
सुशांत मेरे परम मित्रों में से हैं। नाम पर मत जाइए या कि चेहरे से धोखा खाइए। चेहरे पर असीम शांति लिए सुशांत जी दरअसल भीतर कहीं गहरे तक उद्वेलित रहते हैं। इन्हें जानने वाले उनके स्वभाव के इस पहलु से ज़रूर परिचित हैं। एक तरह से अगर कहना चाहूं कि समाजवाद इनके बचपन का झुला और जवानी की फुलवारी रही है तो कुछ भी गलत नहीं होगा। इन्होंने समाजवाद को आग उगलते भी देखा और सत्ता के गलियारों में चरते खाते भी देखा है। हालांकि लोग इन्हें दक्षिणपंथी कहते रहे हैं लेकिन मेरा मानना है कि ये बाबा नागार्जुन की तरह ... न हम दक्षिण न हम वाम... में ज्याद भरोसा करते हैं। विरोध ही इनकी लेखनी की धार है। खासकर तब जब मुकावला छद्म धर्मनिरपेक्षों से हो। बहरहाल इन्होंने हाल ही में एक कविता भेजी है ... जो पेशे नज़र है आपके लिए...
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वे बहुत गंभीर हैं
वे बहुत गंभीर हैं
संवेदनशील हैं
उनकी बुद्धि तीक्ष्ण है
वे सोचते हैं, विचारते हैं
मुद्दे उछालते हैं
वैचारिक आधार पर
लोगों को तौलते हैं, तोड़ते हैं, जोड़ते हैं
उनके पीछे लोग हैं
उनके पीछे लोग हैं
क्योंकि वे मौलिक हैं
(मेरा नहीं, यह उनका दावा है
गोया बौद्धिक संपदा क़ानून के वे देसी
संस्करण यानी डंकल के वंशज हैं)
बुद्धिजीवी मंडी में उनकी साख है
वे बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ते हैं
डिनर चरते हैं
कालाहांडी पर बहस करते हैं
कभी-कभी वे इराक, क्यूबा, सोमालिया बोलते हैं
वे सिद्धांत बोते हैं
और तर्कों के हंसिए से
आंदोलन की फसल काटते हैं
सावधान!
वे विचार माफिया हैं।
3 टिप्पणियां:
संदीप जी,
सुशांत की अशांत कविता छापने के लिए साधुवाद। सुशांत को जितना मैं जानता हूं... उनकी रगों में दौड़ने वाला खून सजग पत्रकार का तो है ही, एक साहित्यकार की तरह मंद-मंद हिलोरें लेने वाला भी है। अब इस्तेमाल वह कम ही करते हैं, लेकिन जितना करते हैं. सुपर्ब, माइंडब्लोइंग, फैंटास्टिक... चौथा क्या बोलते हैं हिमेश रेशमिया...??? वही है। अस्तु। छद्म लोगों को गरियाने में सुशांत कत्तई कोताही नहीं बरतते यही उनकी लेखनी की सबसे बडी़
बात है। सुशांत ध्यान रखना... सत्ता के जिस गलियारे में चरने का आरोप या महिमामंडन आपका हुआ है, वह खत्म नहीं होना चाहिए, ना ही सिर चढकर बोलना चाहिए। क्यों? क्योंकि सत्ता से दूर होते ही आपकी प्रेरणा कमज़ोर हो जाएगी। ज़्यादा नज़दीक जाने से आप शहद में लिथडी़ मक्खी हो सकते हैं। वैसे एक बार फिर अच्छी कविता के लिए, साधु। संदीप को तो शुक्रिया है ही।
मंजीत
शायद उन्हीं लोगों को बौद्धिक आतंकवादी भी कहते हैं । क्यों सुशांत...
jha jee doosare ke bare main tol mol karna aapki aadat hai vicharon ka hansia hi kyon prayog karte hai agar aap main taqat hai to shabdon ka kamal har kisi ke juban par khila dijiye.woh somalia par bolte hai to nisandeh sushant ko us desh ki isthitiyon aur paristhitition ke vare main jankari hai woh dinner karte hai ya videshi brand ka sigar pite hai usase aapko kya lena dena unka apana personel life hai raat ke andhere main aap kis kothe par jate hai kaun si barand ki wine peete hai agar main vaicharik aur boudhik star ka charitra hoon to ye pata lagana mera kaam nahee hai , aap jara murdhanya hindi sahityakaron , ki din charya khaas kar rat ke andhare ke baare main padhenge tab aap ko ehsaas hoga khair abhee aap shaisav kaal main hai . dhanyavaad
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