सोमवार, 3 अगस्त 2009

१५वीं लोकसभा - पटकनी खाता सत्ता पक्ष - ५

अगर एक वाक्य में कहें तो प्रधानमंत्री का भाषण निस्संदेह शानदार था। ख़ासतौर पर पाकिस्तान के साथ दुबारा बातचीत शुरू करने के संबंध में उनके तर्कों का जबाव विपक्ष के पास भी नहीं था। प्रधानमंत्री अपनी चिर परिचित शैली से अलग हटकर बोले। शांत और सौम्यता के बीच विपक्ष पर आक्रामक अंदाज में चुटकी भी ली। इस संदर्भ में अपने पूर्ववर्ती वाजपेयी का ज़िक्र करते हुए उनके नक्शेकदम पर चलने की बात कहकर उन्होंने विपक्ष के हथियार की धार ही खत्म कर दी। बहरहाल अंतिम उपयोगकर्ता निगराणी समझौते ( एंड यूज़र मानिटरिंग एग्रिमेंट ) पर प्रधानमंत्री का तर्क बहुतों के गले नहीं उतरने लायक था।
इस मुद्दे पर उनका कहना था कि अमेरिका के साथ हथियारों और रक्षा से जुड़े उच्च स्तर की अत्याधुनिक प्रणाली की आपूर्ति के संबंध में नब्बे के के दशक से ही भारत की सरकारें इस तरह के समझौते करती आई हैं। इस बार भी अमेरिका के साथ किए गए समझौते में भारत की संप्रभुता और प्रतिष्ठा का ख्याल रखा गया है। इस समझौते में अमेरिका एकतरफा कोई कार्रवायी नहीं कर सकता है खासतौर पर रक्षा प्रतिष्ठानों की जांच के संबंध में। इसके लिए अमेरिका को पहले भारत से औपचारिक अनुरोध करना होगा और भारत की अनुमति और द्वपक्षीय सहमति से ही वो कोई जांच कर सकेगा। इसके बाद प्रधानमंत्री जी आठ के सदस्यों द्वारा संवर्द्धण और परिशोधन तकनीक के हस्तांतरण से संबंद्ध भारत की निशस्त्रीकरण के मुद्दे पर दिए गए बयान पर सदन की चिंता का जबाव दिया। इस पर उनका कहना था कि एनएसजी के ४५ देशों ने यूरोनियम तकनीक भारत को पूरी तरह से देने पर पहले ही सहमति जताई है। इसके पहले भी जी आठ के देशों ने अडंगा लगाने की कोशिश की है लेकिन वो कामयाब नहीं हुए हैं जाहिर है इसमें कामयाबी के लिए एनएसजी के सभी ४५ देशों में आमसहमति बनानी होगी जो फिलहाल संभव नहीं दिखता । लिहाज़ा निकट भविष्य भारत के लिए इस पर चिंता की कोई बात नहीं है। साथ ही उन्होंने ये भी दोहराया कि जब तक दुनिया को परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में मान्यता नहीं देता है तब तक एनपीटी पर हस्ताक्षर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

ज़ाहिर है विपक्ष संतुष्ट था। लेकिन अब भी ब्लुचिस्तान के ज़िक्र पर कोई ठोस जबाव दे पाने में सरकार नाकाम रही थी। लेकिन प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद भाजपा की सुषमा स्वराज द्वारा जो प्रश्न पूछे गए जलवायु परिवर्तन के बारे में वो विपक्ष की दिशाहीनता और प्रधानमंत्री के जबाव पर भाजपा की किसी रणनीति के अभाव को सामने रख गया। इससे ये भी स्पष्ट हो गया सरकार कठघरे में अगर खड़ी दिख भी रही थी तो अपनी मंत्रियों और अधिकारियों की नासमझी की वज़ह से न कि विपक्ष की किसी रणनीति और उसके द्वार किए गए किसी ठोस प्रयास का ये नतीजा था। बहरहाल अब सबकी नज़र विदेश मंत्री के जबाव पर टीकी थी जहां से उन्हें निराश करने वाला जबाव मिलने वाला था और सदन में एक बार फिर ये साबित होने वाले था कि एस एम कृष्णा शायद विदेश मंत्री के रूप में सही चयन नहीं हैं। (जारी)

रविवार, 2 अगस्त 2009

१५वीं लोकसभा -- पटकनी खाता सत्ता पक्ष - ४


शुरूआत से ही सबको उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री बहस में हस्तक्षेप करेंगे। हुआ भी कुछ ऐसा ही। पहले यशवंत सिन्हा के भाषण के दौरान ब्लुचिस्तान से मुत्तल्लिक डोजियर के सवाल पर प्रधानमंत्री ने एक पंक्ति का हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि पाकिस्तान से इस मुद्दे पर भारत सरकार को शर्म अल शेख में कोई डोज़ियर नहीं मिला है। इसके बाद विपक्ष को ये लग रहा था कि प्रधानमंत्री अपने हस्तक्षेप के दौरान सभी मुद्दों पर सरकार की स्थिति साफ साफ शब्दों में स्पष्ट करेंगे। हालांकि पीएम न केवल जबाव के लिए तैयार थे बल्कि आशा के वीपरीत आक्रामक भी दिखाई दिए।

पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है और हम ये बात नहीं भुला सकते। इसलिए बेहतर होगा कि हम आपस में लड़ने से बेहतर अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल अपनी साझा समस्या से निपटने में करें । इसलिए दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध दोनों देशों के करोड़ों नागरिकों और पूरे दक्षिण एशिया के हित में होगा। इसके साथ ही ये उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हमारे नेक इरादों के बावजुद , अगर पाकिस्तानी धरती से भारत पर होने वाले आतंकवादी हमले जिसमें हमारे निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं, होते रहे तो हम इस पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। और मैं इस पर कायम हूं। ॥हालांकि उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि पाकिस्तान से संबंध सुधारने की दिशा में भारत की कोई सरकार तब तक एक भी कदम आगे नहीं बढ़ा पाएगी जब तक वो अपनी जमीन को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होने देगा। ज़ाहिर है ये विपक्ष के लगाए गए आरोप पर एक सफाई की तरह था। बाद में उन्होंने ये भी कहा कि मुंबई हमलों के दोषियों के खिलाफ पाकिस्तान की कार्रवायी के बगैर उससे किसी भी स्तर पर कोई बातचीत नहीं होगी। लेकिन इसके बाद भी ये स्पष्ट नहीं हुआ था कि आखिर अब बातचीत शुरू करने के पीछे क्या तर्क है।

इस पर आगे बढ़ते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि हमने वीपरीत परिस्थितियों में भी अपने संयम को बनाए रखते हुए ये साफ किया कि पाकिस्तान अपना वादा निभाए। पांच जनवरी को हमने पाकिस्तान को हमारी जांच एजेंसियों द्वारा उपलब्ध कराए गए डिटेल रिपोर्ट सौंप दिए जिसमें पाकिस्तान से जुड़ी तथ्यों की जानकारी थी। इसपर पाकिस्तान में कु्छ प्रगति जरूर हुई। उन्होंने सदन को बताया कि पाकिस्तान ने दो मौके पर अपने यहां हो रही जांच की औपचारिका जानकारी भारत सरकार को दी - फरवरी २००९ में और मेरी पेरिस और शर्म अल शेख की यात्रा के दो दिन पहले। सबसे ताजा दस्तावेज जो उन्होंने हमे सौंप वो चौंतीस पेज का था जिसमें घटना की योजना और घटना की क्रम से विवरणी है, पाकिस्तान की संघीय एजेंसी की टीम द्वारा की गई जांच का विस्तृत विवरण, एफ आई आर की एक काफी, हिरासत में लिए गए और भगोड़ो आरोपियों की तस्वीर और विस्तृत जानकारी है। हमले के दौरान उपयोग किए गए संचार साधनों की जानकारी , हमले की वित्तीय मदद की जानकारी और पाकिस्तान में जब्त किए समान मसलन मानचित्र, जीवनरक्षक नौका, नौवहनीय प्रशिक्षिण पर किताबें, इंटेलीजेंस मैनुअल आदि है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की तरफ से उन्हें बताया गया है कि जांच तकरीबन पूरी होने के कगार पर है और अब ट्रायल शुरू किया जाएगा। हमसे कुछ और जानकारियों उन्होंने मांगी है जो हम जल्द ही उपलब्ध करा देंगे। ये पहली बार है कि भारत में हुए किसी आतंकवादी हमले पर पाकिस्तान में हुई जांच पर उन्होंने हमें जानकारी दी है। पहली बार ही उन्होंने ये भी स्वीकार किया है कि भारत में हुए आतंकवादी हमलों में उनके नागरिक और उनके यहां का एक आतंकवादी संगठन संलिप्त है।

सदन को इतनी जानकारी देने के बाद वो भाजपा पर आक्रामक हुए, जो उनकी राजनीतिक छवि के बिल्कुल प्रतिकूल था। लेकिन इस मुद्दे पर हो रही तमाम राजनीति ने उन्हें आक्रामक बना दिया। उन्होंने विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ये वास्तविकता है कि एनडीए सरकार ने पाकिस्तान से इतना कुछ कभी भी हासिल नहीं किया था अपने पूरे कार्यकाल और उनसे लंबी लंबी बातचीत के बावजूद। इसलिए यूपीए सरकार को विपक्ष से विदेशी नीति के संचालन और अपने देश को आतंकवादी हमलों से बचाने के लिए विपक्ष से कोई उपदेश लेने की कोई जरूरत नहीं है।

दुबारा बातचीत शुरू करने पर भी प्रधानमंत्री ने अपनी सफाई दी। उनका कहना था कि किसी देश से बातचीत करके हम अपने पुराने स्टैंड और आतंकवाद को परास्त करने की अपनी नीति को डायल्युट नहीं कर रहे। पाकिस्तानी आतंकवाद से ग्रस्त अन्य शक्तियां भी पाकिस्तान से बातचीत कर रही हैं। अगर हम पाकिस्तान से सीधे बात नहीं करते तो इसके लिए हमें किसी तीसरे देश पर निर्भर रहना होगा। इसका प्रभाव निश्चित तौर पर कम होगा। उन्होंने कहा कि वो पूरी ताकत और जिम्मेदारी से कहता हैं कि आगे बढ़ने के लिए बातचीत ही सबसे सही रास्ता है। पिछले एक दशक में यही पाकिस्तान के साथ संबंधों का हमारा इतिहास रहा है।

अपनी बात को वजनदार और सही साबित करने के लिए उन्होंने एनडीए सरकार के मुखिया वाजपेयी जी के पाकिस्तान कूटनीति की बात भी उदाहरण के तौर पर पेश किया। उनका कहना था कि वाजपेयी जी ने १९९९ में लाहौर जाने का साहस भरा कदम उठाया था और उसके बाद कारगिल हुआ और कांधार अपहरण कांड। इसके बावजूद उन्होंने शांति स्थापना के प्रयास में उन्होंने जनरल मुशर्रफ को आगरा आमंत्रित किया। देश ने संसद पर हमला का दारूण दृश्य देखा। ये दोनों देशों के बीच कठीन समय था। दोनों देश की सेनाएं सीमा पर आमने सामने खड़ीं थी। लेकिन मैं वाजपेयी जी को इसका स्रेय देना चाहुंगा , कि वो डिगे नहीं, और कि स्टेट्समैन को डिगना भी नहीं चाहिए। २००४ में वो इस्लामाबाद गए जहां संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया। पाकिस्तान से निपटने में मैं वाजपेयी जी की दृष्टि और उनकी फ्रस्ट्रेशन दोनों महसूस कर सकता हूं।

इसके साथ ही पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों को उन्होंने रोनाल्ड रीगन के शब्दों में परिभाषित किया -- विश्वास करो लेकिन सतर्कता के साथ। जाहिर है पाकिस्तान के साथ उनकी बातचीत सतर्कता के साथ होने का उन्होंने दावा किया। लेकिन यहां ये नहीं साफ कर पाए कि इस सतर्कता में ब्लुचिस्तान जैसी चूक कैसे हो गई। बहरहाल उन्होंने ये जरूर कहा कि ब्लुचिस्तान पर पाकिस्तान की आशंकाओँ को निर्मूल करने के लिए ही संयुक्त वक्तव्य में उन्होंने इसका ज़िक्र किया है। यहां उनकी बात पर भरोसा करना विपक्ष के लिए थोड़ा मुश्किल ज़रूर था। अगर बात इतनी साधारण थी तो फिर सरकार की तरफ से इतनी बयानबाजी, इसको कानूनी दस्तावेज न मानने , बैड ड्राफ्टिंग जैसे बातें क्यों आई। ज़ाहिर है विपक्ष इतने पर संतुष्ट नहीं हो सकता था। और प्रधानमंत्री का बयान शायद इसी एक मुद्दे पर सदन को विश्वास में ले पाने में नाकाम रहा।

शनिवार, 1 अगस्त 2009

१५ वीं लोकसभा - प‍टकनी खाता सत्ता पक्ष - 3

इसको बाद कांग्रेस की तरफ से बोलने के लिए पी सी चाको उठे। पहले उन्होंने संयुक्त वक्तव्य में पाकिस्तान को इस्लामिक गणराज्य कहकर संबोधित करने पर यशवंत सिन्हा द्वारा की गई आलोचना पर हमला बोला। बाद में उनका जोर वर्तमान मुद्दों से ज़्यादा पूर्ववर्ती एनडीए सरकार की गलतियां गिनाने पर केंद्रित रहा। उन्होंने कारगिल युद्ध और संसद पर हमले के बाद भी वाजपेयी सरकार द्वारा पाकिस्तान से बातचीत जारी रखने को अपने तर्क का आधार बनाया। श्री चाको का कहना था कि अगर कारगिल और संसद पर हमले के बाद सरकार आगरा शिखर वार्ता और लाहौर यात्रा कर सकती है तो वर्तमान सरकार अगर मुंबई हमले के बाद शर्म अल शेख में बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात करती है तो इसमें क्या शर्मनाक है ? चाको अपनी जगह पर ठीक हैं। लेकिन ये ध्यान रखनी वाली बात थी कि वाजपेयी ने आर पार की लड़ाई की बात तो की थी लेकिन कभी ये नहीं कही था कि अब पाकिस्तान से बातचीत नहीं होगी। मुंबई हमले के बाद यूपीए सरकार ने साफ तौर पर ये कहा था कि मुंबई हमलों में शरीक लोगों के खिलाफ जब तक कार्रवायी नहीं होगी , भारत सरकार पाकिस्तान से किसी भी तरह की बातचीत नहीं करेगी। फिर जरदारी से मुलाकात के दौरान भी यही रूख दोहराया गया। फिर एक ही महीने में क्या बदल गया कि गिलानी से मुलाकात के बाद आतंकवाद पिछले दरवाजे से बैक फूट पर चला गया।

इसका जबाव दिया समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने उन्होंने अपने भाषण में यूपीए सरकार पर अमेरिका के दबाव में झुकने का आरोप लगाया। भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को अमेरिका के सामने घुटने टेकने की बात कहते हुए श्री यादव ने कहा कि ये पहली बार नहीं है कि ऐसा हुआ है। इराक और अफगानिस्तान पर हमलों के दौरान और ईरान के संदर्भ में हमारी विदेश नीति अमेरिका के सामने घुटने टेक चुकी है। मुलायम का आरोप था कि सरकार अपने पुराने बयान से पलटी है तो आखिर किस वजह से ? उनका कहना था कि सरकार को इन बातों पर साफ तौर पर सदन को विश्वास में लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि अजीब बात है जब युद्ध होता है तो भारत जीतता है लेकिन बातचीत के दौरान भारत की कूटनीति हमेशा हार क्यों जाती है ? इसके चलते ताशकंद में हम अपना प्रधानमंत्री खो चुके हैं। उनका कहना था कि भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का आधार गुटनिरपेक्षता रही है। सारी दुनिया में हमारी प्रतिष्ठा का यही आधार था। लेकिन अब हम गुटनिरपेक्षता से भटक रहे हैं। उन्होंने शर्म अल शेख में भारत की दो भूलों - ब्लुचिस्तान और आतंकवाद को डिलिंक करने का जिक्र करते हुए कहा कि जो सत्ता में बैठे हैं उनकी भूल भारी है। उन्होंने कहा कि इस संयुक्त वक्तव्य से भी पाकिस्तान को लाभ हुआ है भारत को नुकसान हुआ है। इसके साथ ही यूपीए की विदेश नीति का एक तरह से मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा कि सरकार विदेशी मोर्चे पर हमेशा दोस्त बनाने को अपनी नीति का आधार बनाती रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधे सवाल किया वो बताएं सदन को कि आज की तारीख में कौन सा देश भारत का दोस्त है ? उन्होंने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने के भारत सरकार की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि हमें इस बात की ध्यान रखना चाहिए कि पाकिस्तान के निर्माण की नींव ही शत्रुता पर टिकी है। साथ ही हमने उसके टुकड़े भी किये हैं। वो हमारा दोस्त कभी हो ही नहीं सकता। इसलिए पाकिस्तान के साथ हमारी नीति में विश्वास कम और सतर्कता का पुट ज्यादा होना चाहिए। अंत में उन्होंने प्रधानमंत्री को नसीहत दी कि जो गलती कर आए कोई बात नहीं .... अब उसे रद्दी की टोकरी में फेंक दीजिए।

अब बारी जनता दल युनाइटेड के शरद यादव की थी। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाए कि पहले तो मुंबई हमलों के बाद सरकार ने आम जनता में पाकिस्तान के खिलाफ उन्माद पैदा किया। बातचीत किसी कीमत पर नहीं का नारा बुलंद किया और अब चोर दरबाजे से बातचीत करने पर सहमति जता आए। उन्होंने कहा कि ब्लुचिस्तान के लोगों के साथ भारत के लोगों की मानवीय संवेदनाएं जुड़ी हुई हैं। शरद यादव ने कहा कि सरकार दुविधा की शिकार है। संयुक्त वक्तव्य के बाद सत्ताधारी दल के प्रवक्ता बगलें झांक रहे हैं और विदेश मंत्रालय के अधिकारी अलग बयान दे रहे हैं। यही दुविधा बताती है कि आप कुछ गलत कर आए। उनका कहना था कि इससे गजब बात क्या हो सकती है कि भारत सरकार से तनख्वाह पा रहा अधिकारी सरकार की गलती बता रहा है। उनका कहना था कि या तो आप सही हैं या आपका अधिकारी सही बोल रहा है। सरकार की दो ज़ुबान नहीं हो सकती है। आपकी पार्टी और सरकार अलग अलग भाषा बोल रही है। उन्होंने कहा कि जब तक देश दो ज़ुबान में बात कर रहा है तब तक आप किसी का भी सामना नहीं कर सकते। पाकिस्तान जीत गए जीत गए चिल्लाता रहा और यहां दो ज़ुबान में बातें हो रही हैं। शरद यादव ने कहा कि २६.११ के बाद आप रिवर्स गियर में चले गए ... देश आहत है। उन्होंने कांग्रेस को याद दिलाया कि इस देश की विदेश नीति बनाने में उनका ज्यादा योगदान रहा और बासठ सालों से देश की विदेश नीति आम सहमति से संचालित होती रही लेकिन आज आम सहमति की ये परंपरा खंडित हो गई है। उनका कहना था कि २६.११ के बाद जो दुनिया हमारी बात गौर से सुन रही, पाकिस्तान दबाव में आ गया था, इस वक्तव्य के बाद वो स्थिति खत्म हो गई है।

ज़ाहिर है विपक्ष इस मुद्दे पर पूरी तरह से आक्रामक था। सरकार को कटघरे में खड़ा करने का कोई मौका विपक्ष हाथ से नहीं जाने दे रहा था। कांग्रेस की तरफ से बोलने के लिए खड़े हुए चाको भी मामले को रफा दफा करने में कामयाब नहीं हो पाए। लिहाजा सत्ता पक्ष की तरफ से लोगों को ठोस जबाव का इंतजार था। ( जारी )

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

१५ वीं लोकसभा - प‍टकनी खाता सत्ता पक्ष - २


दरअसल लोकसभा में प्रधानमंत्री के हाल के विदेश दौरे पर नियम १९३ के तहत चर्चा कराने का विपक्ष की तरफ से दिया गया नोटिस स्वीकार कर लिया गया था। लेकिन चर्चा कराने के कई दिन पूर्व ही लोकसभा में शून्य काल में भाजपा के हजारीबाग से सांसद और पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने इस मुद्दे को उठाकर सरकार को बैक फूट पर ला दिया था। शून्य काल में मामला उठाते हुए यशवंत सिन्हा ने भारत पाक साझा बयान में ब्लुचिस्तान के जिक्र का मुद्दा , आतंकवाद को डिलिंक कर पाकिस्तान से बातचीत करने पर सहमति, एंड यूजर एग्रीमेंट और संवर्द्धन और परिशोधन तकनीक पर जी आठ की भूमिका का जिक्र करते हुए भारत की संप्रभूता बेचने का आरोप लगाते हुए एक तरह से आने वाले चर्चा के दौरान विपक्ष का टोन सेट कर चुके थे। लिहाज़ा आने वाली चर्चा पर जबाव देने के लिए सरकार के पास बहुत वक्त था , इन सवालों पर पूरी तरह से तैयार होकर आने के लिए। लेकिन उसके बाद जितने दिन बीते सरकार के विभिन्न धड़ों की तरफ से आने वाले जबाव ने सरकार के लिए और मुश्किलें ही पैदा की। मसलन विदेश राज्य मंत्री शशी थरूर का सदन के बाहर दिया गया ये बयान कि साझा वक्तव्य की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। और उस पर विदेश सचिव मेनन का ड्राफ्टिंग में गलती की स्वीकारोक्ति वाले बयान ने सरकारी की पेशानी पर पसीने की बूंद और बढ़ाई ही , कम करने में कोई सहयोग नहीं दे पाई। रही सही कसर सत्ताधारी कांग्रेस से दबे स्वर से आने वाले विरोध ने कर दिखाया। कांग्रेसी प्रवक्ताओं की तरफ से प्रधानमंत्री के समर्थन में दो एक वाक्य क्या निकलते , अपनी पिंड छुड़ाने के लिए उन्होंने ये कह कर पल्ला झाड़ लिया कि प्रधानमंत्री आशंकाओं का जबाव देंगे। ज़ाहिर है टोन दोनों तरफ से सेट हो चुके थे। विपक्ष मजबूत दिखने लगा था। मैसेज जा चुका था ... कुछ न कुछ गलती हुई है जिसे सरकार छुपा रही है। ये मैसेज खतरनाक था। जिसे ख़ारिज करने में सत्ता पक्ष को अब तक सफलता नहीं मिल पाई।


बहरहाल लोकसभा में इस मुद्दे पर होने वाली चर्चा की शुरुआत सदन में भाजपा की उपनेता सुषमा स्वराज को करना था लेकिन ऐन मौके पर पार्टी ने इसके लिए यशवंत सिन्हा को चुन कर अपने आंतरिक अंतर्विरोध को कम करने में भी कुछ हद तक सफलता पाई। हालांकि इसके लिए यशवंत सिन्हा ने अपने भाषण की शुरूआत में ही पार्टी पर भी व्यंग्य वाण सनित चुटकी लेकर मजा ले लिया। ( इस पर चर्चा बाद में )। बहरहाल शुरआत से यशवंत सिन्हा आक्रामक नज़र आए। विदेश नीति की तुलना मेट्रो के खंभे से करते हुये उन्होंने सरकार पर आरोप लगाए कि शर्म अल शेख जो कुछ भी हुआ उससे विदेश नीति के खंभे भी मेट्रों की तरह क्रैक हो गए हैं। उन्होंने कहा कि मेट्रो के क्रैक तो फिर भी भर लिए जाएंगे लेकिन विदेश नीति में ये दरार शायद ही भरा जा सकेगा।


उनका कहना था कि तेरह जुलाई को पाकिस्तानी राष्ट्रपति ज़रदारी से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री का बयान था कि जब तक पाकिस्तान २६ नवंवर के मुबंई हमलावरों पर ठोस कार्रवायी नहीं करता तब तक पाकिस्तान से सार्थक बातचीत संभव नहीं है । फिर शर्म अल शेख में गिलानी के साथ मुलाकात के बाद एक महीने के अंदर क्या बदल गया कि साझा बयान में भारत आतंकवाद को परे रखकर पाकिस्तान से बातचीत के लिए राजी हो गया। जाहिर है ये २६ नवंवर को मुबंई हमलों के बाद पाकिस्तान से किसी भी तरह की बातचीत नहीं करने की भारत सरकार के पोजिशन से डेविएशन है। सरकार को इस पर अपना रूख स्पष्ट करने की मांग उन्होंने की। इससे भी करारा वार उन्होंने साझा बयान में ब्लुचिस्तान के जिक्र पर किया। इस पर सरकारी प्रतिक्रिया कि ब्लुचिस्तान में भारत को छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है, का उल्लेख करते हुए उन्होंने सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि कई मुद्दों और जगहों पर हमारे लिए छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है तो फिर सरकार को उसका भी उल्लेख कर लेना चाहिए था। उनका साफ तौर पर कहना था कि शर्म अल शेख में ब्लुचिस्तान के जिक्र बाले साझा बयान की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि पाकिस्तान इसका अपने पक्ष में इस्तेमाल करने लगा। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि प्रधानमंत्री जो कर आए हैं उसको सातों समुद्र के पानी से भी नहीं धोया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि ब्लुचिस्तान का ये जिक्र आने वाले वक्त में भारत को बहुत तकलीफ देने वाला है।


विदेश सचिव के बैड ड्राफ्टिंग वाली बात भी उनके भाषण में प्रमुखता से छाया रहा। उन्होंने कहा कि साझा बयान की ड्राफ्टिंग बहुत सोच समझ और तैयारी के साथ होती है। एक एक शब्द पर घंटो खपाया जाता है। आगरा शिखर वार्ता इसी साझा बयान पर एकमत नहीं होने की वजह से टूट गई थी। फिर सरकार की क्या मजबूरी थी कि आखिर ब्लुचिस्तान का जिक्र करना पड़ा। और उस पर तुर्रा ये कि बैड ड्राफ्टिंग को स्वीकार करने वाला अधिकारी अब तक अपने पद पर बना हुआ है। या तो वो अधिकारी सही या सरकार सच बोल रही है। क्या ब्लुचिस्तान के संदर्भ में पाकिस्तान ने भारत को कोई दस्तावेज सौंपे हैं जिसके वजह से उसका जिक्र लाजिमी हो गया। अगर ऐसा है तो सरकार को बताना चाहिए। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, संवर्द्धन और शोधन तकनीक, और अंतिम उपयोगकर्ता निगराणी समझौता ( एंड यूजर मानिटरिंग एग्रिमेंट ) का जिक्र करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री पर देश की संप्रभुता गिरवी रखने का आरोप लगाया। ज़ाहिर है सारा विपक्ष उनके इन आरोपों पर एक मत था। ( ज़ारी )