शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2008

एक रहैं नरसिंह पंडित जी....


एक थे नरसिंह पंडित जी। पहले गोवर्धन साहित्य महाविद्यालय, देवघर के प्राचार्य रहे बाद में हिन्दी विधापी‌ठ यानि के राजेंद्र शोध संस्थान, देवघर के प्राचार्य हुए। हिन्दी के अकादमिक और विद्वानों के लिए हिन्दी विधापीठ किसी मक्का से कम नहीं है। बहरहाल ये इनका अकादमिक परिचय है। बाँकि का परिचय जानने के लिए आपको किसी देवघरिए से मिल कर बात करना होगा या देवघर जाना होगा। वैसे मैं बता दूं कि अगर आप किसी देवघरिया से पंडित जी के बारे में बात करेंगे तो कुछ इस अंदाज़ में उनको बारे में आपको बताएगा...जैसा आगे मैं बताने जा रहा हूं।
दरअसल पंडित जी से पहला सामना कब हुआ कुछ ‌ठीक ठाक याद नहीं। हाँ इतना याद है कि झक झक धोती कुर्ता पहने तेज चाल में चलता हुआ एक व्यक्ति घर के पास वाले चौक से एक निश्चित समय पर रोज गुजरता। उन्हें देखते ही आस पास जो भी होता झुक कर पैर छुता और अलग हट जाता। बहरहाल अपने घर के आस पास के बड़ों को उस उज्जवल धवल व्यक्तित्व के पाँव छुता देखकर , मैं भी उनके पाँव छुने लगा... बिना जाने के कौन हैं वो। अच्छा लगता था .... वो भी तेज कदमों से चलते हुए अचानक मेरे पीछे से आकर पाँव छुने वक्त ठीठकते और मुझे कलेजे से लगाकर आर्शिवाद देकर तेज कदमों से अपने रास्ते पर चल पड़ते। ये तब की बात है जब मैं कक्षा एक या दो में पढ़ता था।
बाद में मैं आर मित्रा हाईस्कूल चला गया। तब तक पैर छुकर आर्शिवाद लेने का सिलसिला ज़ारी रहा। बहरहाल एक दिन मित्रों से बातचीत में पता चला कि अगर आर्टस विषयों में अच्छा करना हो तो नरसिंह पंडित जी के पास पढ़ने के लिए जाना चाहिए। मुझे नहीं पता था कि ये नरसिंह पंडित कौन हैं लेकिन बातों ही बातों में पता लगा कि बड़े खड़ुस शिक्षक हैं लेकिन पढ़ाते बहुत जबरदस्त हैं। मुझे भी लगा कि उनके पास पढ़ना चाहिए। लिहाज़ा मैंने भी मित्रों से कहा कि भई मुझे भी जाना है उनसे पढ़ने के लिए तो उनका जबाव था .... ठीक है चले आओ लेकिन बात करने के लिए अभिभावकों को भेजना होगा। वरना पढ़ाएंगें तो नहीं ही उल्टे धमकाएंगें अलग से। इससे मेरी चिंता बढ़ गई। क्योंकि मेरे पिता जी अपने रोजमर्रा के कामों में इतने व्यस्त होते कि उनके पास इस काम के लिए वक्त शायद ही हो। ऐसे भी पिता जी ने हमें बचपन से अपने काम के लिए स्वतंत्र छोड़ रखा था।
बहरहाल तय हुआ कि अकेले ही चला जाए। मित्रों ने बता रखा था कि सुबह पाँच बजे पढ़ाते हैं। घर का पता भी पता दिया था। सुबह चार बजे उठा गया। पौने पाँच तक साइकिल चलाता हुआ उनके घर के बाहर पहुँच गया। अंदर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अपने अराध्यों को याद करता अंदर दाखिल हुआ। बरामदे में आकर खड़ा हो गया कि घर से कोई बाहर आए तो अपनी बात बताई जाए। थोड़ी देर में कोई संस्कृत का श्लोक कानों में सुनाई दिया। सामने देखा तो भौंचक ये तो वही व्यक्ति थे जिनके पाँव छुता रहा था रास्ते में बिना ये जाने कि ये कौन हैं। उनकी नज़र मुझ पर पड़ी ..... जय हो जय हो जय हो करते हुए तेजी से बाहर आए। मेरी घिग्गी बँध गई। पुछा क्या काम है। आदतवश मैंने पाँव छुकर प्रणाम किया .... कहा सर आपसे पढ़ना चाहता हूं। थोड़ी देर के लिए गंभीर हो गए ... मैंने सोचा मैं तो गया आज .... ज़रूर पूछेंगे पिता जी क्यों नहीं आए। बहरहाल कुछ ही पल में उन्होंने कहा ठीक है.... जाओ पंद्रह मिनट में कापी किताब लेकर आ जाओ। मैं जल्दी जल्दी दुबारा आया। जब आया तो देखा हालनुमा कमरा पूरा भरा हुआ था। सबसे पीछे बैठा।
बहरहाल उनके सानिध्य में हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, इतिहास, और भूगोल आदि विषयों का रोचक रूप से वाक़िक हुआष। बाद में पता चला कि उन्होंने अपनी पढ़ाई गणित विषय के साथ पूरी की है। आश्चर्य हुआ कि गणित और मानविकी का क्या संबंध। लेकिन उनकी पढ़ाई का मुझ पर ये असर हुआ कि गणित से भागने वाला मैं कब गणित से दोस्ती कर बैठा और कब मानविकी मुझे आकर्षित करने लगा .....पता ही नहीं चला। परिणाम ग्याहरवी बारहवी में गणित और कालेज में इतिहास विषय। हिन्दी से आकर्षण तो उन्हीं की वजह से शुरू हुआ। बाद में उनके सानिध्य में हिन्दी विद्यापीठ लाइब्रेयरी में रखी हिन्दी की तकरीबन सभी नामी हस्ताक्षरों को पढ़ा।
बहुत बाद में पता चला कि वो जाति के कुम्हार थे। आश्चर्य हुआ कि कुम्हार इतना विद्वान। दरअसल देवघर वो शहर है जहाँ ब्राह्मणों की आबादी आज भी बहुत है। एक तरह से शहर ब्राह्मणों और पूजा पाठ की वजह से ही जाना जाता। आश्चर्य हुआ कि इतने पुरातनपंथी शहर में एक कुम्हार प्राचार्य को इतना सम्मान। दरअसल सच कहुँ तो ये बाते उस दौरान दिमाग में आई हो ऐसा भी नहीं है। ये बातें तो तब दीमाग में आईं जब जातिव्यवस्था और दलितों पिछड़ों के बारें में जानने समझने को मिला। दरअसल मुझे क्या हर देवघरिए को शहर के इस विरासत पर गर्व होगा।
दरअसल अविनाश जी के मोहल्ले पर दलित साहित्य और दलित चेतना पर चल रही बहस को पढ़ कर नरसिंह पंडित जी का चेहरा कौंध गया था। इसी के साथ कौंधा था उनसे वो अंतिम भेंट जब बीए करने के तत्काल बाद सड़क पर उनसे मुलाकात हुई। आदतवश पैरों पर झुक गया था। सीने से लगा कर उन्होंने पूछा था अब क्या करने का इरादा है। मैंने कहा था पत्रकार बनना चाहता हूं। उनकी आँखों में चमक आ गई थी। आर्शिवाद देते हुए कहा था बहुत अच्छा सोचा है तुमने। मेरे इस फैसले पर अकेले पंडित जी थे जिन्होंने न केवल सकारात्मक बातें कहीं बल्कि उनकी आँखों की चमक देख कर मेरा हौसला दुगुणा हो गया था। बाद में मेरे दिल्ली आने के बाद खबर आई कि पंडित जी नहीं रहे .... अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाया। आज भी उनकी याद आती है तो आँखे नम हो जाती हैं ... स्रद्धा से दिल भर आता है। लगता है अभी झुक कर प्रणाम कर आर्शिवाद ले लूं।

7 टिप्‍पणियां:

अजय रोहिला ने कहा…

विरले ही आपको मिलेगें जो इतने सदीद मन से अपने गुरूओं को याद करते होगें। खैंर ये आपकी खूबी नहीं है के अपने मास्टर जी को इतनी इज्जत आज भी देते है। दरअसल पुराना समय ही ऐसा था। उस समय को हम गुरू शिष्य की मरयादा का स्वणॆयुग भी कह सकते हैं।

Shashi Anand ने कहा…

आज आपके ब्लॉग को बस यूँ ही देखने बैठ गया .... वही घिसी पिटी राजनीति की बातें .....मैं लगभग बोर सा होने लगा था .....पर पता नहीं क्यों, फिर भी पढ़े जा रहा था ... शायद ये आपके शब्दों का जादू था " या " मेरे साथ आपके स्नेह भरे सम्बन्ध का जादू " या फिर " किस्मत मुझे भी इस महापुरुष ( श्री नरसिंह पंडित जी ) के प्रति आपने श्रद्धा भाव रूपी श्रधांजलि देने का एक मौका देना चाहती थी .... खैर जो भी था,
आज फिर से अपने बचपन के बीते हुए वो दिन फिर से याद आ गए... सर्दियों में सुबह के साड़े ४ बजे साईकिल पे पंडित जी पास टूशन पढने जाना और गर्मी के दिनों में दोपहर के २ बजे ......

एक बात तो पुरे यंकी क साथ बोल सकता हूँ की आने वाली पीढी के पास से ये सौभाग्य छीन गया जो हम लोगो को प्राप्त हुआ था .....

आपका छोटा भाई (तुल्य)

शशि आनंद

Unknown ने कहा…

Aapko dheron dhanyawaad for writing and sharing this blog.
Thank you so much.

kuldeep ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
kuldeep ने कहा…

wow ,
Sir i am your big fan .
what a memory you are assume...

Unknown ने कहा…

"कवि कुल चूड़ामणि संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास ......." जब मेरे मित्र सुजीत कुमार सिन्हा ने तुलसी जयंती पर तुलसी के जीवन परिचय पर स्कूल में भाषण दिया तो मुख्य अतिथि के एन सहाय(तत्कालीन प्राचार्य ,देवघर कॉलेज )ने उसे गोद में उठा लिया |तब हम चौथी कक्षा में थे |पूछने पर पता चला की यह भाषण उसे पंडितजी ने लिखवाया था |पहली बार पंडितजी का नाम कानों में गया |थोड़े बड़े हुए तो एकदिन पिताजी ने बुलाकर कहा "आवारा लड़को के साथ खेलने की जरूरत नहीं है ,शाखा में जाना शुरू करो ,पंडितजी के सान्निध्य में संस्कार बनेगा |पूछते हुए छतिशी पंहुचा और फिर ह्रदय से पंडितजी का भक्त हो गया |श्रद्धा ऐसी कि देवघर कॉलेज से आने जाने के क्रम में उन्हें आता देख साइकिल से नीचे उतरकर चला करता था |उनके जैसा व्यक्तित्व ,जो मनसा- वाचा- कर्मणा एक रहे,उन्हें पाकर देवघर की मिट्टी सुवासित होती रही |फिर एक ग्रीष्म अवकाश में दिल्ली से देवघर गया तो मेरे ससुर जी ने एक पेन पकड़ाते हुए कहा "ये लीजिए पंडितजी का प्रसाद| वे उनका श्राद्ध कर्म करा के वापस आये थे |मैंने अश्रुपूरित नेत्रों से कलम को माथे से लगा लिया |.......जब भी आदर्श और अनुशासन की बात आती है ,पंडितजी आप बहुत याद आते हैं |

Convergence Eduresource ने कहा…

हमने गोविंदा बाँध शाखा में ही जीवन आदर्श का पाठ, उनसे अल्प उम्र में ही पा लिया था, जो कि चाह कर भी नहीं जाती | धन्य हैं, आप जैसे, माटी के लाल जिनके स्मरण मात्र से मन- प्राणों में स्फुरण दौड़ जाती है |