भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के जलवे आज़ादी के पहले भी रहे लेकिन आजादी के तकरीबन तीन चार दशक के बाद इनकी धमक राष्ट्रीय राजनीति में साफ तौर पर दिखाई पड़ने लगी। इसकी शुरूआत देश में धुर दक्षिण से हुई जहां हिन्दी विरोधी आंदोलन के अगुवा सी एम अन्नादुरई ने 1967 में पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को राज्य की सत्ता से अपदस्थ कर तमिलनाडु के राजनीति की दशा और दिशा दोनों ही बदल दी। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की इस लहर ने करूणानिधि , एम जी रामचंद्रन और जे जयललिता जैसे कई दिग्गज़ों को तमिलनाडु की राजनीति में न केवल स्थापित नाम बना दिया बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति में राष्ट्रीय दल महज मूक दर्शक बन कर रह गए। राज्य की पूरी राजनीति इन्हीं क्षत्रपों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई। 
हिन्द महासागर से उठे इस राजनीतिक चक्रवात ने धीरे धीरे ही सही देश की राजनीति में क्षत्रपों को न केवल लोकप्रिय विकल्प के तौर पर खड़ा किया बल्कि केंद्रीकृत होती जा रही राजनीति को सही मायने में जन जन की राजनीति में तब्दील करने में अहम भूमिका निभाई। दरअसल धुर दक्षिण के साथ साथ धुर उत्तर यानि कश्मीर और पंजाब में भी क्षेत्रीय दलों ने अपना दबदबा आजादी के बाद से ही बनाया रखा। पंजाब में तो अकाली दल को पूरी तरह से उभरने में कुछ वक्त लगा जबकि इसके विपरीत जम्मू कश्मीर की राजनीति में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कांफ्रेस का दबदबा आरंभ से ही बना रहा। पंजाब और कश्मीर दोनों ही राज्यों में राष्ट्रीय दलों को दोनों ही क्षेत्रीय दलों ने लगभग लंबे वक्त तक हाशिए पर रखा।
अस्सी के दशक में आंध्र प्रदेश में तेलुगू सिनेमा के सुपरस्टार एन टी रामाराव का राजनीतिक अवतार न केवल प्रदेश की राजनीति बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी मील का पत्थर साबित हुआ। हैदराबाद हवाई अड्डे पर तत्कालीन सांसद राजीव गांधी के राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री को अनदेखा करने की बात केंद्र के सौतेले रवैय्ये के खिलाफ तेलुगू सिनेमा के इस महानायक के अभियान ने पहली बार प्रदेश में तेलुगूदेशम पार्टी का नेतृत्व करते हुए अपनी सरकार बनाई बल्कि भविष्य में राष्ट्रीय मोर्चे के रूप में केंद्रीय राजनीति में जो सफल प्रयोग हुआ उसके भी अगुवा एन टी आर ही रहे।
सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के खिलाफ खड़ा हुआ संपूर्ण क्रांति का अभियान केंद्र में भले ही दो साल में दम तोड़ गया लेकिन राज्यों की राजनीति में इसने कई क्षत्रपों को जन्म दिया और केंद्रीय राजनीति में इनके ही जलवे छाने लगे। खास तौर पर हिन्दी पट्टी के दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार, पूर्व में उड़िसा , पश्चिम भारत में गुजरात और दक्षिण भारत के कर्नाटक जैसे राज्यों में समाजवादियों ने पहली बार सरकारें बनाई। बाद में मतांतर की वजह से समाजवादियों की एकता भले ही खंडित हो गईं, लेकिन अपने अपने राज्यों में इन क्षत्रपों का वर्चस्व बरकरार रहा। बिहार में लालू यादव, उत्तर प्रदेश में विश्वनाथ प्रताप सिंह, चौधरी चरण सिंह, मुलायम सिंह यादव , उड़िसा में बिजू पटनायक, कर्नाटक में राम कृष्ण हेगड़े और एच डी देवेगौड़ा जैसे नेता इसी दशक में उफान पर आए।
यही नहीं इनकी एकता का उफान केंद्रीय राजनीति में 1989 में पहले राष्ट्रीय मोर्चे और चंद्रशेखर की सरकारों के रूप में दिखा और बाद में एच डी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल संयुक्त मोर्चे की सरकारों के रूप में सामने आया। इन सरकारों में प्रमुखता से अपनी भूमिका निभाने वाले जनता दल , लोक दल, द्रमुक, टीडीपी जैसे क्षेत्रीय दल आज भी विभिन्न राज्यों में अपनी महत्ती भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं।
यही नहीं इनकी एकता का उफान केंद्रीय राजनीति में 1989 में पहले राष्ट्रीय मोर्चे और चंद्रशेखर की सरकारों के रूप में दिखा और बाद में एच डी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल संयुक्त मोर्चे की सरकारों के रूप में सामने आया। इन सरकारों में प्रमुखता से अपनी भूमिका निभाने वाले जनता दल , लोक दल, द्रमुक, टीडीपी जैसे क्षेत्रीय दल आज भी विभिन्न राज्यों में अपनी महत्ती भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं।

पिछले एक दशक से भी अधिक वक्त से इन क्षेत्रीय दलों ने अपनी भूमिका का इस कदर विस्तार किया है कि केंद्र में कोई भी गठबंधन बिना इन क्षेत्रीय दलों के अपने मुकाम तक नहीं पहुंच सकता। दरअसल भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका सिर्फ विकल्प देने तक ही सीमित नहीं है बल्कि सही मायनों में सामाजिक न्याय और लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण को इन्होंने अंजाम तक पहुंचाया है। अब जबकि पंद्रहवी लोकसभा के लिए चुनाव सिरे चढ़ रहा है एक बात बिल्कुल साफ है राष्ट्रीय कहे जाने वाले दलों के लिए केंद्र में सरकार बनाना तब तक दूर की कौड़ी होगी जब तक कि ये क्षेत्रीय कहे जाने वाले दलों को साथ न ले लें। ज़ाहिर है क्षेत्रीय दलों की भूमिका सिर्फ सरकार बनाने तक ही सीमित नहीं है।

1 टिप्पणी:
फिलहाल तो ये छोटे दल किंग मेकर की भूमिका में है...सब इन्हें पटाने में लगे है...
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