रविवार, 30 दिसंबर 2007

भाग तीन - टूटी है किसके हाथ में तलवार देखिए


.... दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी ने राज्य चुनाव में जीत हासिल करने के लिए बड़ी सुनियोजित तैयारी की थी। ये तैयारी कांग्रेस की तरह अंत के एक महीने की मशक्कत नहीं थी बल्कि सत्ता में आने के अगले दिन से राज्य में अगले विधानसभा की तैयारी शुरू हो गई थी। कहा ये जाता है कि नरेंद्र मोदी ने राज्य में प्रत्येक दस घर पे एक कार्यकर्ता लगा रखा है। यानि उस दस घर की सुख दुख उस कार्यकर्ता के जिम्मे। क्या कांग्रेस ने वाकई राज्य में ऐसी मेहनत की थी। इसके अलावा नरेंद्र मोदी की सबसे पहले अपनी छवि एक काम करने वाले मुख्यमंत्री यानि विकास पुरूष के रूप में खुद को स्थापित करने की थी। इसके लिए नरेंद्र मोदी ने न केवल काम किया बल्कि उस काम को कार्यकर्ताओं के जरिए मतदाताओं तक पहुंचाने में सफलता भी हासिल की। आप भले ही ये कह कर ढोल पींटे कि ये तो हम तो बस काम करते हैं प्रचार नहीं तो शायद आप खुद को भुलावे में रख रहे हैं। दरअसल आप जितना काम करते हैं उससे ज्यादा उसकी मार्केटिंक की जानी चाहिए आज यही सफलता का मूल मंत्र है।
आम जरूरत की चीजें मसलन बिजली पानी और सड़क जैसी समस्याओँ के समाधान को को तो गुजरात में जमीनी स्तर पर देखा जा सकता है। और इस बात की तारीफ न केवल जनता बल्कि विरोधी तक करते हैं। बिजली सुधार को लेकर गुजरात में शुरू किए गए ज्योतिग्राम योजना की सफलता से भी भाजपा कार्यकर्ता उत्साहित थे। इन मुद्दों पर कांग्रेस तो राज्य में भाजपा को कोस नहीं ही सकती थी ( हालांकि उसने कोसा भी जिसका मतदाताओं में कांग्रेस के प्रति नकारात्मक संदेश गया) उल्टे कांग्रेस इस पूरे मुद्दे पर अजीब दुविधा की शिकार दिखी। जसदण और गाँधीधाम की चुनावी रैली में जहाँ कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने ज्योतिग्राम योजना को पूरी तरह से लागू न कर पाने के लिए राज्य सरकार पर निशाना साधा वहीं केंद्र में यूपीए सरकार के बिजली मंत्री और महाराष्ट्र में कांग्रेस के दलित चेहरा सुशील कुमार शिंदे ने राजकोट में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में ज्योतिग्राम को राजीव गांधी ग्रामीण विधुतिकरण मिशन से जोड़ कर इसकी सफलता का स्रेय केंद्र के कंधों पर रखा। ज़ाहिर है ये विरोधाभासी वक्तव्य था। एक ओर सोनिया जी ज्योतिग्राम योजना की कमियाँ गिना रहीं हैं तो दूसरी ओर उन्हीं के मंत्री इसे केंद्र की योजना बताकर उसकी तारीफ कर रहे हैं। आखिर मतदाता किसे सही माने।
इसमें कोई शँका नहीं कि पानी बिजली और सड़क पर गुजरात में अच्छा काम हुआ जिसकी तस्दीक जनता ने भी की। पानी के मुद्दे पर राजकोट जैसे शहर में दो साल पहले लड़ाई होती थी। जब हम चुनाव कवरेज के लिए राजकोट पहुंचे तो वहाँ पानी कोई मुद्दा बचा ही नहीं था। राजकोट से पिछले तेइस सालों से जीत रहे गुजरात के वित्त मंत्री वजुभाई वाला को पानी वाला मेयर के नाम से पुकारा जाता है। पानी की समस्या के निराकरण के लिए राजकोट में वजुभाई के विरोध में खड़ी कांग्रेस प्रत्याशी कश्मीरा नथवाणी भी उनकी प्रशँसा करती हैं। यही नहीं राजकोट से ढाई सौ किलोमीटर दूर कच्छ के गाँधीधाम जैसे शहरों और आस पास के ग्रामीण इलाकों तक पीने का पानी पहुंचा गया है। जो उस इलाके से वाकिफ हैं वो इस बात का महत्व समझ सकते हैं क्योंकि ये पूरा इलाका मरूस्थलीय है।
हालाँकि राज्य में भाजपा ने अपने किए गए पिछले सभी वादे पूरे किए हों ऐसा भी नहीं हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी ने बड़ी चतुराई से ( या कांग्रेस की नासमझी से ) उन वादों की चर्चा ही नहीं होने दी।
लेकिन चेक डैमों की भरमार और पीने के पानी की मौजूदगी से जनता को इस बात का विश्वास ज़रूर बना कि आने वाले समय में कच्छ जैसे इलाकों तक सिंचाई का पानी भी मिलने लगेगा।काँग्रेस मुद्दा बना रही थी बिजली बिल जमा नहीं करने की वजह से जिन्हें सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा उनके अंसंतोष को। ज़ाहिर है ये नकारात्मक राजनीति थी। वज़ह साफ है जिन्हें सरकार बिजली पानी मुहैय्या करा रही है उससे बिल भी वसुल करेगी। लेकिन बिल जमा नहीं करने वालों के लिए कठोर सजा का भी प्रावधान किया गया था। जिसकी वजह से कुछ किसान नाराज़ जरूर थे। और इसको लेकर चुनाव से पूर्व के दिनों कई जगह धरने प्रदर्शन भी हुए थे। लेकिन इन सबसे राज्य प्रशासन की छवि एक कठोर प्रशासक की बनीं जिसका कोई भी विवेकबान व्यक्ति विरोध नहीं करेगा। लोकलुभावन राजनीति की तुलना में ये बेहतर उपाय है चुनाव जीतने के लिए... शायद इस बार कांग्रेस को गुजरात में ये सबक भी मिला होगा।
ज़ाहिर है इन गए कामों का प्रचार भी उतना ही जबरदस्त था विरोधी भी प्रशंसा करते नहीं अघा रहे थे ।अगर आप इन भुलावे में हैं कि नरेंद्र मोदी इतना काम करने के बाद संतुष्ट बैठ गए तो आप उन्हें कम करके आंक रहे हैं। दरअसल चुनाव जीतने के लिए नरेंद्र मोदी ने राज्य में विरोधियों के खिलाफ साम दाम दंड भेद हर उस नीति को आजमाया। प्रचार की कमान अपने हाथ में रख उन्होंने कार्यकर्ताओं को आगे किया। तीन बार से सत्ता में बने रहने से जो सत्ता विरोधी लहर ( एंटी इनकंबेंसी) थी उस बात को ध्यान में रखा गया। यही वजह थी कि पचास पूर्व विधायकों के टिकट काटे गए ... अस्सी से भी अधिक नए चेहरे आजमाए गए और रिबेल्स के विरोध में महिलाओं को टिकट दिए गए। इस बात से राजनीतिक पंडितों और विरोधियों ने उन्हें आटोक्रेट जैसे शब्दों से भी नवाज़ा। किसे फिक्र है आप चाहें जो कहें असली काम चुनाव जीतना है।
ज़ाहिर है नरेंद्र मोदी ने अपने सभी योद्धाओँ को सही समय पर सही चाल से उतारा था। मतदान के दिन कई जगहों से ऐसी भी खबरें आईं कि कुछ गाँवों में पहचान पत्र खरीदे जा रहे हैं पंद्रह सौ रूपए में। हालांकि इसकी पुष्टि मैंने तो नहीं की लेकिन ऐसी बात वहां के स्थानीय पत्रकारों के बीच भी चर्चा का केंद्र बना था। दूसरी तरफ राजकोट में एक बूथ पर कई वोहरा सोसाइटी में रहने वाले मतदाताओं ने मीडिया के सामने बड़ी संख्या में ये शिकायतें भी की कि उनके पहचान पत्र तो हैं लेकिन मतदाता सूची से उनके नाम ही गायब हैं। ज़ाहिर है चुनाव जीतने के लिए हर तरह की तैयारी थी भाजपा और नरेंद्र मोदी की तरफ से। लेकिन काँग्रेसी योद्धा बस हवा में ही तलवारें भाँज रहे थे। इसलिए मेरे मन में ये ख्याल आया था ... मैदान में हार जीत तो किस्मत की बात है , टूटी है किसके हाथ में तलवार देखिए । शायद अब काँग्रेस देख पाए।।।।।।।।।।।।

बुधवार, 26 दिसंबर 2007

भाग दो -- टूटी है किसके हाथ में तलवार देखिए ...


... कांग्रेस पूरे चुनाव के दौरान ... अंत के दो एक दिनों को छोड़ दें तो नरेंद्र मोदी के विकास के दावे को मुद्दा बनाकर इसकी असलियत गुजरात की जनता के सामने लाने की कवायद में थी। बाद में मौत के सौदागर और हिन्दु आतंकवाद के विवाद को को अगर परे रख दें तो कांग्रेस के पास इस असलियत को भी सामने लाने के लिए कोई खास रणनीति रही हो ऐसा लगता नहीं है। दरअसल विकास के मुद्दे पर या विकास की परिभाषा के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी को सही तरीके से घेरा जा सकता था लेकिन कांग्रेस यहां भी चूक गई। जिस पार्टी ने पिछले पांच साल की ही अगर बात करें तो राज्य में जनता की सुख दुख का कोई जायजा नहीं लिया वो अगर चुनाव के दौरान असमान विकास और विकास के कथित खोखले दावों की पोल खोलने में लगे तो जनता उसे कितनी गंभीर ढंग से लेगी। नतीजा सामने था। कांग्रेस पिछले साल में एक अदद नेता ही खड़ा कर लेती गुजरात में तो सांप्रदायिकता और विकास के खोखले दावों से लड़ने की उसकी सच्चाई पर कुछ हद तक भरोसा किया जा सकता था। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस गुजरात से नरेंद्र मोदी को बाहर का दरबाजा दिखाना ही नहीं चाहती थी। शायद कांग्रेस के लिए नरेंद्र मोदी का गुजरात में बने रहना राष्ट्रीय राजनीति में सेक्युलर सेक्युलर खेलने में मदद करे। बहरहाल कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी से लड़ाई के लिए जो योद्धा चुने ज़रा उसकी एक बानगी देखिए ... केंद्र में खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्री सुबोध कांत सहाय ( सांसद, झारखंड), महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ( सांसद आंध्र प्रदेश), गृह राज्य मंत्री स्री प्रकाश जायसवाल ( सांसद, उत्तर प्रदेश), माग्रेट अल्वा, मोहसिना किदवई, प्रिया दत्त और ऐसे ही कितने अनजान चेहरे जिन्हें गुजरात की जनता क्या देश की बांकि हिस्सों में कितना लोग पहचानते हैं या इनकी क्या विश्ववसनीयता है किसी से छुपी नहीं। सोनिया गाँधी को अगर छोड़ दें जिन्होंने राज्य में कुल दस ग्यारह जनसभाएं की जिसमें तीन चार तो सिर्फ कच्छ और सौराष्ट्र में ही थे तो दूसरे राहुल बाबा भी अंतिम दिनों में रोड शो के ज़रिए चुनाव प्रचार में कूदे। उत्तर प्रदेश में राहुल अपनी कितनी विश्ववसनीयता साबित कर पाए किसी से छुपी नहीं है। उन्हें गुजरात में नरेंद्र मोदी की सुनियोजित रणनीति से लड़ने के लिए भेजा गया। बहरहाल कांग्रेस के रणनीतिकारों के पास इन नामों के अलावा कोई विकल्प क्या सचमुच में नहीं था। क्या अर्जुन मोडवाडिया, भरत सिंह सोलंकी या शंकर सिंह बाघेला को पहले दिन से मोदी के खिलाफ एक नाम के तौर पर प्रोजेक्ट करना कांग्रेस के लिए सही रणनीति नहीं होती। शंकर सिंह बाघेला तो मोदी के लिए सबसे सही प्रोजेक्शन हो सकते थे। लेकिन ऐसा बताया जा रहा है कि उनकी संघ पृष्ठभूमि को देखते हुए ऐसा करने से बचती रही कांग्रेस इसलिए भी अंत समय में मणिनगर में मोदी के खिलाफ दिनशा पटेल को ला कर फिजां में कुछ और भी प्रोजेक्ट करने की कोशिश की गई । पर मुझे ये नहीं समझ में आया कि जो काग्रेस चंद दिनों पहले भाजपा से बड़ी संख्या में कांग्रेस में आई नेताओं को चुनाव मैदान में अपनी टिकट पर उतार सकती है उसे शँकर सिंह बाघेला को मुख्यमंत्री प्रत्याशी प्रोजेक्ट करने में इतनी बैचेनी क्यों महसूस हो रही थी।बहरहाल जब नेता ही नहीं प्रोजेक्ट हो पाया तो योद्धाओँ की दशा तो आसानी से समझी जा सकती है। राजकोट में टिकट नहीं मिलने से नाराज एक नेता जो वहाँ शायद जिला अध्यक्ष भी थे पार्टी के उन्होंने तो चुनाव प्रचार के दिनों में तो जिला कार्यालय पर ही ताला जड़ दिया ये कहकर कि ये उनकी ज़मीन पर बना है। जब उन्हें टिकट ही नहीं मिला तो कैसी पार्टी और कैसा कार्यालय। लिहाजा उन्हें पार्टी आफिस को अपनी संपत्ती घोषित कर ताला जड़ दिया। अंत के दिनों में ही वो ताला खुल पाया। लिहाजा कांग्रेस चुनाव प्रचार के दिनों में भी मोदी से टक्कर लेने के लिए कितनी तैयार थी , इन सब घटनाओं से इसका अंदाज साफ साफ लगाया जा सकता है। रही बात सोनिया गांधी के गुजरात में चुनाव प्रचार की तो कांग्रेस के रणनीतिकारों को अब ये समझना होगा कि जब तक प्रदेशों में कांग्रेस क्षत्रपों को खड़ा नहीं करेगी तब तक सिर्फ सोनिया गांधी के दम पर उन्हें अपने सुनहरे अतीत का सिर्फ ख्वाब ही देखने का अधिकार है। जमीन स्तर पर वो कुछ उम्मीद न ही करे तो बेहतर है। वैसे भी ज़माने से नेताओं के लिए कांग्रेस तरस ही रही है। पार्टी को अब चारण युग से बाहर निकल कर भी देखना होगा।..... (जारी)

सोमवार, 24 दिसंबर 2007

टूटी है किसके हाथ में तलवार देखिए ...

जिनको ज़मीं पर रहने का शउर नहीं , उन्हीं को जिद है आसमां लेंगें.... दरअसल गुजरात में नरेंद्र मोदी की जीत के बाद कांग्रेस पार्टी और देश के कथित सेक्युलर जमात के लिए ये पंक्ति बार बार मेरे ज़ेहन में घूम रही है। ज़ाहिर है गुजरात में बहुत कुछ दांव पर था। आम लोगों के लिए भले ही ये एक पार्टी या व्यक्ति की एक राज्य में जीत भर रही हो लेकिन अंदर ही अंदर ये जीत कहीं न कहीं कई मुद्दों सिद्धातों पर एक जनमत सर्वेक्षण की तरह रहा।
बहरहाल नरेंद्र मोदी गुजरात में हैट्रिक मार चुके हैं , कांग्रेस और सेक्युलर जमात ( ख़ास तौर पर मीडिया का वो हिस्सा जो राज्य में अपना एजेंडा पहले दिन से पेल रहे थे ) इस आत्मचिंतन में लग गए हैं कि आखिर गेंद गलत कैसे पड़ गई। दरअसल नरेंद्र मोदी राज्य में पहली बार विकास की पिच पर खेल रहे थे जबकि ये बुद्धजीवी अब भी गोधरा - गोधरा ही खेलना चाह रहे थे। राज्य में विकास के मुद्दे पर दबे मुंह ( मीडिया की भाषा में आफ द रिकार्ड ) ये भी स्वीकार करते थे कि विकास के मामले में राज्य बाँकि कई सेक्युलर राज्यों को बहुत पीछे छोड़ चुका था.. सांप्रदायिक हिंसा के मामले में भी राज्य अपने अतीत से पीछा छुड़ाकर पांच साल आगे निकल चुका है और ये पूरा सफर नरेंद्र मोदी की अगुवाई में गुजरात ने तय किया था। ज़ाहिर है इसका स्रेय नरेंद्र मोदी को मिलना चाहिए था जो जनादेश के रूप में मतदाताओं ने दिया भी लेकिन सेक्युलर जमात किसी भी कीमत पर ये स्रेय नरेंद्र मोदी को देने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे जिनका नतीजा उन्हें गुजरात में भुगतना भी पड़ा। आख़िर कांग्रेस को ये बातें शुरूआत में समझ में क्यों नहीं आई। अयातित नेताओं, हवाई मुद्दों और बागियों के भरोसे गुजरात की वैतरणी किस मुँह से पार करना चाह रही थी कांग्रेस।
जिन असन्तुष्ट नेताओं के लिए नरेंद्र मोदी कल तक सिर सम्राट थे उनके साथ अंतिम समय में ऐसा क्या हो गया कि वो नरेंद्र मोदी के कट्टर दुश्मन हो गए। क्या उनका विरोध सिद्धांतों और नीतियों का विरोध था। क्या कांग्रेस ने उनके सिद्धांतों से प्रभावित होकर उन्हें टिकट दिया था। कांग्रेस के पास इसका जबाव नहीं था। ज़ाहिर है होना भी नहीं था। इसका जबाव चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने बार बार दिया और जिसे गुजरात की साढे पांच करोड़ जनता भी स्वीकार कर रही थी --- खातो नती खावा देतो नती ... यानि न तो खाउँगा और न ही खाने दूंगा। मतलब साफ था कि ये तमाम बागियों की नरेंद्र मोदी से अलग होने की वजह ... खाने नहीं देना था और यही मैसेज जनता के बीच से भी आ रहे थे। खासकर गुजरात घुम रहे दिल्ली के सेक्युलर रिपोटरों को भी ऐसे संकेत साफ मिल रहे थे.. फिर भी उनके लिए असंतुष्ट एक बड़ा मुद्दा था। फिर ऐसे नेताओं को टिकट देकर कांग्रेस कौन सी लड़ाई जितने का दम भर रही थी।
इन असंतुष्टों के साथ साथ परिणामों से पूर्व केशुभाई पटेल को भी एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही थी। तमाम चैनलों पर गुजरात शोहर गा रहे चमचमाते पत्रकार बता रहे थे कि अब तो राज्य में भाजपा और नरेंद्र मोदी को कौन बचा सकता है। अब तो केशुभाई यानि बापा भी मोदी के खिलाफ हो गए हैं।... फिर परिणाम अपेक्षित क्यों नहीं रहा। दरअसल केशुभाई पटेल गुजरात में बाबा बनने की इच्छा रखते थे जो पूरा नहीं हो पाया। होता भी कैसे जिस राज्य के १८ हज़ार गांवों में से एक तिहाई मुखिया को राज्य का प्रमुख नाम से जानता हो और सीधे बात करता हो उस प्रमुख के लिए किसी अतीत को बाबा के रूप में स्वीकार करना राजनीतिक रूप से कितना सही माना जाए। ऐसा नहीं था कि केशुभाई पहली बार असंतुष्ट हुए थे। गुजरात में नरेंद्र मोदी के सत्ताशीन होने के बाद से ही केशुभाई लगातार असंतुष्ट बने हुए हैं। इसके पहले भी चुनाव में उन्होंने अपना रंग दिखाया था लेकिन जमा नहीं था तो फिर इस चुनाव में ऐसा क्या था कि पूरी जमात उनसे नरेंद्र मोदी के खिलाफ बड़ा उम्मीद लगाए बै‌ठी थी .......( ज़ारी)

बुधवार, 7 नवंबर 2007

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है ....

अनिल जी पेशे से पत्रकार हैं या कहें कि यायावार हैं। घुमना इनकी मूल प्रवृति है। इनकी संवेदना का दायरा बहुत घना है। परम मित्र हैं मेरे। मेरे लिए इन्होंने रज़ा साहब की एक बेहतरीन कविता भेजी है। गुजरात चुनाव सर पर हैं। मुझे लगा आपको भी पढ़ना चाहिए।

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझको क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
मेरे उस कमरे को लूटो जिसमें मेरी बयाजें जाग रही हैं
और मैं जिस में तुलसी की रामायाण से सरगोशी करके
कालिदास के मेघदूत से कहता हूं - मेरा भी एक संदेशा है
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझे क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
लेकिन मेरी रग - रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है
मेरे लहू से चुल्लू भर कर महादेव के मुँह पर फेंको
और उस जोगी से कह दो .... महादेव
अब इस गंगा को वापस ले लो
यह ज़लील तुर्कोँ के बदन में गढ़ा गया
लहू बन कर दौड़ रही है ............


राही मासुम रज़ा

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2007

शबनम हाशमी को गुस्सा क्यों आता है



गुजरात में चुनाव की दुदंभी बज चुकी है। सारे संगठन चुनाव के लिए कमर कस चुके हैं। गुजरात में होने वाला चुनाव कोई आम सा चुनाव नहीं है। कई कथित जानकारों का मानना है कि गुजरात चुनाव देश की सेक्युलर छवि के लिए भी एक इम्तहान की तरह है। ऐसा मानने वालों में अधिकांश के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी किसी सांप्रदायिक शैतान से कम नहीं। इनका मानना है कि दरअसल मोदी गोधरा के बाद के घटनाओं की वजह से हुई हिन्दु मतों के ध्रुवीकरण का फायदे लेकर सोमनाथ के सिंहासन तक पहुंच गए। वरना वो तो एक खाकी निकर पहनने वाले किसी सांप्रदायिक फासीवादी नाजीवादी और न जाने क्या क्या वादी की तरह हैं जो समाज को बांट कर उसी समाज पर तानाशाही चलाते हैं। खैर उनकी समझ पर तो मैं तुच्छ सा प्राणी कुछ कह पाने की हैसियत में नहीं हूं। बहरहाल आए दिन अखबारों पत्रिकाओँ में मोदी को देश का नंबर एक मुख्यमंत्री घोषित करते देखता हूं तो उन सेक्युलरों की तरह मुझे भी लगने लगता है साले ये सारे अखबार पत्रिका और संगठन (खासतौर राजीब गांधी फाउंडेशन) भी मोदी की तरह फासिस्ट सोच वाले होंगे। अरे इन्हें तो सोचना चाहिए कि गुजरात के करोड़ों लोग जो तय करेंगे वो थोड़े ही होगा ... होना तो वो चाहिए जो हमारे सेक्युलर सिविल सोसायटी के लोग सोचें और कहें। इस हिसाब से मोदी को सभी मुख्यमंत्रियों में से सबसे कम नंबर मिलने चाहिए। बहरहाल इसी कड़ी में कल शबनम जी ने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेस आयोजित किया था ... गुजरात में किसानों द्वारा किए जा रहे आत्महत्याओं को लेकर। उनका दावा था कि मोदी के शासनकाल में गुजरात में तकरीबन पांच सौ किसानों ने सरकार की जन विरोधी नीतियों की वजह से आत्महत्या कर ली । इन आत्महत्या के गवाह के तौर पर गुजरात के सोलह सत्रह किसान भी वो साथ लाईं थी। सबकी दारूण कहानी थी। सब दुखी थे आहत थे और सबसे बढ़कर निराश हो चुके थे। शबनम जी का कहना था कि इन हालात के लिए राज्य सरकार जिम्मेवार है। सोलह आने सच बोल रही थीं वो । आत्महत्याओं का पूरा लिस्ट था उनके पास जो उनके शब्दों में गुजरात सरकार ने खुद स्वीकार किये हैं। दरअसल किसी भी शासन में अगर किसान खुश नहीं होगें उस शासन को सफल कहना कम्युनिस्टों की शब्दावली में जनविरोधी ही नहीं दक्षिणपंथियों के मुताबिक पाप भी है। बहरहाल इसके लिए मोदी को सबक मिलना ही चाहिए। आगे उनका ये भी कहना था कि दरअसल वो मोदी के खिलाफ इसलिए भी हैं कि वो फासिस्ट सोच वाले हैं। थोड़ा धक्का लगा... लगा जैसे अभी किसानों के लिए थोड़ी देर पहले जो आंसू दिखाए जा रहे थे वो दरअसल घड़ियाली थे । उन्हें किसानों की समस्या से मतलब उतना नहीं था जितना मोदी को हटाने से था। खैर ऐसे नामुराद मुख्यमंत्री को पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार है ... मैं तो कम से कम ऐसा नहीं समझता। बहरहाल बातें होती रहीं.... पत्रकार बंधुओं ने उनसे ये भी पूछा कि चुनाव की घोषणा के बाद आप ये प्रेस कांफ्रेस क्यों बुला रही हैं। कोई साफ जबाव तो उन्होंने नहीं दिया लेकिन उनके जबाव से मुझे ये ज़रूर लगा कि अभी नहीं कहेंगी अपनी बात तो फिर कब कहेंगी। लिहाजा इस बात पर तो मैं उनके साथ था। आगे फिर किसी नामुराद ने पूछ लिया कि आखिर आप मोदी के खिलाफ तो हैं लेकिन किसके पक्ष में हैं। तो उनका कहना था कि मोदी के विरोध का फायदा तो कांग्रेस के खाते में ही जाएगा। सीधे सीधे उन्होंने ये नहीं कहा कि वो चाहती हैं कि कांग्रेस सत्ता में आए पर उनका आशय कुछ ऐसा ही था। लिहाज़ा जो बात मेरे सीने में उस प्रेस कांफ्रेंस के दौरान खाए गए पकौड़े की तरह गड़ती रही वो ये कि आखिर कांग्रेस के आने से गुजरात में किसानों की समस्याएं कैसे खतम हो सकती हैं। वही कांग्रेस जिसके राज्य महाराष्ट् में विदर्भ के किसान दुर्दिन झेल रहे हैं। बहरहाल बाद में उन्होंने फिर साफ किया कि दरअसल वो कांग्रेस के सेक्युलर क्रेडेंशियल की वजह से उन्हें सत्ता में देखना चाहती हैं। फिर एक बार स्पष्ट हुआ कि वो किसान की समस्याओं की वजह से उतनी चिंतित नहीं हैं जितनी मोदी के शासन में होने से चिंतित हैं। लेकिन मेरे लिए मुसीबत और बढ़ गई ... मेरे दिमाग में लगातार घंटे की तरह ये शब्द बजने लगे कि आखिर ये कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष कैसे। दरअसल मेरे दीमाग में सवाल इसलिए कौंधा क्योंकि गोधरा की बात तो मैंने अपने आंखों से नहीं देखी लेकिन मुझे ये भरोसा जरूर हुआ कि प्रशासन अल्पसंख्यकों के कत्लेआम में जरूर लगी होगी, लेकिन दुर्भाग्यवश भागलपुर का दंगा मैंने जरूर देखा और भोगा है। वहां प्रशासन द्वारा किए गए कत्लेआम से भी मैं वाकिफ था। हालांकि उस वक्त कांग्रेस ही बिहार में राज कर रही थी। लेकिन उस वक्त उस कांग्रेसी मुख्यमंत्री को किसी ने फासिस्ट नहीं कहा था। इसलिए जब शबाना जी कांग्रेस को सेक्युलर जैसे विशेषण नवाज रही थी तो उनका पकोड़ा कहीं जा कर गड़ रहा था मुझे। बहरहाल सवाल जबाव होते रहे ... दरअसल पत्रकार शबनम जी को घेर रहे थे... उनका चेहरा तमतमा रहा था। मैं उठ कर चला आया। मेरे पेट में अब भी कुछ गड़ रहा था... गांधी नेहरू को छोड़ दें तो कांग्रेस सेक्युलर कैसे ।।। दरअसल शबनम जी के तमतमाए चेहरे पर ये प्रश्न मैं फेंक नहीं पाया। आपको मिले तो पूछिएगा जरूर... अरे नहीं आपको कहाँ मिलेंगी... वो तो पिछले पांच महीने से गुजरात में हैं .... ऐसा उन्होंने ही बताया था प्रेस कांफ्रेस में। आखिर उन्हें गुजरात में सेक्युलर सरकार जो बनबानी है। इति श्री

सोमवार, 8 अक्टूबर 2007

उजाले उनकी यादों के .... मंजीत की जुबानी



कई लोग रेडियो सुन-सुनकर जवान हुए हैं॥ मैं भी॥ लेकिन मेरी यादें कुछ अलग तरह की हैं। मेरे घर में किसिम-किसिम के रेडियो मौजूद रहते थे। एक बेहद बड़ा-सा रेडियो, स्साला बहुत बैटरी खाता था। हम बच्चे थे, बड़े भईया उसकी बैटरी का खर्च अपने पाकेट मनी- आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि कितनी होती होगी- से निकालेते थे। बाद में बैटरीखउका रेडियो हमारे घर के कबाड़ वाले कमरे में पहुंच गया। हमेशा के लिए..वैसे ही जैसे घर के बेहद बुजुर्ग दालान पर पहुंच जाते हैं। अगला रेडियो आया.. साइज़ में छोटा प्यारा-सा। संतोष कंपनी का। लोकल मेड। फिलिप्स वगैरह लेना उस वक्त अय्याशी समझी जाती। हमारे हाथ से कई-कई बार गिर कर हाथ पैर तुड़वा बैठा। बाद में उसमें रबर के बैंड वगैरह लगा कर अस्थिपंजर जोड़े गए। लेकिन उस रेडियों के लिए कान पकड़कर उठक-बैठक लगवाई गई.. वह आज तक याद है। रेडियों में भाई साहब समाचार सुनते...यह आकाशवाणी है, अब आप देवकी नंदन पांडेय से समाचार सुनिए.. प्रधानमंत्री ने फलां कहा.. ढिमका कहा...ऐसा हो गया, वैसा हो गया। खेल समाचार संजोय बैनर्जी से.... मेरी याद्दाश्त ज़्यादा अच्छी नहीं.... कार्यक्रमों में युववाणी.. जयमाला वगैरह ही याद हैं। युववाणी को मैं बहुत दिनों तक युगवाणी जानता रहा। .... एक बात और... हमारे घर बहुत दिनों तक टीवी नहीं था। टीवी आया सन ८८ में। तब तक हम क्रिकेट मैच, रामायण, समाचार या चित्रहार देखने पड़ोस के घरों में जाया करता। आमतौर पर बिजली नहीं होती, होती भी क्रिकेट मैचों और समाचारों में पडो़सी की रूचि नहीं होती। बैटरी वह किसी और प्रोग्राम के लिए बचाकर रखता । ऐसी विषम स्थितियों में मुझे एक प्रेयसी की तरह शरण देती। सच तो यह है कि बहुत बुद्धिजीवी नहीं होने की वजह से आज भी चालू न्यूज़ चैनलों पर मैं एफएम चैनलों को तरज़ीह देता हूं। ज़ाहिर है, गोल्ड और रेनबो को। बाकी के एफएम तो उनकी तरह ही चालू हैं।....शेष तो अशेष है...

रविवार, 7 अक्टूबर 2007

उजाले उनकी यादों के .....


बहनों और भाइयों ....आवाज़ की दुनिया के दोस्तों .... सभी सुनने वालों को
कमल शर्मा का नमस्कार... और न जाने कितने कार्यक्रम ... हवा महल, जयमाला, पिटारा, सेहत नामा , हैलो $$$$ फ़रमाइश, सेल्युलायड के सितारे, बाइस्कोप की बातें , मंथन, उजाला उनकी यादें के ... और न जाने क्या क्या ... बस आंख खुलते ही विविध भारती सुनते और देर रात को सोने तक कमरे के एक कोने में पड़ा रेडियो अपनी ध्वनी तरंगों के ज़रिए बक बक करता रहता , दुनिया भर की बातें बताता ... और साथ में होता हिन्दी फिल्मों का एक से बढ़कर एक गीत। इसके साथ हम कब बड़े होते गए पता ही नहीं चला। उम्र तेज़ी से भागती गयी। वो यादें पीछे छुट गयीं ... अपने तमाम खट्टे मीठे अनुभवों के साथ.... पंचरंगी कार्यक्रम के पचास साल के ज़रिए उन्हीं यादों को आप एक बार फिर जी सकते हैं ... बस उठाइए कलम लिख डालिए उन यादों को जिसमें आप हैं और आपके साथ ही आपका प्यारा पंचरंगी कार्यक्रम विविध भारती ... इंतजार रहेगा ... लिखिएगा ज़रूर

सोमवार, 1 अक्टूबर 2007

वे विचार माफिया हैं .....


सुशांत मेरे परम मित्रों में से हैं। नाम पर मत जाइए या कि चेहरे से धोखा खाइए। चेहरे पर असीम शांति लिए सुशांत जी दरअसल भीतर कहीं गहरे तक उद्वेलित रहते हैं। इन्हें जानने वाले उनके स्वभाव के इस पहलु से ज़रूर परिचित हैं। एक तरह से अगर कहना चाहूं कि समाजवाद इनके बचपन का झुला और जवानी की फुलवारी रही है तो कुछ भी गलत नहीं होगा। इन्होंने समाजवाद को आग उगलते भी देखा और सत्ता के गलियारों में चरते खाते भी देखा है। हालांकि लोग इन्हें दक्षिणपंथी कहते रहे हैं लेकिन मेरा मानना है कि ये बाबा नागार्जुन की तरह ... न हम दक्षिण न हम वाम... में ज्याद भरोसा करते हैं। विरोध ही इनकी लेखनी की धार है। खासकर तब जब मुकावला छद्म धर्मनिरपेक्षों से हो। बहरहाल इन्होंने हाल ही में एक कविता भेजी है ... जो पेशे नज़र है आपके लिए...

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वे बहुत गंभीर हैं

संवेदनशील हैं

उनकी बुद्धि तीक्ष्ण है

वे सोचते हैं, विचारते हैं

मुद्दे उछालते हैं

वैचारिक आधार पर

लोगों को तौलते हैं, तोड़ते हैं, जोड़ते हैं
उनके पीछे लोग हैं

क्योंकि वे मौलिक हैं

(मेरा नहीं, यह उनका दावा है

गोया बौद्धिक संपदा क़ानून के वे देसी

संस्करण यानी डंकल के वंशज हैं)

बुद्धिजीवी मंडी में उनकी साख है

वे बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ते हैं

डिनर चरते हैं

कालाहांडी पर बहस करते हैं

कभी-कभी वे इराक, क्यूबा, सोमालिया बोलते हैं

वे सिद्धांत बोते हैं

और तर्कों के हंसिए से

आंदोलन की फसल काटते हैं


सावधान!

वे विचार माफिया हैं।

रविवार, 30 सितंबर 2007

आसमान में धान


शेखर पेशे से पत्रकार हैं। स्टार न्यूज़ में काम करते हैं। अक्सर मुझे कविताएं भेजते रहते हैं। ये कविताएं विभिन्न विषयों पर होती हैं। इन सबमें इंसानियत के प्रति उनकी संवेदना का अहसास तारी होता है। एक बार फिर उन्होंने ये कविता मुझे भेजी है। मुझे अच्छी लगी। आप भी इसे पढ़ सकते हैं...

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मैं किसान हूँ.........
आसमान में धान बो रहा हूँ.........
कुछ लोग कह रहे हैं कि पगले !
आसमान में धान नहीं जमा करता.........
मैं कहता हूँ पगले !
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है तो
आसमान में धान भी जम सकता है.............
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा..............
या आसमान में धान जमेगा......................

शुक्रवार, 28 सितंबर 2007

क्या आप बिमल और विलियम को जानते हैं ....


जीत गए भई जीत गए... के गगनभेदी नारों के बीच भारतीय क्रिकेट टीम का मुंबई वासियों ने जम कर स्वागत किया। किसी चैनल में कोई एंकर गले फाड़ फाड़ कर बता रहा था सैंतीस लाख लोगों की भीड़ उमड़ी धोनी के धुरंधरों के स्वागत में ... मुंबई की हर गली मानो भारतीय टीम के स्वागत में पलक पाँवड़े बिछाए बैठी थी! मुंबई ही क्यों सारा देश मानों उन्हीं नारों के साथ अपनी सुर में सुर मिला रहा था। चौबीस साल के अंतराल के बाद हमने विश्व कप को चूमा था। एक पूरी पीढ़ी (पुरानी वाली) इस पल को देख कर नास्टेलजिक हुई जा रही थी और दूसरी अपेक्षाकृत नई पीढ़ी उस क्षण को इस पल में जीने की कोशिश कर रही थी। बहरहाल टीम की शोभा यात्रा देखने वालों की भीड़ शायद सभी रिकार्ड तोड़ने पर आमदा थी। उसी पल किसी चैनल ने न्यूज़ ब्रेक किया भारतीय क्रिकेट टीम के सम्मान पर खेल पदाधिकारियों के दोगले रवैय्ये से आहत भारतीय हाकी टीम के कुछ खिलाड़ी भूख हड़ताल पर। समाचार चैनल वालों के लिए तो मानों बिन मांगे मुराद पूरी हो गई । सुबह से जो मुंबई शो पर आठ आठ विंडो काट कर पगलाए जा रहे थे उन्हें स्टोरी में नया एंगल जुड़ता दिखा। फिर तुलना शुरू हुई ... विश्व कप और एशिया कप हाकी में जीत की। बहरहाल कुछ देर में ही अधिकांश चैनलों पर हाकी विलाप (?) दम तोड़ता नज़र आया। लेकिन इन सबमें एक बात जो वाकई अखरने वाली थी ... वो ये कि क्या सचमुच देश में क्रिकेट की तुलना में हाकी या अन्य भारतीय खेलों की हालत खास्ता नहीं है ? क्या सचमुच ऐसा नहीं है कि रांची के धोनी को तो बच्चा बच्चा जानता है जबकि उसी झारखंड के बिमल लाकड़ा को शायद ही कोई जानता हो? क्रिकेट में कल के छोकरों को तो हम सर आँखों पर बिठाए घुम रहे हैं लेकिन राष्ट्रीय खेल हाकी की तरफ जब देखते हैं तो अतीत के चंद सुपर स्टारों के अलावा हम किसी को पहचानते तक नहीं। क्या चेन्नई में आयोजित एशिया कप हाकी में भारतीय टीम का प्रदर्शन ऐसा नहीं था कि हमें सुनहरे अतीत की याद अनायास हो आई थी? बीस शून्य के अंतर से थाईलैंड को कूटने और ऐसे ही एक दो भारी अंतरों से अन्य टीमों को कूटने के बाद क्या हमें रूप सिंह और ध्यान चंद जैसे दिग्गजों की याद नहीं आने लग गई थी? क्या हम फिर आपस में हिटलर और ध्यानचंद के बीच हुए उस एतिहासिक गल्प को एक दूसरे को बढ़ चढ़कर नहीं सुना रहे थे जिसमें ध्यानचंद को हिटलर की तरफ से दी गई पेशकश , उसको ध्यानचंद की तरफ से ठुकराने और फिर ध्यानचंद की स्टीक को जादू की छड़ी कह कर बदलने की कथाएं शामिल थीं? इतना सब होने के बाद भी क्या भारतीय हाकी टीम हमारे प्यार और इज्ज़त की हकदार नहीं थी? क्या उन्हें भी वो सब सम्मान नहीं मिलना चाहिए था जो बीसबिसया विश्व कप जीत कर आने वाली भारतीय टीम को दिया गया? मज़ा तो देखिए जब भारतीय हाकी टीम अपनी अभियान में लगी हुई थी उसी दौरान हाकी संघ में बैठे कुछ सनकी अधिकारियों ने ये बयान दे डाला कि हरेक गोल पर एक हज़ार का इनाम और गोल खाने पर दो हज़ार की कटौती खिलाड़ी के खाते से। चलिए हाकी के गरीब गुरबा खिलाड़ियों को चाहें आप जितना आँखें दिखा लें ... किसी की ये सवाल युवराज सिंह से पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि भई तुमने छह छक्के मारे तो एक करोड़ हसोत लिए ... उन पांच छक्कों का क्या जो तुम्हारे एक ओवर में किसी बल्लेबाज ने तुमपे जड़ दिए थे? क्या इसके लिए युवराज की कमाई का हिस्सा काटने की हिम्मत क्रिकेट संघ में बैठा कोई सनकी साँड़ नुमा पदाधिकारी कर सकता था? कुछ लोग ज़ाहिरा तौर पर जो बिकता है वो दिखता है ... एड जगत की अपनी मजबूरियों और कारपोरेट दलीलों का सहारा लेकर आसान रास्ते के ज़रिए इन सवालों से कन्नी काट लें लेकिन इसके बावजूद हम इस सवाल से बचने का कोई ठोस तर्क ढूंढ़ पाने में शायद असफल ही रहेंगें या फिर यक्ष प्रश्न की भांति ये सवाल हमें मुंह चिढ़ाता ही रहेगा कि क्या आप बिमल और विलियम को जानते हैं ...?????

बुधवार, 26 सितंबर 2007

जीत गए भई जीत गए .........


क्रिकेट के नए मैगी... बस दो मिनटिया ट्वेंटी ट्वेंटी संस्करण में भारत विश्वविजेता बन गया। हरफ़नमौला खिलाड़ियों से लबरेज धोनी के नेतृत्व में युवाओं की टीम ने चमत्कार कर दिया। चौबीस साल के अंतराल पर हमने देखा विश्व कप में कैसा जीता जाता है। एक पूरी पीढ़ी ने महसूस किया विश्व कप की जीत के बाद भारतीय तिरंगा का लहराना कैसा होता है। एक पूरी पीढ़ी मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि हममें से कई नौजवान ऐसे थे जिन्होंने १९८३ में कपिलदेव की टीम को लार्डस में जितते नहीं देखा था बस सुना था ... उस वक्त वाकई देश भर में लगभग ऐसा ही कुछ माहौल रहा होगा। बहरहाल धोनी की टीम ने देखते ही देखते इतिहास रच दिया। इसके साथ ही विश्व कप में पाकिस्तान को लगातार पटखनी देने का अपना रिकार्ड भी अक्षुण्ण बना रहा। बहरहाल इन सबमें एक बात जो मुझे निरंतर खल रही है... पाकिस्तानी कप्तान को वो बयान जिसमें हार के बाद रवि शास्त्री से बात करते हुए अपनी हार के लिए दुख का इज़हार करते हुए उनने पूरे मुस्लिम जगत से माफी मांगी। क्या पाकिस्तानी कप्तान का ये बयान जायज़ था ? क्या पाकिस्तानी टीम पूरे मुस्लिम जगत का प्रतिनिधित्व करती है ? दरअसल ये बयान कुछ वैसा ही है जो पाकिस्तान के राजनेताओं का रहता आया है। पाकिस्तानी राजनेताओं के इस तरह के बयानों का मतलब तो आसानी से समझा जा सकता है। एक राष्ट्र राज्य के रूप में पाकिस्तान की असफलता को तो आसानी से इस्लामी मुखौटे के पीछे छिपाया जा सकता है। क्योंकि पाकिस्तानी के नीति नियंताओं के पास इसके अलावा और कोई विकल्प भी नहीं। चोरी छिपाए चलाए जा रहे पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को इस्लामी बम कहने तक को राजनीतिक रूप से जायज माना लेते हैं ये सोच कर कि चलो उनकी मजबूरी है। लेकिन क्रिकेट के मैदान में हार जीत को धार्मिक स्वरूप देने की बात कहाँ तक जायज़ है ? क्या भारत के विरूद्ध क्रिकेट मैच को धर्मयुद्ध या ज़िहाद के चश्मे से देखा जाना उचित है ? ऐसे में जबकि भारत में मुसलमानों की जनसंख्या पाकिस्तान जैसे देशों से कहीं अधिक है। इस लिहाज़ से जब युसूफ पठान पाकिस्तानी गेंदबाजों की लपलपाती गेंद को बाउंड्री के दर्शन करा रहे तब तो वो इस्लाम के विरूद्ध काम कर रहे थे ??? पाकिस्तानी गेंदबाजों को उन्हें आउट करने से पहले फिर तो सोचना चाहिए था ... आखिर वो एक मुसलमान को आउट करके इस्लाम विरूद्ध काम कर रहे थे। फिर इरफ़ान पठान की गेंद का तो हर पाकिस्तानी गेंदबाज को सम्मान करना चाहिए था ... आख़िर वो एक मुसलमान की गेंद को कैसे पीट सकते हैं ??? हे भगवान पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने पूरे मैच में इस्लाम के विरूद्ध काम किया । अब वो किस मूंह से खुद को इस्लाम के बंदे कह पाएंगें ??? दरअसल जो भी ऐसे बयान दे कर अपनी असफलता को छिपाने का कुत्सित प्रयास करते आये हैं वो न तो इस्लाम को जानते हैं न हीं धर्म के मर्म को। जिस धरम के नाम पर मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान बनवाने में सफल रहे उसी धरम का वो कभी भी सम्मान नहीं कर पाए। ज़िन्ना कितने आधार्मिक किस्म के थे और किस तरह से शराब और सिगार के शौकिन थे ये किसी से छिपी नहीं है। आज़ाद भारत और पाकिस्तान के हुक्मरानों को कम से कम अब छह दशक के बाद ये बात आसानी से समझ में आ जाना चाहिए था कि पाकिस्तान का जन्म एक राजनीतिक कदम था न कि धार्मिक ... बहरहाल पाकिस्तान के कप्तान का इस तरह का बयान न केवल फिजुल था बल्कि अपनी असफलता को छिपाने की कुत्सित प्रयास के रूप में भी इसे देखा जाना चाहिए। ऐसे में क्या क्रिकेट की अंतर्राष्ट्रीय संस्था आईसीसी इस पूरे मामले में कोई कार्रवायी करेगी ?