
भाजपा ने कर्नाटक में सरकार बनाने लायक सीटें जीत ली हैं। विंध्य के पार भाजपा का कमल शतदल खिला , कईयों के चेहरे पर मुर्दानी छा गई। इस हार से न केवल केंद्र में सत्ता के झुले पर सवार कांग्रेस हिचकोले खाने लगी बल्कि उन कई राजनीतिक विश्लेषकों के चेहरे भी मुर्झा गए जिन्हें लगता था कि बनिओं की ये कथित पार्टी केवल उत्तर भारत में सांप्रदायिकता के रथ पर सवार होकर ही सत्ता का आलिंगन कर सकती है। दोपहर तक परिणाम आते आते एनडीटीवी और सीएनएन जैसे सेक्युलर चैनलों की हवा खराब हो गई। राजदीप बार बार खिसियाए चेहरे से अपने इंटलेक्चुअल दर्शकों से माफी मांगते नज़र आए। विनोद दुआ और पंकज पचौरी अंत तक आडवाणी के उस बयान की याद दिलाते रहे भाजपा को जिसमें उन्होंने बहुमत नहीं आने की हालात में विपक्ष में बैठने की बात कही थी। साफ दिख रहा था भाजपा की जीत से कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की बजाए इन पत्रकारों को निराशा हुई ।
बहरहाल कर्नाटक में भाजपा की जीत में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं था। कुछ लोग इसे बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहे हों लेकिन तमाम राजनीतिक दलों को इसका अहसास चुनाव से पहले ही था। ये वही राज्य है जिसने आपातकाल की विषम बेला में भी कांग्रेस नेतृत्व को मूंह छिपाने की जगह दी थी। आज उसी बेल्लारी और चिकमंगलूर जैसे इलाकों में हरेक तीन किलोमीटर पर मौजूद भाजपा का दफ्तर कांग्रेस को ये अहसास करा रहा है कि वाकई कांग्रेस दो सौ साल पुरानी हो गई है। ज़ाहिर है न केवल भारतीय जनता पार्टी के लिए ये जीत ऐतिहासिक है बल्कि भारत के राजनीतिक इतिहास में ये कई बदलावों का सूचक है। ये जीत भाजपा के लिए कोई तुक्का नहीं है न ही कर्नाटक की जीत को गुजरात की जीत की तरह देश का कथित सेक्युलर वर्ग ये कह कर ख़ारिज़ कर सकता है कि ये सांप्रदायिक उन्माद का वोट में तब्दीलीकरण है। देश की एक कथित उग्रपंथी राष्ट्रवादी चरमपंथी मानी जाने वाली पार्टी अब तक उत्तर भारत तक सिमटी हुई थी। २००४ में केंद्र में सत्ता से बाहर होने के बाद कई विश्लेषक ये भी मानने लगे थे कि भाजपा की पारी खत्म हुई या कि ९८ से २००४ तक का भाजपा का सफर भारतीय राजनीति में एक फिनोमिना था जो सांप्रदायिक उन्माद का बस चरम भर था। बनियों की ये पार्टी कभी देश भर में लोगों को स्वीकार्य नहीं हो सकती है। कर्नाटक में भाजपा की इस जीत के साथ इस तरह के कई भ्रम टूटते देखे जा सकते हैं। इस भ्रम का टूटना मैंने उस वक्त कामरेड सीताराम येचूरी के चेहरे पर भी महसूस किया था जब हाल ही में वो संसद में पत्रकारों को संबोधित करते हुए कन्नूर में मारे गए कामरेडों का स्यापा कर रहे थे। मैंने पहली बार किसी मार्क्सवादी को ये कहते सुना था कि उनके ही गढ़ में संघ ने उनके पच्चीस कार्यकर्ताओं को मार दिया। हालांकि वो ये भी गर्व से बता रहे थे कि १२५ संघ कार्यकर्ताओं को भी मार डाला कामरेडों ने। बहरहाल कर्नाटक की जीत का अहसास कन्नूर के संघर्ष में ही दिख रहा था। दक्षिण विजय ने भाषा की राजनीति के तेवर को भी थोड़ा ढिला ज़रूर किया होगा।इसमें कोई शक नहीं कि चंद पूंजीपतियों के बीच की ये पार्टी उत्तर भारत में पहले सवर्णों ( उत्तर प्रदेश ) और फिर बाद में सभी वर्गों ( मध्य प्रदेश और राजस्थान ) के बीच की पार्टी बनी और आज कर्नाटक में जीत के साथ अपनी सिर्फ उत्तर भारतीयों की पार्टी होने का भी कलंक धो लिया है। कर्नाटक की राजनीति को समझने वाले छह महीने पहले से ही कहने लगे थे कि राज्य में जनता दल के दिन लद चुके हैं। कांग्रेस का बोरिया बिस्तर तो जनता दल ने पहले ही समेट दिया था। ये ठीक वैसे ही है जैसा कि गुजरात में पहले जनता दल ने कांग्रेस का बोरिया बिस्तर समेटा और बाद में भाजपा ने जनता दल का। खैर ये न तो एक दिन का काम था और न ही छह महीने का। इसके पीछे एक पूरी सोच पिछले पंद्रह सत्तरह सालों से कर्नाटक में लगातार काम कर रही थी। धन्यवाद सुषमा स्वराज का जो एनडीटीवी पर विजय त्रिवेदी के साथ बातचीत में ये बताना नहीं भूली कि ये सिर्फ भाजपा की जीत नहीं है बल्कि पिछले बीस सालों में संघ के लोगों का और पार्टी के कैडर की मेहनत का नतीजा है।
बहरहाल भाजपा की लगातार जीत के साथ जो एक बात जुड़ी है वो राज्यों में एक कुशल नेतृत्व का विकास करना है। एक ऐसा चेहरा देना जो साफ छवि होने के साथ साथ जनता के बीच एक विश्ववसनीय नेतृत्व के रुप में जाना जाए। भाजपा की पिछली सारी जीतों में ये साफ है जबकि कांग्रेस के पिछले सारे हार में ये बड़ी वजह रही है। हाईकमान के भरोसे पूरे देश पर राज नहीं किया जा सकता है ... कर्नाटक की जीत से शायद कांग्रेस को ये सबक मिला हो। हालांकि कुछ लोग अतिउत्साह में भाजपा की केंद्र में वापसी के दावे भी ठोंकने लगे हैं। इन अतिउत्साहियों को ये ध्यान रखना होगा कि केंद्र में भाजपा की वापसी की राह जितनी कांग्रेस ने आसान बनाई है उतनी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने अपने लिए राह तैयार नहीं की है। ये बात भाजपा को नहीं भूलनी चाहिए कि केंद्र की राह अब भी लखनऊ के रास्ते से ही गुजरती है जहाँ मायावती अपने नए सामाजिक समीकरण के साथ हाथी पर कुंडली मार कर सवार है।
भाजपा की पिछली सभी जीतों की सबसे बड़ी वजह उत्तर प्रदेश में पार्टी के पराभव की भी सबसे बड़ी वजह है। बुढ़ाते नेतृत्व के भरोसे अगर भाजपा उत्तर प्रदेश में अपने लिए कोई आस देखती है तो शायद अगले छह महीने पार्टी के लिए आत्महत्या के राह पर आगे बढ़ने जैसा होगा। अगर भाजपा केंद्र में वापसी के सपने देखती है तो उसे विंध्य पार की सफलता से ही संतोष कर नहीं बैठना चाहिए बल्कि हिमालय की तराई में खुले घुम रहे हाथियों पर भी अंकुश लगाने में सफलता पानी होगी।




