शनिवार, 10 मई 2008

कांग्रेस को क्या होगा हासिल - यूसुफ़ अंसारी

राहुल गाँधी के बतौर प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करने के सवाल पर दिग्गज नेताओं के ...चापलूसी... से बाज आने की नसीहत देने वाली कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से कहना शुरू कर दिया है कि राहुल गाँधी के भारत दौरे का असर दिखने लगा है। राहुल गाँधी ने छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के आदिवासी इलाकों का अपना दौरा खत्म किया। ठीक उसी दिन कांग्रेस की नियमित प्रेस ब्रीफिंग में नए नवेले प्रवक्ता मनीष तिवारी ने दावा कर डाला कि दलित और आदिवासियों पर ...राहुल फैक्टर... का असर दिखने लगा है। कुछ दिन पहले इसी प्रेस ब्रीफिंग में चापलूसी से दूर रहने की नसीहत दिलायी थी और अब खुद कांग्रेस प्रवक्ता राहुल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रहे हैं। यानि मामला अनौपचारिक चापलूसी से बढ़कर औपचारिक तक पहुंच गया है।

अब जरा कांग्रेस के इस दावे को भी परखा जाए कि राहूल फैक्टर काम करने लगा है। कांग्रेस की दलील है कि बुंदेलखंड में राहुल गांधी के बारबार जाने से मायावती बौखला गई हैं। इसीलिए वो राहुल पर अनाप शनाप आरोप लगा रही हैं। इशारा उस बयान की तरफ है जिसमें मायावती ने कहा था कि दलितों के घर से वापस आने के बाद राहुल खास खुशबुदार साबुन से नहाते हैं। इतना ही नहीं बल्कि बाकयादा धूपबत्ती और अगरबत्ती से उनका शुद्दीकरण किया जाता है। इसी तरह से ये भी दावा किया गया कि राहुल के उड़ीसा के दौरे से वहां की नवीन पटनायक सरकार की नींद हराम हो गई। ये भी दावा है कि कर्नाटक दौरे के बाद राज्य में कांग्रेस की वापसी की उम्मीद और भी मजबूत हुई है। अब कांग्रेस का दावा है कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में राहुल के दौरे से भाजपा परेशान है। दोनों ही राज्यों में उसके पैर उखड़ने के संकेत मिलने लगे हैं।

अब जरा छत्तीसगढ़ में राहुल के दौरे की कुछ बानगी पर नजर डालिए। अपने दौरे के पहले दिन सरगुजा और आसपास के इलाकों के दौरा करने के बाद उन्हें कोरवा में रोड शो करना था, मगर आखरी वक्त में उसे रद्द कर दिया गया। इससे वहाँ के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का मनोबल उंचा हुआ होगा या गिरा होगा। इसका अंदाजा आप आसानी से लगा सकते हैं। शाम को राहुल ने जगदलपुर में कांग्रेस के चुने हुए जिला पंचायत सदस्यों और ग्राम प्रधानों के साथ बैठक की। इसमें राहुल के सामने ही कांग्रेसी आपस में भिड़ गए। सलवा जुडूम पर कांग्रेस एक दूसरे के कपड़े फाड़ते नजर आए। जगदलपुर अजित जोगी का गढ़ माना जाता है। लिहाजा यहाँ जोगी समर्थकों ने महेंद्र वर्मा , मोतीलाल वोरा और विद्याचरण शुक्ल के लोगों को पूरी तरह किनारे रखा। अगले दिन राहुल को एक गाँव कुम्हारपाटा जाना था। वहाँ सिर्फ तीन कार्यक्रम थे। दो कुम्हारों के घर जाना था और एक साथी नामक सामाजिक संस्था के दफ्तर जा कर उसके कामकाज के तरीकों पर नजर डालनी थी। इसका काफी प्रचार किया गया। मीडिया पहले ही उन कुम्हारों के घर पहुँच गया, जहाँ राहुल को जाना था। दोनों घरों के लोग अपने हाथों बने मिट्टी के बर्तन और दूसरे सामान लिए बैठे थे। वे लोग राहुल के कुछ बनाने के मकसद से गीली मिट्टी और चाक तैयार करके बैठे थे। राहुल गाँव में आए और सामाजिक संस्था के दफ्तर में गए। वहीं से सीधे हेलिकाप्टर में बैठकर वापस हो गए। हस्तशिल्पियों से मिलने के राहुल के कार्यक्रम का जितना प्रचार किया गया था वो पल भर में ही उल्टा पड़ गया।

एक खास बात देखने की है कि इस गांव के तमाम घरों को राहुल के आने से पहले ही हल्के नीले रंग से पोत दिया गया था। सारे घरों पर एनएसयूआई और युवक कांग्रेस ने नारे पोत दिए थे। कार्यकर्ताओं से बात करने पर पता चला कि जिन गाँवों में राहुल को जाना होता है वहाँ इसी तरह से किया जाता है। जिन घरों में राहुल को जाना था वहाँ घर की दीवारों पर पहले से ही कांग्रेस के झंडे पोस्टर और बैनर लगाए दिए गए थे और तो और इस बेहद गरीब घर की दीवारों पर राहुल गाँधी के आगमन का स्वागत करने के लिए बढ़िया फ्लैक्स के पोस्टर भी चस्पा थे। आगमन के लिए धन्यवाद के पोस्टर भी एडवाँस में ही चस्पाँ कर दिए गए थे। देखने सुनने में ये तो ये दावे बहुत छोटे लगते हैं , मगर इसका असर दूर तक होता है। जिस इमेज बिल्डिंग के लिए राहुल गाँधी देश के गाँव देहात का दौरा कर रहे हैं , उन्हीं गाँव देहात में इसका उल्टा असर भी हो सकता है।स्थानीय स्तर पर कांग्रेसी कार्यकर्ता भी ऐसा ही मानते हैं।

दिल्ली में बैठकर राहुल गाँधी के भारत दौरे के असर का अंदाज लगाना बेहद मुश्किल काम है। इस दौरे की सबसे अहम बात ये है कि राहुल जहाँ जाते हैं वहां अपना असर जरूर छोड़ते हैं। उनके कुछ कदम स्थानीय लोगों के दिल को छू जाता है। मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ के दौरे पर राहूल ने स्थानीय लोगों से महुआ से बनने वाली शराब के बारे में पूछा। उसे पीने की इच्छा जताई। तेंदू पत्ते के बारे में पूछताछ की। दरअसल यहाँ के आदिवासी इलाके के लिए महुआ और तेंदू पत्ता लाइफ लाइन है। उनके साथ खुद को जोड़कर या जुड़ने का अहसास दिलाकर राहुल ने ये जताने की कोशिश की कि उन्हें उनकी चिंता है। काकेर की अपनी प्रेस कांफ्रेस में राहुल बोले भी ... दो भारत हैं। एक मजबूत भारत और एक ऐसा भारत जिसकी आवाज सत्ता तक नहीं पहुंचती है। मैं उसी भारत की आवाज सुनने निकला हूं। .... लेकिन सिर्फ आवाज सुन लेना ही काफी नहीं है। उस दर्द को समझना और उसका इलाज करना जरूरी है।

इसमें कोई शक नहीं है कि राहुल गाँधी कांग्रेस को मजबूत करने के लिए जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन का काफी दारोमदार राहुल के कंधों पर होगा। पिछले लोकसभा चुनाव में सोनिया गाँधी ने इसी तरह रोड शो पर रोड शो करके बेजान कांग्रेस में जान फूंकी थी। उन्हीं की मेहनत के बदौलत १९९६ में सत्ता से बेदखल हुई कांग्रेस को २००४ में अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता का स्वाद चखने को मिला था। मां की मेहनत से बनाई विरासत को संभालने और उसे आगे ले जाने की सारी जिम्मेदारी राहुल के कंधे पर आ गई है। जनवरी में कांग्रेस प्रवक्ता वीरप्पा मोइली के यहां मीडिया के लिए आयोजित लंच के दौरान राहुल ने कहा था ... मम्मी आराम नहीं करतीं, उन्हें आराम की सख्त जरूरत है। ... ये एक संकेत था कि अब बेटा मां की जिम्मेदारी संभालने लायक हो गया है। उसी के साथ उन्होंने भारत दौरे का एलान किया और मार्च के पहले हप्ते में दौरा शुरू कर दिया। पहले उड़िसा फिर कर्नाटक और अब छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश का दौरा कर लिया है। हेलिकाप्टर से हो रहे इस भारत खोजो यात्रा से राहुल देश के उन हिस्सों से रू ब रू हो रहे हैं , जिनके बारे में उन्होंने अपने अपनी दादी, पापा और मम्मी से सुना होगा या फिर किताबों में और इंटरनेट पर पढ़ा होगा।

राहुल गाँधी चार साल से राजनीति में हैं। सांसद बनने के तीन साल तक तो वो सिर्फ अपने चुनाव क्षेत्र अमेठी में घुमते रहे हैं। अक्टूबर २००७ में उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया । एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस की जिम्मेदारी सौंप दी गई। तब से राहुल सही मायनों में अमेठी और यूपी से बाहर पैर निकालने शुरू किए हैं। हालांकि अभी तक का राहुल का राजनीतिक अनुभव कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुआ है। यूपी के विधानसभा चुनाव की कमान राहुल के हाथ में थी। टिकट बांटने से लेकर पार्टी की चुनावी रणनीति और प्रचार नीति तक सब उन्होंने बनाई। पूरे प्रदेश में जमकर रोड शो किए, रैलियाँ कीं, लेकिन कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं लगा। हाथ आजमाने के लिए गुजरात चुनाव में भी गए, वहाँ भी रोड शो किए और रैलियाँ की , मगर वहाँ भी नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। ज़ाहिर है राहुल की राजनीति करने का स्टाइल देश की जनता को पसंद नहीं आ रहा है। राहुल को देखने आना एक बात है और वोट देना और बात है। यूपी और गुजरात के सबक तो कम से कम वही हैं।

राहुल ने कारपोरेट जगत की तर्ज पर यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई के दरवाजे नौजवानों के लिए खोले हैं। जहाँ वो जाते हैं वहाँ यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई के कार्यकर्ता बैंकों के एक्जीक्यूटिव की तरह भर्ती के लिए स्टाल लेके बैठ जाते हैं। नौजवानों के फार्म भरवाए जाते हैं। राहुल कहते हैं कि नौजवानों को राजनीति में आने का मौका मैं दूंगा, लेकिन असल सवाल मौका मिलने का नहीं, बल्कि राजनीति में जगह बनाने का है। पहले से जो लोग राजनीति में हैं कांग्रेस में उनकी क्या जगह है ? आम परिवारों के कितने नौजवानों को पार्टी में ठीकठाक जगह मिल पाती है ? कितने पूरी तरह सैटल हो पाते हैं ? अगर ये सब नहीं हो रहा है तो नई भर्तियों का क्या मतलब ? हो सकता है कि आने वाले दिनों में राजनीति का ये स्टाइल लोगों को पसंद आए, लेकिन फिलहाल तो इसका फायता होता नहीं दिखता।

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