
जीत गए भई जीत गए... के गगनभेदी नारों के बीच भारतीय क्रिकेट टीम का मुंबई वासियों ने जम कर स्वागत किया। किसी चैनल में कोई एंकर गले फाड़ फाड़ कर बता रहा था सैंतीस लाख लोगों की भीड़ उमड़ी धोनी के धुरंधरों के स्वागत में ... मुंबई की हर गली मानो भारतीय टीम के स्वागत में पलक पाँवड़े बिछाए बैठी थी! मुंबई ही क्यों सारा देश मानों उन्हीं नारों के साथ अपनी सुर में सुर मिला रहा था। चौबीस साल के अंतराल के बाद हमने विश्व कप को चूमा था। एक पूरी पीढ़ी (पुरानी वाली) इस पल को देख कर नास्टेलजिक हुई जा रही थी और दूसरी अपेक्षाकृत नई पीढ़ी उस क्षण को इस पल में जीने की कोशिश कर रही थी। बहरहाल टीम की शोभा यात्रा देखने वालों की भीड़ शायद सभी रिकार्ड तोड़ने पर आमदा थी। उसी पल किसी चैनल ने न्यूज़ ब्रेक किया भारतीय क्रिकेट टीम के सम्मान पर खेल पदाधिकारियों के दोगले रवैय्ये से आहत भारतीय हाकी टीम के कुछ खिलाड़ी भूख हड़ताल पर। समाचार चैनल वालों के लिए तो मानों बिन मांगे मुराद पूरी हो गई । सुबह से जो मुंबई शो पर आठ आठ विंडो काट कर पगलाए जा रहे थे उन्हें स्टोरी में नया एंगल जुड़ता दिखा। फिर तुलना शुरू हुई ... विश्व कप और एशिया कप हाकी में जीत की। बहरहाल कुछ देर में ही अधिकांश चैनलों पर हाकी विलाप (?) दम तोड़ता नज़र आया। लेकिन इन सबमें एक बात जो वाकई अखरने वाली थी ... वो ये कि क्या सचमुच देश में क्रिकेट की तुलना में हाकी या अन्य भारतीय खेलों की हालत खास्ता नहीं है ? क्या सचमुच ऐसा नहीं है कि रांची के धोनी को तो बच्चा बच्चा जानता है जबकि उसी झारखंड के बिमल लाकड़ा को शायद ही कोई जानता हो? क्रिकेट में कल के छोकरों को तो हम सर आँखों पर बिठाए घुम रहे हैं लेकिन राष्ट्रीय खेल हाकी की तरफ जब देखते हैं तो अतीत के चंद सुपर स्टारों के अलावा हम किसी को पहचानते तक नहीं। क्या चेन्नई में आयोजित एशिया कप हाकी में भारतीय टीम का प्रदर्शन ऐसा नहीं था कि हमें सुनहरे अतीत की याद अनायास हो आई थी? बीस शून्य के अंतर से थाईलैंड को कूटने और ऐसे ही एक दो भारी अंतरों से अन्य टीमों को कूटने के बाद क्या हमें रूप सिंह और ध्यान चंद जैसे दिग्गजों की याद नहीं आने लग गई थी? क्या हम फिर आपस में हिटलर और ध्यानचंद के बीच हुए उस एतिहासिक गल्प को एक दूसरे को बढ़ चढ़कर नहीं सुना रहे थे जिसमें ध्यानचंद को हिटलर की तरफ से दी गई पेशकश , उसको ध्यानचंद की तरफ से ठुकराने और फिर ध्यानचंद की स्टीक को जादू की छड़ी कह कर बदलने की कथाएं शामिल थीं? इतना सब होने के बाद भी क्या भारतीय हाकी टीम हमारे प्यार और इज्ज़त की हकदार नहीं थी? क्या उन्हें भी वो सब सम्मान नहीं मिलना चाहिए था जो बीसबिसया विश्व कप जीत कर आने वाली भारतीय टीम को दिया गया? मज़ा तो देखिए जब भारतीय हाकी टीम अपनी अभियान में लगी हुई थी उसी दौरान हाकी संघ में बैठे कुछ सनकी अधिकारियों ने ये बयान दे डाला कि हरेक गोल पर एक हज़ार का इनाम और गोल खाने पर दो हज़ार की कटौती खिलाड़ी के खाते से। चलिए हाकी के गरीब गुरबा खिलाड़ियों को चाहें आप जितना आँखें दिखा लें ... किसी की ये सवाल युवराज सिंह से पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि भई तुमने छह छक्के मारे तो एक करोड़ हसोत लिए ... उन पांच छक्कों का क्या जो तुम्हारे एक ओवर में किसी बल्लेबाज ने तुमपे जड़ दिए थे? क्या इसके लिए युवराज की कमाई का हिस्सा काटने की हिम्मत क्रिकेट संघ में बैठा कोई सनकी साँड़ नुमा पदाधिकारी कर सकता था? कुछ लोग ज़ाहिरा तौर पर जो बिकता है वो दिखता है ... एड जगत की अपनी मजबूरियों और कारपोरेट दलीलों का सहारा लेकर आसान रास्ते के ज़रिए इन सवालों से कन्नी काट लें लेकिन इसके बावजूद हम इस सवाल से बचने का कोई ठोस तर्क ढूंढ़ पाने में शायद असफल ही रहेंगें या फिर यक्ष प्रश्न की भांति ये सवाल हमें मुंह चिढ़ाता ही रहेगा कि क्या आप बिमल और विलियम को जानते हैं ...?????
2 टिप्पणियां:
बहुत बढिया लिखे हो ... जारी रखो
sahi likhe ho sir....achhi tulna kiye ho.....aur aaj ki dasa dekh ker sahi mai ye lag raha hai ki aaj ki pidi apne rastre ki khelo ko bhul rahe hai...aur dusre khelo mai jayada dilchaspi le rahe hai....
एक टिप्पणी भेजें