अगर एक वाक्य में कहें तो प्रधानमंत्री का भाषण निस्संदेह शानदार था। ख़ासतौर पर पाकिस्तान के साथ दुबारा बातचीत शुरू करने के संबंध में उनके तर्कों का जबाव विपक्ष के पास भी नहीं था। प्रधानमंत्री अपनी चिर परिचित शैली से अलग हटकर बोले। शांत और सौम्यता के बीच विपक्ष पर आक्रामक अंदाज में चुटकी भी ली। इस संदर्भ में अपने पूर्ववर्ती वाजपेयी का ज़िक्र करते हुए उनके नक्शेकदम पर चलने की बात कहकर उन्होंने विपक्ष के हथियार की धार ही खत्म कर दी। बहरहाल अंतिम उपयोगकर्ता निगराणी समझौते ( एंड यूज़र मानिटरिंग एग्रिमेंट ) पर प्रधानमंत्री का तर्क बहुतों के गले नहीं उतरने लायक था।
इस मुद्दे पर उनका कहना था कि अमेरिका के साथ हथियारों और रक्षा से जुड़े उच्च स्तर की अत्याधुनिक प्रणाली की आपूर्ति के संबंध में नब्बे के के दशक से ही भारत की सरकारें इस तरह के समझौते करती आई हैं। इस बार भी अमेरिका के साथ किए गए समझौते में भारत की संप्रभुता और प्रतिष्ठा का ख्याल रखा गया है। इस समझौते में अमेरिका एकतरफा कोई कार्रवायी नहीं कर सकता है खासतौर पर रक्षा प्रतिष्ठानों की जांच के संबंध में। इसके लिए अमेरिका को पहले भारत से औपचारिक अनुरोध करना होगा और भारत की अनुमति और द्वपक्षीय सहमति से ही वो कोई जांच कर सकेगा। इसके बाद प्रधानमंत्री जी आठ के सदस्यों द्वारा संवर्द्धण और परिशोधन तकनीक के हस्तांतरण से संबंद्ध भारत की निशस्त्रीकरण के मुद्दे पर दिए गए बयान पर सदन की चिंता का जबाव दिया। इस पर उनका कहना था कि एनएसजी के ४५ देशों ने यूरोनियम तकनीक भारत को पूरी तरह से देने पर पहले ही सहमति जताई है। इसके पहले भी जी आठ के देशों ने अडंगा लगाने की कोशिश की है लेकिन वो कामयाब नहीं हुए हैं जाहिर है इसमें कामयाबी के लिए एनएसजी के सभी ४५ देशों में आमसहमति बनानी होगी जो फिलहाल संभव नहीं दिखता । लिहाज़ा निकट भविष्य भारत के लिए इस पर चिंता की कोई बात नहीं है। साथ ही उन्होंने ये भी दोहराया कि जब तक दुनिया को परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में मान्यता नहीं देता है तब तक एनपीटी पर हस्ताक्षर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।
ज़ाहिर है विपक्ष संतुष्ट था। लेकिन अब भी ब्लुचिस्तान के ज़िक्र पर कोई ठोस जबाव दे पाने में सरकार नाकाम रही थी। लेकिन प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद भाजपा की सुषमा स्वराज द्वारा जो प्रश्न पूछे गए जलवायु परिवर्तन के बारे में वो विपक्ष की दिशाहीनता और प्रधानमंत्री के जबाव पर भाजपा की किसी रणनीति के अभाव को सामने रख गया। इससे ये भी स्पष्ट हो गया सरकार कठघरे में अगर खड़ी दिख भी रही थी तो अपनी मंत्रियों और अधिकारियों की नासमझी की वज़ह से न कि विपक्ष की किसी रणनीति और उसके द्वार किए गए किसी ठोस प्रयास का ये नतीजा था। बहरहाल अब सबकी नज़र विदेश मंत्री के जबाव पर टीकी थी जहां से उन्हें निराश करने वाला जबाव मिलने वाला था और सदन में एक बार फिर ये साबित होने वाले था कि एस एम कृष्णा शायद विदेश मंत्री के रूप में सही चयन नहीं हैं। (जारी)
शुरूआत से ही सबको उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री बहस में हस्तक्षेप करेंगे। हुआ भी कुछ ऐसा ही। पहले यशवंत सिन्हा के भाषण के दौरान ब्लुचिस्तान से मुत्तल्लिक डोजियर के सवाल पर प्रधानमंत्री ने एक पंक्ति का हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि पाकिस्तान से इस मुद्दे पर भारत सरकार को शर्म अल शेख में कोई डोज़ियर नहीं मिला है। इसके बाद विपक्ष को ये लग रहा था कि प्रधानमंत्री अपने हस्तक्षेप के दौरान सभी मुद्दों पर सरकार की स्थिति साफ साफ शब्दों में स्पष्ट करेंगे। हालांकि पीएम न केवल जबाव के लिए तैयार थे बल्कि आशा के वीपरीत आक्रामक भी दिखाई दिए। पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है और हम ये बात नहीं भुला सकते। इसलिए बेहतर होगा कि हम आपस में लड़ने से बेहतर अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल अपनी साझा समस्या से निपटने में करें । इसलिए दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध दोनों देशों के करोड़ों नागरिकों और पूरे दक्षिण एशिया के हित में होगा। इसके साथ ही ये उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हमारे नेक इरादों के बावजुद , अगर पाकिस्तानी धरती से भारत पर होने वाले आतंकवादी हमले जिसमें हमारे निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं, होते रहे तो हम इस पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। और मैं इस पर कायम हूं। ॥हालांकि उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि पाकिस्तान से संबंध सुधारने की दिशा में भारत की कोई सरकार तब तक एक भी कदम आगे नहीं बढ़ा पाएगी जब तक वो अपनी जमीन को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होने देगा। ज़ाहिर है ये विपक्ष के लगाए गए आरोप पर एक सफाई की तरह था। बाद में उन्होंने ये भी कहा कि मुंबई हमलों के दोषियों के खिलाफ पाकिस्तान की कार्रवायी के बगैर उससे किसी भी स्तर पर कोई बातचीत नहीं होगी। लेकिन इसके बाद भी ये स्पष्ट नहीं हुआ था कि आखिर अब बातचीत शुरू करने के पीछे क्या तर्क है। इस पर आगे बढ़ते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि हमने वीपरीत परिस्थितियों में भी अपने संयम को बनाए रखते हुए ये साफ किया कि पाकिस्तान अपना वादा निभाए। पांच जनवरी को हमने पाकिस्तान को हमारी जांच एजेंसियों द्वारा उपलब्ध कराए गए डिटेल रिपोर्ट सौंप दिए जिसमें पाकिस्तान से जुड़ी तथ्यों की जानकारी थी। इसपर पाकिस्तान में कु्छ प्रगति जरूर हुई। उन्होंने सदन को बताया कि पाकिस्तान ने दो मौके पर अपने यहां हो रही जांच की औपचारिका जानकारी भारत सरकार को दी - फरवरी २००९ में और मेरी पेरिस और शर्म अल शेख की यात्रा के दो दिन पहले। सबसे ताजा दस्तावेज जो उन्होंने हमे सौंप वो चौंतीस पेज का था जिसमें घटना की योजना और घटना की क्रम से विवरणी है, पाकिस्तान की संघीय एजेंसी की टीम द्वारा की गई जांच का विस्तृत विवरण, एफ आई आर की एक काफी, हिरासत में लिए गए और भगोड़ो आरोपियों की तस्वीर और विस्तृत जानकारी है। हमले के दौरान उपयोग किए गए संचार साधनों की जानकारी , हमले की वित्तीय मदद की जानकारी और पाकिस्तान में जब्त किए समान मसलन मानचित्र, जीवनरक्षक नौका, नौवहनीय प्रशिक्षिण पर किताबें, इंटेलीजेंस मैनुअल आदि है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की तरफ से उन्हें बताया गया है कि जांच तकरीबन पूरी होने के कगार पर है और अब ट्रायल शुरू किया जाएगा। हमसे कुछ और जानकारियों उन्होंने मांगी है जो हम जल्द ही उपलब्ध करा देंगे। ये पहली बार है कि भारत में हुए किसी आतंकवादी हमले पर पाकिस्तान में हुई जांच पर उन्होंने हमें जानकारी दी है। पहली बार ही उन्होंने ये भी स्वीकार किया है कि भारत में हुए आतंकवादी हमलों में उनके नागरिक और उनके यहां का एक आतंकवादी संगठन संलिप्त है।
सदन को इतनी जानकारी देने के बाद वो भाजपा पर आक्रामक हुए, जो उनकी राजनीतिक छवि के बिल्कुल प्रतिकूल था। लेकिन इस मुद्दे पर हो रही तमाम राजनीति ने उन्हें आक्रामक बना दिया। उन्होंने विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ये वास्तविकता है कि एनडीए सरकार ने पाकिस्तान से इतना कुछ कभी भी हासिल नहीं किया था अपने पूरे कार्यकाल और उनसे लंबी लंबी बातचीत के बावजूद। इसलिए यूपीए सरकार को विपक्ष से विदेशी नीति के संचालन और अपने देश को आतंकवादी हमलों से बचाने के लिए विपक्ष से कोई उपदेश लेने की कोई जरूरत नहीं है।
दुबारा बातचीत शुरू करने पर भी प्रधानमंत्री ने अपनी सफाई दी। उनका कहना था कि किसी देश से बातचीत करके हम अपने पुराने स्टैंड और आतंकवाद को परास्त करने की अपनी नीति को डायल्युट नहीं कर रहे। पाकिस्तानी आतंकवाद से ग्रस्त अन्य शक्तियां भी पाकिस्तान से बातचीत कर रही हैं। अगर हम पाकिस्तान से सीधे बात नहीं करते तो इसके लिए हमें किसी तीसरे देश पर निर्भर रहना होगा। इसका प्रभाव निश्चित तौर पर कम होगा। उन्होंने कहा कि वो पूरी ताकत और जिम्मेदारी से कहता हैं कि आगे बढ़ने के लिए बातचीत ही सबसे सही रास्ता है। पिछले एक दशक में यही पाकिस्तान के साथ संबंधों का हमारा इतिहास रहा है। अपनी बात को वजनदार और सही साबित करने के लिए उन्होंने एनडीए सरकार के मुखिया वाजपेयी जी के पाकिस्तान कूटनीति की बात भी उदाहरण के तौर पर पेश किया। उनका कहना था कि वाजपेयी जी ने १९९९ में लाहौर जाने का साहस भरा कदम उठाया था और उसके बाद कारगिल हुआ और कांधार अपहरण कांड। इसके बावजूद उन्होंने शांति स्थापना के प्रयास में उन्होंने जनरल मुशर्रफ को आगरा आमंत्रित किया। देश ने संसद पर हमला का दारूण दृश्य देखा। ये दोनों देशों के बीच कठीन समय था। दोनों देश की सेनाएं सीमा पर आमने सामने खड़ीं थी। लेकिन मैं वाजपेयी जी को इसका स्रेय देना चाहुंगा , कि वो डिगे नहीं, और कि स्टेट्समैन को डिगना भी नहीं चाहिए। २००४ में वो इस्लामाबाद गए जहां संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया। पाकिस्तान से निपटने में मैं वाजपेयी जी की दृष्टि और उनकी फ्रस्ट्रेशन दोनों महसूस कर सकता हूं। इसके साथ ही पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों को उन्होंने रोनाल्ड रीगन के शब्दों में परिभाषित किया -- विश्वास करो लेकिन सतर्कता के साथ। जाहिर है पाकिस्तान के साथ उनकी बातचीत सतर्कता के साथ होने का उन्होंने दावा किया। लेकिन यहां ये नहीं साफ कर पाए कि इस सतर्कता में ब्लुचिस्तान जैसी चूक कैसे हो गई। बहरहाल उन्होंने ये जरूर कहा कि ब्लुचिस्तान पर पाकिस्तान की आशंकाओँ को निर्मूल करने के लिए ही संयुक्त वक्तव्य में उन्होंने इसका ज़िक्र किया है। यहां उनकी बात पर भरोसा करना विपक्ष के लिए थोड़ा मुश्किल ज़रूर था। अगर बात इतनी साधारण थी तो फिर सरकार की तरफ से इतनी बयानबाजी, इसको कानूनी दस्तावेज न मानने , बैड ड्राफ्टिंग जैसे बातें क्यों आई। ज़ाहिर है विपक्ष इतने पर संतुष्ट नहीं हो सकता था। और प्रधानमंत्री का बयान शायद इसी एक मुद्दे पर सदन को विश्वास में ले पाने में नाकाम रहा।