गुरुवार, 15 सितंबर 2016

गुजरात : प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर चार रिकार्ड बनाने की तैयारी

PIC SOURCE : PMO INDIA 
नई दिल्ली :  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 66वें जन्मदिन के मौके पर 17 सितंबर को गुजरात के नवसारी जिले में होने वाले कार्यक्रम में तीन वर्ल्ड रिकार्ड और एक राष्ट्रीय रिकार्ड बनाने की तैयारी हो रही है। गुजरात सरकार की ओर से आयोजित किए जा रहे समारोह में 11,223 दिव्यांगों को तकरीबन 17,000 उपयोगी उपकरण दिए जाने हैं।

गुरूवार को अपनी योजना के बारे में बताते हुए आयोजकों ने कहा कि व्हीलचेयर पर बैठे लोगों की उस अधिकतम संख्या का विश्व रिकार्ड बनाया जाएगा जो सामुहिक रूप से किसी चित्र या लोगो का निर्माण कर सकें। पूर्व में ये रिकार्ड अमेरिका के नाम है जहां 2010 में व्हील चेयर पर बैठे 346 दिव्यांगों ने ये कारनाम दोहराया था। आयोजन समिति के एक अधिकारी ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिवस के मौके पर व्हीलचेयर पर बैठे एक हजार दिव्यांग गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल होने की मुहिम का हिस्सा होंगे। 

तकरीबन 1000 बधिर लोगों को सुनने की मशीन उपलब्ध कराके एक दूसरा रिकार्ड भी बनाया जाएगा। इससे पहले इस तरह का रिकार्ड ऑस्ट्रेलिया में बनाया गया था। एक ही आयोजन स्थल पर 1500 दीपों को एक साथ प्रज्जवलित कर तीसरा विश्व रिकार्ड बनाने की भी तैयारी है।


आयोजन को देखने के लिए गिनिज वर्ल्ड रिकार्ड के अधिकारी भी समारोह स्थल पर मौजुद होंगे। कार्यक्रम को भारत सरकार के सुगम्य भारत अभियान से प्रेरित माना जा रहा है। लाभार्थियों को उपयोगी उपकरण दिए जाने के अलावा दिव्यांगो के सशक्तिकरण के लिए दिए जाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार के तहत मिलने वाली विभिन्न राशियों के चेक भी प्रदान किए जाएंगे। केंद्रीय समाज कल्याण एवं अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत भी आयोजन में शिरकत करेंगे।

राजधानी दिल्ली में डेंगू से अब तक 14 मौतें, चिकनगुनिया ने ली दस की जान

PIC Source : AIIMS
नई दिल्ली : अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान में एम्स में पांच और लोगों की डेंगू से मौत की पुष्टि के बाद राजधानी में इस वैक्टिरिया जनित बुखार से मरने वालों की संख्या 14 हो गई है। इस मौसम में इस बीमारी से कम से कम 1150 लोग अब तक प्रभावित हो चुके हैं। एम्स के एक उच्चाधिकारी ने डेंगू से हुई मौत की आज पुष्टि करते हुए बताया,' 1 सितंबर से 13 सितंबर के बीच डेंगू से पांच लोगों की मौत हुई है"। उल्लेखनीय है कि सोमवार को एम्स ने कहा था कि वो इन पांच संदिग्ध मामलों को विस्तार से देख रहे हैं।
उधर दिल्ली के ही प्रतिष्ठित माने जाने वाले अपोलो अस्पताल में चिकनगुनिया से आज सुबह पांच लोगों की मौत हो गई। चिकनगुनिया की वजह से मारे गए इन अधिकांश लोगो की उम्र अस्सी से उपर थी। इन पांच मौत के साथ राजधानी दिल्ली में चिकनगुनिया से मरने वालों की संख्या 10 हो गई है।
अपोलो प्रशासन ने बताया कि पिछले तीन सप्ताह में चिकनगुनिया की वजह से पांच लोगों की मौत हुई है जिसमें से अधिकांश बुजुर्ग हैं। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक गाजियाबाद के अस्सी वर्षीय महेंद्र सिंह की मौत कल दोपहर ढेड़ बजे हुई। उल्लेखनीय है कि मंगलवार तक राजधानी दिल्ली में चिकनगुनिया से पांच लोगों की मौत हुई थी जिसमें से चार गंगा राम अस्पताल में भर्ती थे।

हालांकि डाक्टर मानते हैं कि आमतौर पर चिकनगुनिया में मौत का खतरा नहीं होता है लेकिन कुछ मामलों में खासतौर पर बच्चों औऱ बुजुर्गों के लिए ये कई बार मारक साबित होता है।  

राजधानी दिल्ली में डेंगू से अब तक 14 मौतें, चिकनगुनिया ने ली दस की जान

PIC Source : AIIMS
नई दिल्ली : अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान एम्स में पांच और लोगों की डेंगू से मौत की पुष्टि के बाद राजधानी में इस वैक्टिरिया जनित बुखार से मरने वालों की संख्या 14 हो गई है। इस मौसम में इस बीमारी से कम से कम 1150 लोग अब तक प्रभावित हो चुके हैं। एम्स के एक उच्चाधिकारी ने डेंगू से हुई मौत की आज पुष्टि करते हुए बताया,' 1 सितंबर से 13 सितंबर के बीच डेंगू से पांच लोगों की मौत हुई है"। उल्लेखनीय है कि सोमवार को एम्स ने कहा था कि वो इन पांच संदिग्ध मामलों को विस्तार से देख रहे हैं।
उधर दिल्ली के ही प्रतिष्ठित माने जाने वाले अपोलो अस्पताल में चिकनगुनिया से आज सुबह पांच लोगों की मौत हो गई। चिकनगुनिया की वजह से मारे गए इन अधिकांश लोगो की उम्र अस्सी से उपर थी। इन पांच मौत के साथ राजधानी दिल्ली में चिकनगुनिया से मरने वालों की संख्या 10 हो गई है।
अपोलो प्रशासन ने बताया कि पिछले तीन सप्ताह में चिकनगुनिया की वजह से पांच लोगों की मौत हुई है जिसमें से अधिकांश बुजुर्ग हैं। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक गाजियाबाद के अस्सी वर्षीय महेंद्र सिंह की मौत कल दोपहर ढेड़ बजे हुई। उल्लेखनीय है कि मंगलवार तक राजधानी दिल्ली में चिकनगुनिया से पांच लोगों की मौत हुई थी जिसमें से चार गंगा राम अस्पताल में भर्ती थे।

हालांकि डाक्टर मानते हैं कि आमतौर पर चिकनगुनिया में मौत का खतरा नहीं होता है लेकिन कुछ मामलों में खासतौर पर बच्चों औऱ बुजुर्गों के लिए ये कई बार मारक साबित होता है।  

रविवार, 23 नवंबर 2014

शीतकालीन सत्र – घर में मोदी सरकार की पहली अग्नि परीक्षा

Source : Parliament
पिछले चार दशकों में पहली बार किसी सरकार को अपने तईं बहुमत मिला। भाजपा पहली बार बहुमत के आंकड़ों के साथ सरकार बनाने में सफल हुई। निस्संदेह सदियों से मुख्य विपक्षी दल का तमगा झेल रही भाजपा के लिए सोलहवीं लोकसभा की शुरूआत इससे बेहतर नहीं हो सकती थी। ऐसे वक्त में जब पूर्ववर्ती सरकार नीतिगत पंगुता ( Policey Paralysis )की शिकार हो चुकी हो, मंहगाई उफान पर हो, सरकार की छवि घोटाले दर घोटाले से बुरी तरह झुलसी हुई हो। अपने जीवन में बेहतरी की संभावनाओं की उम्मीद लगाए जनता ने बैलेट के जरिए न केवल नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया बल्कि तीन दशकों में सियासत की पहचान बन चुकी गठबंधन की मजबूरी को भी ठेंगा दिखा दिया। जनज्वार से उपज़ा अभूतपूर्व जनादेश ही नई सरकार के लिए पहली चुनौती भी है। अभूतपूर्व जनादेश के स्वप्निल बौछार में भींगते भींगते ही नरेंद्र मोदी सरकार के छह महीने बीत गए। अब शीतकालीन सत्र में सरकार की नीति और नियत की पहली अग्नि परीक्षा होनी है।


24 नवंबर से शुरू हो रही संसद की शीतकालीन सत्र में कुल मिलाकर 22 बैठकें आयोजित होनी है। संसद के समक्ष पहले से ही 67 विधेयक लंबित हैं। लोकसभा में आठ और शेष 59 राज्यसभा में। ऐसे में जबकि वित्त मंत्री लगातार ये कहते नजर आ रहे हैं कि छह फ़ीसदी विकास दर का लक्ष्य बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण लग रहा है। ऐसे में सरकार का ऐजेंडा क्या होगा , समझना बहुत कठीन नहीं। वो भी तब झारखंड और जम्मू कश्मीर के चुनाव निपट जाने के बाद लगभग एक साल तक चुनावी रणनीति बनाए रखने से भी सरकार को निजात मिली हुई है। जनता के नज़र में खरे उतरने की चुनौती से निपटने के लिए सरकार इस सत्र में आर्थिक सुधार के एजेंडे को प्राथमिकता में रखेगी, इसमें कोई शक नहीं है लेकिन सरकार के लिए इस एजेंडा को लागू करना ही बड़े इम्तिहान से गुजरने सरीखा होगा। संसद के भीतर कांग्रेस और गैर एनडीए दलों के साथ के साथ कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर फ्लोर कार्डिनेशन करने में सरकार के प्रबंधकों को पसीने आ जाएंगें। खासतौर पर तब जबकि सत्ता पक्ष राज्यसभा में अब भी बहुमत के आंकड़ों से दूर है। 

कांग्रेस के साथ भाजपा के रिश्ते बीते एक पखवाड़े में कुछ और तल्ख हुए हैं। नेता विपक्ष की कुर्सी से दूरी और नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल विस्तार में सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की अनुपस्थिति खुद ही दोनों दलों के बीच संबंधों की कटुता की कहानी बयां कर रही है। इस पर जवाहर लाल नेहरू , ईंदिरा गांधी और सरदार पटेल की विरासत पर दोनों दलों के बीच हुई खिंचतान ने आग में घी का काम किया है।

 यही नहीं अभूतपूर्व जनादेश के बाद देश भर में क्षेत्रीय दलों में एक तरह की सनसनी है, ज़ाहिर है भविष्य में सियासत में खुद को अप्रसांगिक होने से बचाने के लिए कभी जनता दल का कुनबा रहे सभी क्षेत्रीय दलों ने एक बार फिर साथ बैठने की कवायद शुरू कर दी है। इनमें जनता दल युनाइट, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल सेक्युलर, इंडियन नेशनल लोक दल और समाजवादी पार्टी खास हैं। हालांकि लोकसभा में इनके साथ बैठने से सरकार के सेहत में शायद ही फर्क पड़े क्योंकि लोकसभा में इनकी कुल संख्या 15 है लेकिन राज्यसभा में पहले से ही परेशानी महसूस कर रही सरकार के लिए इनका साथ बैठना और असहज़ करेगा क्योंकि राज्यसभा में इनका आंकड़ा 25 बैठता है। ऐसे में संसदीय कार्यमंत्री के इस बयान से कि सरकार विपक्षी दलों को साथ लेने के लिए कुछ अतिरिक्त कदम चलने में गुरेज नहीं करेगी , के जरिए सत्ता पक्ष की जरूरत और मजबूरी दोनों को परखा जा सकता है। 

ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि तनी हुई रस्सी पर चल रही सरकार महत्वपूर्ण संशोधनों और विधेयकों को इस सत्र में सदन में चर्चा के लिए लेकर आती है या नहीं। खास तौर पर ऐसे विधेयक जो आर्थिक सुधार के एजेंडे के लिहाज से मह्त्वपूर्ण हैं। मसलन नई भूमि अधिग्रहण कानून के संशोधन को लेकर विधेयक, रियल इस्टेट को नियमित करने वाली विधेयक या श्रम सुधार से जुड़े विधेयक। सरकार हर हाल में टकराव से बचना चाहेगी और अधिकांश मुद्दे पर आम सहमति के रास्ते ही आगे बढ़ने का रूख करेगी। वस्तु और सेवाकर ( जीएसटी ) विधेयक जैसे बिल जिसे पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी सरकार के पास आम सहमति के रास्ते से आगे बढ़ने के अलावा शायद ही कोई विकल्प है। सरकार ऐसे तकरीबन 86 विधेयकों पर पहले ही चर्चा कर चुकी है जो बिल बनने के विभिन्न चरणों में हैं। कोल माइन्स स्पेशल प्रोभिजन्स बिल जिस पर पहले ही सरकार अध्यादेश ला चुकी है, इंश्योरेंस बिल जो लोकसभा से पारित होकर राज्यसभा की सेलेक्ट कमिटी के पास है, ऐसे कई विधेयकों पर सरकार को इसी सत्र में फैसला लेना है। हालांकि सरकार के पास इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर आगे बढ़ने के लिए संसद के संयुक्त सत्र का भी रास्ता है। एनडीए के पास दोनों सदनों में कुल 393 सांसद हैं जो कुल सांसदों के आधे 392 से एक ज्यादा है। लेकिन महाराष्ट्र में शिवसेना के रूठने मनाने के खेल में लगे होने से सरकार के पास शिवसेना के समर्थन को लेकर उतना स्थायित्व नहीं है जितना जरूरी है । लिहाज़ा सरकार के लिए संयुक्त सत्र का रास्ता भी बहुत आसान नहीं लगता है, और मौजुदा परिस्थितियों को देखते हुए सरकार शायद इस रास्ते पर चलना पसंद करे। बिलों और संशोधनों के अलावा काला धन, महंगाई , इंश्योरेंस सेक्टर में एफडीआई , उद्योंगों के सहुलियत के लिए जमीन खरीद के नियमों को अनुकूल बनाना, सब्सिडी हटाने, देश के कई हिस्सों में हुए सांप्रदायिक दंगे और अदानी समूह को एसबीआई की ओर से ऋण उपलब्ध कराने जैसे अनेकों मुद्दों हैं जिस पर टुकड़ों में बंटी विपक्ष एक मंच पर आकर सरकार को घेरने की कोशिश करेगी।

ऐसे में बिल्कुल साफ है कि शीतकालीन सत्र मोदी सरकार के लिए घरेलु मोर्चे पर पहली बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होगी और सरकार के प्रबंधकों को सदन में कई कदम आगे बढ़कर इनसे आगे निकलने का रास्ता ढूंढ़ना होगा।