बुधवार, 16 दिसंबर 2009

मुस्लिम प्रधानमंत्री का लॉलीपॉप - यूसुफ़ अंसारी

कांग्रेस के महासचिव और भविष्य में प्रधानमंत्री पद के सबसे मज़बूत दावोदार और उम्मीदवार राहुल गांधी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ये कह कर मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की है कि मुसलमान भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। प्रधानमंत्री बनना धर्म नहीं बल्कि क़ाबिलियत पर निर्भर करता है। ये बात उन्होंने एक सवाल के जवाब में ये बात कही है। राहुल गांदई ने कहा तो ठाक ही है। किसी मुसलमान के प्रधानमंत्री बनने पर न संविधान में कोई रोक है और न ही क़ानून में। प्रधानमंत्री बनना राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। राहुल के बयान से एक नई बहस छिड़ी है। ये बहस कहीं न कही देश को 1947 तक ले जाती है। देश का बंटवारा ही इस बात को लेकर हुआ कि प्रधानमंत्री कौन हो। अगर उस वक्त जवाहर लाल नेहरू महात्मा गांधी की बात मानते हुए मोहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राज़ी हो जाते तो देश का विभाजन टल सकता था। ये सवाल उस वक्त जितना महत्वपूर्ण था आज भी उतना ही महत्वपूर्ण हैं।
पहले इस बात पर ग़ौर किया जाए कि क्या देश में कोई मुस्लिम राजनेता ऐसा है जिसमें प्रधानमंत्री बनने के गुण दिखते हों। जिस पर देश भरोसा कर सके कि ये व्यक्ति देश की बागडोर संभालने की क्षमता रखता है। दूसरा सवाल ये है कि ये तय कौन करेगा कि किस व्यक्ति में प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है। मनमोहन सिंह मे प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है इसका फैसला 2004 में कंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया था। लेकिन क्या मनमोहन सिंह सिर्फ क़ाबिलियत के भरोसे प्रधानमंत्री बनाए गए। अगर हां तो क्या प्रणव मुख्रर्जी मे प्रधानमंत्री बनने की क्षमता नहीं थी या इस वक़्त नहीं है। अगर नहीं तो फिर क्यों पिछली सरकार में प्रणव मुखर्जी को 60 से ज़्यादा मंत्रियों के समूह की अध्यक्षता क्यों सौंपी गयी। प्रणव मुखर्जी को अगर क़ाबिलियत के होते हुए प्रधानंमत्री बनने का मौक़ा नहीं मिला तो इस लिए कि वो इंदिरा गांधी की मौत के बाद के बाद प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे और राजीव को प्रधानमंत्री बनाए जाने के विरोध में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी। उसके बाद वो कांग्रेस में वापिस तो आ गए लेकिन सोनिया गांधी का भरोसा उस हद तक नहीं जीत पाए कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ पाते। ज़ाहिर है कि वो कभी दस जनपथ के उतना वफादार नहीं रहे जितने मनमोहन सिंह रहे। वफादारी क़ाबिलियत पर भारी पड़ी। राहुल गांधी में प्रधानमंत्री बनने के तमाम गुण मौजूद हैं क्योंकि वो ख़ुद ऐसे घर मे पैदा हुए हैं जिसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं। राहुल गांधी की टीम के तमाम लोगों की सबसे बड़ी क़ाबिलियत उनका मंत्रियों के घरों मे पैदा होना ही है। राहुल गांधी की टीम में ज़्यादातर वहीं हैं जिनेक पिता राजीव गांधी या फिर इंदिरा गांधी के मंत्रीमंडल में रहे हैं। मंत्री बनने लायक क़ाबिलियत तो किसी मुसलमान मे हो सकती है लेकिन वो प्रधानंमत्री बनने लायक क़ाबिलियत कहां से लाए। प्रधानमंत्री तो कोई मुसलमान पहले हुआ ही नहीं।
चलो मान भी लें कि मुसलमान प्रधानमंत्री बन सकता है तो क्या राहुल गांधी बताएंगे कि वो शुभ दिन कब आएगा। मुझे तो अगली आधी सदी इसकी कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। अभी केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार है। इसका कार्यकाल 2014 तक है। इसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। यानि 2014 तक तो मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री रहेंगे। उसके बाद अगर कांग्रेस की अकेले या फिर उसके गंठबंधन की सरकार बनती है तो प्रधानंमत्री खुद राहुल गांधी हो जाएंगे। अल्लाह उन्हें उम्र दराज़ करे तो कम से कम अगले चालीस साल तो कांग्रस मे उऩके अलावा प्रधनंमत्री पद के लिए किसी और का नंबर आने से रहा। बीजेपी तो मुसलमान के नाम से वैसे ही बिदकती है। लिहाज़ा उसकी तरफ से ऐसी किसी ग़लती की उम्मीद एकदम नहीं है। बचे बाक़ी दल तो उनमें मायावती, शरद पवार, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव और रामविलास पासवान ख़ुद ही प्रधानमंत्री पद की दावेदारी ठोकते हैं। वो भला क्यों किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाने की वकालत करेगें। राम विलास पासवान तो बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री का नारा देकर नतीजे भुगत चुके हैं। 2005 में पासवान ने बिहार वॆदान सभा में 29 सीटें जीती थी। अपना समर्थन देने के लिए उन्होंने लालू यादव और नीतीश कुमार के सामने किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाने की मांग रखी और उस पर अड़ गए। नतीजा क्या हुआ ? उसी साल हुए दोबारा हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सिर्फ़ 8 सीटों पर सिमट गयी। लोक सभा में पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया, खुद अपना चुनीव भी वो हार गए।
दर असल मुसलमानों के राजनीतिक सशक्तिकरण को लेकर अब कोई पार्टी गंभीर नहीं हैं। सबको अपना वोट खिसकने का डर रहता है। कांग्रेस अब पहले की तरह गंभीर नहीं रह गयी है। इसकी एक वजह उसका देशभर में कमजोर होना भी हो सकती है। क्योंकि ये सच है कि एक ज़माने में मुसलमानों के सशक्तिकरण के लिए कांग्रेस ने ही क़दम उठाए। कम ही लोग जानते हैं कि आज़ादी के बाद जम्मू-कश्मीर को छोड़कर देश के 6 राज्यों में मुस्लिम मुख्यमंत्री हुए हैं। एक को छोड़ कर सभी कांग्रेस के रहे। ये सारे मुख्यमंत्री तब हुए जब कांग्रेस की कमान इंदिरा गांधी के हात में थी। सबसे पहले राज्स्थान में बरकतुल्लाह ख़ान जुलाई 1971 से अगस्त 1973 तक दो साल से ज़्यादा मुख्यमंत्री रहे। उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में मोहम्मद अलीमुद्दीन मार्च 1972 से मार्च 1973 तक क़रीब साल भर तक कांग्रेस से मुख्यमंत्री रहे। बाद में वो मणिपुर पीपुल्स पार्टी की तरफ से 1974 में मार्च से जुलाई तक चार महीने के लिए मुख्यमंत्री बने। बिहार में अब्दुल ग़फूर जुलाई 1973 से अप्रैल 1975 तक क़रीब पौने दो साल मुख्यमंत्री रहे। केरल मे कांग्रेसक के समर्थन से अक्टूबर 1979 से दिसंबर 1979 तक क़रीब तीन महीने तक मुस्लिम लीग के सी एच मोहम्मद कोया मुख्यमंत्री रहे। महाराष्ट्र में ए आर अंतुले जून 1980 से जनवरी 1982 तक क़रीब डेढ़ साल मुख्यमंत्री रहे। असम में अनवरा तैमूर दिसंबर 1980 से जून 1981 तक क़रीब सात महीने तक मुख्यमंत्री रहीं। हालांकि कोई भी मुस्लिम मुख्यमंत्री अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया लेकिन इनके बाद किसी भी राज्य में कोई मुस्लिम मुख्यमंत्री बना ही नहीं। किसी में इतनी क़ाबिलियत नहीं थी या हालात ऐसे नहीं रहे। या फिर कांग्रेस नेतृत्व में किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा शक्ति बाक़ी न रही।
इस देश को उन 10 से 15 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में मुस्लिम मुख्यमंत्री देने वाली कांग्रेस आज किस मुक़ाम पर खड़ी है ? कांग्रेस संगठन की बात करें तो आज कांग्रेस में एक भी प्रदेश अध्यक्ष मुसलमान नहीं हैं। किसी भी राज्य में विधायक दल का नेता मुसलमान नहीं है। केंद्रीय संगठन पर ग़ौर करे तो यहां भी मुसलमानों की कमी साफ जलकती है। हालांकि पार्टी में सोनिया गांधी के बाद उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ही सर्वेसर्वा हैं। लेकिन संगठन मे मुसलमानों का नुमाइंदगी के तौर पर 9 में से सिर्फ़ दो महासचिव हैं- ग़ुलाम नबी आज़ाद और मोहसिना क़िदवई। पार्टी के 8 स्वतंत्र प्रभारियों में से एक भी मुसलमान नहीं हैं। पार्टी के 39 सचिवों में पांच मुसलमान हैं- परवेज़ हाशमी, शकीलुज़्जमां अंसारी, अब्दुल मन्नान अंसारी, महबूब अली क़ैसर और मिर्ज़ा इरशाद बेग। यूपीए सरकार की बात करें तो मनमोहन सिंह के नए मंत्रीमंडल में मुसलमानों की हिस्सेदारी उनके पिछले मंत्रीमंडल से कम हो गयी है। पिछली बार तीन मुस्लिम केबिनेट मंत्री थे इस बार कुल दो हैं। इनमें एक ग़ुलाम नबी आज़ाद और कांग्रेस के हैं और दूसरे फारूक़ अब्दुल्लाह सहयोगी दल नेश्नल कांफ्रेस से। एक स्वतंत्र प्रभार के साथ राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद हैं। सरकार में एक केबिनेट और दो राज्यमंत्री सहयोगी दलों की तरफ से हैं। जो पार्टी जीते हुए सांसदों को मंत्री बनाने से कतराती है उससे किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाने की उम्मीद रखना बेमानी है। अब तो कांग्रेस मुसलमानों तको राज्यपाल तक बनाने मे कंजूसी करने लगी है। झारखंड के राज्य पाल सैयद सिब्ते रज़ी का कार्यकाल पूरा होने बाद देश में कोई मुस्लिम राज्यपाल नहीं होगा। अभी तक तो किसी की नियुक्ति हुई नहीं है।
कांग्रेस को तो टिकट देने लायक क़ाबिल मुसलमना तक नहीं मिलते। 2007 मे गुजरात विधानसभा चुनाव मे पार्टी ने डरते डरते 7 मुसलमानों को टिकट दिए उनमे से 6 जीत गए। हाल ही में हुए हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने क़ाबिलियत नहीं होने का बहाना बना कर मुसलमानो को कम टिकट दिए। दरअसल 2005 में कांग्रेस ने पांच टिकट मुसलमानों को दिए थे जिनमे केवल एक ही जीत पाया था, वो पूरी विधानसभा मे अकेला। लिहाजा इस बार उसने तीन ही टिकट दिए उनमे एक जीता। चार और जीत गए। इसी तरह महाराष्ट्र में में कांग्रेस ने मुसलमानों के कम टिकट दिए लेकिन उनकी जीत का रिकार्ट पार्टी के आंकलन से कहीं बेहतर साबित हुआ। सावल ये है जब टिकट के बंटवारे में ही आप नाम तकाट देंगे तो हिस्सेदारी के लिए आगे कितने लोग बंचेंगे। किसी भी चुनाव मे टिकटों के बंटवारे के वक़्त पार्टी में आम सोच ये रहती है कि किसी मुसलमान को टिकट देने से ध्रुवीकरण हो जाएगा और इससे कांग्रेस को नुक़सान होगा। यानि पार्टी को अपने ही कार्यकर्ताओं, समर्थकों और वोटरों की धर्मनिरपेक्षता पर ही भरोसा नहीं हैं।
मुसलमानों को राजनीति मे हिस्सेदारी देने के मामले में राहुल गांधी कितने गंभीर हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस राहुल टीम की बात मीडिया में उछाली जाती है उसमें एक भी मुसलमान नहीं। राहुल गांधी की पहल पर लोकसभा चुनाव में पार्टी ने युवक कांग्रेस से दस टिकट दिए इनमें एक भी मुसलमान नहीं था। नौजवान सांसद हमदुल्लाह सईद को टिकट उनके पिता पीएम सईद की मौत की वजह से मिला। विधान सभा चुनाव में किसी भा राज्य में राहुल गांधी ने किसी मुस्लिम नौजवान के लिए टिकट की वकालत नहीं की। दरअसल राहुल गांधी अलीगढ़ में अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार पढ़े लिखे मुस्लिम नौजवानों से रूबरू हुए। उन्हें वहां मुसलमानों से जुड़ें कई अहम मुद्दों पर तीखे सवालों का भी सामना करना पड़ा। ऐसे ही तीखे सवाल के जवाब में उन्होंने मुस्लिम प्रधानमंत्री बनने की बात कह दी। इसका ये मतलब नहीं है कि वो किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनानाचाहते हैं। राहुल गांधी ने 2012 वलिधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने का संकल्प लिया है। इसके लिए उन्हे मुस्लिम वोटों की ज़रूरत है। पिछले चुनाव में वो टोपी लगा कर देवबंद की सड़कों पर घूमे थे। लेकिन वहां उन्हे वोट नहीं मिला। क्या मुस्लिम प्रधानमंत्री झूठा ख़्वाब दिखा कर वो मुसलमानों के वोट हासिल कर सकते हैं ? शायद नहीं। उन्हें ये समझना होगा कि मुस्लिम प्रधानंमत्री का लॉलीपॉप थमा कर वो कांग्रेस के लिए मुसलमानों की हमदर्दी तो हासिल कर सकते हैं लेकिन उनका वोट नहीं। मुसलमान आज समाज के दूसरे तबक़ों की तरह सत्ता में हर तरह से अपनी हिस्सेदारी चाहता है। मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए राहुल गांधी को ये सुनिश्चित करना होगा कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली सरकार इस कसोटी पर खरी उतरे।
(लेखक ज़ी न्यूज़ के सहायक संपादक हैं।)

1 टिप्पणी:

Irfan Ahmad ने कहा…

Muslims are still under the illusion of socio-historically established mundane thoughts and mentality. They should use Quranic psyche to solve their problems. If we do not have solutions for our problems under the limited sphere of modern thinking then it means we got to need to expand our horizons of understading with the familiarities and graces of Allah,the Almighty. It is not the question whether India should have a muslim PM or not but this is a real question posed by the real situations and circumstances of India that our PM should be MUSLIM(Submitted to God)for the general welfare.