देश में चुनावी हलचल अपने अंजाम के करीब पहुंचता जा रहा है। राजनीतिक दल अपने कमान से हर तरह के तरकश का इस्तेमाल कर रहे है जिससे वे अपने प्रत्याशियों और समर्थक उम्मीदवारों को चुनाव जीता सके। इस चुनाव में बहुत कुछ दांव पर है। पर सबसे ज्यादा दांव पर है राष्ट्रीय राजनीति के दो दिग्गज गठबंधनों यूपीए और एनडीए की प्रतिष्ठा। इन दोनों ही गठबंधनों के लिए तीसरा मोर्चा बहुत बड़ा सिर दर्द बन कर उभरा है। ज़ाहिर है इसलिए भी यूपीए और एनडीए की रणनीति का इम्तिहान इस बार कड़ा है। दरअसल 2004 में चुनाव पूर्व बने यूपीए गठबंधन में बिहार से राष्ट्रीय जनता दल और लोकजनशक्ति पार्टी, महाराष्ट्र से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और आरपीआई, तमिलनाडु से पीएमके, डीएमके और एमडीएमके और आंध्र प्रदेश से टीआरएस सरकार बनाने में शामिल थे। इसके साथ ही वाम दलों ने यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दिया था।14वीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अकेले 145 सीट प्राप्त कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई थी और उसके सहयोगी दलों को कुल मिलाकर 70 सीटें हासिल हुई थी। लेकिन बाहर से समर्थन देनेवाले दल में सीपीएम को 43, सीपीआई को 10, फारवार्ड ब्लाक को 3, आरएसपी 3, केईसी 1 और एक अन्य निर्दलीय सांसद का समर्थन प्राप्त था।

कांग्रेस को आंध्र प्रदेश , असम, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु , झारखंड और केंद्र शासित प्रदेशों अंडमान निकोबार, चंडीगढ़, दमन दीव और दिल्ली के 203 सीटों में से 97 सीटें हासिल हुई थी यानि इन राज्यों की कुल सीटों की तकरीबन पचास फ़ीसदी के करीब सीटें कांग्रेस के खाते में गई थी जबकि इन्हीं राज्यों में भाजपा को महज़ 31 सीटें हासिल हुई थी। ज़ाहिर है पिछली बार कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने में इन राज्यों की भूमिका बहुत बड़ी थी, लिहाज़ा इस बार वापसी के लिए कांग्रेस का यहां बहुत कुछ दांव पर है। अब भाजपा के बेहतर प्रदर्शन वाले राज्यों पर नज़र डालें तो मध्य प्रदेश , राजस्थान , छत्तीसगढ़ , गुजरात, महाराष्ट्र और उड़ीसा जैसे राज्यों की कुल 160 सीटों में से 90 सीटों पर कब्ज़ा जमाने में सफल रही थी यानि कुल सीटों की पचास फ़ीसदी से भी अधिक। ज़ाहिर है भाजपा के समक्ष इन राज्यों में अपनी इन सफलता को दोहराने के साथ साथ कांग्रेस के उन राज्यों में भी अपनी स्थिति मजबूत करने की दोहरी चुनौती है। ज़ाहिर है कांग्रेस और भाजपा के बीच असली मुकाबला इन्हीं राज्यों में देखने को मिलेगा।
अब चौदहवीं लोकसभा में कांग्रेस की सहयोगी दलों के प्रदर्शन पर नज़र डालें तो बिहार और झारखंड में राष्ट्रीय जनता दल, लोकजनशक्ति पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा, महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और आरपीआई, तमिलनाडु पांडिचेरी में डीएमके, पीएमके और एमडीएमके जैसी पार्टियों ने कुल 142 सीटों में से 68 सीटों पर कब्ज़ा जमा कर कांग्रेस के लिए केंद्र में सरकार बनाने की राहें आसान कर दी थी। लेकिन इसके विपरीत भाजपा के सहयोगी दलों पंजाब में अकाली दल, महाराष्ट्र में शिवसेना, तमिलनाडु में जयललिता, उड़िसा में बीजु जनता दल और बिहार में जनता दल युनाइटेड जैसी सहयोगी दलों ने 161 सीटों में महज़ सैंतीस सीटें हासिल कर केंद्र में सरकार बनाने की कवायद में एनडीए की असफलता की पटकथा लिख दी थी। ज़ाहिर है इस बार भाजपा और कांग्रेस की केंद्र में सरकार बनाने का दारमोदार बहुत हद तक पुराने सहयोगियों के प्रदर्शन और नए सहयोगी बना पाने में उनकी सफलता पर निर्भर करेगा। इसके अलावा देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सिर्फ अहसास तक सीमट कर रह गई राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के प्रदर्शन पर भी प्रेक्षकों की निगाहें होंगी।
इन सबके बीच पंद्रहवी लोकसभा चुनाव के पूर्व एनडीए ने हरियाणा में चौटाला , असम में असम गण परिषद और उत्तर प्रदेश में चौधरी अजीत सिंह को अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल की । इसके साथ ही लुधियाना की रैली में टीआरएस को अपने खेमे में खड़ा कर पटनायक को अपने खेमे में लेकर खुशी मना रहे तीसरे मोर्चे को भी करारा ज़बाव दे दिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस अब तक ऐसी कोई भी कदम बढ़ा पाने में नाकाम रही है। इसके वीपरीत उसे बिहार और उत्तर प्रदेश में राजद, लोजपा और सपा जैसी अपनी सहयोगी पार्टियों का ही सामना करना पड़ा रहा है। साथ ही समय प्रेक्षकों के मुताबिक वक्त से पहले किए गए कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेस ने द्रमुक और राजद जैसी पार्टियों को उल्टे नाराज़ कर दिया है। हालांकि चुनाव बाद की रणनीति पर कांग्रेस एक साथ कई संकेत देती है जिसमें नीतिश के साथ साथ तीसरे मोर्चे के नायडु पर भी डोरे डालने की रणनीति का खुल कर इज़हार है। लेकिन लुधियाना की रैली में नीतिश और नरेंद्र मोदी की गलबहियां ने शायद राहुल के बचपने का जबाव अपने अंदाज में दे दिया। ज़ाहिर बिना किसी तैयारी के हवा में बात करने के लिए प्रेस कांफ्रेस बुलाने का जो नतीज़ा कांग्रेस को भुगतना था तो वो भुगत रही है। नाराज़ द्रमुक को मनाने के लिए तमिलनाडु में सोनिया गांधी को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा गया। ज़ाहिर है चुनाव बाद के हालात बहुत हद तक आने वाले चुनाव परिणामों पर निर्भर होंगे लेकिन फिलहाल भाजपा राहुल के ऐसे विचारों को कांग्रेस की कपोल कल्पना कह कर अगर ख़ारिज कर रही तो कुछ भी गलत नहीं है उसमें। कांग्रेस को अब भी बहुत होमवर्क करना होगा। हालांकि इस बीच एनडीए को तीसरे मोर्चे से झटका भी लगा जब ग्यारह साल पुराने सहयोगी बीजू जनता दल ने उड़िसा और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी राह बदल ली। हालांकि इसका विकल्प जैसा कि लुधियाना में टीआरएस को अपने खेमे में लाकर भाजपा ने तीसरे मोर्चे को करारा जबाव दे तो दिया है लेकिन उन्हें भी पता है वो नवीन पटनायक का स्थायी स्थानपन्न नहीं हो सकता। हाँ इतना जरूर है कि इसके बांकि दलों को अपने ओर खिंचने के लिए टर्निंग प्वांइट के रूप में भाजपा इस्तेमाल कर सकती है। दरअसल केंद्रीय राजनीति की शतरंज पर भाजपा और कांग्रेस दो बड़े मोहरे ज़रूर है लेकिन दिल्ली की तख्त पर सत्तानशीं के लिए राज्यों के इन मोहरे के प्रदर्शन पर न केवल प्रेक्षकों की निगाहें होंगी बल्कि इन राष्ट्रीय दलों की भविष्य भी बहुत हद तक इन्हीं से तय होगा। ज़ाहिर है यूपीए एनडीए के लिए बहुत कठिन है डगर पनघट की।
1 टिप्पणी:
चुनाव हो रहे है तो सियासत के नए फामूले तो तैयार होगे ही । रही बात किसी के टूटने औऱ नये सिरे से तैयार होने की तो यह भी सियासत का एक खेल है । जो आज एनडीए के साथ है वह कल कांग्रेस के साथ था । यह बात जरूर है कि इस बार के समीकरण में यह बताना मुश्किल है कि सत्ता का स्वाद किसे मिलेगा । जहां तक तीसरे दल की बात है वह तो दिखता ही नही है । विकल्प तैयार नही हुए है । एनडीए और यूपीए में ही किसी को सत्ता का स्वाद चखना है । बाकी बहुत कुछ १६ मई को भी तय होगा
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