गठबंधन राजनीति के इन दिनों में केंद्र में सरकार के गठन की जिम्मेदारी बहुत हद तक क्षेत्रीय दलों के हाथों में है। यही वजह रही कि पंद्रहवीं लोकसभा के गठन की प्रक्रिया के घोषणा के साथ ही राष्ट्रीय दलों में क्षत्रपों को एक दूसरे के पाले में लाने की होड़ मच गई। दरअसल राजनीति की ये पटकथा नब्बे के दशक में ही लिख दी गई जिसका उत्कर्ष 13वीं लोकसभा में एनडीए सरकार और उसके बाद यूपीए के सरकारों के रूप में सामने आया। पंद्रहवीं लोकसभा के दौरान भी हालात बहुत बदलेगा , इसकी संभावना कम है। आने वाले समय में क्षत्रप ही अगली लोकसभा की रूपरेखा तय करने जा रहे हैं। या फिर कहें कि इनमें से ही कोई डार्क होर्स भी हो सकता है। यही वो तथ्य है जिस पर राष्ट्रीय दलों के साथ साथ क्षेत्रीय दलों के लिए भी रणनीति का निर्धारण होना है।दरअसल
14वीं लोकसभा में भविष्य की राजनीति को ध्यान में रख कर इसकी शुरूआत तब हुई जब वामपंथी दलों ने परमाणु करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस लिया। तभी से क्षत्रपों को अपने पाले में करने और पहले से ही अपने कुनबे में मौजूद क्षत्रपों को जोड़े रखने की कवायद शुरू हुई। इस दौरान मायावती, जयललिता, चंद्रबाबू नायडु , चौटाला, वृंदावन गोस्वामी, देवेगौड़ा और बाबू लाल मरांडी जैसे क्षत्रपों ने जहां तीसरे मोर्चे के ठोस स्वरूप को सामने रखा वहीं पहले से तीसरे मोर्चे के साथ रही सपा कांग्रेस के साथ आ गई जबकि एनडीए को अपने गठबंधन को बनाए रखने के लिए काफी पसीना बहाना पड़ा। और ये कि पहले से ही यूपीए में मौजूद शिबू सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चे ने अंतिम समय तक कांग्रेस को अपनी ओर ताकने को मजबूर किया।
दरअसल ये शुरूआत थी , उसके बाद भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए कई क्षत्रप अपना पाला बदल चुके हैं। ये साफ तौर पर तमिलनाडु में देखने को मिला जहां पहले डीएमके और यूपीए के साथ रहे रामदौस और वाइको अब जयललिता के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं। चुनाव के ठीक पहले बिहार में लालू और पासवान का दबे स्वर में ही सही कांग्रेस से किनारा करना और असम गण परिषद और हरियाणा में चौटाला का का एनडीए के पाले में चले जाना। साथ ही एनडीए के पाले से खिसक कर बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस के साथ महाजोट की रणनीति और उडिसा में बीजू जनता दल का एनडीए से खिसक कर तीसरे मोर्चे में शामिल होना सब इसी का हिस्सा है।दरअसल ये सारे गठबंधन अपने अपने इलाकों में अपनी लाभप्रद राजनीतिक जरूरत के मुताबिक किया गया। गठबंधन की राजनीति में स्थायी कुछ भी नहीं होता। ये बहुत कुछ चुनाव परिणामों पर निर्भर करता है। अगर पंद्रहवी लोकसभा के चुनाव परिणाम यूपीए या एनडीए के अनुकूल नहीं रहा तो अब तक यूपीए या एनडीए के पाले में नज़र आ रहे क्षेत्रीय दल तीसरे मोर्चे का रूख कर सकते हैं। यही वजह है कि एनडीए में रहते हुए भी शरद यादव घर पर सीताराम येचुरी से मुलाकात करते हैं और लालू और पासवान यूपीए में रह कर भी कांग्रेस से दूरी बढ़ा लेते हैं या कि शिवसेना एनडीए में होते हुए भी मराठा प्रधानमंत्री के नाम पर कभी कभी एनडीए की राजनीतिक जरूरत के विपरीत संकेत देती है। यहां ये बताता चलुं कि अगर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर भी जाती है जैसा कि लग रहा तो भी अगर उसके पास खुद के १७० से ज़्यादा सांसद नहीं हुए तो कांग्रेस तीसरे मोर्चे के किसी डार्क हार्स को समर्थन दे कर सरकार बनवा सकती है। इस संभावना की बड़ी वज़ह इसलिए भी है कि सेकुलर सेकुलर चिल्लाते हुए ये सभी सिद्धांत बघारने वाली पार्टियां एक हो सकती हैं। लेकिन इन सब संभावनाओं के लिए जरूरी है कि अपने अपने इलाके के ये क्षत्रप अपने अपने किले को बचा पाने में सफल हों।
ज़ाहिर है इन क्षत्रपों के लिए अपने अपने इलाके में बेहतर प्रदर्शन करना सिर्फ अपनी ताकत बढ़ाने के लिए ज़रूरी नहीं है बल्कि दिल्ली में राष्ट्रीय दलों को अपने मुताबिक साधने के लिए भी जरूरी है। लेकिन अगर ये कमज़ोर पड़ते हैं फिर ऐसे हालात में इनके लिए केंद्रीय राजनीति में अस्तित्व का संकट भी आ सकता है। इसलिए हर हाल में इनकी कोशिश ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल कर केंद्रीय राजनीति को अपने मुताबिक मोड़ने की होगी। आप यों कह सकते हैं कि पंद्रहवी लोकसभा का स्वरूप बहुत कुछ राज्यों के इन धुरंधरों के मुताबिक तय होगा।
1 टिप्पणी:
गठबंधन की राजनीति ने देश को किस कदर कमजोर किया है शायद हमसे ज्यादा आप जानते है । लेकिन बात चली है तो एक बात कहता चलू कि लालू और पासवान की राजनीति ने विहार को और मुलायम की राजनीति ने उत्तरप्रदेश को किस कदर आहत किया है यह भी आप बखूबी जानते है । जहां तक बात तमिलनाडू बंगाल की है तो वहां दो महारानी किस और करवट बदलेगी कहना मुश्किल है । शरद पवार राजनीति के माहिर है वह भी किसी समय एक अलग मोहरे फेक सकते है । ज्यादा बहस में नही जाना चाहता हू क्योकि आपने तो खुद ही लिख दिया है कि कौन किस और जाएगा यह तो किसी को पता नही है । वैसे भी तोल-मोल के दम पर सत्ता के गलियारे तक पहुंचने वाले नेताओ पर कब तक विश्वास किया जा सकता है । सभी तो एक ही थाली के चट्टे-बट्टे है । फिर उनसे लंबी उम्मीद कैसी ।
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