बुधवार, 30 दिसंबर 2009

झारखंड - मोबाइल के झरोखों से


दशम झरना





हुंडरू झरने पर लकड़ी से बने सजावटी समान को बेचते आदिवासी












गिरीडीह की एक शाम - टूंडी जंगल




रांची चाईबासा मुख्य मार्ग पर पंचघाग का मजा लेता मैं
पंचघाग यानि पांच नदियों का संगम , चौदह किमी के दायरे में फैला




हिरानी जलप्रपात ( रांची चाईबासा मुख्य मार्ग पर )


हुंडरू फॉल -- मोबाइल कैमरे की नज़र से झारखंड का सौंदर्य

झारखंड विधानसभा चुनाव 2009 के दौरान डेड़ दो महीने मुझे झारखंड मेंं रहने मौका मिला था। सात आठ सालों से दिल्ली की भागदौड़ से यूं भी मन उबा ही रहता था। ऐसे में सोचा भी नहीं था कि झारखंड की चुनावी कवरेज हमारे लिए इतना रिफ्रेशिंग होगा। झारखंड प्रवास के दौरान न केवल राज्य की राजनीतिक हलचल और चुनावी गतिविधियों पर हमारी नजर थी बल्कि हमारी नज़र राज्य के अकूत प्राकृतिक सौंदर्य पर भी था। समय मिलते ही हमलोग काम को झटक कर निकल पड़ते प्रकृति की गोद में घंटों बैठने के लिए। ऐसे ही एक दोपहर मैं अपनी टीम के सात आठ लोगों के साथ निकल पड़े थे रांची के पास ही स्थित हुंडरू फॉल को देखने। सोचा था कि शायद बेहद भीढ़ होगी, लेकिन उम्मीद के विपरीत इतनी शांत जगह, इतन सुरम्य वातावरण, और इतना ज्यादा प्राकृतिक माहौल कभी देखने को नहीं मिला था। समस्या ये थी कि हम लोग बगैर किसी तैयारी के ही निकलते थे लिहाजा फोटो ग्राफी के लिए कैमरे वगैरह का इंतजाम नहीं होता था लेकिन हाथ में एक छोटा सा मोबाइल था, उससे ही कुछ फोटो उतार लाए थे।                                                                                            
हुंडरू जल प्रपात - रांची
 झारखंड प्रवास के दौरान न केवल राज्य की राजनीतिक हलचल और चुनावी गतिविधियों पर हमारी नजर थी बल्कि हमारी नज़र राज्य के अकूत प्राकृतिक सौंदर्य पर भी था। दिल्ली से हम लोग तीन चार समूह में राज्य की चुनावी रिपोर्टिंग के  लिए झारखंड में थे। दो टीमेेें हम लोग आस पास थे लिहाजा बेहद व्यस्त चुनावी कवरेज से समय चुरा कर हम थोड़ा बहुत घुम भी आते। मजे की बात ये थी कि मैं झारखंड का वाशिंदा होने के बाद भी झारखंड को इतना करीब से नहीं देख पाया था जितने करीब से व्यस्त चुनावी रिपोर्टिंग से समय चुरा कर घुमने वक्त देख पाया। मैंने अपने जीवन के शुरूआती तकरीबन 25 साल राज्य के संथाल परगना इलाके में गुजारे थे लेकिन मुझे झारखंड के छोटानागपुर या कोल्हान इलाकों के बारे में शहरों के नाम के अलावा ही शायद कुछ पता था। पहली बार इन इलाकों में घुमने, लोगों से बात करने और इन सबसे बढ़कर उन इलाकों की प्राकृतिक      खुबसुरती को इतने करीब से देखने का मौका मिला।                                                                          


दो महीनों में तो शायद हजारों तस्वीर बनाने के मौके मिले थे लेकिन चूंकि ऐसी कोई तैयारी थी नहीं, लिहाजा छोटे से मोबाइल फोन के जरिए जितनी तस्वीरें बना पाया, उनको सुरक्षित रख लिया गया। मैं झारखंड का था लिहाजा बहुत कुछ सुना सुनाया सा था लेकिन मेरे साथ जो लोग थे उनमें से आधिकांश अन्य राज्यों के थे... उनके मूंह से झारखंड की प्राकृतिक सुंदरता की तारीफ सुनने में मजा भी आता था लेकिन इन खुबसुरत जगहों के लिए राज्य सरकार के प्रयास की नाकाफी पर भी उनका लंबा चौड़ा भाषण सुनने को मिलता था। इसी क्रम में एक दोपहर हमारा कारवां पहुंच गया रांची के पास हुंडरू जल प्रपात देखने।



हुंडरू फॉल तक पहुंचने के लिए सीढियों के माध्यम से नीचे उतरना पड़ता है। मुहाने तक लाकर आपकी गाड़ी खडी हो जाती है और आप नीचे जाते हैं। खैर गाड़ी से उतर कर हमने आस पास देखा... झोपड़ियों के बने दो तीन खाने पीने के छोटे छोटे ढाबे जैसे थे। नीचे जाने से पहले मुझे लगा कि खाने पीने का इंतजाम कर लिया जाए। मैंं उनमें से एक झोपड़ी में अंदर गया और खाने पीने के बारे में बात की। स्थानीय लोगों ने बताया कि देशी या जंगली मुर्गा आसानी से उपलब्ध हो जाएगा लिहाज सबने कहा कि देशी मुर्गा का ही मजा लिया जाए तो हमने उन्हेंं मुर्गा और चावल की व्यवस्था करने को कहा औऱ कहा कि नीचे से लौट कर आते हैं, फिर खाएंगे। तब तक आप इंतजाम कर लीजिए। इसके बाद हम सभी नीचे प्रपात देखने चल पड़े।

उतरने वक्त तो हमारा ग्रुप पूरी तरह उत्साह से लबरेज था। धपा धप सीढ़िया उतर रहा था। हर किसी को जल्दीबाजी थी प्रपात के नीचे पहुंचने की। तकरीबन बीस मिनट सीढ़ियां उतरने के बाद हम नीचे प्रपात के पास पहुंच गए।  कुछ सीढ़ियां उतरने के बाद ही हवा ठंडी हो चली थी और पानी के चट्टानों से टकराने के बाद उत्पन्न आवाज हमें और तेजी से सीढ़ियां उतरने के लिए आकर्षित भी कर रहा था। बहरहाल एक चट्टान पर बैठ हम सभी पानी के चट्टान से टकराने की आवाज में खो गए थे।

काफी देर यूं बैठे रहने के बाद देखा दूबे जी अपने कपड़े उतार चुके थे, एक आध कैमरा असिस्टेंंट भी नहाने की मुद्रा में आ चुके थे। मैंं यूं ही बैठे बैठे चट्टान पर ही लुढ़क गया। एक तो जाड़े का दिन उपर से आसमां से बरसती शरद की धूप अपना असर दिखा चुकी थी। शरीर पर आलस हावी होने लगा था। आराम से चट्टान पर आसमां की ओर निगाह किये अलसायी शीत की धूप का मजा लेने लगा। भाई लोग चट्टान के नीचे बने कूंड नुमा तालाब में उपर चट्टाने से गिरती धारा के नीचे जल क्रिड़ा का आनंद लेने में व्यस्त हो चुके थे।

यूं ही प्रकृति की उस नीरवता में चट्टान पर लेटे लेटे कब आंख लग गई पता ही नहीं चला। पता नहीं कुछ मिनटों की बड़ी गहरी नींद आई। आंख खुली तो भाई लोग वापसी में सीढ़ियां चढ़ने के लिए तैयार हो चुके थे। अपन भी उठ लिए और चल पड़े वापस। भूख भी लग रही थी। मेरा ये हाल था तो पता नहींं जो लोग नहा चुके थे उनका क्या हाल रहा होगा। बहरहाल अब वापस उन सीढ़ियों को चढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन मजे में हम लोग वापस भी हो लिए। सीढ़ियों को चढ़ने के क्रम में भूख दोगुनी चार गुनी हो चुकी थी। ऐसे में उपर बैठ उस भाई का सहारा ही था। मन में ये आशंंका भी थी कि क्या पता पहुंचने के बाद खाना मिलने में देर न हो जाए। क्योंकि अब इंतजार करने तक का धैर्य नहीं बचा था। खैर उपर भी पहुंच गए। हमें देखते ही उस झोपड़ी नुमा ढाबे में हलचल और तेज हो गई।

जल्दी जल्दी चौकी बिछाया गया। सखुवा के पत्ते की थाली सजी। दूबे जी बेचारे अलग थलग बैठ गए। उनके लिए भी दाल चावल सब्जी, अचार, पापड़ का इंतजाम था। हमलोग शहरी अदा से भोजन करने का मन लेकर बैठे थे कि दो एक पीस मुर्गा मिलेगा चावल के साथ। लेकिन ये क्या ढाबे वाले भाई साहब ने पत्ते पर पहले चावल रखा और फिर दे दना दना मुर्गा और झोर डालना शुरू किया। हम भी टूट पड़ेे। एक तो भूख और उपर से आ रही खुशबू हमें बेचैन बना रही थी। जमाने बाद ऐसा स्वादिष्ट भोजन इतना छक कर खाया। ढाबे वाले ने हमारे लिए भी मुर्गा भात के अलावा दाल, बरी, पापड, दही आदि का भी इंतजाम किया था। टूट कर भोजन हुआ। बीच बीच में भाई लोग आपस में भोजन की तारीफ में एकाध शब्द भी खर्च कर रहे थे। खैर भोजन करने के बाद जब हम पहुंचे ढाबे वाले के पास बिल चुकाने को तो सात आदमी के भरपेट स्वादिष्ट भोजन की कीमत उसने बताई सिर्फ तीन सौ रुपये। हम सभी आश्चर्यचकित रह गए। पहले तो भोजन बनाने वाले की दिल खोल कर तारीफ की और फिर पॉकेट में मौजुद हजार रुपये का नोट उससे विदा लिया। और हम निकल पड़े रांची की ओर वापिस।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

झारखंड का सौंदर्य - मोबाईल कैमरे की नज़र से

दशम फाल -- रांची जमशेदपुर मुख्य मार्ग पर रांची से २० - २५ किमी की दूरी पर है। कहते हैं यहां पर पहाड़ी के उपर से दस नदियों का जल पत्थर के सीने को चीरता है। प्रकृति का अद्भभूत सौंदर्य। झारखंड राज्य के इन अद्भुत नजारों से झारखंड वासी होने के बाद भी मैं वाकिफ नहीं था। 2009 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान झारखंड के तकरीबन हर विधानसभा सीट पर जाने का मौका मुझे मिला था। इसी दौरान मैंने प्रकृति के इन अद्भुत नजारों का दीदार किया। उस वक्त पूरी तैयारी नहीं थी, लिहाजा पास में मौजुद मोबाइल कैमरो से जितना संभव हो सका, तस्वीर खींच ली। उसी मोबाइल कैमरे की नज़र से ये फोटो फीचर आप सब के लिए।

दशम फॉल रांची



                           दशम फॉल के ठीक सामने पहाड़ी का दृश्य


दूर से ली गई दशम की तस्वीर



सामने उंचाई से ली गई दशम की तस्वीर



मोबाइल कैमरे से ली गई तस्वीर

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

झारखंड की सियासत - बोए पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए


रत्नगर्भा की चुनावी जंग का परिणाम आ गया। कौन जीता , कौन हारा ? कहना आसान नहीं । भाजपा जो सबसे बड़ी पार्टी थी , कभी उसके पास दो दर्जन से ज्यादा विधायक थे ... आज भी सबसे बड़ी पार्टी है लेकिन उसके विधायकों की संख्या घट कर दो दर्जन से भी कम हो गई। कांग्रेस नौ सीटिंग विधायकों में से सात के हार जाने के बाद भी बाबु लाल मरांडी के सहयोग से अपना आंकड़ा पंद्रह तक ले जा पाने में सफल रही। उधर भाजपा की सहयोगी जनता दल युनाइटेड छह से घटकर दो तो राजद अपना आंकड़ा तकरीबन बरकरार रख पाने में सफल रही। निर्दलीयों को बहुत अधिक झटके लगे हों ऐसी बात नहीं। तकरीबन सभी जिन्होंने भंग विधानसभा में अपने जलवे बिखेरे थे एक फिर जीत के साथ विधानसभा प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं। उधर सुदेश महतो की आजसू ने भी अपने ताकत बढ़ाए हैं। इन सबमें झारखंड मुक्ति मोर्चा सबसे अधिक मजबूत हुआ है। अगर बाबुलाल मरांडी को छोड़ दें तो।


इस आंकड़े का कई लोग अपनी अपनी तरह से विश्लेषण कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि कांग्रेस और जेवीएम सबसे बड़े गठबंधन के तौर पर जीत कर सामने आई लेकिन भाजपा हार कर भी सरकार बनाने की दौड़ में सबसे आगे चल रही है। ये कुछ वैसा ही है जैसा कि पिछले विधानसभा में हुआ था। भाजपा जद यू गठबंधन ३६ सीट लेकर भी महज पांच सीटों के फासले से सरकार बना पाने में असफल रही थी। जबकि कांग्रेस और राजद क्रमश नौ और सात सीट लेकर भी सरकार बना ले गए थे। कहने की जरूरत नहीं कि इसके लिए सियासत के कौन कौन से अदाएं झारखंड ने देखे। इस बार कांग्रेस के दांव पेंच से ही भाजपा ने कांग्रेस को चारो खाने चित्त कर दिया। कहते हैं न बोए पेड़ बबुल का तो आम कहां से होए। सबसे बड़े गठबंधन के बाद भी कांग्रेस मूंह फाड़े देखती रही , भाजपा शिबू को लेकर उड़ गई।




दरअसल जो अब हो रहा है , उसकी नींव बहुत पहले पड़ चुकी थी। शिबू सोरेन और कांग्रेस की बीच असहमति के बीज बहुत पहले बोए जा चुके थे। अमेरिका के साथ परमाणु करार के मुद्दे पर जब कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन को विश्वास मत का सामन करना था तब शिबु सोरेन ही उसके तारणहार बने थे। इसके बावजुद केंद्र में उस वक्त उन्हें कोई बड़ा पद नहीं मिला था। बाद में गुरू जी की जीद पर उन्हें झारखंड में मुख्यमंत्री पद से नवाजा तो गया लेकिन उनको सबक सिखाने के लिए भी कांग्रेस और राजद जैसी पार्टियों ने कमर कस लिया था। लिहाजा छह महीने के भीतर विधानसभा की सदस्यता लेने की संवैधानिक बाध्यता के तहत जब गुरू जी ने तमाड़ से चुनाव लड़ने का फैसला किया तो यूपीए के भीतरघात की वजह से वो चुनाव हार गए। ये कांग्रेस और शिबु के रिश्ते में खटास बड़ाने में अहम मोड़ साबित हुआ। जानकार बताते हैं कि विधानसभा चुनाव प्रक्रिया की शुरूआत के बाद इतना कुछ होने के बाद भी शिबु सोरेन चाहते थे कि कांग्रेस राजद और जेएमएम साथ मिलकर चुनाव लड़े। वो मानसिक रूप से इसके लिए तैयार भी थे लेकिन कांग्रेस ने झारखंड में शिबु सोरेन की हार को गुरू जी की राजनीतिक कैरियर का अंत मानते हुए बाबुलाल मरांडी के रूप में नया सहयोगी ढुढ़ लिया। अंत तक कुछ बाते ऐसी हुईं जिसमें कुछ लोग बताते हैं कि गठबंधन के लिए गुरू जी को धमकी तक दी गई जिससे नाराज़ होकर उन्होंने अकेले जाने का फैसला किया। इस बीच गुरू जी अपने पुराने रूठे हुए कुछ सहयोगियों मसलन सूरज मंडल जैसों को मना कर नई रणनीति बुनने में लग गई। हालांकि सूरज मंडल खुद पड़ैय्याहाट से चुनाव हार गए लेकिन उनके झामुमो के साथ आने से संथाल परगणा में गुरू जी को काफी लाभ हुआ , खास तौर पर झामुमो के पुराने वोट बैंक को एकजूट रखने में ।


अब यहां से राजनीतिक लाभ हानि का दूसरा अध्याय प्रारंभ हुआ। कांग्रेस जेवीएम गठबंधन से सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी को हो सकता था तो वो जे एम एम और भाजपा थी। लिहाजा इन दोनों दलों ने सामने से तो नहीं , लेकिन परदे के पीछे आपस में मदद से चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया। इसमें ध्यान देने की बात है कि जेएमएम और जेवीएम दोनों के लिए संथाल परगणा और उत्तरी छोटानागपुर राजनीतिक हैसियत के लिहाज़ से महत्वपूर्ण थे। लिहाज़ा भाजपा ने ऐसे इलाके में कमज़ोर प्रत्याशी खड़े कर एक तरह से शिबू सोरेन को अंदर ही अंदर मदद किया। आप नतीजों के विश्लेषण से पाएंगें कि संथाल परगणा में अधिकांश सीटों पर ऐसा ही हुआ। मसलन मधुपुर जहां से भाजपा के राज पलिवार पिछली बार जीते थे वहां से दुबारा उन्हें न उतार कर राजनीतिक रूप से नौसखिया अभिषेक आनंद झा को टिकट देने के पिछे कहीं न कहीं झामुमो के हाजी हुसैन अंसारी को जीताने का लक्ष्य था। हुआ भी वही। जाहिर है जब अधिकांश सीटों पर चतुष्कोणीय मुकावला हो तो दो पार्टियों के आपसी समन्वय से सीट निकालना बहुत आसान रह जाता है। बहरहाल इसमें पेंच ये था कि भाजपा मान कर चल रही थी कि संथाल परगणा और उत्तरी छोटानागपुर जैसे कुछ इलाकों में आठ दस सीट गंवाने के बावजुद उसके पास कोयलांचल, कोल्हान और छोटानागपुर जैसे इलाकों से तकरीबन तीस सीटें आ जाएंगी और नीतिश के जलवे से दक्षिणी छोटानागपुर के इलाके जो बिहार से सटे हैं वहां से चार पांच सीटें जद यू को आ जाएंगी तो शिबू सोरेन को अपनी शर्तों पर सरकार में शामिल कर भाजपा की सरकार बना ली जाएगी। इसमें फार्मुला ये था कि दुमका से शिबु के बेटे हेमंत को जीता कर उप मुख्यमंत्री का पद दे दिया जाए और भाजपा का मुख्यमंत्री बना कर शिबु सोरेन को संयोजक बनाया दिया जाए। परिणाम आने के पहले भाजपा तकरीबन ये मान कर चल रही थी कि शिबु सोरेन इस पड़ाव पर अपनी राजनीतिक लाभ हानि के बजाए अपने बेटे और बहु के कैरियर को लेकर ज्यादा चिंतित होंगे लिहाजा बहु को कोई बढ़िया मंत्रालय और बेटे को डिप्टी सीएम देने के बाद उनको संयोजक जैसा कोई पद देने के बाद मनाना आसान होगा। इसके साथ ही ये मान कर भी भाजपा चल रही थी कि कांग्रेस से खर खाए बैठे गुरू जी उनके तरफ इतने पहल से तो मान ही जाएंगे।

अब परिणाम आने के बाद तीसरा अध्याय शुरू हुआ। इसमें शिबू के पास इतनी सीटें आ गईं कि उनको बिना खुश किए कोई भी दल या गठबंधन सरकार नहीं बना सकती थी। परिणाम ऐसा था कि कांग्रेस - जेवीएम, राजद , और शिबू प्राकृतिक तौर पर एक साथ आकर स्थायी सरकार की दिशा में पहल कर सकती थीं। ये स्वभाविक भी था लेकिन इसमें कई पेंच था। सबसे बड़ा पेंच था कि शिबु मुख्यमंत्री पद से नीचे मानने को तैयार नहीं थे। ये स्वभाविक भी था क्योंकि गुरू जी अपनी ताकत न केवल बचाने में सफल रहे थे बल्कि उससे आगे भी जा चुके थे। उधर कांग्रेस और जेवीएम स्वभाविक विजेता बन कर उभरी थी। लिहाजा कांग्रेस अब किंगमेकर से ज्यादा किंग बनने के सपने देख रही थी। ये भी स्वभाविक था। तीसरी तरफ बाबुलाल के लिए शिबू सोरेन उस कीमत तक ही पसंद थे जहां तक वो कांग्रेस जेवीएम को सरकार बनाने में समर्थन दे। उससे आगे इतनी सफलता के बाद न तो कांग्रेस और न ही जेवीएम शिबू को मुख्यमंत्री पद पर राजी हो सकती थी। ज़ाहिर है बाबुलाल अपनी भविष्य की राजनीति के लिए भी चिंतित थे। दूसरी तरफ कांग्रेस इस मुगालते में थी कि कैबिनेट में शिबू को एक पद देकर और बेटे को उप मुख्यमंत्री का पद देकर साथ ही विभिन्न मुकदमों का डर दिखाकर अपने साथ ला पाने में सफल रहेंगे। लेकिन जिस तरह गुरू जी ने मतगणना के दिन ही ये कहकर कि सरकार न तो दिल्ली में बनेगी और न ही रांची में बल्कि सरकार जिसे बनाना है वो बोकारो आए, अपने संकेत बिल्कुल साफ कर दिए। सफलता के रथ पर सवार कांग्रेस को इन संकेतों में समझने में देर हो गई।


अब बारी थी भाजपा की। जिसके पास राज्य में खोने के लिए कुछ भी नहीं था। ज़ाहिर है पिछले सात आठ सालों में जितने बूरे दिन भाजपा ने देखे हैं , इतने विधायक होने के बाद भी , उतने किसी ने नहीं देखे। लिहाजा शिबू के संकेतों को साफ साफ पड़ते हुए भाजपा ने पलटती बाजी को अपने नाम करने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई। जो पिछली बार कांग्रेस ने किया था बिल्कुल उसी अंदाज में भाजपा ने इस बार कांग्रेस को पटखनी दे दी। इसमें गुरू जी मुख्यमंत्री होंगे और आजसू के सुदेश महतो और भाजपा का एक एक डिप्टी सीएम होगा। राज्य में उसकी सरकार तो होगी।


इन सबमें बाबुलाल रह गए। सबसे ज्यादा सफलता हासिल कर भी विपक्ष में रहना पड़ा। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि अगर बाबुलाल अकेले लड़े होते तो दो दर्जन से ज्यादा विधायक उनके साथ होते। अगर आपको लगता है कि झारखंड में सब कुछ सामान्य हो गया तो आपको भी सोचने के लिए कुछ बातें दे देता हूं। आखिर अब तक झारखंड में यूपीए की मुखालफत करने वाले बाबुलाल अंतिम वक्त में कांग्रेस की गोद में क्यों बैठे ? कांग्रेस के पुराने नौ विधायकों में से सात हार गए। हारने वालों में प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू, विधायक दल के नेता मनोज यादव, राज्य में कांग्रेस का अल्पसंख्यक चेहरा फुरकान अंसारी, दिग्गज थामस हांसदा, बागुन सुम्ब्रई आदि बड़े बड़े नेता। फिर भी कांग्रेस का आंकड़ा एक दर्जन के उपर गया। मतदान के दिनों में आखिरी घंटों में मतदान का प्रतिशत पंद्रह से बीस फीसदी भागता रहा। ज़ाहिर है झारखंड में सोचने और लिखने के लिए बहुत कुछ है। आगे फिर कभी।

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

मुस्लिम प्रधानमंत्री का लॉलीपॉप - यूसुफ़ अंसारी

कांग्रेस के महासचिव और भविष्य में प्रधानमंत्री पद के सबसे मज़बूत दावोदार और उम्मीदवार राहुल गांधी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ये कह कर मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की है कि मुसलमान भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। प्रधानमंत्री बनना धर्म नहीं बल्कि क़ाबिलियत पर निर्भर करता है। ये बात उन्होंने एक सवाल के जवाब में ये बात कही है। राहुल गांदई ने कहा तो ठाक ही है। किसी मुसलमान के प्रधानमंत्री बनने पर न संविधान में कोई रोक है और न ही क़ानून में। प्रधानमंत्री बनना राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। राहुल के बयान से एक नई बहस छिड़ी है। ये बहस कहीं न कही देश को 1947 तक ले जाती है। देश का बंटवारा ही इस बात को लेकर हुआ कि प्रधानमंत्री कौन हो। अगर उस वक्त जवाहर लाल नेहरू महात्मा गांधी की बात मानते हुए मोहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राज़ी हो जाते तो देश का विभाजन टल सकता था। ये सवाल उस वक्त जितना महत्वपूर्ण था आज भी उतना ही महत्वपूर्ण हैं।
पहले इस बात पर ग़ौर किया जाए कि क्या देश में कोई मुस्लिम राजनेता ऐसा है जिसमें प्रधानमंत्री बनने के गुण दिखते हों। जिस पर देश भरोसा कर सके कि ये व्यक्ति देश की बागडोर संभालने की क्षमता रखता है। दूसरा सवाल ये है कि ये तय कौन करेगा कि किस व्यक्ति में प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है। मनमोहन सिंह मे प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है इसका फैसला 2004 में कंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया था। लेकिन क्या मनमोहन सिंह सिर्फ क़ाबिलियत के भरोसे प्रधानमंत्री बनाए गए। अगर हां तो क्या प्रणव मुख्रर्जी मे प्रधानमंत्री बनने की क्षमता नहीं थी या इस वक़्त नहीं है। अगर नहीं तो फिर क्यों पिछली सरकार में प्रणव मुखर्जी को 60 से ज़्यादा मंत्रियों के समूह की अध्यक्षता क्यों सौंपी गयी। प्रणव मुखर्जी को अगर क़ाबिलियत के होते हुए प्रधानंमत्री बनने का मौक़ा नहीं मिला तो इस लिए कि वो इंदिरा गांधी की मौत के बाद के बाद प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे और राजीव को प्रधानमंत्री बनाए जाने के विरोध में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी। उसके बाद वो कांग्रेस में वापिस तो आ गए लेकिन सोनिया गांधी का भरोसा उस हद तक नहीं जीत पाए कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ पाते। ज़ाहिर है कि वो कभी दस जनपथ के उतना वफादार नहीं रहे जितने मनमोहन सिंह रहे। वफादारी क़ाबिलियत पर भारी पड़ी। राहुल गांधी में प्रधानमंत्री बनने के तमाम गुण मौजूद हैं क्योंकि वो ख़ुद ऐसे घर मे पैदा हुए हैं जिसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं। राहुल गांधी की टीम के तमाम लोगों की सबसे बड़ी क़ाबिलियत उनका मंत्रियों के घरों मे पैदा होना ही है। राहुल गांधी की टीम में ज़्यादातर वहीं हैं जिनेक पिता राजीव गांधी या फिर इंदिरा गांधी के मंत्रीमंडल में रहे हैं। मंत्री बनने लायक क़ाबिलियत तो किसी मुसलमान मे हो सकती है लेकिन वो प्रधानंमत्री बनने लायक क़ाबिलियत कहां से लाए। प्रधानमंत्री तो कोई मुसलमान पहले हुआ ही नहीं।
चलो मान भी लें कि मुसलमान प्रधानमंत्री बन सकता है तो क्या राहुल गांधी बताएंगे कि वो शुभ दिन कब आएगा। मुझे तो अगली आधी सदी इसकी कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। अभी केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार है। इसका कार्यकाल 2014 तक है। इसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। यानि 2014 तक तो मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री रहेंगे। उसके बाद अगर कांग्रेस की अकेले या फिर उसके गंठबंधन की सरकार बनती है तो प्रधानंमत्री खुद राहुल गांधी हो जाएंगे। अल्लाह उन्हें उम्र दराज़ करे तो कम से कम अगले चालीस साल तो कांग्रस मे उऩके अलावा प्रधनंमत्री पद के लिए किसी और का नंबर आने से रहा। बीजेपी तो मुसलमान के नाम से वैसे ही बिदकती है। लिहाज़ा उसकी तरफ से ऐसी किसी ग़लती की उम्मीद एकदम नहीं है। बचे बाक़ी दल तो उनमें मायावती, शरद पवार, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव और रामविलास पासवान ख़ुद ही प्रधानमंत्री पद की दावेदारी ठोकते हैं। वो भला क्यों किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाने की वकालत करेगें। राम विलास पासवान तो बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री का नारा देकर नतीजे भुगत चुके हैं। 2005 में पासवान ने बिहार वॆदान सभा में 29 सीटें जीती थी। अपना समर्थन देने के लिए उन्होंने लालू यादव और नीतीश कुमार के सामने किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाने की मांग रखी और उस पर अड़ गए। नतीजा क्या हुआ ? उसी साल हुए दोबारा हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सिर्फ़ 8 सीटों पर सिमट गयी। लोक सभा में पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया, खुद अपना चुनीव भी वो हार गए।
दर असल मुसलमानों के राजनीतिक सशक्तिकरण को लेकर अब कोई पार्टी गंभीर नहीं हैं। सबको अपना वोट खिसकने का डर रहता है। कांग्रेस अब पहले की तरह गंभीर नहीं रह गयी है। इसकी एक वजह उसका देशभर में कमजोर होना भी हो सकती है। क्योंकि ये सच है कि एक ज़माने में मुसलमानों के सशक्तिकरण के लिए कांग्रेस ने ही क़दम उठाए। कम ही लोग जानते हैं कि आज़ादी के बाद जम्मू-कश्मीर को छोड़कर देश के 6 राज्यों में मुस्लिम मुख्यमंत्री हुए हैं। एक को छोड़ कर सभी कांग्रेस के रहे। ये सारे मुख्यमंत्री तब हुए जब कांग्रेस की कमान इंदिरा गांधी के हात में थी। सबसे पहले राज्स्थान में बरकतुल्लाह ख़ान जुलाई 1971 से अगस्त 1973 तक दो साल से ज़्यादा मुख्यमंत्री रहे। उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में मोहम्मद अलीमुद्दीन मार्च 1972 से मार्च 1973 तक क़रीब साल भर तक कांग्रेस से मुख्यमंत्री रहे। बाद में वो मणिपुर पीपुल्स पार्टी की तरफ से 1974 में मार्च से जुलाई तक चार महीने के लिए मुख्यमंत्री बने। बिहार में अब्दुल ग़फूर जुलाई 1973 से अप्रैल 1975 तक क़रीब पौने दो साल मुख्यमंत्री रहे। केरल मे कांग्रेसक के समर्थन से अक्टूबर 1979 से दिसंबर 1979 तक क़रीब तीन महीने तक मुस्लिम लीग के सी एच मोहम्मद कोया मुख्यमंत्री रहे। महाराष्ट्र में ए आर अंतुले जून 1980 से जनवरी 1982 तक क़रीब डेढ़ साल मुख्यमंत्री रहे। असम में अनवरा तैमूर दिसंबर 1980 से जून 1981 तक क़रीब सात महीने तक मुख्यमंत्री रहीं। हालांकि कोई भी मुस्लिम मुख्यमंत्री अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया लेकिन इनके बाद किसी भी राज्य में कोई मुस्लिम मुख्यमंत्री बना ही नहीं। किसी में इतनी क़ाबिलियत नहीं थी या हालात ऐसे नहीं रहे। या फिर कांग्रेस नेतृत्व में किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा शक्ति बाक़ी न रही।
इस देश को उन 10 से 15 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में मुस्लिम मुख्यमंत्री देने वाली कांग्रेस आज किस मुक़ाम पर खड़ी है ? कांग्रेस संगठन की बात करें तो आज कांग्रेस में एक भी प्रदेश अध्यक्ष मुसलमान नहीं हैं। किसी भी राज्य में विधायक दल का नेता मुसलमान नहीं है। केंद्रीय संगठन पर ग़ौर करे तो यहां भी मुसलमानों की कमी साफ जलकती है। हालांकि पार्टी में सोनिया गांधी के बाद उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ही सर्वेसर्वा हैं। लेकिन संगठन मे मुसलमानों का नुमाइंदगी के तौर पर 9 में से सिर्फ़ दो महासचिव हैं- ग़ुलाम नबी आज़ाद और मोहसिना क़िदवई। पार्टी के 8 स्वतंत्र प्रभारियों में से एक भी मुसलमान नहीं हैं। पार्टी के 39 सचिवों में पांच मुसलमान हैं- परवेज़ हाशमी, शकीलुज़्जमां अंसारी, अब्दुल मन्नान अंसारी, महबूब अली क़ैसर और मिर्ज़ा इरशाद बेग। यूपीए सरकार की बात करें तो मनमोहन सिंह के नए मंत्रीमंडल में मुसलमानों की हिस्सेदारी उनके पिछले मंत्रीमंडल से कम हो गयी है। पिछली बार तीन मुस्लिम केबिनेट मंत्री थे इस बार कुल दो हैं। इनमें एक ग़ुलाम नबी आज़ाद और कांग्रेस के हैं और दूसरे फारूक़ अब्दुल्लाह सहयोगी दल नेश्नल कांफ्रेस से। एक स्वतंत्र प्रभार के साथ राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद हैं। सरकार में एक केबिनेट और दो राज्यमंत्री सहयोगी दलों की तरफ से हैं। जो पार्टी जीते हुए सांसदों को मंत्री बनाने से कतराती है उससे किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाने की उम्मीद रखना बेमानी है। अब तो कांग्रेस मुसलमानों तको राज्यपाल तक बनाने मे कंजूसी करने लगी है। झारखंड के राज्य पाल सैयद सिब्ते रज़ी का कार्यकाल पूरा होने बाद देश में कोई मुस्लिम राज्यपाल नहीं होगा। अभी तक तो किसी की नियुक्ति हुई नहीं है।
कांग्रेस को तो टिकट देने लायक क़ाबिल मुसलमना तक नहीं मिलते। 2007 मे गुजरात विधानसभा चुनाव मे पार्टी ने डरते डरते 7 मुसलमानों को टिकट दिए उनमे से 6 जीत गए। हाल ही में हुए हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने क़ाबिलियत नहीं होने का बहाना बना कर मुसलमानो को कम टिकट दिए। दरअसल 2005 में कांग्रेस ने पांच टिकट मुसलमानों को दिए थे जिनमे केवल एक ही जीत पाया था, वो पूरी विधानसभा मे अकेला। लिहाजा इस बार उसने तीन ही टिकट दिए उनमे एक जीता। चार और जीत गए। इसी तरह महाराष्ट्र में में कांग्रेस ने मुसलमानों के कम टिकट दिए लेकिन उनकी जीत का रिकार्ट पार्टी के आंकलन से कहीं बेहतर साबित हुआ। सावल ये है जब टिकट के बंटवारे में ही आप नाम तकाट देंगे तो हिस्सेदारी के लिए आगे कितने लोग बंचेंगे। किसी भी चुनाव मे टिकटों के बंटवारे के वक़्त पार्टी में आम सोच ये रहती है कि किसी मुसलमान को टिकट देने से ध्रुवीकरण हो जाएगा और इससे कांग्रेस को नुक़सान होगा। यानि पार्टी को अपने ही कार्यकर्ताओं, समर्थकों और वोटरों की धर्मनिरपेक्षता पर ही भरोसा नहीं हैं।
मुसलमानों को राजनीति मे हिस्सेदारी देने के मामले में राहुल गांधी कितने गंभीर हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस राहुल टीम की बात मीडिया में उछाली जाती है उसमें एक भी मुसलमान नहीं। राहुल गांधी की पहल पर लोकसभा चुनाव में पार्टी ने युवक कांग्रेस से दस टिकट दिए इनमें एक भी मुसलमान नहीं था। नौजवान सांसद हमदुल्लाह सईद को टिकट उनके पिता पीएम सईद की मौत की वजह से मिला। विधान सभा चुनाव में किसी भा राज्य में राहुल गांधी ने किसी मुस्लिम नौजवान के लिए टिकट की वकालत नहीं की। दरअसल राहुल गांधी अलीगढ़ में अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार पढ़े लिखे मुस्लिम नौजवानों से रूबरू हुए। उन्हें वहां मुसलमानों से जुड़ें कई अहम मुद्दों पर तीखे सवालों का भी सामना करना पड़ा। ऐसे ही तीखे सवाल के जवाब में उन्होंने मुस्लिम प्रधानमंत्री बनने की बात कह दी। इसका ये मतलब नहीं है कि वो किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनानाचाहते हैं। राहुल गांधी ने 2012 वलिधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने का संकल्प लिया है। इसके लिए उन्हे मुस्लिम वोटों की ज़रूरत है। पिछले चुनाव में वो टोपी लगा कर देवबंद की सड़कों पर घूमे थे। लेकिन वहां उन्हे वोट नहीं मिला। क्या मुस्लिम प्रधानमंत्री झूठा ख़्वाब दिखा कर वो मुसलमानों के वोट हासिल कर सकते हैं ? शायद नहीं। उन्हें ये समझना होगा कि मुस्लिम प्रधानंमत्री का लॉलीपॉप थमा कर वो कांग्रेस के लिए मुसलमानों की हमदर्दी तो हासिल कर सकते हैं लेकिन उनका वोट नहीं। मुसलमान आज समाज के दूसरे तबक़ों की तरह सत्ता में हर तरह से अपनी हिस्सेदारी चाहता है। मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए राहुल गांधी को ये सुनिश्चित करना होगा कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली सरकार इस कसोटी पर खरी उतरे।
(लेखक ज़ी न्यूज़ के सहायक संपादक हैं।)