कल एक बार फिर झारखंड पहुंचा। ज़ाहिर है प्रदेश में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। अखाड़े में हर योद्धा ताल ठोंक रहे हैं लेकिन इन सबके बीच मधु कोड़ा के खिलाफ खुल गए पैसे के खेल ने मामले को और भी दिलचस्प मोड़ पर ला खड़ा किया है। दरअसल राष्ट्रीय फलक पर मधु कोड़ा फिलहाल झारखंड की राजनीति में अकेले खलनायक भले ही दिख रहे हों लेकिन झारखंड को जानने वाले ये बात भली भांति जानते हैं कि न तो वो अकेले खलनायक हैं और न ही ये खेल झारखंड के परिदृश्य पर कोई नया है। कई नाम हैं जो पांच चरण के चुनाव के दौरान हो सकता है सामने आए, लेकिन इस भुलावे में मत रहिएगा कि वो नाम भी सामने आएँगे जो वास्तव में कहीं दूर बैठे रांची का ये खेल खेल रहे थे। सही मायनों में अगर देखा जाए तो मधु कोड़ा का नाम सामने आना , कहीं भी झारखंड में पारदर्शी हो रहे सरकारी व्यवस्था या ईमानदारी होती व्यवस्था का नमूना नहीं है। बल्कि धूमिल की पंक्ति को अगर उधार लें तो .... सरल सूत्र उलझाऊ निकले बापू जी के तीन बंदर , वाली पंक्ति को ही चरितार्थ करता है।
मतलब ये कि कोड़ा सियासी चाल के एक मोहरे भर हैं जिसके जरिए ये दिखाने की कोशिश हो रही है कि पिछले कुछ सालों से झारखंड में लूट का जो सियासी खेल चला , हम उसके हिस्सा नहीं है। हमारा दामन साफ है। यानि की मेरी कमीज मैली नहीं है। और सबसे बड़कर अब झारखंड की जनता को उनकी सियासी किस्मत हमारे हाथ में सौंप देना चाहिए ताकि हम उनका विकास कर सकें। और इसके बाद चुनाव पर्व निपट जाएगा। अगर एक पार्टी या गठबंधन को सत्ता मिल गई तो भी और नहीं मिला तो भी ये सिलसिला चलता रहेगा। मधु कोड़ा का मामला चारा घोटाले की तरह वक्त की धूल के नीचे कहीं दब जाएगा। जनता यूं ही कराहती रहेगी। और ये नहीं हुआ तो अभी गला फाड़ फाड़ कर ईमानदारी की दुहाई देने वाले साथ बैठकर फोटो खिंचवाएंगे और जनता के हित में एक स्थायी सरकार बनाने के लिए इधर उधर स्थानांतरित होते रहेंगे। हमारे आपके हाथ में आएगा क्या कद्दू । इसलिए इन राजनेताओं के झांसे से बचिए लेकिन आपके पास विकल्प भी तो नहीं। आखिर किसी को तो चुनिएगा। जिसको चुनिएगा वही दुहेगा। आगे कुछ अच्छा मिलेगा तो आपको भी बताउंगा। इति
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