सोमवार, 11 मई 2009

ललबबुआ कहां जहइएं ......



आजाद भारत की राजनीति में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकाधिपत्य को चुनौती देने वाले राजनीतिक दलों में कम्युनिस्टों का योगदान महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि पचास के दशक में ही ई एम एस नंबुदरीपाद ने केरल में पहली बार कांग्रेसवाद के नारे को आप्रसांगिक बना दिया। ये पूरे देश में किसी राज्य की पहली गैर कांग्रेसी सरकार ही नहीं थी बल्कि इसने ये अहसास भी दिलाया था कि कांग्रेस अपराजेय नहीं हैं और ये कि विकल्प की राजनीति भारत में हमेशा अपना वजुद बनाये रखेगी। भविष्य में कई मौकों पर देश में वाम धारा की राजनीति के लिए ये बीज वाक्य साबित हुआ। दरअसल ये तथ्य अपने आप में एतिहासिक इसलिए भी है कि राजनीति में मौजूद वामपंथी धारा ने हमेशा देश की राजनीति को दशा और दिशा देने का काम किया। केरल से शुरू हुई गैर कांग्रेसवाद की लड़ाई बंगाल और त्रिपुरा होते हुए केंद्रीय राजनीति में भी अपने वजुद का अहसास कराने लगा। जब भी दिल्ली में गैर कांग्रेसी सरकार बनाई गई कामरेड उसके अहम घटक रहे।


अगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के छह साल के शासन को छोड़ दे तो वर्ष 1977 से लेकर अब तक जितनी भी गैर कांग्रेसी सरकार बनी उसमें वामपंथियों की भूमिका ज़रूर रही। यहां तक की संपूर्ण क्रांति अभियान पर सवार जब जनता पार्टी ने लोहियावादियों के साथ मिलकर पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनाई उसको भी वामपंथियों का समर्थन हासिल था। उस वक्त अब की तरह शायद सेकुलर शब्द राजनीति में इस कदर प्रचलित नहीं हुआ होगा। 1989 से लेकर अब तक यह गठबंधन केन्द्र में सरकार के गठन में अपनी अहम भूमिका निभाता रहा। चाहे वह विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार हो या चंद्रशेखर की सरकार । सन् 96 में जब एनडीए सरकार के बहुमत नहीं साबित कर पाई तब एच डी देवगौड़ा की सरकार बनाने में लेफ्ट ने अहम रोल अदा किया और इस सरकार में सीपीआई के इंद्रजीत गुप्ता और चतुरानन मिस्रा शामिल हुए। और फिर इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने तो भी सीपीआई के दोनों सांसद सरकार में बने रहे। ये पहला मौका था जब लेफ्ट केंद्र में सरकार में हिस्सेदारी कर रही थी। वरना हाल के यूपीए सरकार के दौरान तो बिना सरकार में रहे ही मजे लेते रहे और शायद विपक्षी एनडीए से ज़्यादा सरकार को अंगूली किया।

आम चुनाव के बाद जब एनडीए की सरकार बनी तो उस वक्त वाम मोर्चा प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका निभाता रहा। और वर्ष 2004 में आम चुनाव के बाद कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सामने आया जिसने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन बनाया और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तब इस सरकार को वाम मोर्चा ने बाहर से समर्थन दिया। और केन्द्र में नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हुआ। राजनीतिक के दिग्गज और वामपंथी नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने इसमें अपनी अहम भूमिका निभाई और उन्हीं का प्रयास था जिन्होंने कथित धर्मनिरपेक्ष दलों को एक साथ कर उन्हें गोलबंद किया और सभी को एक झंडे के तले किया। और इसी के परिणामस्वरूप केन्द्र में यूपीए सरकार के गठन का रास्ता साफ हो पाया।

केन्द्र में सरकार को चलाने के लिए संयुक्त घोषणा पत्र बनाया गया जिसके तहत सरकार को चलाने की बात कही गई लेकिन अमरीका के साथ हुए परमाणु करार के बाद वाम मोर्चा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। आप इसे सैद्धांतिक विरोध कह सकते हैं लेकिन कई विश्लेषक इसे इस रूप में देखते हैं कि आखिर लेफ्ट को चुनाव भी लड़ना था और वो भी अपने ही गढ़ में उस कांग्रेस के खिलाफ जिसे वो अब तक केंद्र में समर्थन देती आई थी लिहाज़ा समर्थन वापस लेने की घटना को कुछ लोग लेफ्ट की सोची समझी रणनीति में मानते हैं। ज़ाहिर है पूरे यूपीए सरकार के दौरान लेफ्ट पार्टियां ज्यादा असर दार भूमिका में रहे।

लेकिन अगर अगर हम वर्ष 1991 से लेकर अब तक हुए लोकसभा चुनाव के परिणामों पर एक नज़र डालते है तो नतीजा यही निकलता है कि लेफ्ट अब तक अपने गढ़ को बचाए रखने में कामयाब रहा और केन्द्र की राजनीति में उसका दबदबा बरकरार रहा। पिछले परिणाम को देखे तो सीपीएम ने 1991 में 35 पर तो 1996 में 32 पर 1998 में 32, 1999 में 33, 2004 में 43 सीटों पर जीत दर्ज की।

लेकिन पंद्रहवीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव प्रक्रिया चल रही है। एक बार फिर वामपंथी गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई , विकल्प देने की कवायद में जुट गए हैं। लेकिन इसकी संभावना कम ही लगती है। हां ये ज़रूर हो सकता है एनडीए को सरकार बनने के करीब देखते ही सेकुलर सेकुलर चिल्लाते हुए लेफ्ट या तो तीसरे मोर्चे की सरकार बनवाते हुए कांग्रेस को समर्थन देने के लिए कह सकती है, या फिर ये कि बाद में फिर मनमोहन सिंह की गोद में जाकर बैठ जाएं। परमाणु करार जैसे मुद्दे पर यूपीए से समर्थन वापस लेकर कामरेडों ने ये जताने की कोशिश तो जरूर की कि सत्ता के नजदीक रहने के लिए उन्होंने सिद्दांतों से समझौता नहीं किया।

बहरहाल परिणाम जिस करवट बैठे इस पर सबकी निगाहें जरूर होंगी कि हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे बेहतरीन रणनीतिकार के अभाव में वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति में अपनी कोई छाप छोड़ पाएगें। ज़ाहिर है परिणाम से ज्यादा रणनीति पर सबकी निगाहें होंगी। इस चुनाव में शायद वामपंथियों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती भी है।

क्षेत्रीय दलों के जलवे

भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के जलवे आज़ादी के पहले भी रहे लेकिन आजादी के तकरीबन तीन चार दशक के बाद इनकी धमक राष्ट्रीय राजनीति में साफ तौर पर दिखाई पड़ने लगी। इसकी शुरूआत देश में धुर दक्षिण से हुई जहां हिन्दी विरोधी आंदोलन के अगुवा सी एम अन्नादुरई ने 1967 में पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को राज्य की सत्ता से अपदस्थ कर तमिलनाडु के राजनीति की दशा और दिशा दोनों ही बदल दी। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की इस लहर ने करूणानिधि , एम जी रामचंद्रन और जे जयललिता जैसे कई दिग्गज़ों को तमिलनाडु की राजनीति में न केवल स्थापित नाम बना दिया बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति में राष्ट्रीय दल महज मूक दर्शक बन कर रह गए। राज्य की पूरी राजनीति इन्हीं क्षत्रपों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई।

हिन्द महासागर से उठे इस राजनीतिक चक्रवात ने धीरे धीरे ही सही देश की राजनीति में क्षत्रपों को न केवल लोकप्रिय विकल्प के तौर पर खड़ा किया बल्कि केंद्रीकृत होती जा रही राजनीति को सही मायने में जन जन की राजनीति में तब्दील करने में अहम भूमिका निभाई। दरअसल धुर दक्षिण के साथ साथ धुर उत्तर यानि कश्मीर और पंजाब में भी क्षेत्रीय दलों ने अपना दबदबा आजादी के बाद से ही बनाया रखा। पंजाब में तो अकाली दल को पूरी तरह से उभरने में कुछ वक्त लगा जबकि इसके विपरीत जम्मू कश्मीर की राजनीति में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कांफ्रेस का दबदबा आरंभ से ही बना रहा। पंजाब और कश्मीर दोनों ही राज्यों में राष्ट्रीय दलों को दोनों ही क्षेत्रीय दलों ने लगभग लंबे वक्त तक हाशिए पर रखा।
अस्सी के दशक में आंध्र प्रदेश में तेलुगू सिनेमा के सुपरस्टार एन टी रामाराव का राजनीतिक अवतार न केवल प्रदेश की राजनीति बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी मील का पत्थर साबित हुआ। हैदराबाद हवाई अड्डे पर तत्कालीन सांसद राजीव गांधी के राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री को अनदेखा करने की बात केंद्र के सौतेले रवैय्ये के खिलाफ तेलुगू सिनेमा के इस महानायक के अभियान ने पहली बार प्रदेश में तेलुगूदेशम पार्टी का नेतृत्व करते हुए अपनी सरकार बनाई बल्कि भविष्य में राष्ट्रीय मोर्चे के रूप में केंद्रीय राजनीति में जो सफल प्रयोग हुआ उसके भी अगुवा एन टी आर ही रहे।
सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के खिलाफ खड़ा हुआ संपूर्ण क्रांति का अभियान केंद्र में भले ही दो साल में दम तोड़ गया लेकिन राज्यों की राजनीति में इसने कई क्षत्रपों को जन्म दिया और केंद्रीय राजनीति में इनके ही जलवे छाने लगे। खास तौर पर हिन्दी पट्टी के दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार, पूर्व में उड़िसा , पश्चिम भारत में गुजरात और दक्षिण भारत के कर्नाटक जैसे राज्यों में समाजवादियों ने पहली बार सरकारें बनाई। बाद में मतांतर की वजह से समाजवादियों की एकता भले ही खंडित हो गईं, लेकिन अपने अपने राज्यों में इन क्षत्रपों का वर्चस्व बरकरार रहा। बिहार में लालू यादव, उत्तर प्रदेश में विश्वनाथ प्रताप सिंह, चौधरी चरण सिंह, मुलायम सिंह यादव , उड़िसा में बिजू पटनायक, कर्नाटक में राम कृष्ण हेगड़े और एच डी देवेगौड़ा जैसे नेता इसी दशक में उफान पर आए।
यही नहीं इनकी एकता का उफान केंद्रीय राजनीति में 1989 में पहले राष्ट्रीय मोर्चे और चंद्रशेखर की सरकारों के रूप में दिखा और बाद में एच डी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल संयुक्त मोर्चे की सरकारों के रूप में सामने आया। इन सरकारों में प्रमुखता से अपनी भूमिका निभाने वाले जनता दल , लोक दल, द्रमुक, टीडीपी जैसे क्षेत्रीय दल आज भी विभिन्न राज्यों में अपनी महत्ती भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं।

पिछले एक दशक से भी अधिक वक्त से इन क्षेत्रीय दलों ने अपनी भूमिका का इस कदर विस्तार किया है कि केंद्र में कोई भी गठबंधन बिना इन क्षेत्रीय दलों के अपने मुकाम तक नहीं पहुंच सकता। दरअसल भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका सिर्फ विकल्प देने तक ही सीमित नहीं है बल्कि सही मायनों में सामाजिक न्याय और लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण को इन्होंने अंजाम तक पहुंचाया है। अब जबकि पंद्रहवी लोकसभा के लिए चुनाव सिरे चढ़ रहा है एक बात बिल्कुल साफ है राष्ट्रीय कहे जाने वाले दलों के लिए केंद्र में सरकार बनाना तब तक दूर की कौड़ी होगी जब तक कि ये क्षेत्रीय कहे जाने वाले दलों को साथ न ले लें। ज़ाहिर है क्षेत्रीय दलों की भूमिका सिर्फ सरकार बनाने तक ही सीमित नहीं है।

रविवार, 15 मार्च 2009

अल्पमत का लोकतंत्र !


लोक सभा के चुनाव फस्‍ट पास्ट द पोस्ट चुनाव प्रणाली से कराए जाते हैं। इस प्रणाली के अधीन कुल मतदान में से सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी विजयी घोषित किया जाता है। फिर चाहे उसके कुल मतदान या कुल वोटों का कितना भी प्रतिशत क्यों न हो।
२००४ के आम चुनावों में लोकसभा की ५४३ सीटों में से २१९ सांसदों ने अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में कुल मतदान के ५० प्रतिशत या उससे अधिक मत प्राप्त किए थे। इसका अर्थ ये हुआ कि शेष ३२४ सीटों पर ( कुल ५४३ सीटों का लगभग ६० प्रतिशत ) विजयी उम्मीदवार कुल मतदान के ५० प्रतिशत वोट प्राप्त नहीं कर सके थे।

देश के विभिन्न राज्यों में मतदानगत खुबियों की वजह से काफी अलग अलग हैं। उदाहरण के तौर पर जहाँ तमिलनाडु में अधिकांश सीटों पर विजेता प्रत्याशियों ने कुल मतदान के ५० प्रतिशत से अधिक मत ( ३९ में से ३४ स्थानों पर ) प्राप्ता किये , वहीं उत्तर प्रदेश में ८० सीटों में से केवल ९ सीटों पर इतने प्रत्याशियों ने अंतर से वोट प्राप्त किये । प्रतिशत की दृष्टि से तमिलनाडु में ८७ प्रतिशत से अधिक स्थान ५० प्रतिशत ये उससे अधिक मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशियों को मिले जबकि उत्तर प्रदेश में केवल ११।२५ प्रतिशत विजेता उम्मीदवार ही इस प्रतिशत तक पहुंच पाए।

तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के अलावा लोकसभा की अधिक सीटों वाले कुछ अन्य राज्यों में अलग अलग खुबी देखी गईं। आंध्र प्रदेश में लोकसभा की ४२ सीटों में से २९ सीटों पर विजेता प्रत्याशियों ने ५० प्रतिशत या अधिक मत प्राप्त किये , जबकि बिहार में ४० विजेता प्रत्याशियों में से मात्र ४० प्रत्याशियों में से मात्र ११ प्रत्याशी ही इस अंतर को पा‍ट सके।

दक्षिण के दो अन्य राज्य जैसे कर्नाटक और केरल को भी इस दृष्‍ि़ट से कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई। कर्नाटक में लोक सभा की २८ सीटों में से केवल पांच सीटों पर ही विजेता प्रत्याशी ५० प्रतिशत से अधिक मता प्राप्त कर सके, जबकि केरल में २० में से केवल चार विजेता प्रत्याशी ही कुल मतदान के ५० प्रतिशत से अधिक वोट प्रप्त कर सके। तथापि महाराष्ट्र की स्थिति बेहतर रही। वहां लोकसभा के ४८ सदस्यों में से १५ सदस्य कुल मतदान के ५० प्रतिशत से अधिक मतों के अंतर से विजयी रहे।

इसके विपरीत पश्चिम बंगाल , राजस्थान और उड़ीसा राज्यों ने अपने आधे से अधिक सांसद ५० प्रतिशत से अधिक के अंतर से वोट पाने वाले सदस्य लोक सभा में भेजे। ( पश्चिम बंगाल ने ४२ में से २३ , राजस्थान ने २५ में से १४ और उड़ीसा ने २१ में से ११ ) । तथापि गुजरात और मध्य प्रदेश इस मामले में थोड़े पिछड़ गए । उन्होंने क्रमश २६ में से १२ और २९ में १३ सदस्य ही लोकसभा में भेजे।

जहां तक अनुपातिक दृश्टि से कम सीटों वाले राज्यों का संबंध है असम ने अपने १४ सांसदों में से केवल एक सांसद ही ऐसा भेजा जिसने ५० प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त किए थे जबकि इतनी सीटों वाले झारखंड ने ऐसे तीन सांसद और पंजाब ने १३ में से ऐसे तीन सांसद भेजे थे।
हरियाणा में १० में से केवल एक ही विजेता प्रत्याशी ५० प्रतिशत से अधिक वोट प्राप्त कर सका। इसके विपरीत दिल्ली ही एक मात्र ऐसा केंद्र शासित प्रदेश था जहां सातों सांसदों ने ५० प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त किये थे।

देश में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। बहुत लंबे समय तक मैंने कोई पोस्ट नहीं डाला। इस बीच देश के कई भागों में विधानसभा चुनावों और राजनीतिक सरगर्मियों के बीच उन राज्यों की राजनीति से वाकिफ हुआ हूं। आगे के पोस्ट में उन पर विस्तार से बात करूंगा। खासतौर पर झारखँड और जम्मू कश्मीर की राजनीतिक कवरेज के दौरान जो अनुभव हुए उसको साझा करूंगा। फिलहाल लोकसभा चुनावों से जुड़ी कुछ दिलचस्प जानकारियों के साथ आपके सामने फिर हाज़िर हूं। आशा है आपको पसंद आएंगे। इन दिलचस्प जानकारियों के साथ ही देश की राजनीति और लोकतंत्र पर एक लंबी बहस हो सकती है।