रविवार, 25 मई 2008

विंध्य के पार केसरिया


भाजपा ने कर्ना‍टक में सरकार बनाने लायक सीटें जीत ली हैं। विंध्य के पार भाजपा का कमल शतदल खिला , कईयों के चेहरे पर मुर्दानी छा गई। इस हार से न केवल केंद्र में सत्ता के झुले पर सवार कांग्रेस हिचकोले खाने लगी बल्कि उन कई राजनीतिक विश्लेषकों के चेहरे भी मुर्झा गए जिन्हें लगता था कि बनिओं की ये कथित पार्टी केवल उत्तर भारत में सांप्रदायिकता के रथ पर सवार होकर ही सत्ता का आलिंगन कर सकती है। दोपहर तक परिणाम आते आते एनडीटीवी और सीएनएन जैसे सेक्युलर चैनलों की हवा खराब हो गई। राजदीप बार बार खिसियाए चेहरे से अपने इंटलेक्चुअल दर्शकों से माफी मांगते नज़र आए। विनोद दुआ और पंकज पचौरी अंत तक आडवाणी के उस बयान की याद दिलाते रहे भाजपा को जिसमें उन्होंने बहुमत नहीं आने की हालात में विपक्ष में बैठने की बात कही थी। साफ दिख रहा था भाजपा की जीत से कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की बजाए इन पत्रकारों को निराशा हुई ।
बहरहाल कर्ना‍‍टक में भाजपा की जीत में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं था। कुछ लोग इसे बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहे हों लेकिन तमाम राजनीतिक दलों को इसका अहसास चुनाव से पहले ही था। ये वही राज्य है जिसने आपातकाल की विषम बेला में भी कांग्रेस नेतृत्व को मूंह छिपाने की जगह दी थी। आज उसी बेल्लारी और चिकमंगलूर जैसे इलाकों में हरेक तीन किलोमीटर पर मौजूद भाजपा का दफ्तर कांग्रेस को ये अहसास करा रहा है कि वाकई कांग्रेस दो सौ साल पुरानी हो गई है। ज़ाहिर है न केवल भारतीय जनता पार्टी के लिए ये जीत ऐतिहासिक है बल्कि भारत के राजनीतिक इतिहास में ये कई बदलावों का सूचक है। ये जीत भाजपा के लिए कोई तुक्का नहीं है न ही कर्ना‍टक की जीत को गुजरात की जीत की तरह देश का कथित सेक्युलर वर्ग ये कह कर ख़ारिज़ कर सकता है कि ये सांप्रदायिक उन्माद का वो‍ट में तब्दीलीकरण है। देश की एक कथित उग्रपंथी राष्ट्रवादी चरमपंथी मानी जाने वाली पार्टी अब तक उत्तर भारत तक सिमटी हुई थी। २००४ में केंद्र में सत्ता से बाहर होने के बाद कई विश्लेषक ये भी मानने लगे थे कि भाजपा की पारी खत्म हुई या कि ९८ से २००४ तक का भाजपा का सफर भारतीय राजनीति में एक फिनोमिना था जो सांप्रदायिक उन्माद का बस चरम भर था। बनियों की ये पार्टी कभी देश भर में लोगों को स्वीकार्य नहीं हो सकती है। कर्नाटक में भाजपा की इस जीत के साथ इस तरह के कई भ्रम टूटते देखे जा सकते हैं। इस भ्रम का टूटना मैंने उस वक्त कामरेड सीताराम येचूरी के चेहरे पर भी महसूस किया था जब हाल ही में वो संसद में पत्रकारों को संबोधित करते हुए कन्नूर में मारे गए कामरेडों का स्यापा कर रहे थे। मैंने पहली बार किसी मार्क्सवादी को ये कहते सुना था कि उनके ही गढ़ में संघ ने उनके पच्चीस कार्यकर्ताओं को मार दिया। हालांकि वो ये भी गर्व से बता रहे थे कि १२५ संघ कार्यकर्ताओं को भी मार डाला कामरेडों ने। बहरहाल कर्नाटक की जीत का अहसास कन्नूर के संघर्ष में ही दिख रहा था। दक्षिण विजय ने भाषा की राजनीति के तेवर को भी थोड़ा ढिला ज़रूर किया होगा।

इसमें कोई शक नहीं कि चंद पूंजीपतियों के बीच की ये पार्टी उत्तर भारत में पहले सवर्णों ( उत्तर प्रदेश ) और फिर बाद में सभी वर्गों ( मध्य प्रदेश और राजस्थान ) के बीच की पार्टी बनी और आज कर्ना‍टक में जीत के साथ अपनी सिर्फ उत्तर भारतीयों की पार्टी होने का भी कलंक धो लिया है। कर्नाटक की राजनीति को समझने वाले छह महीने पहले से ही कहने लगे थे कि राज्य में जनता दल के दिन लद चुके हैं। कांग्रेस का बोरिया बिस्तर तो जनता दल ने पहले ही समेट दिया था। ये ठीक वैसे ही है जैसा कि गुजरात में पहले जनता दल ने कांग्रेस का बोरिया बिस्तर समेटा और बाद में भाजपा ने जनता दल का। खैर ये न तो एक दिन का काम था और न ही छह महीने का। इसके पीछे एक पूरी सोच पिछले पंद्रह सत्तरह सालों से कर्ना‍टक में लगातार काम कर रही थी। धन्यवाद सुषमा स्वराज का जो एनडीटीवी पर विजय त्रिवेदी के साथ बातचीत में ये बताना नहीं भूली कि ये सिर्फ भाजपा की जीत नहीं है बल्कि पिछले बीस सालों में संघ के लोगों का और पार्टी के कैडर की मेहनत का नतीजा है।
बहरहाल भाजपा की लगातार जीत के साथ जो एक बात जुड़ी है वो राज्यों में एक कुशल नेतृत्व का विकास करना है। एक ऐसा चेहरा देना जो साफ छवि होने के साथ साथ जनता के बीच एक विश्ववसनीय नेतृत्व के रुप में जाना जाए। भाजपा की पिछली सारी जीतों में ये साफ है जबकि कांग्रेस के पिछले सारे हार में ये बड़ी वजह रही है। हाईकमान के भरोसे पूरे देश पर राज नहीं किया जा सकता है ... कर्ना‍टक की जीत से शायद कांग्रेस को ये सबक मिला हो। हालांकि कुछ लोग अतिउत्साह में भाजपा की केंद्र में वापसी के दावे भी ठोंकने लगे हैं। इन अतिउत्साहियों को ये ध्यान रखना होगा कि केंद्र में भाजपा की वापसी की राह जितनी कांग्रेस ने आसान बनाई है उतनी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने अपने लिए राह तैयार नहीं की है। ये बात भाजपा को नहीं भूलनी चाहिए कि केंद्र की राह अब भी लखनऊ के रास्ते से ही गुजरती है जहाँ मायावती अपने नए सामाजिक समीकरण के साथ हाथी पर कुंडली मार कर सवार है।
भाजपा की पिछली सभी जीतों की सबसे बड़ी वजह उत्तर प्रदेश में पार्टी के पराभव की भी सबसे बड़ी वजह है। बुढ़ाते नेतृत्व के भरोसे अगर भाजपा उत्तर प्रदेश में अपने लिए कोई आस देखती है तो शायद अगले छह महीने पार्टी के लिए आत्महत्या के राह पर आगे बढ़ने जैसा होगा। अगर भाजपा केंद्र में वापसी के सपने देखती है तो उसे विंध्य पार की सफलता से ही संतोष कर नहीं बैठना चाहिए बल्कि हिमालय की तराई में खुले घुम रहे हाथियों पर भी अंकुश लगाने में सफलता पानी होगी।

शनिवार, 10 मई 2008

कांग्रेस को क्या होगा हासिल - यूसुफ़ अंसारी

राहुल गाँधी के बतौर प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करने के सवाल पर दिग्गज नेताओं के ...चापलूसी... से बाज आने की नसीहत देने वाली कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से कहना शुरू कर दिया है कि राहुल गाँधी के भारत दौरे का असर दिखने लगा है। राहुल गाँधी ने छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के आदिवासी इलाकों का अपना दौरा खत्म किया। ठीक उसी दिन कांग्रेस की नियमित प्रेस ब्रीफिंग में नए नवेले प्रवक्ता मनीष तिवारी ने दावा कर डाला कि दलित और आदिवासियों पर ...राहुल फैक्टर... का असर दिखने लगा है। कुछ दिन पहले इसी प्रेस ब्रीफिंग में चापलूसी से दूर रहने की नसीहत दिलायी थी और अब खुद कांग्रेस प्रवक्ता राहुल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं। यानि मामला अनौपचारिक चापलूसी से बढ़कर औपचारिक तक पहुंच गया है।

अब जरा कांग्रेस के इस दावे को भी परखा जाए कि राहूल फैक्टर काम करने लगा है। कांग्रेस की दलील है कि बुंदेलखंड में राहुल गांधी के बारबार जाने से मायावती बौखला गई हैं। इसीलिए वो राहुल पर अनाप शनाप आरोप लगा रही हैं। इशारा उस बयान की तरफ है जिसमें मायावती ने कहा था कि दलितों के घर से वापस आने के बाद राहुल खास खुशबुदार साबुन से नहाते हैं। इतना ही नहीं बल्कि बाकयादा धूपबत्ती और अगरबत्ती से उनका शुद्दीकरण किया जाता है। इसी तरह से ये भी दावा किया गया कि राहुल के उड़ीसा के दौरे से वहां की नवीन पटनायक सरकार की नींद हराम हो गई। ये भी दावा है कि कर्नाटक दौरे के बाद राज्य में कांग्रेस की वापसी की उम्मीद और भी मजबूत हुई है। अब कांग्रेस का दावा है कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में राहुल के दौरे से भाजपा परेशान है। दोनों ही राज्यों में उसके पैर उखड़ने के संकेत मिलने लगे हैं।

अब जरा छत्तीसगढ़ में राहुल के दौरे की कुछ बानगी पर नजर डालिए। अपने दौरे के पहले दिन सरगुजा और आसपास के इलाकों के दौरा करने के बाद उन्हें कोरवा में रोड शो करना था, मगर आखरी वक्त में उसे रद्द कर दिया गया। इससे वहाँ के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का मनोबल उंचा हुआ होगा या गिरा होगा। इसका अंदाजा आप आसानी से लगा सकते हैं। शाम को राहुल ने जगदलपुर में कांग्रेस के चुने हुए जिला पंचायत सदस्यों और ग्राम प्रधानों के साथ बैठक की। इसमें राहुल के सामने ही कांग्रेसी आपस में भिड़ गए। सलवा जुडूम पर कांग्रेस एक दूसरे के कपड़े फाड़ते नजर आए। जगदलपुर अजित जोगी का गढ़ माना जाता है। लिहाजा यहाँ जोगी समर्थकों ने महेंद्र वर्मा , मोतीलाल वोरा और विद्याचरण शुक्ल के लोगों को पूरी तरह किनारे रखा। अगले दिन राहुल को एक गाँव कुम्हारपाटा जाना था। वहाँ सिर्फ तीन कार्यक्रम थे। दो कुम्हारों के घर जाना था और एक साथी नामक सामाजिक संस्था के दफ्तर जा कर उसके कामकाज के तरीकों पर नजर डालनी थी। इसका काफी प्रचार किया गया। मीडिया पहले ही उन कुम्हारों के घर पहुँच गया, जहाँ राहुल को जाना था। दोनों घरों के लोग अपने हाथों बने मिट्टी के बर्तन और दूसरे सामान लिए बैठे थे। वे लोग राहुल के कुछ बनाने के मकसद से गीली मिट्टी और चाक तैयार करके बैठे थे। राहुल गाँव में आए और सामाजिक संस्था के दफ्तर में गए। वहीं से सीधे हेलिकाप्टर में बैठकर वापस हो गए। हस्तशिल्पियों से मिलने के राहुल के कार्यक्रम का जितना प्रचार किया गया था वो पल भर में ही उल्टा पड़ गया।

एक खास बात देखने की है कि इस गांव के तमाम घरों को राहुल के आने से पहले ही हल्के नीले रंग से पोत दिया गया था। सारे घरों पर एनएसयूआई और युवक कांग्रेस ने नारे पोत दिए थे। कार्यकर्ताओं से बात करने पर पता चला कि जिन गाँवों में राहुल को जाना होता है वहाँ इसी तरह से किया जाता है। जिन घरों में राहुल को जाना था वहाँ घर की दीवारों पर पहले से ही कांग्रेस के झंडे पोस्टर और बैनर लगाए दिए गए थे और तो और इस बेहद गरीब घर की दीवारों पर राहुल गाँधी के आगमन का स्वागत करने के लिए बढ़िया फ्लैक्स के पोस्टर भी चस्पा थे। आगमन के लिए धन्यवाद के पोस्टर भी एडवाँस में ही चस्पाँ कर दिए गए थे। देखने सुनने में ये तो ये दावे बहुत छोटे लगते हैं , मगर इसका असर दूर तक होता है। जिस इमेज बिल्डिंग के लिए राहुल गाँधी देश के गाँव देहात का दौरा कर रहे हैं , उन्हीं गाँव देहात में इसका उल्टा असर भी हो सकता है।स्थानीय स्तर पर कांग्रेसी कार्यकर्ता भी ऐसा ही मानते हैं।

दिल्ली में बैठकर राहुल गाँधी के भारत दौरे के असर का अंदाज लगाना बेहद मुश्किल काम है। इस दौरे की सबसे अहम बात ये है कि राहुल जहाँ जाते हैं वहां अपना असर जरूर छोड़ते हैं। उनके कुछ कदम स्थानीय लोगों के दिल को छू जाता है। मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ के दौरे पर राहूल ने स्थानीय लोगों से महुआ से बनने वाली शराब के बारे में पूछा। उसे पीने की इच्छा जताई। तेंदू पत्ते के बारे में पूछताछ की। दरअसल यहाँ के आदिवासी इलाके के लिए महुआ और तेंदू पत्ता लाइफ लाइन है। उनके साथ खुद को जोड़कर या जुड़ने का अहसास दिलाकर राहुल ने ये जताने की कोशिश की कि उन्हें उनकी चिंता है। काकेर की अपनी प्रेस कांफ्रेस में राहुल बोले भी ... दो भारत हैं। एक मजबूत भारत और एक ऐसा भारत जिसकी आवाज सत्ता तक नहीं पहुंचती है। मैं उसी भारत की आवाज सुनने निकला हूं। .... लेकिन सिर्फ आवाज सुन लेना ही काफी नहीं है। उस दर्द को समझना और उसका इलाज करना जरूरी है।

इसमें कोई शक नहीं है कि राहुल गाँधी कांग्रेस को मजबूत करने के लिए जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन का काफी दारोमदार राहुल के कंधों पर होगा। पिछले लोकसभा चुनाव में सोनिया गाँधी ने इसी तरह रोड शो पर रोड शो करके बेजान कांग्रेस में जान फूंकी थी। उन्हीं की मेहनत के बदौलत १९९६ में सत्ता से बेदखल हुई कांग्रेस को २००४ में अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता का स्वाद चखने को मिला था। मां की मेहनत से बनाई विरासत को संभालने और उसे आगे ले जाने की सारी जिम्मेदारी राहुल के कंधे पर आ गई है। जनवरी में कांग्रेस प्रवक्ता वीरप्पा मोइली के यहां मीडिया के लिए आयोजित लंच के दौरान राहुल ने कहा था ... मम्मी आराम नहीं करतीं, उन्हें आराम की सख्त जरूरत है। ... ये एक संकेत था कि अब बेटा मां की जिम्मेदारी संभालने लायक हो गया है। उसी के साथ उन्होंने भारत दौरे का एलान किया और मार्च के पहले हप्ते में दौरा शुरू कर दिया। पहले उड़िसा फिर कर्नाटक और अब छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश का दौरा कर लिया है। हेलिकाप्टर से हो रहे इस भारत खोजो यात्रा से राहुल देश के उन हिस्सों से रू ब रू हो रहे हैं , जिनके बारे में उन्होंने अपने अपनी दादी, पापा और मम्मी से सुना होगा या फिर किताबों में और इंटरनेट पर पढ़ा होगा।

राहुल गाँधी चार साल से राजनीति में हैं। सांसद बनने के तीन साल तक तो वो सिर्फ अपने चुनाव क्षेत्र अमेठी में घुमते रहे हैं। अक्टूबर २००७ में उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया । एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस की जिम्मेदारी सौंप दी गई। तब से राहुल सही मायनों में अमेठी और यूपी से बाहर पैर निकालने शुरू किए हैं। हालांकि अभी तक का राहुल का राजनीतिक अनुभव कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुआ है। यूपी के विधानसभा चुनाव की कमान राहुल के हाथ में थी। टिकट बांटने से लेकर पार्टी की चुनावी रणनीति और प्रचार नीति तक सब उन्होंने बनाई। पूरे प्रदेश में जमकर रोड शो किए, रैलियाँ कीं, लेकिन कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं लगा। हाथ आजमाने के लिए गुजरात चुनाव में भी गए, वहाँ भी रोड शो किए और रैलियाँ की , मगर वहाँ भी नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। ज़ाहिर है राहुल की राजनीति करने का स्टाइल देश की जनता को पसंद नहीं आ रहा है। राहुल को देखने आना एक बात है और वोट देना और बात है। यूपी और गुजरात के सबक तो कम से कम वही हैं।

राहुल ने कारपोरेट जगत की तर्ज पर यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई के दरवाजे नौजवानों के लिए खोले हैं। जहाँ वो जाते हैं वहाँ यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई के कार्यकर्ता बैंकों के एक्जीक्यूटिव की तरह भर्ती के लिए स्टाल लेके बैठ जाते हैं। नौजवानों के फार्म भरवाए जाते हैं। राहुल कहते हैं कि नौजवानों को राजनीति में आने का मौका मैं दूंगा, लेकिन असल सवाल मौका मिलने का नहीं, बल्कि राजनीति में जगह बनाने का है। पहले से जो लोग राजनीति में हैं कांग्रेस में उनकी क्या जगह है ? आम परिवारों के कितने नौजवानों को पार्टी में ठीकठाक जगह मिल पाती है ? कितने पूरी तरह सैटल हो पाते हैं ? अगर ये सब नहीं हो रहा है तो नई भर्तियों का क्या मतलब ? हो सकता है कि आने वाले दिनों में राजनीति का ये स्टाइल लोगों को पसंद आए, लेकिन फिलहाल तो इसका फायता होता नहीं दिखता।

गुरुवार, 8 मई 2008

साढ़े सत्तरह सौ रूपए मिलेगें मतदाताओं को !

सुनने में अजुबा लग सकता है लेकिन सच है कि देश के करोड़ों मतदाताओं को उनके वोट देने के एवज में अब प्रति माह साढ़े सत्तरह सौ रूपए दिए जाएं। लोकसभा और राज्यसभा के कुछ सांसदों ने ये पहल की है कि देश के करोड़ों मतदाताओं को उनके वोट देने के एवज़ में प्रति माह साढ़े सत्तरह सौ रूपए दिए जाएं। हालांकि ये पूरा मामला अभी आरंभिक अवस्था में है। देखने सुनने में अटपटा लग सकता है लेकिन राज्यसभा के करीब २२ और लोकसभा के १२५ सांसदों ने इसके लिए पहल की है। इस पूरे मुद्दे पर नियम १९३ के तहत संसद के हाल ही में खत्म हुए सत्र में चर्चा होना था लेकिन समय से पूर्व सत्रावसान की वजह से इस पर चर्चा नहीं हो पाई। हालांकि इसकी पहल करने वाले सांसदों का समूह इससे कतई निराश नहीं है।

दरअसल ये पूरा मुद्दा इस सोच पर आधारित है कि भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्व में आजिविका के जिस अधिकार की बात कही गई है वो पूरा नहीं हो पाया है। एक तरफ तो हम देश के विकास के लंबे चौड़े दावे कर रहे हैं लेकिन उस विकास के साथ आम लोगों को भागीदार नहीं बनाया जा रहा है। इसी तर्क के मद्देनज़र इस समूह ने अपने वोटरशीप याचिका में कहा है कि सभी मतदाताओं को साढ़े सत्तरह सौ रूपए दिए जाने पर देश में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं बचेगा जिसके दीमाग को रोजगार न मिल जाए। इसमें कहा गया है कि नियमित आमदनी व्यक्ति के मन को स्वस्थ्य और सक्रिय रखती है जिससे ऐसा व्यक्ति उत्पादन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भूमिका निभाने लग जाता है। जबकि बेरोजगार व्यक्ति देश के लिए कई मायनों में विध्वंसक है।

यहाँ ये बड़ा सवाल है कि ये साढ़े सत्तरह सौ रूपए ही क्यों और इसका जुगाड़ कहाँ से हो पाएगा। इसके लिए भी याचिका में व्यवस्था की गई है ? इसमें कहा गया है कि जीडीपी की गणना करते समय मशीनों और इंसानों के प्रतिशत की अलग अलग गिनती हो और मशीनों के परिश्रम से पैदा हो रहे धन को मतदाताओं के बीच साम्यवादी तरीके से नकद रूप में और इंसानों के हिस्से को पूंजीवादी तरीके से वितरित किया जाए। आखिर मशीन किसी बेरोजगारी इंसान की कीमत पर ही तो हैं ? दरअसल देश की जीडीपी की कुल गणना के जरिए इसमें प्रत्येक मतदाता के हिस्से में साढ़े सत्तरह सौ रूपए की मांग की गई है।
दरअसल ये एक सोच है। इसके नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पक्ष हो सकते हैं लेकिन इसे अजूबा या अटपटा मान कर खारिज भी नहीं किया जा सकता है। ऐसे मुद्दों पर जिसमें एक बड़े वर्ग का हित जुड़ा हो बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के तो मेरा मानना है कि इसे बिना बहस किए खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

शुक्रवार, 2 मई 2008

लोकतंत्र में सामंती अवशेष

अंसारी जी ज़ी न्यूज़ से जुड़े हैं। पेशे से पत्रकार युसूफ़ जी लंबे अर्से से कांग्रेस कवर करते रहे हैं। लिहाजा राजनीति की कांग्रेसी शैली से गहरे वाकिफ हैं। उनका ये लेख उनकी पत्रिका रायसिना हिल से साभार है। आशा है आपको पसंद आएगी और आप अपने पसंद नापसंद को दर्ज़ भी करेंगे।
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तो राहुल गाँधी ने कह ही दिया कि मुझे युवराज न कहें। ये शब्द उन्हें अपमानित करने वाला लगता है। उनका कहना है कि आज देश में लोकतंत्र है और ऐसे में इन संबोधनों का कोई मतलब नहीं है। राहुल गाँधी छत्तीसगढ़ के कांकेर में प्रेस काँफ्रेस के दौरान ये बोल रहे थे। युवराज कहे जाने पर सवाल हुआ तो बिलख उठे। बोले व्यक्तिगत रूप से कहुँ तो मुझे ये शब्द इनसल्टिंग लगता है। बहुत दिन बाद जगे राहुल। जब से वो राजनीति में आए हैं तभी से उनके लिए युवराज शब्द का इस्तेमाल हो रहा है। सवाल ये है कि राहुल को कब से ये शब्द अपमानजनक लगने लगा। लगता है राज्यसभा में बवाल मचने के बाद से। अगर पहले से लगता तो मीडिया वालों को चिठ्ठी लिखकर मना कर देते मुझे युवराज मत लिखो।

हमें याद है नीतिश कुमार को मीडिया में नितीश लिखा जाता था। अजित सिंह को लोग अज़ीत सिंह लिखते थे। बात बड़ी छोटी सी है। मगर दोनों ने सारे अखबार वालों को चिठ्ठी भेजी और अपना नाम दुरुस्त करवा लिया। अब सभी नीतिश और अजित लिखते हैं। अगर राहुल गाँधी को युवराज कहे जाने पर इतना एतराज था तो भइया मीडिया वालों को एक बार बताया तो होता। कम से कम अपने कार्यकर्ताओं को ही कह दिया होता मत लिखो। शुरूआत तो मीडिया ने ही की थी राहुल को युवराज लिखने की। अब तो पार्टी नेता भी आपसी बातचीत में बोलने लगे हैं। उस दिन राज्यसभा में बवाल मच गया। कांग्रेस के सुदर्शन नचीयप्पन को युवराज कह कर संबोधित किया। शरद यादव, बलबीर पुंज और वृंदा करात समेत तमाम सांसदों की भृकुटियाँ तन गईं। शरद यादव और बलबीर पुंज बोले लोकतंत्र में युवराज शब्द का कोई मतलब नहीं है। सीपीएम की वृंदा करात ने नेपाल का हवाला दिया। बोली जो लोग युवराज, युवराज गा बजा रहे हैं , उन्हें याद रखना चाहिए कि नेपाल का क्या हश्र हुआ। जनता ने राजशाही को नकार दिया। वहाँ के युवराज को कहीं बाहर शरण लेनी पड़ रही है। ये बातें तो संसद के अंदर की है। संसद के बाहर तो लोग और पता नहीं क्या क्या कहते हैं।
और बोले तो बोलें भाजपा वाले भी बोलते हैं। सख्त एतराज है उन्हें राहुल को युवराज कहने पर। ये तो वही बात हुई कि छलनी बोले सूई से तेरे पेट में छेद। अब उनसे भी भला कोई पूछे तो। उनके यहाँ तो राजमाता थीं ...... विजयराजे सिंधिया। जब भी उनका नाम आया राजमाता ही कहा गया और अब भी यही कहते हैं। तब किसी को याद नहीं आई सामंती अवशेषों की। लोकतंत्र में युवराज शब्द का कोई मतलब नहीं है तो फिर राजमाता का क्या मतलब है। ज़रा बीजेपी वाले याद करें १९९८ में क्या नारा पार्टी का। उन्हें तो याद नहीं होगा। चलो हम ही बता देते हैं। भाजपा सीना ठोंक कर कहते थे ...... राज तिलक की करो तैय्यारी, आ रहे हैं अटल बिहारी....। अब उनसे कोई पूछे कि लोकतंत्र में किसी का राजतिलक होता है क्या। अब वाजपेयी का राजतिलक हुआ था या वो सत्तारूढ़ हुए थे। ये तो वही जाने। हम तो इतना जानते हैं कि उन दिनों लखनऊ से लेकर दिल्ली तक यही नारा लग रहा था। किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। वाजपेयी के विश्वासमत पर जब बहस हुई तो बहराईच से सांसद चुने गए आरिफ़ मोहम्मद खान ने इसी नारे को आधार बनाकर भाजपा की बखिया उधेड़ दी थी। उन्होंने कहा था ..... बाबा साहब भीमराव अंबेदकर ने २६ जनवरी १९५० को संविधान लागू करते वक्त ही कहा था कि अब इस देश में किसी का राजतिलक नहीं होगा, लेकिन लोकतंत्र विरोधी भाजपा वाजपेयी का राजतिलक कराके देश में लोकतंत्र की हत्या कर रही है और फिर से सामंतवादी व्यवस्था को ज़िन्दा कर रही है।

कांग्रेस में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अभी भी सपनों की सामंतवादी व्यवस्था में रहते हैं। सामंती अवशेष का इस्तेमाल करते हैं। .... राजमाता.... के पोते कांग्रेस में हैं। हाल ही में मंत्री भी बन गए। मगर ठाट अब भी महाराजाओं वाले हैं। महाराज ही कहलवाते हैं खुद को। उनकी विदेशी गाड़ी पर अब भी सिंधिया घराने का ही लोगा यानि की राजकीय पहचान चिह्न लगा हुआ है। उनकी बुआ जी हैं ... राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं। खुद को रानी कहती हैं। उनका सांसद बेटा नाम में कुंवर लगाता है। कुंवर पर याद आया कांग्रेस से बेआबरू होकर निकाले गए नटवर सिंह भी तो कुंवर नटवर सिंह हैं। अंग्रेजी में अपना नाम के नटवर सिंह लिखते हैं। उन्हें एक बार कुंवर कह दें ऐसे खुश होते हैं जैसे बहुत दिन से खुश ही नहीं हुए थे। इस लोकसभा में भी और पहले लोकसभा में भी कई सांसद ऐसे हैं जिनके नाम के साथ कुंवर लगा है।

लोकतंत्र तो अपने देश में पहले ही आ गया लेकिन सामंती व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं हुई। दूरदराज के इलाकों में निकल जाएं तो अभी भी राजे महराजे, कुंवर साहब आपको मिल जाएंगे। कईयों का तो बकायादा राज चलता है। लोकतंत्र का कानून वहाँ नहीं चलता। कई टीवी सीरियलों में भी ऐसे पात्र मिल जाएंगे जिनके नाम का पता नहीं होता है वो बस कुंवर साहब होते हैं। मतलब साफ है अपने लोकतंत्र में अब भी सामंती अवशेष बरकरार हैं। राहुल को तो युवराज अपमानजनक लगता है, सो बता दिया। बाँकियों को लगता है कि नहीं ये तो तब ही पता चलेगा जब बाँकि भी बोलेंगे।