झारखंड विधानसभा चुनाव 2009 के दौरान डेड़ दो महीने मुझे झारखंड मेंं रहने मौका मिला था। सात आठ सालों से दिल्ली की भागदौड़ से यूं भी मन उबा ही रहता था। ऐसे में सोचा भी नहीं था कि झारखंड की चुनावी कवरेज हमारे लिए इतना रिफ्रेशिंग होगा। झारखंड प्रवास के दौरान न केवल राज्य की राजनीतिक हलचल और चुनावी गतिविधियों पर हमारी नजर थी बल्कि हमारी नज़र राज्य के अकूत प्राकृतिक सौंदर्य पर भी था। समय मिलते ही हमलोग काम को झटक कर निकल पड़ते प्रकृति की गोद में घंटों बैठने के लिए। ऐसे ही एक दोपहर मैं अपनी टीम के सात आठ लोगों के साथ निकल पड़े थे रांची के पास ही स्थित हुंडरू फॉल को देखने। सोचा था कि शायद बेहद भीढ़ होगी, लेकिन उम्मीद के विपरीत इतनी शांत जगह, इतन सुरम्य वातावरण, और इतना ज्यादा प्राकृतिक माहौल कभी देखने को नहीं मिला था। समस्या ये थी कि हम लोग बगैर किसी तैयारी के ही निकलते थे लिहाजा फोटो ग्राफी के लिए कैमरे वगैरह का इंतजाम नहीं होता था लेकिन हाथ में एक छोटा सा मोबाइल था, उससे ही कुछ फोटो उतार लाए थे।
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| हुंडरू जल प्रपात - रांची |
झारखंड प्रवास के दौरान न केवल राज्य की राजनीतिक हलचल और चुनावी गतिविधियों पर हमारी नजर थी बल्कि हमारी नज़र राज्य के अकूत प्राकृतिक सौंदर्य पर भी था। दिल्ली से हम लोग तीन चार समूह में राज्य की चुनावी रिपोर्टिंग के लिए झारखंड में थे। दो टीमेेें हम लोग आस पास थे लिहाजा बेहद व्यस्त चुनावी कवरेज से समय चुरा कर हम थोड़ा बहुत घुम भी आते। मजे की बात ये थी कि मैं झारखंड का वाशिंदा होने के बाद भी झारखंड को इतना करीब से नहीं देख पाया था जितने करीब से व्यस्त चुनावी रिपोर्टिंग से समय चुरा कर घुमने वक्त देख पाया। मैंने अपने जीवन के शुरूआती तकरीबन 25 साल राज्य के संथाल परगना इलाके में गुजारे थे लेकिन मुझे झारखंड के छोटानागपुर या कोल्हान इलाकों के बारे में शहरों के नाम के अलावा ही शायद कुछ पता था। पहली बार इन इलाकों में घुमने, लोगों से बात करने और इन सबसे बढ़कर उन इलाकों की प्राकृतिक खुबसुरती को इतने करीब से देखने का मौका मिला।
दो महीनों में तो शायद हजारों तस्वीर बनाने के मौके मिले थे लेकिन चूंकि ऐसी कोई तैयारी थी नहीं, लिहाजा छोटे से मोबाइल फोन के जरिए जितनी तस्वीरें बना पाया, उनको सुरक्षित रख लिया गया। मैं झारखंड का था लिहाजा बहुत कुछ सुना सुनाया सा था लेकिन मेरे साथ जो लोग थे उनमें से आधिकांश अन्य राज्यों के थे... उनके मूंह से झारखंड की प्राकृतिक सुंदरता की तारीफ सुनने में मजा भी आता था लेकिन इन खुबसुरत जगहों के लिए राज्य सरकार के प्रयास की नाकाफी पर भी उनका लंबा चौड़ा भाषण सुनने को मिलता था। इसी क्रम में एक दोपहर हमारा कारवां पहुंच गया रांची के पास हुंडरू जल प्रपात देखने।
काफी देर यूं बैठे रहने के बाद देखा दूबे जी अपने कपड़े उतार चुके थे, एक आध कैमरा असिस्टेंंट भी नहाने की मुद्रा में आ चुके थे। मैंं यूं ही बैठे बैठे चट्टान पर ही लुढ़क गया। एक तो जाड़े का दिन उपर से आसमां से बरसती शरद की धूप अपना असर दिखा चुकी थी। शरीर पर आलस हावी होने लगा था। आराम से चट्टान पर आसमां की ओर निगाह किये अलसायी शीत की धूप का मजा लेने लगा। भाई लोग चट्टान के नीचे बने कूंड नुमा तालाब में उपर चट्टाने से गिरती धारा के नीचे जल क्रिड़ा का आनंद लेने में व्यस्त हो चुके थे।



1 टिप्पणी:
बहुत सुंदर.
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