सोमवार, 3 अगस्त 2009

१५वीं लोकसभा - पटकनी खाता सत्ता पक्ष - ५

अगर एक वाक्य में कहें तो प्रधानमंत्री का भाषण निस्संदेह शानदार था। ख़ासतौर पर पाकिस्तान के साथ दुबारा बातचीत शुरू करने के संबंध में उनके तर्कों का जबाव विपक्ष के पास भी नहीं था। प्रधानमंत्री अपनी चिर परिचित शैली से अलग हटकर बोले। शांत और सौम्यता के बीच विपक्ष पर आक्रामक अंदाज में चुटकी भी ली। इस संदर्भ में अपने पूर्ववर्ती वाजपेयी का ज़िक्र करते हुए उनके नक्शेकदम पर चलने की बात कहकर उन्होंने विपक्ष के हथियार की धार ही खत्म कर दी। बहरहाल अंतिम उपयोगकर्ता निगराणी समझौते ( एंड यूज़र मानिटरिंग एग्रिमेंट ) पर प्रधानमंत्री का तर्क बहुतों के गले नहीं उतरने लायक था।
इस मुद्दे पर उनका कहना था कि अमेरिका के साथ हथियारों और रक्षा से जुड़े उच्च स्तर की अत्याधुनिक प्रणाली की आपूर्ति के संबंध में नब्बे के के दशक से ही भारत की सरकारें इस तरह के समझौते करती आई हैं। इस बार भी अमेरिका के साथ किए गए समझौते में भारत की संप्रभुता और प्रतिष्ठा का ख्याल रखा गया है। इस समझौते में अमेरिका एकतरफा कोई कार्रवायी नहीं कर सकता है खासतौर पर रक्षा प्रतिष्ठानों की जांच के संबंध में। इसके लिए अमेरिका को पहले भारत से औपचारिक अनुरोध करना होगा और भारत की अनुमति और द्वपक्षीय सहमति से ही वो कोई जांच कर सकेगा। इसके बाद प्रधानमंत्री जी आठ के सदस्यों द्वारा संवर्द्धण और परिशोधन तकनीक के हस्तांतरण से संबंद्ध भारत की निशस्त्रीकरण के मुद्दे पर दिए गए बयान पर सदन की चिंता का जबाव दिया। इस पर उनका कहना था कि एनएसजी के ४५ देशों ने यूरोनियम तकनीक भारत को पूरी तरह से देने पर पहले ही सहमति जताई है। इसके पहले भी जी आठ के देशों ने अडंगा लगाने की कोशिश की है लेकिन वो कामयाब नहीं हुए हैं जाहिर है इसमें कामयाबी के लिए एनएसजी के सभी ४५ देशों में आमसहमति बनानी होगी जो फिलहाल संभव नहीं दिखता । लिहाज़ा निकट भविष्य भारत के लिए इस पर चिंता की कोई बात नहीं है। साथ ही उन्होंने ये भी दोहराया कि जब तक दुनिया को परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में मान्यता नहीं देता है तब तक एनपीटी पर हस्ताक्षर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

ज़ाहिर है विपक्ष संतुष्ट था। लेकिन अब भी ब्लुचिस्तान के ज़िक्र पर कोई ठोस जबाव दे पाने में सरकार नाकाम रही थी। लेकिन प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद भाजपा की सुषमा स्वराज द्वारा जो प्रश्न पूछे गए जलवायु परिवर्तन के बारे में वो विपक्ष की दिशाहीनता और प्रधानमंत्री के जबाव पर भाजपा की किसी रणनीति के अभाव को सामने रख गया। इससे ये भी स्पष्ट हो गया सरकार कठघरे में अगर खड़ी दिख भी रही थी तो अपनी मंत्रियों और अधिकारियों की नासमझी की वज़ह से न कि विपक्ष की किसी रणनीति और उसके द्वार किए गए किसी ठोस प्रयास का ये नतीजा था। बहरहाल अब सबकी नज़र विदेश मंत्री के जबाव पर टीकी थी जहां से उन्हें निराश करने वाला जबाव मिलने वाला था और सदन में एक बार फिर ये साबित होने वाले था कि एस एम कृष्णा शायद विदेश मंत्री के रूप में सही चयन नहीं हैं। (जारी)

2 टिप्‍पणियां:

sandeep sharma ने कहा…

rajniti me sab jayaj hai...

Manjit Thakur ने कहा…

प्रधानमंत्री के बहुत सारे चयन ऐसे हैं जिन पर सवाल उठाए जा सकते हैं। आनंद शर्मा..भूल गए? बहरहाल, पीएम ने बलूचिस्तान पर जो भूल करदी है उसका जवाब उनके संसदीय जवाब में उल्लिखित नहीं था। उसे टाल गए वहग। लेकिन इसका कोई निदान है क्या?