि के राजेंद्र शोध संस्थान, देवघर के प्राचार्य हुए। हिन्दी के अकादमिक और विद्वानों के लिए हिन्दी विधापीठ किसी मक्का से कम नहीं है। बहरहाल ये इनका अकादमिक परिचय है। बाँकि का परिचय जानने के लिए आपको किसी देवघरिए से मिल कर बात करना होगा या देवघर जाना होगा। वैसे मैं बता दूं कि अगर आप किसी देवघरिया से पंडित जी के बारे में बात करेंगे तो कुछ इस अंदाज़ में उनको बारे में आपको बताएगा...जैसा आगे मैं बताने जा रहा हूं।
दरअसल पंडित जी से पहला सामना कब हुआ कुछ ‌ठीक ठाक याद नहीं। हाँ इतना याद है कि झक झक धोती कुर्ता पहने तेज चाल में चलता हुआ एक व्यक्ति घर के पास वाले चौक से एक निश्चित समय पर रोज गुजरता। उन्हें देखते ही आस पास जो भी होता झुक कर पैर छुता और अलग हट जाता। बहरहाल अपने घर के आस पास के बड़ों को उस उज्जवल धवल व्यक्तित्व के पाँव छुता देखकर , मैं भी उनके पाँव छुने लगा... बिना जाने के कौन हैं वो। अच्छा लगता था .... वो भी तेज कदमों से चलते हुए अचानक मेरे पीछे से आकर पाँव छुने वक्त ठीठकते और मुझे कलेजे से लगाकर आर्शिवाद देकर तेज कदमों से अपने रास्ते पर चल पड़ते। ये तब की बात है जब मैं कक्षा एक या दो में पढ़ता था।
बाद में मैं आर मित्रा हाईस्कूल चला गया। तब तक पैर छुकर आर्शिवाद लेने का सिलसिला ज़ारी रहा। बहरहाल एक दिन मित्रों से बातचीत में पता चला कि अगर आर्टस विषयों में अच्छा करना हो तो नरसिंह पंडित जी के पास पढ़ने के लिए जाना चाहिए। मुझे नहीं पता था कि ये नरसिंह पंडित कौन हैं लेकिन बातों ही बातों में पता लगा कि बड़े खड़ुस शिक्षक हैं लेकिन पढ़ाते बहुत जबरदस्त हैं। मुझे भी लगा कि उनके पास पढ़ना चाहिए। लिहाज़ा मैंने भी मित्रों से कहा कि भई मुझे भी जाना है उनसे पढ़ने के लिए तो उनका जबाव था .... ठीक है चले आओ लेकिन बात करने के लिए अभिभावकों को भेजना होगा। वरना पढ़ाएंगें तो नहीं ही उल्टे धमकाएंगें अलग से। इससे मेरी चिंता बढ़ गई। क्योंकि मेरे पिता जी अपने रोजमर्रा के कामों में इतने व्यस्त होते कि उनके पास इस काम के लिए वक्त शायद ही हो। ऐसे भी पिता जी ने हमें बचपन से अपने काम के लिए स्वतंत्र छोड़ रखा था।
बहरहाल तय हुआ कि अकेले ही चला जाए। मित्रों ने बता रखा था कि सुबह पाँच बजे पढ़ाते हैं। घर का पता भी पता दिया था। सुबह चार बजे उठा गया। पौने पाँच तक साइकिल चलाता हुआ उनके घर के बाहर पहुँच गया। अंदर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अपने अराध्यों को याद करता अंदर दाखिल हुआ। बरामदे में आकर खड़ा हो गया कि घर से कोई बाहर आए तो अपनी बात बताई जाए। थोड़ी देर में कोई संस्कृत का श्लोक कानों में सुनाई दिया। सामने देखा तो भौंचक ये तो वही व्यक्ति थे जिनके पाँव छुता रहा था रास्ते में बिना ये जाने कि ये कौन हैं। उनकी नज़र मुझ पर पड़ी ..... जय हो जय हो जय हो करते हुए तेजी से बाहर आए। मेरी घिग्गी बँध गई। पुछा क्या काम है। आदतवश मैंने पाँव छुकर प्रणाम किया .... कहा सर आपसे पढ़ना चाहता हूं। थोड़ी देर के लिए गंभीर हो गए ... मैंने सोचा मैं तो गया आज .... ज़रूर पूछेंगे पिता जी क्यों नहीं आए। बहरहाल कुछ ही पल में उन्होंने कहा ठीक है.... जाओ पंद्रह मिनट में कापी किताब लेकर आ जाओ। मैं जल्दी जल्दी दुबारा आया। जब आया तो देखा हालनुमा कमरा पूरा भरा हुआ था। सबसे पीछे बैठा।
बहरहाल उनके सानिध्य में हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, इतिहास, और भूगोल आदि विषयों का रोचक रूप से वाक़िक हुआष। बाद में पता चला कि उन्होंने अपनी पढ़ाई गणित विषय के साथ पूरी की है। आश्चर्य हुआ कि गणित और मानविकी का क्या संबंध। लेकिन उनकी पढ़ाई का मुझ पर ये असर हुआ कि गणित से भागने वाला मैं कब गणित से दोस्ती कर बैठा और कब मानविकी मुझे आकर्षित करने लगा .....पता ही नहीं चला। परिणाम ग्याहरवी बारहवी में गणित और कालेज में इतिहास विषय। हिन्दी से आकर्षण तो उन्हीं की वजह से शुरू हुआ। बाद में उनके सानिध्य में हिन्दी विद्यापीठ लाइब्रेयरी में रखी हिन्दी की तकरीबन सभी नामी हस्ताक्षरों को पढ़ा।
बहुत बाद में पता चला कि वो जाति के कुम्हार थे। आश्चर्य हुआ कि कुम्हार इतना विद्वान। दरअसल देवघर वो शहर है जहाँ ब्राह्मणों की आबादी आज भी बहुत है। एक तरह से शहर ब्राह्मणों और पूजा पाठ की वजह से ही जाना जाता। आश्चर्य हुआ कि इतने पुरातनपंथी शहर में एक कुम्हार प्राचार्य को इतना सम्मान। दरअसल सच कहुँ तो ये बाते उस दौरान दिमाग में आई हो ऐसा भी नहीं है। ये बातें तो तब दीमाग में आईं जब जातिव्यवस्था और दलितों पिछड़ों के बारें में जानने समझने को मिला। दरअसल मुझे क्या हर देवघरिए को शहर के इस विरासत पर गर्व होगा।
दरअसल अविनाश जी के मोहल्ले पर दलित साहित्य और दलित चेतना पर चल रही बहस को पढ़ कर नरसिंह पंडित जी का चेहरा कौंध गया था। इसी के साथ कौंधा था उनसे वो अंतिम भेंट जब बीए करने के तत्काल बाद सड़क पर उनसे मुलाकात हुई। आदतवश पैरों पर झुक गया था। सीने से लगा कर उन्होंने पूछा था अब क्या करने का इरादा है। मैंने कहा था पत्रकार बनना चाहता हूं। उनकी आँखों में चमक आ गई थी। आर्शिवाद देते हुए कहा था बहुत अच्छा सोचा है तुमने। मेरे इस फैसले पर अकेले पंडित जी थे जिन्होंने न केवल सकारात्मक बातें कहीं बल्कि उनकी आँखों की चमक देख कर मेरा हौसला दुगुणा हो गया था। बाद में मेरे दिल्ली आने के बाद खबर आई कि पंडित जी नहीं रहे .... अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाया। आज भी उनकी याद आती है तो आँखे नम हो जाती हैं ... स्रद्धा से दिल भर आता है। लगता है अभी झुक कर प्रणाम कर आर्शिवाद ले लूं।

सोमवार, 28 जनवरी 2008

मुस्लिम आरक्षण - जुलाहों में लठ्मलठ्ठा

मुसलमानों को आरक्षण के सवाल पर एक बार फिर विवाद छिड़ गया है। इस बार विवाद कहीं और नहीं बल्कि यूपीए सरकार के कांग्रेसी मंत्रियों के बीच ही है। पिछले दिनों राज्यों के अल्पसंख्यक आयोगों की सालाना बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने कहा कि अल्पसंख्यकों के विकास के लिए सरकार उन्हें आरक्षण देने का मन बना चुकी है। बस देखना ये है कि आरक्षण दिया कैसे जाए। लेकिन बैठक के बाद मीडिया से मुख़ातिब हुए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने ये कह कर गृहमंत्री के ग़ुब्बारे की हवा निकाल दी कि धार्मिक आधार पर आरक्षण देने का कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार के सामने विचारधीन नहीं है। इतने अहम मसले पर दो केंद्रीय मंत्रियों के परस्पर विरोधी बयान ये साबित करते हैं कि बात-बात में मुसलमानों के हितों का दम भरने वाली यूपीए सरकार उनके मसलों के हल के लिए कितना गंभीर है।
सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के मसले पर सरकार के बीच ही तीखे मतभेद हैं। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री ए आर अंतुले और मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति में शामिल करके आरक्षण के दायरे में लाने के हक़ में हैं। जबकि समाज कल्याण मंत्री मीरा कुमार इसके सख़्त ख़िलाफ़ हैं। सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात ये है कि यूपीए सरकार की रहनुमाई करने वाली कांग्रेस की इस बारे में अपनी कोई राय नहीं है। 25 दिसंबर के कांग्रेस के प्रवक्ता और जाने माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कांग्रेस की नियमित प्रेस कांफ्रेस में क़ुबूल किया कि सरकार के सामने निकट भविष्य मे दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का कोई प्रस्ताव विचारधीन नहीं है। उन्होंने तो यहां तक कह डाला कि जब तक इस मसले पर सभी राजनीतिक दलों के बीच आमराय क़ायम नहीं होती तब तक इस बारे में कोई फ़ैसला नहीं हो सकता। क्या कांग्रेस इस पर आमसहमति बनाने की कोई पहल करेगी ? इस सवाल पर वो चुप्पी साध गए। अभिषेक मनु सिंघवी के इस बयान से दो दिन पहले ही केंद्र सरकार ने इस बारे में फ़ैसला करे बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट से आठ हफ्तों की मोहलत मांगी है। जब सिंघवी को ये याद दिलाया गया तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया कि जब संविधान सभा में इस पर सहमति नहीं बनी, पिछले साठ साल में मसला नहीं सुलझा तो आठ हफ्ते में आम सहमति कैसे बन सकती है।
कांग्रेस का ये रुख़ मुसलमानों ख़ासकर पसमांदा बिरादरियों के मुसलमानों के साथ अब तक का सबसे भद्दा मज़ाक है। कांग्रेस के प्रवक्ता कांग्रेस के मंच से इतना बड़ा झूठ बोलते हैं। आम सहमति का बहाना बना कर कांग्रेस इस अहम मसले को लगातार लटका रही है। लेकिन सच्चाई ये है कि दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने में न संवैधानिक अड़चन है और नहीं आम सहमति की बाधा है। कमी है तो सिर्फ यूपीए सरकार की राजनीतिक इच्छा शक्ति की। यूपीए के तमाम घटक दल मसलन आरजेडी, लोकजनशक्ति पार्टी, डीएमके, एनसीपी इसके हक़ में है। सराकर को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दल भी इस मसले पर अपनी रज़ामंदी दे चुके हैं। सीपीएम महासचिव प्रकाश कारत और बीएसपी प्रमुख मायावती बाक़ायदा प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिख कर कह चुके हैं कि सरकार विधेयक लाए तो समर्थन करेंगे। तीसरे मोर्चे में शामिल समाजवादी पार्टी, टीडीपी के साथ एआईएडीएमके भी समर्थन कर रही है। उधर बीजेपी के सहयोगी दल शिरोमणी अकाली दल और जनता दल यूनाइटेड भी दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने के हक़ में है। सिर्फ बीजेपी और शिवसेना ही इसका विरोध कर रहे हैं। 200 में बिहार विधान सभा और दिसंबर 2006 उत्तर प्रदेश विधानसभा इस आशय का प्रस्ताव पारित करके केंद्र को भेज चुकी हैं। और कितनी आम राय केंद्र की यूपीए सरकार को चाहिए। लेकिन हैरानी की बात ये है कि जिस मसले पर तमाम छोटे बड़े दल अपनी राय क़ायम कर चुके हैं और उसे ज़ाहिर भी कर चुके हैं, उस मसले पर देश की सबसे पुरानी और सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी अभी तक अपना राय क्यों क़ायम नहीं कर पायी।
इस मसले पर फैसला करने में टालमटोल करने वाली यूपीए सरकार और कांग्रेस को क्या इतनी आम सहमति काफी नहीं लगती ? अगर नहीं तो और सुन लीजिए। प्रधानमंत्री की पहल पर बनी जस्टिस सच्चर कमेटी ने धार्मिक आधार पर आरक्षण में भेदभाव को ग़लत ठहराया है। जस्टिस रंगानथ मिश्रा आयोग ने अपनी रिपोर्ट में साफ साफ कहा है कि दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने से रोकना संविधान में दिए गए समता के अधिकारों यानि अनुच्छेद 14 और 15 का खुला उलंघन है। आयोग ने सरकार से दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की पुरज़ोर वकालत की है। आयोग ने तो यहां तक कह दिया है कि अगर इसमे कोई संवैधानिक बाधा हो तो उसे दूर करने के लिए संविधान में ज़रूरी संशोधन किया जाए। जस्टिस रंगनाथ आयोग की ये रिपोर्ट पिछले नौ महीनों से प्रधानमंत्री कार्यालय में धूल फांक रही है। इस रिपोर्ट पर अमल को लेकर सरकार लगातार बहानेबाज़ी कर रही है।
मार्च 2004 में दलित इसाईयों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके दलित इसाईयों के साथ दलित मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का रुख़ जानना चाहा। पहले तो सरकार टाल मटोल करती रही। दो तीन सुनवाई के बाद सरकार ने ये मामला भषाई अल्पसंख्यकों के मामले पर बने जस्टिस रंगनाथ आयोग को सौंपा। आयोग की रिपोर्ट आने तक सरकार को अच्छा बहाना मिल गया। मई 2007 मे आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप दी। सरकार आयोग ने दलित इसाई और मुसलमानों को हक़ मे सिफारिश की। सरकार ने इस पर अनुसूचित जाति आयोग को भेज कर उसकी भी राय मांगी। अनुसूचित आयोग ने भी रंगनाथ आयोग की सिफारिश की हां मे हां मिलाते हुए 18 दिसंबर 2007 को अपनी रिपोर्ट समाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को भेज दी। अनुसूचित जाति आयोग ने साफ कहा कि धर्म के आधार पर दलित इसाइयों और मुसलमानों को आरक्षण के दारे से बाहर रखना संविधान के ख़िलाफ़ है। इससे पहले एनडीए सरकार को दौरान बने संविधान समीक्षा आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ कहा था कि दलित इसाईयों और मुसलमानों को अनुसचित जाति का दर्जा देने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं है। बाधा है तो सिर्फ़ एक, और वो है सरकार में राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी।
सवाल ये पैदा होता है कि कि आख़िर ये तमाम रिपोर्ट और तमाम राजनीतिक दलों को बीच इस मसले पर आमराय आख़िर कांग्रेस को नज़र क्यों नहीं आ रही। मुसलमानों के विकास के लिए आए दिन नई घोषणाएं करने वाली यूपीए सरकार आख़िर क्यों इस मसले पर टालमटोल कर रही है। इसका उत्तर इतिहास के गर्भ में छुपा है। 1996 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तात्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने दलित इसाईयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के लिए बाक़ायदा विधेयक लाने की तैयारी की थी। सरकार में लंबे विचार विमर्श के बाद विधेयक लाना तय हुआ मगर तब के लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल ने इसे पेश करने की इजाज़त नहीं दी। बाद में सरकार ने अध्यादेश जारी करने की कोशिश की मगर बीजेपी ने इस पर बवाल मचा दिया। बाक़ायदा राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से मिलकर गुहार लगाई कि वो सरकार के इस अध्यादेश पर दस्तख़त न करें। सरकार डर गयी और क़दम पीछे खींच लिए। मगर 1996 के लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में बाका़यदा वादा किया था कि सत्ता मे आने पर वो दलित इसाईयों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाएगी। लेकिन अब कांग्रेस अपने वादे से मुकर रही है। आख़िर क्यों ? क्या इस डर से कि बीजेपी मुद्दा बनाएगी ? तो सरकार बताए कि कि उसने पोटा वापिस लेते वक़्त क्या बीजेपी की इच्छा का ख़्याल किया था। क्या उस वक़्त राजनीतिक आमराय के अनुरूप काम किया गया। यूपीए सरकार ने कई संविधान संशोधन कराए हैं। तो इस मामले मे संविधान संशोधन क्यों नहीं हो सकता ? अनुसूचित जातियों को पढ़ाई, सरकरी नौकरियों, विधानसभाओं और लोकसभा में आरक्षण देने वाले राष्ट्रपति के आदेश ने आज़ादी के बाद पिछले साठ साल से इसाई और मुसलमानों के एक बड़े तबके को उन तमाम सुविधाओं से महरूम रखा हुआ है जो दलितों को मिलती है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित देश भर की विधानसभाओं की लगभग एक हज़ार और लोकसभा की 79 सीटों पर इन्हें चुनाव लड़ने का हक़ नहीं है। 1950 में जारी किए गए इस आदेश में पहला संशोधन 1956 में किया गया। इसके ज़रिए दलित सिखों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया। 1990 में दूसरा संशोधन करके नवबौद्धों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दे दिया गया। अनुसूचित जाति के दरवाज़े नहीं खुल रहे तो दलित इसाई और मुसलमानों को लिए। ये धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं तो और क्या है ? इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। सवाल उठता है कि धर्म के आधार पर किसी समुदाय विशेष को आरक्षण की सुविय़ा से वंचित रखना संविधान सम्मत है। अब देखना ये है कि क्या यूपीए सरकार में इतनी राजनीतिक इच्छाशक्ति है कि वो जस्टिस रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट को लागू करे।
युसूफ़ अंसारी
(लेखक ज़ी न्यूज़ के सहायक संपादक हैं।)

शनिवार, 26 जनवरी 2008

तीन स्तंभ तीन रत्न


पद्म पुरस्कारों की घोषणा हो गई। ‍टेलिविजन मीडिया के तीन वरिष्ठ पत्रकारों राजदीप सरदेशाई, बरखा दत्त और विनोद दुआ के नाम भी इसमें शामिल हैं। पत्रकार होने के नाते उनकी ये उपलब्धि हम सब के लिए गर्व की बात है। मुबारकबाद और ढेर सारी शूभकामनाएं। इति