मंगलवार, 12 मई 2009

चलो पीम बोएं उगाएं और काटे .... लोकतंत्र है भई

पंद्रहवीं लोकसभा के चुनावी महासमर के दौरान जिस पर सबसे ज़्यादा रार मची और ये कि जिसे आने वाले वक्त में शायद सबसे ज़्यादा याद किया जाएगा ... पहली बार चुनाव परिणाम आने से पहले देश ने प्रधानमंत्री पद के सबसे ज्यादा दावेदार देखे। राष्ट्रीय पार्टियों से लेकर इलाकाई क्षत्रपों तक ने देश के इस सर्वोच्च पद के लिए अपनी अपनी तालें ठोंकी। दिल्ली का तख्तो- ताज किस राजनैतिक दल को मिलेगा, ये सवाल अहम है बावजूद इसके एकबारगी ऐसा लगने लगा कि ये सवाल कहीं न कहीं पीछे चला गया और अहम ये हो गया कि आखिर इस सरकार का मुखिया कौन होगा।

इस सवाल के पीछे राजनीतिक दलों की भूमिका जितनी अहम थी राजनीतिक विश्लेषकों की भूमिका कहीं भी उससे कम नहीं थी। प्रेक्षक शुरूआत से ही मान कर चल रहे थे कि प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह केयरटेकर पीएम हैं जिन्हें सरकार के मुखिया के तौर पर भरत की भूमिका निभानी है। इसलिए बार बार ये सवाल उठता रहा कि पंद्रहवीं लोकसभा के दौरान कांग्रेस डा मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चुनावी समर में जाएगी या कि धीरे धीरे दलीय प्रतिबद्धता को बखुबी निभा ( पार्टी प्रवक्ताओं के मुताबिक ) रहे राहुल गांधी सही वक्त पर समर का नेतृत्व अपने हाथ में लेंगे। बहरहाल कांग्रेस नेतृत्व ने कई मंचों पर अपना स्टैंड मजबूती से साफ करने का अभिनय किया।

यूपीए में प्रधानमंत्री पद का मुद्दा यहीं नहीं थमा। कभी लालू , पासवान और मुलायम की तिकड़ी इस कोशिश में रही कि एनसीपी के शरद पवार यूपीए के भीतर बने इस चौथे मोर्चे का नेतृत्व थाम लें। इसके पीछे ये धारणा थी कि चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की सीटें कम होती हैं और ये क्षत्रप अपना गढ़ बचा पाने में सफल रहते हैं तो शरद पवार के पीछे गोलबंद हुआ जा सकता है। इसको लेकर एनसीपी में भी गुदगुदाहट होती रही, वो शरद पवार को पीएम मैटेरियल मानते रहे और इसको मूर्त रूप देने के लिए कभी कभी मराठा मुखिया की बात को भी हवा देते रहे। अंतत शरद पवार की इस स्वीकारोक्ति ने कि उनके पास पर्याप्त संख्या नहीं है , काफी हद तक यूपीए के भीतर प्रधानमंत्री पद को लेकर भ्रम साफ कर दिया। दरअसल ये साफगोई शरद पवार की शातिर अंदाज का एक नमूना है। ये शरद पवार भी जानते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के लिए घोड़े नहीं चाहिए होते बल्कि घोड़े पर दांव लगाने वाले चाहिए होते हैं। अपनी पार्टी के इकलौते सांसद चंद्रशेखर अगर इस देश में प्रधानमंत्री हो सकते हैं तो शरद पवार क्यों नहीं , ये बात वो भी बखूबी समझते हैं और सही वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं। दरअसल इसीलिए भी उन्होंने सन्यास के बाद भी पीच पर बैटिंग करने को उतरने मतलब चुनाव लड़े। इसके पीछे की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। लेकिन उनके इस मह्त्वाकांक्षा को अगर तीसरा मोर्चा चार चांद लगा सकता है तो कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी है जो हर कीमत पर इसे होने से रोकना चाहेगी।


बहरहाल एनडीए के अंदर लालकृष्ण आडवानी की ताज़पोशी भी कम उतार चढ़ाव से भरी नहीं रही। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सन्यास की घोषणा ने एनडीए के मुखिया के तौर पर कई नाम हवा में उछाले। आडवानी सबसे आगे ज़रूर थे लेकिन उनके राजनीतिक सफरनामे और भाजपा के भीतर ही चल रही खिंचतान को देखकर कई प्रेक्षकों को ऐसा लगता रहा कि शायद एनडीए में अपनी स्वीकार्यता को लेकर उन्हें लंबी लड़ाई लड़नी पड़े। बहरहाल जसवंत सिंह , शरद यादव, नीतिश कुमार आदि नामों की चर्चा के बीच अंतत आडवानी पीएम इन वेटिंग बनाए गए। लेकिन राजस्थान में पटकनी खाने के बाद भाजपा में भैरों सिंह शेखावत और वसुंधरा राजे के बीच टकराव ने पीएम इन वेटिंग आडवानी की सर्व स्वीकार्यता को भी अपने लपेटे में ले लिया। उप राष्ट्रपति पद से निवृत होकर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की गंगा स्नान करने की सलाह के बीच भैरों सिंह शेखावत ने लोकसभा चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। प्रेक्षकों ने इस हुंकार को आडवानी के खिलाफ उनके बगावत के रूप में देखा।

चुनावी महाभारत के दौरान अरूण शौरी के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री मैटेरियल बताने से रही सही कसर भी निकल गई। यूएनपीए से बदल कर लेफ्ट के आलंबन में तीसरे मोर्चे का स्वरूप अख्तियार करने वाली कथित विकल्प की राजनीतिक धारा में भी इस बात पर खुब हो हल्ला है। दरअसल यूएनपीए से तीसरे मोर्चे के रूप में चोला बदलने की नींव ही प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की घोषणा के बीच हुई। जब कई पार्टियां राष्ट्रीय हित में स्थानांतरित हुईं ,उसी वक्त लेफ्ट ने यूएनपीए की कमान संभाली और बसपा के साथ तीसरे मोर्चे का गठन किया। पहली बैठक में ही उत्तर प्रदेश में अपनी सफलता की हाथी पर सवार मायावती ने साफ कर दिया वो पीएम बनने के लिए तीसरे मोर्चे की हम सफर हुई हैं। बाद में मोर्चे में इस पर हुए ना नुकूर पर नाराज हुई मायावती ने तुमकूर की रैली में ना जाकर अपनी नाराज़गी का भी इज़हार कर दिया। तीसरे मोर्चे में मायावती के समर्थन में बड़े नेता खुलकर नहीं आए, इसके पीछे शायद वामपंथियों के मन में अतीत में किए गए एतिहासिक भूल सुधारने के लिए अवसर बनाने की कवायद और जयललिता जैसी कुछ अन्य नेता भी हैं जो ये मानती हैं कि इस बार केंद्र की राजनीति तमिलनाडु तय करेगा।

ये तीसरा मोर्चा एतिहासिक रूप से कई बार गुजराल और देवेगौड़ा जैसे डार्क हार्स पैदा कर चुका है। क्या पता वक्त की मजबूत पतवार पकड़ कर शरद पवार, नीतिश कुमार, मुलायम सिंह, प्रकाश करात, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू जैसे नेताओं में से ही कोई इस बार के डार्क हार्स बन जाएं। लेकिन इसके लिए ज़रूरी होगा कि क्षत्रप मजबूत बनकर उभरे साथ ही कि राष्ट्रीय दलों के कमज़ोर होने की उनकी प्रार्थना ईश्वर के दरबार में स्वीकार हो जाए। इंतज़ार कीजिए मतगणना का।

2 टिप्‍पणियां:

kumar Dheeraj ने कहा…

गुरूजी देश में प्रधानमंत्री पद के दाबेदारों की होड़ लगी हुई है । हर कोई प्रधानमंत्री बनने को बेताब है ।बात पहले एमडीए औऱ यूपीए की । ऐसा क्या कर दिया मनमोहन सिंह ने कि उन्हे दोबारा प्रधानमंत्री बना दिया जाए । मुझे तो ऐसा नही लगता है कि विकास का बहुत बड़ा खांका मनमोहन सिंह ने खीच दिया कि कांग्रेस उन्हे किसी तरह पीएम बना दे । रही बात पीएम इन वे‍टिंग की तो लालकृष्ण आडवाणी भी देश के लिए दंगे करवाने से ज्यादा कुछ नही करवा पाएं है इसलिए देश में अगर एनडीए सत्ता में आती है आडवाणी जी का सपना पूरा हो जाएगा...खैर ये तो वक्त की बात है । रही बात मराठा मानुष शरद पवार की तो राजनीति के दिग्गज माने जाने वाले पवार अपने तरफ से कोई गेम छोड़ना नही चाहेगे । हलांकि देश की राजनीति में कुछ विशेष उनके नाम भी नही है । बात मायावती पर जाकर जब ठहरती है तो लगता है कि एक दलित की बेटी को प्रधानमंत्री की कुसीॆ तक जाना चाहिए । हाथी की सवारी कर अन्य दलों को रौदनेवाली माया इसके लिए अपना इजहार भी कर चुकी है । भले ही वह अभी से धूमिल होता दिख रहा है । लालू ,पासवान औऱ मुलायम के हसीन सपने मुंगेरीलाल की तरह हो गए है जो लगता नही है कि इस बार पूरे हो पाएगे लेकिन लालसा सभी के दिल में है । बामदल भी किसी तरह से पीछे नही है औऱ कवायद जारी है भले ही तीसरा मोचाॆ बनने से पहले ही टूटता दिख रहा है । टीआरएस और जेडीएस अपना चेहरा दिखा चुके है और इसमें कोई अंदेशा नही कि सपने देखना बुरी बात तो नही लेकिन उसे हकीकत में बदलना कठिन जरूर होता है । डाकॆ होसॆ की बात से इत्तफाक रखता हू कि सियासी फिजा में कोई भी फूल गठजोड़ की बगिया में खिल सकता है और किसी के किस्मत पर मेहरबान हो सकता है । बाकी आप सब लिखनेवाले लोग भी कम माहिर नही है...कुछ अन्देशा जरूर लगा रहे होगे

kumar Dheeraj ने कहा…

गुरूजी मैने लिखा है कि पप्पू वोट देकर क्या करेगा जरा एक बाक तवज्जों दीजिएगा । धीरज कुमार