शनिवार, 1 अगस्त 2009

१५ वीं लोकसभा - प‍टकनी खाता सत्ता पक्ष - 3

इसको बाद कांग्रेस की तरफ से बोलने के लिए पी सी चाको उठे। पहले उन्होंने संयुक्त वक्तव्य में पाकिस्तान को इस्लामिक गणराज्य कहकर संबोधित करने पर यशवंत सिन्हा द्वारा की गई आलोचना पर हमला बोला। बाद में उनका जोर वर्तमान मुद्दों से ज़्यादा पूर्ववर्ती एनडीए सरकार की गलतियां गिनाने पर केंद्रित रहा। उन्होंने कारगिल युद्ध और संसद पर हमले के बाद भी वाजपेयी सरकार द्वारा पाकिस्तान से बातचीत जारी रखने को अपने तर्क का आधार बनाया। श्री चाको का कहना था कि अगर कारगिल और संसद पर हमले के बाद सरकार आगरा शिखर वार्ता और लाहौर यात्रा कर सकती है तो वर्तमान सरकार अगर मुंबई हमले के बाद शर्म अल शेख में बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात करती है तो इसमें क्या शर्मनाक है ? चाको अपनी जगह पर ठीक हैं। लेकिन ये ध्यान रखनी वाली बात थी कि वाजपेयी ने आर पार की लड़ाई की बात तो की थी लेकिन कभी ये नहीं कही था कि अब पाकिस्तान से बातचीत नहीं होगी। मुंबई हमले के बाद यूपीए सरकार ने साफ तौर पर ये कहा था कि मुंबई हमलों में शरीक लोगों के खिलाफ जब तक कार्रवायी नहीं होगी , भारत सरकार पाकिस्तान से किसी भी तरह की बातचीत नहीं करेगी। फिर जरदारी से मुलाकात के दौरान भी यही रूख दोहराया गया। फिर एक ही महीने में क्या बदल गया कि गिलानी से मुलाकात के बाद आतंकवाद पिछले दरवाजे से बैक फूट पर चला गया।

इसका जबाव दिया समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने उन्होंने अपने भाषण में यूपीए सरकार पर अमेरिका के दबाव में झुकने का आरोप लगाया। भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को अमेरिका के सामने घुटने टेकने की बात कहते हुए श्री यादव ने कहा कि ये पहली बार नहीं है कि ऐसा हुआ है। इराक और अफगानिस्तान पर हमलों के दौरान और ईरान के संदर्भ में हमारी विदेश नीति अमेरिका के सामने घुटने टेक चुकी है। मुलायम का आरोप था कि सरकार अपने पुराने बयान से पलटी है तो आखिर किस वजह से ? उनका कहना था कि सरकार को इन बातों पर साफ तौर पर सदन को विश्वास में लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि अजीब बात है जब युद्ध होता है तो भारत जीतता है लेकिन बातचीत के दौरान भारत की कूटनीति हमेशा हार क्यों जाती है ? इसके चलते ताशकंद में हम अपना प्रधानमंत्री खो चुके हैं। उनका कहना था कि भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का आधार गुटनिरपेक्षता रही है। सारी दुनिया में हमारी प्रतिष्ठा का यही आधार था। लेकिन अब हम गुटनिरपेक्षता से भटक रहे हैं। उन्होंने शर्म अल शेख में भारत की दो भूलों - ब्लुचिस्तान और आतंकवाद को डिलिंक करने का जिक्र करते हुए कहा कि जो सत्ता में बैठे हैं उनकी भूल भारी है। उन्होंने कहा कि इस संयुक्त वक्तव्य से भी पाकिस्तान को लाभ हुआ है भारत को नुकसान हुआ है। इसके साथ ही यूपीए की विदेश नीति का एक तरह से मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा कि सरकार विदेशी मोर्चे पर हमेशा दोस्त बनाने को अपनी नीति का आधार बनाती रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधे सवाल किया वो बताएं सदन को कि आज की तारीख में कौन सा देश भारत का दोस्त है ? उन्होंने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने के भारत सरकार की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि हमें इस बात की ध्यान रखना चाहिए कि पाकिस्तान के निर्माण की नींव ही शत्रुता पर टिकी है। साथ ही हमने उसके टुकड़े भी किये हैं। वो हमारा दोस्त कभी हो ही नहीं सकता। इसलिए पाकिस्तान के साथ हमारी नीति में विश्वास कम और सतर्कता का पुट ज्यादा होना चाहिए। अंत में उन्होंने प्रधानमंत्री को नसीहत दी कि जो गलती कर आए कोई बात नहीं .... अब उसे रद्दी की टोकरी में फेंक दीजिए।

अब बारी जनता दल युनाइटेड के शरद यादव की थी। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाए कि पहले तो मुंबई हमलों के बाद सरकार ने आम जनता में पाकिस्तान के खिलाफ उन्माद पैदा किया। बातचीत किसी कीमत पर नहीं का नारा बुलंद किया और अब चोर दरबाजे से बातचीत करने पर सहमति जता आए। उन्होंने कहा कि ब्लुचिस्तान के लोगों के साथ भारत के लोगों की मानवीय संवेदनाएं जुड़ी हुई हैं। शरद यादव ने कहा कि सरकार दुविधा की शिकार है। संयुक्त वक्तव्य के बाद सत्ताधारी दल के प्रवक्ता बगलें झांक रहे हैं और विदेश मंत्रालय के अधिकारी अलग बयान दे रहे हैं। यही दुविधा बताती है कि आप कुछ गलत कर आए। उनका कहना था कि इससे गजब बात क्या हो सकती है कि भारत सरकार से तनख्वाह पा रहा अधिकारी सरकार की गलती बता रहा है। उनका कहना था कि या तो आप सही हैं या आपका अधिकारी सही बोल रहा है। सरकार की दो ज़ुबान नहीं हो सकती है। आपकी पार्टी और सरकार अलग अलग भाषा बोल रही है। उन्होंने कहा कि जब तक देश दो ज़ुबान में बात कर रहा है तब तक आप किसी का भी सामना नहीं कर सकते। पाकिस्तान जीत गए जीत गए चिल्लाता रहा और यहां दो ज़ुबान में बातें हो रही हैं। शरद यादव ने कहा कि २६.११ के बाद आप रिवर्स गियर में चले गए ... देश आहत है। उन्होंने कांग्रेस को याद दिलाया कि इस देश की विदेश नीति बनाने में उनका ज्यादा योगदान रहा और बासठ सालों से देश की विदेश नीति आम सहमति से संचालित होती रही लेकिन आज आम सहमति की ये परंपरा खंडित हो गई है। उनका कहना था कि २६.११ के बाद जो दुनिया हमारी बात गौर से सुन रही, पाकिस्तान दबाव में आ गया था, इस वक्तव्य के बाद वो स्थिति खत्म हो गई है।

ज़ाहिर है विपक्ष इस मुद्दे पर पूरी तरह से आक्रामक था। सरकार को कटघरे में खड़ा करने का कोई मौका विपक्ष हाथ से नहीं जाने दे रहा था। कांग्रेस की तरफ से बोलने के लिए खड़े हुए चाको भी मामले को रफा दफा करने में कामयाब नहीं हो पाए। लिहाजा सत्ता पक्ष की तरफ से लोगों को ठोस जबाव का इंतजार था। ( जारी )

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