गुरुवार, 8 मई 2008

साढ़े सत्तरह सौ रूपए मिलेगें मतदाताओं को !

सुनने में अजुबा लग सकता है लेकिन सच है कि देश के करोड़ों मतदाताओं को उनके वोट देने के एवज में अब प्रति माह साढ़े सत्तरह सौ रूपए दिए जाएं। लोकसभा और राज्यसभा के कुछ सांसदों ने ये पहल की है कि देश के करोड़ों मतदाताओं को उनके वोट देने के एवज़ में प्रति माह साढ़े सत्तरह सौ रूपए दिए जाएं। हालांकि ये पूरा मामला अभी आरंभिक अवस्था में है। देखने सुनने में अटपटा लग सकता है लेकिन राज्यसभा के करीब २२ और लोकसभा के १२५ सांसदों ने इसके लिए पहल की है। इस पूरे मुद्दे पर नियम १९३ के तहत संसद के हाल ही में खत्म हुए सत्र में चर्चा होना था लेकिन समय से पूर्व सत्रावसान की वजह से इस पर चर्चा नहीं हो पाई। हालांकि इसकी पहल करने वाले सांसदों का समूह इससे कतई निराश नहीं है।

दरअसल ये पूरा मुद्दा इस सोच पर आधारित है कि भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्व में आजिविका के जिस अधिकार की बात कही गई है वो पूरा नहीं हो पाया है। एक तरफ तो हम देश के विकास के लंबे चौड़े दावे कर रहे हैं लेकिन उस विकास के साथ आम लोगों को भागीदार नहीं बनाया जा रहा है। इसी तर्क के मद्देनज़र इस समूह ने अपने वोटरशीप याचिका में कहा है कि सभी मतदाताओं को साढ़े सत्तरह सौ रूपए दिए जाने पर देश में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं बचेगा जिसके दीमाग को रोजगार न मिल जाए। इसमें कहा गया है कि नियमित आमदनी व्यक्ति के मन को स्वस्थ्य और सक्रिय रखती है जिससे ऐसा व्यक्ति उत्पादन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भूमिका निभाने लग जाता है। जबकि बेरोजगार व्यक्ति देश के लिए कई मायनों में विध्वंसक है।

यहाँ ये बड़ा सवाल है कि ये साढ़े सत्तरह सौ रूपए ही क्यों और इसका जुगाड़ कहाँ से हो पाएगा। इसके लिए भी याचिका में व्यवस्था की गई है ? इसमें कहा गया है कि जीडीपी की गणना करते समय मशीनों और इंसानों के प्रतिशत की अलग अलग गिनती हो और मशीनों के परिश्रम से पैदा हो रहे धन को मतदाताओं के बीच साम्यवादी तरीके से नकद रूप में और इंसानों के हिस्से को पूंजीवादी तरीके से वितरित किया जाए। आखिर मशीन किसी बेरोजगारी इंसान की कीमत पर ही तो हैं ? दरअसल देश की जीडीपी की कुल गणना के जरिए इसमें प्रत्येक मतदाता के हिस्से में साढ़े सत्तरह सौ रूपए की मांग की गई है।
दरअसल ये एक सोच है। इसके नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पक्ष हो सकते हैं लेकिन इसे अजूबा या अटपटा मान कर खारिज भी नहीं किया जा सकता है। ऐसे मुद्दों पर जिसमें एक बड़े वर्ग का हित जुड़ा हो बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के तो मेरा मानना है कि इसे बिना बहस किए खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

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