मुसलमानों को आरक्षण के सवाल पर एक बार फिर विवाद छिड़ गया है। इस बार विवाद कहीं और नहीं बल्कि यूपीए सरकार के कांग्रेसी मंत्रियों के बीच ही है। पिछले दिनों राज्यों के अल्पसंख्यक आयोगों की सालाना बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने कहा कि अल्पसंख्यकों के विकास के लिए सरकार उन्हें आरक्षण देने का मन बना चुकी है। बस देखना ये है कि आरक्षण दिया कैसे जाए। लेकिन बैठक के बाद मीडिया से मुख़ातिब हुए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने ये कह कर गृहमंत्री के ग़ुब्बारे की हवा निकाल दी कि धार्मिक आधार पर आरक्षण देने का कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार के सामने विचारधीन नहीं है। इतने अहम मसले पर दो केंद्रीय मंत्रियों के परस्पर विरोधी बयान ये साबित करते हैं कि बात-बात में मुसलमानों के हितों का दम भरने वाली यूपीए सरकार उनके मसलों के हल के लिए कितना गंभीर है।सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के मसले पर सरकार के बीच ही तीखे मतभेद हैं। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री ए आर अंतुले और मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति में शामिल करके आरक्षण के दायरे में लाने के हक़ में हैं। जबकि समाज कल्याण मंत्री मीरा कुमार इसके सख़्त ख़िलाफ़ हैं। सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात ये है कि यूपीए सरकार की रहनुमाई करने वाली कांग्रेस की इस बारे में अपनी कोई राय नहीं है। 25 दिसंबर के कांग्रेस के प्रवक्ता और जाने माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कांग्रेस की नियमित प्रेस कांफ्रेस में क़ुबूल किया कि सरकार के सामने निकट भविष्य मे दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का कोई प्रस्ताव विचारधीन नहीं है। उन्होंने तो यहां तक कह डाला कि जब तक इस मसले पर सभी राजनीतिक दलों के बीच आमराय क़ायम नहीं होती तब तक इस बारे में कोई फ़ैसला नहीं हो सकता। क्या कांग्रेस इस पर आमसहमति बनाने की कोई पहल करेगी ? इस सवाल पर वो चुप्पी साध गए। अभिषेक मनु सिंघवी के इस बयान से दो दिन पहले ही केंद्र सरकार ने इस बारे में फ़ैसला करे बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट से आठ हफ्तों की मोहलत मांगी है। जब सिंघवी को ये याद दिलाया गया तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया कि जब संविधान सभा में इस पर सहमति नहीं बनी, पिछले साठ साल में मसला नहीं सुलझा तो आठ हफ्ते में आम सहमति कैसे बन सकती है।
कांग्रेस का ये रुख़ मुसलमानों ख़ासकर पसमांदा बिरादरियों के मुसलमानों के साथ अब तक का सबसे भद्दा मज़ाक है। कांग्रेस के प्रवक्ता कांग्रेस के मंच से इतना बड़ा झूठ बोलते हैं। आम सहमति का बहाना बना कर कांग्रेस इस अहम मसले को लगातार लटका रही है। लेकिन सच्चाई ये है कि दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने में न संवैधानिक अड़चन है और नहीं आम सहमति की बाधा है। कमी है तो सिर्फ यूपीए सरकार की राजनीतिक इच्छा शक्ति की। यूपीए के तमाम घटक दल मसलन आरजेडी, लोकजनशक्ति पार्टी, डीएमके, एनसीपी इसके हक़ में है। सराकर को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दल भी इस मसले पर अपनी रज़ामंदी दे चुके हैं। सीपीएम महासचिव प्रकाश कारत और बीएसपी प्रमुख मायावती बाक़ायदा प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिख कर कह चुके हैं कि सरकार विधेयक लाए तो समर्थन करेंगे। तीसरे मोर्चे में शामिल समाजवादी पार्टी, टीडीपी के साथ एआईएडीएमके भी समर्थन कर रही है। उधर बीजेपी के सहयोगी दल शिरोमणी अकाली दल और जनता दल यूनाइटेड भी दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने के हक़ में है। सिर्फ बीजेपी और शिवसेना ही इसका विरोध कर रहे हैं। 200 में बिहार विधान सभा और दिसंबर 2006 उत्तर प्रदेश विधानसभा इस आशय का प्रस्ताव पारित करके केंद्र को भेज चुकी हैं। और कितनी आम राय केंद्र की यूपीए सरकार को चाहिए। लेकिन हैरानी की बात ये है कि जिस मसले पर तमाम छोटे बड़े दल अपनी राय क़ायम कर चुके हैं और उसे ज़ाहिर भी कर चुके हैं, उस मसले पर देश की सबसे पुरानी और सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी अभी तक अपना राय क्यों क़ायम नहीं कर पायी।
इस मसले पर फैसला करने में टालमटोल करने वाली यूपीए सरकार और कांग्रेस को क्या इतनी आम सहमति काफी नहीं लगती ? अगर नहीं तो और सुन लीजिए। प्रधानमंत्री की पहल पर बनी जस्टिस सच्चर कमेटी ने धार्मिक आधार पर आरक्षण में भेदभाव को ग़लत ठहराया है। जस्टिस रंगानथ मिश्रा आयोग ने अपनी रिपोर्ट में साफ साफ कहा है कि दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने से रोकना संविधान में दिए गए समता के अधिकारों यानि अनुच्छेद 14 और 15 का खुला उलंघन है। आयोग ने सरकार से दलित इसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की पुरज़ोर वकालत की है। आयोग ने तो यहां तक कह दिया है कि अगर इसमे कोई संवैधानिक बाधा हो तो उसे दूर करने के लिए संविधान में ज़रूरी संशोधन किया जाए। जस्टिस रंगनाथ आयोग की ये रिपोर्ट पिछले नौ महीनों से प्रधानमंत्री कार्यालय में धूल फांक रही है। इस रिपोर्ट पर अमल को लेकर सरकार लगातार बहानेबाज़ी कर रही है।
मार्च 2004 में दलित इसाईयों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके दलित इसाईयों के साथ दलित मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का रुख़ जानना चाहा। पहले तो सरकार टाल मटोल करती रही। दो तीन सुनवाई के बाद सरकार ने ये मामला भषाई अल्पसंख्यकों के मामले पर बने जस्टिस रंगनाथ आयोग को सौंपा। आयोग की रिपोर्ट आने तक सरकार को अच्छा बहाना मिल गया। मई 2007 मे आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप दी। सरकार आयोग ने दलित इसाई और मुसलमानों को हक़ मे सिफारिश की। सरकार ने इस पर अनुसूचित जाति आयोग को भेज कर उसकी भी राय मांगी। अनुसूचित आयोग ने भी रंगनाथ आयोग की सिफारिश की हां मे हां मिलाते हुए 18 दिसंबर 2007 को अपनी रिपोर्ट समाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को भेज दी। अनुसूचित जाति आयोग ने साफ कहा कि धर्म के आधार पर दलित इसाइयों और मुसलमानों को आरक्षण के दारे से बाहर रखना संविधान के ख़िलाफ़ है। इससे पहले एनडीए सरकार को दौरान बने संविधान समीक्षा आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ कहा था कि दलित इसाईयों और मुसलमानों को अनुसचित जाति का दर्जा देने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं है। बाधा है तो सिर्फ़ एक, और वो है सरकार में राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी।
सवाल ये पैदा होता है कि कि आख़िर ये तमाम रिपोर्ट और तमाम राजनीतिक दलों को बीच इस मसले पर आमराय आख़िर कांग्रेस को नज़र क्यों नहीं आ रही। मुसलमानों के विकास के लिए आए दिन नई घोषणाएं करने वाली यूपीए सरकार आख़िर क्यों इस मसले पर टालमटोल कर रही है। इसका उत्तर इतिहास के गर्भ में छुपा है। 1996 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तात्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने दलित इसाईयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के लिए बाक़ायदा विधेयक लाने की तैयारी की थी। सरकार में लंबे विचार विमर्श के बाद विधेयक लाना तय हुआ मगर तब के लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल ने इसे पेश करने की इजाज़त नहीं दी। बाद में सरकार ने अध्यादेश जारी करने की कोशिश की मगर बीजेपी ने इस पर बवाल मचा दिया। बाक़ायदा राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से मिलकर गुहार लगाई कि वो सरकार के इस अध्यादेश पर दस्तख़त न करें। सरकार डर गयी और क़दम पीछे खींच लिए। मगर 1996 के लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में बाका़यदा वादा किया था कि सत्ता मे आने पर वो दलित इसाईयों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाएगी। लेकिन अब कांग्रेस अपने वादे से मुकर रही है। आख़िर क्यों ? क्या इस डर से कि बीजेपी मुद्दा बनाएगी ? तो सरकार बताए कि कि उसने पोटा वापिस लेते वक़्त क्या बीजेपी की इच्छा का ख़्याल किया था। क्या उस वक़्त राजनीतिक आमराय के अनुरूप काम किया गया। यूपीए सरकार ने कई संविधान संशोधन कराए हैं। तो इस मामले मे संविधान संशोधन क्यों नहीं हो सकता ? अनुसूचित जातियों को पढ़ाई, सरकरी नौकरियों, विधानसभाओं और लोकसभा में आरक्षण देने वाले राष्ट्रपति के आदेश ने आज़ादी के बाद पिछले साठ साल से इसाई और मुसलमानों के एक बड़े तबके को उन तमाम सुविधाओं से महरूम रखा हुआ है जो दलितों को मिलती है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित देश भर की विधानसभाओं की लगभग एक हज़ार और लोकसभा की 79 सीटों पर इन्हें चुनाव लड़ने का हक़ नहीं है। 1950 में जारी किए गए इस आदेश में पहला संशोधन 1956 में किया गया। इसके ज़रिए दलित सिखों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया। 1990 में दूसरा संशोधन करके नवबौद्धों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दे दिया गया। अनुसूचित जाति के दरवाज़े नहीं खुल रहे तो दलित इसाई और मुसलमानों को लिए। ये धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं तो और क्या है ? इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। सवाल उठता है कि धर्म के आधार पर किसी समुदाय विशेष को आरक्षण की सुविय़ा से वंचित रखना संविधान सम्मत है। अब देखना ये है कि क्या यूपीए सरकार में इतनी राजनीतिक इच्छाशक्ति है कि वो जस्टिस रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट को लागू करे।
युसूफ़ अंसारी
(लेखक ज़ी न्यूज़ के सहायक संपादक हैं।)
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