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तो राहुल गाँधी ने कह ही दिया कि मुझे युवराज न कहें। ये शब्द उन्हें अपमानित करने वाला लगता है। उनका कहना है कि आज देश में लोकतंत्र है और ऐसे में इन संबोधनों का कोई मतलब नहीं है। राहुल गाँधी छत्तीसगढ़ के कांकेर में प्रेस काँफ्रेस के दौरान ये बोल रहे थे। युवराज कहे जाने पर सवाल हुआ तो बिलख उठे। बोले व्यक्तिगत रूप से कहुँ तो मुझे ये शब्द इनसल्टिंग लगता है। बहुत दिन बाद जगे राहुल। जब से वो राजनीति में आए हैं तभी से उनके लिए युवराज शब्द का इस्तेमाल हो रहा है। सवाल ये है कि राहुल को कब से ये शब्द अपमानजनक लगने लगा। लगता है राज्यसभा में बवाल मचने के बाद से। अगर पहले से लगता तो मीडिया वालों को चिठ्ठी लिखकर मना कर देते मुझे युवराज मत लिखो।
हमें याद है नीतिश कुमार को मीडिया में नितीश लिखा जाता था। अजित सिंह को लोग अज़ीत सिंह लिखते थे। बात बड़ी छोटी सी है। मगर दोनों ने सारे अखबार वालों को चिठ्ठी भेजी और अपना नाम दुरुस्त करवा लिया। अब सभी नीतिश और अजित लिखते हैं। अगर राहुल गाँधी को युवराज कहे जाने पर इतना एतराज था तो भइया मीडिया वालों को एक बार बताया तो होता। कम से कम अपने कार्यकर्ताओं को ही कह दिया होता मत लिखो। शुरूआत तो मीडिया ने ही की थी राहुल को युवराज लिखने की। अब तो पार्टी नेता भी आपसी बातचीत में बोलने लगे हैं। उस दिन राज्यसभा में बवाल मच गया। कांग्रेस के सुदर्शन नचीयप्पन को युवराज कह कर संबोधित किया। शरद यादव, बलबीर पुंज और वृंदा करात समेत तमाम सांसदों की भृकुटियाँ तन गईं। शरद यादव और बलबीर पुंज बोले लोकतंत्र में युवराज शब्द का कोई मतलब नहीं है। सीपीएम की वृंदा करात ने नेपाल का हवाला दिया। बोली जो लोग युवराज, युवराज गा बजा रहे हैं , उन्हें याद रखना चाहिए कि नेपाल का क्या हश्र हुआ। जनता ने राजशाही को नकार दिया। वहाँ के युवराज को कहीं बाहर शरण लेनी पड़ रही है। ये बातें तो संसद के अंदर की है। संसद के बाहर तो लोग और पता नहीं क्या क्या कहते हैं।
और बोले तो बोलें भाजपा वाले भी बोलते हैं। सख्त एतराज है उन्हें राहुल को युवराज कहने पर। ये तो वही बात हुई कि छलनी बोले सूई से तेरे पेट में छेद। अब उनसे भी भला कोई पूछे तो। उनके यहाँ तो राजमाता थीं ...... विजयराजे सिंधिया। जब भी उनका नाम आया राजमाता ही कहा गया और अब भी यही कहते हैं। तब किसी को याद नहीं आई सामंती अवशेषों की। लोकतंत्र में युवराज शब्द का कोई मतलब नहीं है तो फिर राजमाता का क्या मतलब है। ज़रा बीजेपी वाले याद करें १९९८ में क्या नारा पार्टी का। उन्हें तो याद नहीं होगा। चलो हम ही बता देते हैं। भाजपा सीना ठोंक कर कहते थे ...... राज तिलक की करो तैय्यारी, आ रहे हैं अटल बिहारी....। अब उनसे कोई पूछे कि लोकतंत्र में किसी का राजतिलक होता है क्या। अब वाजपेयी का राजतिलक हुआ था या वो सत्तारूढ़ हुए थे। ये तो वही जाने। हम तो इतना जानते हैं कि उन दिनों लखनऊ से लेकर दिल्ली तक यही नारा लग रहा था। किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। वाजपेयी के विश्वासमत पर जब बहस हुई तो बहराईच से सांसद चुने गए आरिफ़ मोहम्मद खान ने इसी नारे को आधार बनाकर भाजपा की बखिया उधेड़ दी थी। उन्होंने कहा था ..... बाबा साहब भीमराव अंबेदकर ने २६ जनवरी १९५० को संविधान लागू करते वक्त ही कहा था कि अब इस देश में किसी का राजतिलक नहीं होगा, लेकिन लोकतंत्र विरोधी भाजपा वाजपेयी का राजतिलक कराके देश में लोकतंत्र की हत्या कर रही है और फिर से सामंतवादी व्यवस्था को ज़िन्दा कर रही है।कांग्रेस में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अभी भी सपनों की सामंतवादी व्यवस्था में रहते हैं। सामंती अवशेष का इस्तेमाल करते हैं। .... राजमाता.... के पोते कांग्रेस में हैं। हाल ही में मंत्री भी बन गए। मगर ठाट अब भी महाराजाओं वाले हैं। महाराज ही कहलवाते हैं खुद को। उनकी विदेशी गाड़ी पर अब भी सिंधिया घराने का ही लोगा यानि की राजकीय पहचान चिह्न लगा हुआ है। उनकी बुआ जी हैं ... राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं। खुद को रानी कहती हैं। उनका सांसद बेटा नाम में कुंवर लगाता है। कुंवर पर याद आया कांग्रेस से बेआबरू होकर निकाले गए नटवर सिंह भी तो कुंवर नटवर सिंह हैं। अंग्रेजी में अपना नाम के नटवर सिंह लिखते हैं। उन्हें एक बार कुंवर कह दें ऐसे खुश होते हैं जैसे बहुत दिन से खुश ही नहीं हुए थे। इस लोकसभा में भी और पहले लोकसभा में भी कई सांसद ऐसे हैं जिनके नाम के साथ कुंवर लगा है।
लोकतंत्र तो अपने देश में पहले ही आ गया लेकिन सामंती व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं हुई। दूरदराज के इलाकों में निकल जाएं तो अभी भी राजे महराजे, कुंवर साहब आपको मिल जाएंगे। कईयों का तो बकायादा राज चलता है। लोकतंत्र का कानून वहाँ नहीं चलता। कई टीवी सीरियलों में भी ऐसे पात्र मिल जाएंगे जिनके नाम का पता नहीं होता है वो बस कुंवर साहब होते हैं। मतलब साफ है अपने लोकतंत्र में अब भी सामंती अवशेष बरकरार हैं। राहुल को तो युवराज अपमानजनक लगता है, सो बता दिया। बाँकियों को लगता है कि नहीं ये तो तब ही पता चलेगा जब बाँकि भी बोलेंगे।
1 टिप्पणी:
यह लेख बहुत गहरा प्रहार करता है राजनीतिज्ञों पर ही नहीं उन्हें चुननी वाली जनता पर भी।
छलनी बोले सूई से तेरे पेट में छेद। - यह मुहावरा मैंने पहली बार सुना और अच्छा लगा।
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