शनिवार, 7 जून 2014

मोदी मंत्र - खुद बदलो फिर जग बदलेगा

शुक्रवार को भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल की बैठक संसद भवन के सेंट्रल हाल में हुई। बैठक के बाद जो जानकारियां छन कर सामने आ रही हैं वो चौंकाने वाली हैं। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी स्कूल टीचर की तरह सांसदों को प्रशिक्षित कर रहे हैं और उन्हें एक सांसद के तौर पर किस तरह का व्यवहार करना चाहिए इसकी शिक्षा दी गई। सूत्रों के मुताबिक कुछ ऐसी बातों की सलाह अपने नव निर्वाचित सांसदों को दिया गया जो उन्हें हर हाल में करना है और कुछ करने की किसी भी कीमत पर मनाही की गई। जिस प्रकार पिछले कुछ दशकों में आम जनता का भरोसा जनप्रतिनिधियों से उठता गया है और लोकतांत्रिक व्यवस्था का नेतृत्व करने वाली विधायिका जिस तरह से विश्वास के संकट से जूझ रही हैं उसको देखते हुए सत्ताधारी पार्टी की तरफ से अपने सांसदों को दिए गए इन सुझावों का स्वागत ही होना चाहिए। पहली सलाह है कि आपके सामने लाए गए किसी भी दस्तावेज या कागज़ पर बिना पढ़े और पूरी तरह संतुष्ट बगैर हस्ताक्षर न करें। अगर सामने वाला व्यक्ति आपके परिचय के दायरे में हो तो भी पढ़े बगैर हस्ताक्षर नहीं करना है। संसदीय दल की बैठक में जो दूसरी सलाह सामने आई कि सांसदो को सरकार की ओर से जो रिहायश दी जाती है उसके किसी भी हिस्से को भाड़े पर किसी अन्य को न दें यहां तक की गैराज़ या सर्वेंट क्वार्टर को भी भाड़े पर उठाने से बचना है।

तीसरी सलाह गौर करने वाली है, आमतौर पर लोकसभा चुनाव में जीत कर आने के बाद जनप्रतिनिधि पांच साल के लिए निश्चिंत हो जाते हैं और एक अलग ठसक उनके व्यवहार और जीवनशैली का हिस्सा हो जाता है। तीसरी सलाह के मुताबिक संसद में बेकार की गप्पबाजी और बैठकी से बचें और अगर खाली समय मिलता है तो संसद की पुस्तकालय में कुछ पढ़ने में उस वक्त का उपयोग करें। चौथी सलाह है कि अगर किसी सहयोगी सांसद से बातें करना भी हो तो लॉबी में करें न कि संसद में कार्यवाही के दौरान और सत्रावसान के बाद दिल्ली प्रवास से बेहतर है अपने संसदीय क्षेत्र की ओर प्रस्थान किया जाए ताकि उन इलाकों में ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताया जा सके और लोगों की समस्याओं से रू ब रू होकर उसका समाधान खोजा जाए।
अगली सलाह ये दी गई कि अगर आपने ट्रेन टिकट ले लिया है सफर के लिए और किसी वजह से नहीं जा पा रहे हैं तो तुरंत रेलवे अधिकारियों को सूचना दे दी जाए ताकि उस सीट को सामान्य यात्रियों की सुविधा के लिए छोड़ा जा सके। सांसदों को हर वक्त अपने क्षेत्र की चिंता करनी है औऱ इसी क्रम में ये नसीहत भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से सामने आई कि दिल्ली प्रवास के दौरान इलाके से आए पार्टी कार्यकर्ताओं और निवासियों के फोन कॉल्स को नज़रअंदाज सांसदों को नहीं करना है। यानि की प्राथमिकता सूची में कार्यकर्ताओं और क्षेत्र की जनता को सर्वोच्च रखा जाना चाहिए।

बेवजह हर मुद्दों पर मीडिया में चेहरा चमकाने का शौक रखने वाले सांसदों को इससे बचने की सलाह दी गई है। जानकार इसे मीडिया से बचने की सलाह के तौर पर देख रहे हैं लेकिन पार्टी के सूत्र बताते हैं कि दरअसल ये मीडिया से बचने के लिए सलाह नहीं है बल्कि उन सांसदों को सलाह है जो किसी दूसरे इलाके का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन किसी दूसरे इलाके की समस्या पर भी मीडिया में जम कर बयानबाजी करते हैं। मसलन बिहार के किसी सांसद को असम के किसी मुद्दे पर बोलने से बचना चाहिए बेहतर होगा कि असम का ही कोई सांसद उस पर मीडिया में अपनी बात रखे।

सबसे महत्वपूर्ण नसीहत जो निर्वाचित सांसदों को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की तरफ से आया वो ये कि लुटियन जोन में सत्ता के दलालों से सावधान रहें। जो दिल्ली में सत्ता के गलियारे से वाकिफ नहीं हैं उनके लिए इस नसीहत का मतलब बहुत स्पष्ट नहीं हो पाएगा। लेकिन जो लोग सत्ता के गलियारे का चरित्र जानते हैं वो बखुबी वाकिफ हैं इन दलालों से। दरअसल लोगों का एक समूह लुटियन जोन में सक्रिय होता है जो सरकार किसी की भी हो सत्ता का मजा उठाना जानते हैं। इस सलाह पर की ऐसे लोगों सांसदों को बचना है, देखना होगा कि इस नसीहत पर कितना अमल हो पाता है। क्योंकि आखिर में सरकार की बदनामी और छवि के धूमिल होने में इन दलालों का खासा योगदान होता है। जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव सन्निकट हैं उसके लिए अभी से काम करने के लिए सांसदों को कहा गया है। साथ ही ये चेतावनी भी जोड़ी गई है कि जिन नेताओं को इन राज्यों में जिम्मेदारी दी जाएगी उनका उत्तरदायित्व भी निर्धारित किया जाएगा। यानि की सिर्फ जीत का ष्रेय ही नहीं हार का ठीकरा भी सर पर फूटेगा।

जो सबसे महत्वपूर्ण बात इस बैठक में सामने आई वो ये कि बदलते वक्त के साथ अपना सामंजस्य बिठाइए यानि संचार के नए नए साधनों के जरिए आम जनमानस से जुड़िए। मसलन अपने कार्यों , उपलब्धियों, सरकार की योजनाओं , उपलब्धियों और अपने अपने संसदीय क्षेत्र को लेकर पांच साल के लिए आपकी क्या सोच है , क्या योजना है , कैसे उसको क्रियान्वित करने की योजना है, कब तक वो ज़मीन पर दिखना शुरू होगा ये सारी बातें ट्वीटर और फेसबुक के जरिए आम जनमानस तक पहुंचाने की लाह भी वरिष्ठ नेताओं की ओर से नवनिर्वाचित सांसदों को दिया गया है।

ज़ाहिर है यूपीए सरकार की नाकामी और असफलता से सबक लेते हुए भाजपा अब एक नई राह की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही है। साथ ही अटल जी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में भी जो सबक सिखा गया था उसको ज़मीन पर उतारने की कोशिश हो रही है। पार्टी विथ डिफरेंस का नारा पार्टी के उपर हाल के दिनों में व्यंग्य के तीर के रूप में इस्तेमाल होना शुरू हो गया था... इन नसीहतों के जरिए पार्टी की कोशिश है कि एक डिफरेंट चेहरा तो कम से कम जरूर आम आदमी के दिलों में उतारा जाए। ज़ाहिर है ज़मीन पर कारगर ढंग से इन नसीहतों को उतार पाने के लिए साधन की पवित्रता के साथ साथ साध्य की पवित्रता को भी साधना होगा। ऐसे में अपनी राय कायम करने के लिए हमें कुछ दिन तो इंतजार करना होगा।

शुक्रवार, 6 जून 2014

नेता प्रतिपक्ष की लड़ाई पर भारी कांग्रेस का अतीत

इंदौर से भाजपा की सांसद सुमित्रा महाजन के लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने के बाद अब सबकी नज़रें सदन में नेता प्रतिपक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव की ओर उठना स्वाभाविक है। हालांकि इस पर अब भी सत्ता पक्ष की ओर से औपचारिक तौर पर कुछ भी सामने नहीं आया है और विपक्ष सिर्फ अनुमान ही लगा पा रही है। आमतौर पर लोकसभा उपाध्यक्ष का पद सदन में विपक्ष के खाते में जाता रहा है लेकिन अब तक यही स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि 16 वीं लोकसभा में विपक्षी दल का दर्जा किसे मिलेगा। निश्चित तौर पर अध्यक्ष के चुनाव के बाद इस पर फैसले की उम्मीद की जा सकती है। सत्ता पक्ष अनौपचारिक तौर पर इस मुद्दे पर पूर्व में जवाहर लाल नेहरू , ईंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर में इस तरह की नियुक्ति नहीं की गई थी, का हवाला देते हुए कांग्रेस को किसी भी तरह का आश्वासन देने से बच रहा है। इन सभी प्रधानमंत्रियों के दौर में किसी भी दल के पास सदन का कोरम यानि की कुल संख्या का दसवां हिस्सा सदस्य के तौर पर मौजुद नहीं था। दरअसल इस पूरे दौर में लोकसभा के पहले अध्यक्ष जी वी मावलंकर द्वारा दिए गए निर्देश का पालन किया जा रहा था। 
सत्ता पक्ष इस मदुदे पर मावलंकर जी द्वारा अध्यक्ष को दिए गए निर्देश में से निर्देश संख्या 121 की चर्चा अनौपचारिक तौर पर प्रमुखता से कर रही है जिसमें किसी भी दल को सदन के भीतर विपक्षी दल की मान्यता के लिए सदन की संख्या का दसवां हिस्सा उस दल के पास होना जरूरी है। इस मुद्दे पर एनडीए की ओर से कोई औपचारिक संकेत नहीं देना अपने आप में कई बातें स्पष्ट कर देता है। बहरहाल कांग्रेस के पास लोकसभा में 44 सांसद हैं जो अपेक्षित कोरम यानि सदन के दसवें हिस्से 55 से कम है। ज़ाहिर है सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर कांग्रेस नेता विपक्ष का पद मांग सकती है लेकिन सत्ता पक्ष इस मांग को स्वीकार करेगा ऐसा कोई संकेत उधर से अभी तक तो नहीं मिला है।  
इसी क्रम में उपाध्यक्ष का पद भी फंसता दिख रहा है जो आम तौर पर सदन में विपक्षी दल के खाते में ही दर्ज होता है लेकिन ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा इस पद के लिए किसी क्षेत्रीय दल के व्यक्ति का नाम प्रस्तावित कर सकती हैं। 
हालांकि इस पूरे मामले पर कांग्रेस, निर्देश 121 को नेता विपक्ष के लिए वेतन और भत्ते संबंधी कानून के साथ पढ़ने का सुझाव दे रही है जिसमें साफ तौर पर ये लिखा गया है कि सदन में नेता प्रतिपक्ष उस दल से होता है जिसके पास विपक्ष दलों में से सबसे ज्यादा संख्या में सांसद होते हैं।  हालांकि सरकार का तर्क है कि अतीत में निर्देश 121 के तहत ही ये फैसला किया गया है, लिहाज़ा इस मुद्दे पर मामला बहुत जल्दी सुलझता नहीं दिख रहा है। हालांकि इस पर अब तक कुछ भी तय नहीं हो पाया है ऐसे में इस मुद्दे से जुड़े नियमों पर बहस गर्म है। भ्रम के हालात इस लिए भी पैदा हो रहे हैं क्योंकि इस पर दो प्रमुख कानून हैं जिसमें अलग अलग तथ्य स्थापित किए गए हैं। 1998 में बनाए गए संसद में मान्यता प्राप्त दल या समूह के नेता और मुख्य सचेतक की सुविधा का कानून, लोकसभा में उन सभी दलों को जिसके पास कम से कम 55 सदस्य हों, को मान्यता प्राप्त दल के रूप में व्याख्या करता है। जबकि दूसरा नेता प्रतिपक्ष के वेतन और भत्ते से संबंधित 1977 का कानून है जो नेता प्रतिपक्ष की व्याख्या उस व्यक्ति के तौर पर करता है जो लोकसभा में विपक्षी दलों में से सबसे बड़ी संख्या वाले दल का नेता हो जिसे अध्यक्ष मान्यता देता हो। ज़ाहिर है कांग्रेस को 1977 के कानून का हवाला दे रही है जबकि एनडीए 1998 का कानून याद दिला रही है।    
दरअसल नेता प्रतिपक्ष का पद भारतीय लोकतंत्र के लिए कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण होता। लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को निरंकुशता की हद तक चले जाने से बचने के लिए भी ये जरूरी है। इसके साथ ही कार्यपालिका और न्यायपालिका में बेहतर समन्वय बना रहे और वो लोक के हित में काम करें इसमें भी नेता प्रतिपक्ष की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। कार्यपालिका और न्यायपालिका में कई नियुक्तियों मसलन, सीबीआई , सीवीसी, मानवाधिकार आयोग आदि के प्रमुख और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में भी नेता प्रतिपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका है।  
ऐसे में अब जबकि सदन के नए अध्यक्ष का चुनाव हो गया लिहाज़ा सबकी नज़रें सुमित्रा महाज़न की ओर हैं कि आखिर वो इस मुद्दे पर क्या फैसला लेती हैं।