सोमवार, 31 मार्च 2008

माई कं‍ट्री माई लाइ...इफ - फील गुड़ से फील गुड़ तक


हमारे लालकृष्ण आडवाणी नया अवतार ग्रहण कर रहे हैं। नेता विपक्ष से पीएम इन वेटिंग का। डर इस बात का है कि ये नाम उनके साथ कहीं स्थायी रूप से चस्पां न हो जाए। दरअसल जब से भाजपा को ये लगने लगा है कि अब तो केंद्र में उनकी सरकार बननी तय है और आडवाणी जी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है तब से श्रीमान हर दिन किसी न किसी बात से चर्चा में बने हुए ही हैं। हालांकि ये अलग बात है कि कुछ चर्चाएं भाजपा को माइलेज देने की बजाए उनके लिए राह का रोड़ा ही साबित ही हो रहा है।

बहरहाल हम बात कर रहे हैं आडवाणी जी की नई पुस्तक माई कंट्री माई लाइफ की। इस पुस्तक में कई अंशों पर बवाल हो रहा है। हालांकि सबसे महत्वपूर्ण बात जो इस पुस्तक के जरिए राष्ट्रीय मीडिया में छाई हुई है वो है उनका ये कहना कि कँधार अपहरण कांड में विदेश मंत्री के जाने के फैसले से वो अवगत नहीं थे। बहरहाल अब आडवाणी जी ने ये क्यों कहा इस पर तो टिप्पणी नहीं की जा सकती। लेकिन इस बात पर विश्वास करना ज़रा मुश्किल है। कोई बेवकुफ इंसान भी आडवाणी की इस बात पर सहमत नहीं हो सकता। उस पर रही सही कसर तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडिज ने ये कह कर निकाल दी कि नहीं ऐसा नहीं था .... फैसले की बैठक में आडवाणी जी मौजूद थे ... हो सकता है उन्हें कुछ भ्रम हुआ हो।

अज़ी आडवाणी जी माना आपकी पूरी पार्टी एक बार फिर फील गूड कर रही है। ऐसे में आपको कंधार एपिसोड को लेकर इतना अपराध बोध महसूस करने की क्या ज़रूरत है। आप कंधार कांड में विदेश मंत्री के जाने को लेकर इतने शर्मिंदा क्यों हैं कि साफ झूठ बोल गए। पूरे एपिसोड पर इतने अपराध बोध क्यों। आपकी सरकार तो अपने विमान में सवार भारतीय यात्रियों की जान बचाने गई थी।

इस अपराध बोध के साथ साथ इस पूरे प्रसंग में आप अपना कद अटल बिहारी वाजपेयी से बड़ा करने की कोशिश में साफ देखे जा रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि ये राजनीति आपको उल्टी पड़ जाए। माना कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र की यूपीए सरकार आपके अनुकूल मौका बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आपकी पार्टी फीलगूड के चक्कर में पूरा होमवर्क कर ही न सके। और नतीजे में आप पीएम इन वेटिंग हीं रह जाएं। दरअसल पिछले कुछ समय से प्रधानमंत्री बनने की आपकी हड़बड़ाहट साफ देखी जा रही है। वैसे भी आपकी उम्मीदवारी को अब तक एनडीए के धड़े भी मुश्किल से ही पचा पाए हैं। ऐसे में जरूरत तो इस बात की थी कि आप यूपीए सरकार की विफलता को जनता तक ले जाते। आप तो खुद ही सफाई देने में लगे हुए हैं और सफाई भी ऐसी कि आप वाजपेयी सरकार के कई फैसलों से ही पीछा छुड़ाने की कोशिश में हैं।

ये ठीक वैसा ही व्यवहार है जैसा कि कोई व्यक्ति अपनी आत्ममुग्धता में और अपने परिणाम को लेकर निंश्चिचंतता के दौरान करता है। श्रीमान इसमें कोई शक नहीं कि माहौल सत्ता पक्ष के प्रतिकूल है परन्तु इसे अपने अनुकूल बनाने के लिए जो आप कर रहें हैं उसकी नहीं बल्कि देश भर में घुमकर जनता से सीधे संवाद करने की जरूरत है। देश भर में घूम कर रैली करने का कार्यक्रम भाजपा ने पहले ही रद्द कर दिया है। ये बात तो आप भी जानते हैं कि टीवी कैमरों के सामने आकर सरकार की आलोचना करने से चुनाव नहीं जीते जाते। कहीं ऐसा न हो कि ये फीलगूड पिछले फीलगूड से भी आगे निकल जाए और छिंका एक बार फिर कांग्रेस के हाथ लग जाए।

शुक्रवार, 28 मार्च 2008

माताओं के देश में तेरी यही औकात है ....

प्रस्तावित फिल्म हार्न ओके प्लीज़ के से‍ट पर चल रहे आइ‍टम सांग की शूटिंग के दौरान अभिनेत्री तनूश्री के साथ जो कुछ भी हुआ और बाद में ‍न्यूज़ मीडिया ने उसे जिस तरह चटखारे लेकर पेश किया उसे सभ्य समाज में किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है। हो सकता है कइयों के लिए ये मज़ेदार चटखारेदार खबर रही हो लेकिन सभ्यता का तो तकाजा यही है कि हम पूरे मामले में एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह व्यवहार कर सकते थे। घटना को जिस तरह से बताया गया ... माफ कीजिएगा जिस तरह से पेश किया गया उसमें कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा था कि हमें अपने हिन्दुस्तानी होने पर गर्व होना चाहिए।

एक अभिनेत्री फिल्म के सेट पर से एक वरिष्ठ कलाकार द्वारा की गई अभद्र आचरण की निंदा करते हुए बाहर चली आती है और हम लग जाते हैं उस पर मसाला लगाने। और तो और वहाँ मौजूद मीडिया कर्मियों का व्यवहार तो और भी माशा अल्लाह .... । एक लड़की जो अभी इंडस्ट्री में संघर्ष कर रही है ... एक स्थापित कलाकार पर ये आरोप लगाती है। उस वक्त उसकी हालात कितनी तनावपूर्ण रही होगी। और उससे सहानुभूति रखने की बजाए हम उसी का मजाक उड़ा रहे हैं। और तो और मीडिया कर्मी उसी लड़की को ज़लील करने पर उतारू हैं। क्यों ... वो बाइट दे या न दे ... तुम्हारे बाप का क्या ? धन्य हैं हम .... हमारा समाज... और हमारा प्रेस। इस तरह किसी नेता जी से बाइट माँग कर देखना भैय्या तुम्हें बता देगा तुम्हारी औकात ?
दरअसल हमारी पूरी मानसिकता में महिलाओं के प्रति सम्मान एक दिखावे के तौर पर ही मौजूद है या फिर इस डर से मौजूद है कि कोई हमारी माँ बहनों के साथ अमानुषिक व्यवहार न करे। हम दिल से औरत को पांव की जूती और खिलनिया ही समझते हैं और इसी में गौरवान्वित महसूस करते हैं। कार पर हमला करते लंबे बाल बाले उस कैमरामैन को देखकर कौन शख्स कहेगा कि ये उसी प्रेस का प्रतिनिधि जिसने आजादी के संघर्ष के दिनों में और बाद में राष्ट्रनिर्माण में महत्ती भूमिका निभाई है ? मर्दवादी सोच की हद तो देखिए सब तनूश्री की बाइट के पीछे भाग रहे थे, किसी ने नाना पाटेकर से इस आरोप पर सफाई मांगने की जरूरत भी नहीं समझी। और उस पर तुर्रा ये कि तमाम राष्ट्रीय मीडिया ने ..... माफ कीजिएगा नौटंकी मीडिया ने रगड़ कर इस खबर को हेडलाइन बनाई।

चौदह पंद्रह घंटे के बाद जब नाना पाटेकर से इस आरोप का जबाव मांगा तो वो भी हल्के फुल्के मूड में ऐसा जबाव दे रहे थे जैसा ये कोई मुद्दा ही नहीं हो। श्री मान नाना जी अगर ऐसे आरोप को आप अपने व्यक्तिव के हिसाब से ओछा मानते हैं तो कम से कम उसी उँचाई से जबाव भी देते। क्षण भर के लिए मान लेते हैं जान बूझकर नहीं ... सेट पर भीड़ की वजह से ही आपका काफी करीब चले गए हों तनूश्री के, तो इसे सहज भाव से कबूल करके , कह देते कि चलो भाई बात खत्म करो .... जाने अनजाने अगर ऐसा हो गया ... और तुम्हें बुरा लगा तो माफ करना। मेरी नियत खराब नहीं थी। आपका बड़प्पन सामने आता और बात आई गई हो जाती। आपने तो अपना बड़प्पन दिखाया ही नहीं।

वैसे भी मीडिया, साहित्य, कला, मनोरंजन आदि क्षेत्रों में रचनात्मकता की दलील पर ली जाने वाली छूट से कौन वाकिफ नहीं है ? ऐसे पेशों में शायद ही कोई लड़की आम तौर पर इस तरह की घटनाओँ को सार्वजनिक कर पाने का साहस कर पाती है। ऐसे में अगर तनूश्री ने ये हिम्मत की थी तो हमें भी जिम्मेदार व्यवहार करना चाहिए। पर न्यूज़ मीडिया से भला ऐसे व्यवहार की उम्मीद करना बेमानी ही है। जिसके खुद के घर शीशे के हैं वो भला क्या दूसरों को उपदेश दे पाएंगे।

मंगलवार, 25 मार्च 2008

सत्ता का शार्टकट - भारत एक खोज

राहुल गाँधी इन दिनों भारत की खोज कर रहे हैं। ध्यान दीजिएगा ये वो खोज है जो इससे पहले उनके नाना पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कोई छह दशक पहले की थी। इसी भारत की खोज दक्षिण अफ्रिका से लौटकर सदी के महामानव महात्मा गाँधी ने की थी। नेहरू और गाँधी की खोज के पीछे की वास्तविकता भारत से जूड़कर आजादी के संघर्ष के लिए हिन्दुस्तानियों को एकजूट करना था। बहरहाल अब गाँधी उपनाम लिए राहुल गाँधी कोई तीन चार राज्यों की यात्रा कर भारत की खोज पूरी करना चाहते हैं।
जानकार बताते हैं कि राहुल की यात्रा का मकसद लोकसभा चुनाव के पूर्व देश भर में घुम घुम कर काँग्रेस के लिए माहौल पैदा करना है। बहरहाल अगर कोई इस मकसद से दौरे कर रहा है तो उसमें कुछ भी गलत नहीं। संसदीय लोकतंत्र में ऐसा करना कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है। हालांकि इस बात पर कई लोग सवाल उठा सकते हैं कि क्या वाकई राहुल ऐसा चाहते हैं या इसके ज़रिए सिर्फ अपनी राजनीतिक पहचान और ज़मीन तलाश करना उनका मकसद है। यकीनन जिन्होंने भी राहुल की इस योजना को अमली ज़ामा पहनाया होगा उसके नज़र में न तो नेहरू रहे होगें और न ही महात्मा। तीसरे दर्जे में बैठकर रेल की यात्रा के जरिए भारत की खोज करता महात्मा और हेलिकाप्टरों और वातानुकूलित यान में बैठकर एसपीजी से घीरे भारत की खोज। बड़ा सही काँट्रास्ट है।


बहरहाल राहुल अभी कांग्रेस के महासचिव बना दिये गए हैं और प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह की नज़र में वे देश का भविष्य भी हैं। यही वजह है कि अपने अभिनव दौरे से उत्साहित राहुल कई बार ऐसा कुछ बोल जाते हैं जो उनके गले की फाँस बन जाता है। हाल ही में उड़िसा दौरा कर रहे राहुल ने हाईकमान को ही लपेटे में ले लिया। कहा कि हाईकमान की परंपरा खत्म होनी चाहिए और पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र लागू होना चाहिए। भई राहुल अगर ऐसा हो जाए तो आप महासचिव कैसे बन जाते। और हाईकमान का मतलब जानते समझते हैं कि नहीं आप ? कांग्रेस में इसका मतलब होता है आपका परिवार। श्रीमान इसका मतलब आप सोनिया गाँधी की तानाशाही ... अरे गलती हो गई... ठाकुरसुहाती खत्म करना चाहते हैं। आपकी माता जी के दस साल के अध्यक्ष कार्यकाल में ऐसा कभी भी नहीं लगा कि वो उन्हें नापसंद करती हैं। कभी ऐसा नहीं लगा कि राज्यों में मुख्यमंत्री का चयन विधायक की मर्जी से होता है। और इस परंपरा की शुरूआत किसी और ने नहीं बल्कि आपकी दादी जी ने ही किया। खैर ये सब तो आप क्या बदलेगें ....
कोशिश करके थोड़ा बहुत आप ही बदलिए। आपने अब तो कुछ भी नहीं किया है जिससे एक संसद के रूप में आपकी ही कोई पहचान बन पाए। महासचिव के रूप में आपकी उपलब्धता ही सवालों के घेरे में है। आपको अगर लगता है चुनाव के पूर्व गुजरात और कर्नाटक घुम लेने भर से भारत की खोज पूरी हो जाती है तो आप भी नारसिस्टक काम्पलेक्स से ग्रसित हैं। आपके इस खोज से साफ लगता है कि आप भारत की खोज नहीं सत्ता पाने का शार्टकर्ट खोजना चाहते हैं। लेकिन बदलते समय में भारत में अगर कुछ बदला है तो वो ये कि अब आम हिन्दुस्तानी वोटर इस शार्टकर्ट को बखुबी समझते हैं। राजीव दर्शन का क्या हाल हुआ आपको पता ही है। बहरहाल पार्टी आपकी बपौती ज़रूर है जम्हूरियत नहीं।

शनिवार, 15 मार्च 2008

नंदीग्राम की बरसी और अमेरीकी बवाल

जी हाँ १४ मार्च न केवल सोनिया गाँधी की कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में दस साल पूरे होने को लेकर महत्वपूर्ण है बल्कि आज ही के दिन पिछले साल पश्चिम बंगाल की कथित गरीब गुरबों की वाम मोर्चे के लाल झंडे के नीचे नंदीग्राम में दर्जनों किसान मारे गए थे। साल भर से विभिन्न मीडिया चैनलों पर ये खबर छाई रही लेकिन आज बरसी के दिन दो एक चैनलों के अलावा किसी ने इस खबर को याद तक नहीं किया। वो भी दो एक चैनलों ने इसलिए खबर चलाई क्योंकि सुबह सुबह खबर आई कि अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा जारी किए गए रिपोर्ट में नंदीग्राम में मानवाधिकार के उल्लंघन को रोक पाने में राज्य सरकार की नाकामी पर प्रदेश की वाम मोर्चे की सरकार की आलोचना की गई है।

दरअसल सुबह सुबह सारे चैनलों के बंधू सोनिया चालिसा खत्म कर २४ अकबर रोड से संसद पहुँचे ही थे कि टाइम्स नाऊ के वीनित और अनूप जी टकरा गए। बड़े हड़बड़ाए हुए से थे। मैंने भी पूछ लिया कि भैय्या बात क्या है आखिर ? बोले अरे अमेरिका ने वाम सरकार की आलोचना की है। बड़ी खबर है वामपंथियों को ढूंड़ रहे हैं। तभी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गुरूदास दासगुप्ता आते दिखाई दिए। चैनल वाले देखते ही लपके। मैं भी पीछे पीछे भागा। वैसे भी टीवी चैनल वालों को गुरूदास कुछ ज़्यादा ही रास आते हैं। बंगला मिश्रित अंग्रेजी में तीस सेंकेंड का परफेक्ट टीआरपी बाइट लेनी हो तो बस गुरूदास से अच्छा कोई नहीं।

बहरहाल लपक कर पकड़ा। सुबह सुबह चैनल वालों को पीछे भागता देख रूके ... मुस्कुराते हुए पूछा क्या हो गया ? रिपोटरों ने बताया दादा अमेरिकी रिपोर्ट में नंदीग्राम के मुद्दे पर वाम सरकार की आलोचना। चेहरे का रंग उड़ गया और फिर शायद गुस्से से लाल हो गया। गरज़े अमेरिका की ये मज़ाल । दुनिया का दारोगा बनने के चक्कर में हमें सिखाएगा। फिर याद कम्युनिज़्म बंगाल में ही है सिर्फ। लरज के बोले भारतीय लोकतंत्र के अंदरूनी मामलों में दखल देने वाला कौन होता है अमेरिका। हम उसकी रिपोर्ट को बंगाल की खाड़ी में फेंकते हैं। बहरहाल बोलने से पहले पूछ लिया खबर पक्की है तो। फिर लगे गरियाने। लेकिन इसी बीच एक काँटा फँस गया मेरे गले में। नंदीग्राम पर आलोचना अगर भारतीय लोकतंत्र के अंदरूनी मामलों में दखल है तो फिर गुजरात दंगों के मामलों में ये क्या है ? खैर मैंने कहा ज्यादा नहीं सोचना चाहिए ... बड़े लोग जो बोले वही सही
बहरहाल अब भाजपा की भी बाइट चाहिए थी। आहलुवालिया आए और अमेरिका की आलोचना की। अरे ई का इहो तो लेफ्टे जैसन बोला। का भैया आपको तो खुश होना चाहिए। कम से कम गुजरात के बाद अब अमेरिका नंदीग्राम की भी आलोचना कर रहा है। चलिए आप बुड़बक हैं तो हम क्या करें। देश की मर्यादा में मोदी की मर्यादा भूला गए। कोई बात नहीं। आप ठीक कहते हैं देश की इज्जत सबसे उपर। तभी तृणमूल के दिनेश त्रिवेदी आए। सबको याद दिलाया कि आज नंदीग्राम की बरसी है ... हमने राज्यसभा का वाकआउट किया है। एक फाँस और गड़ले रह गया कि आखिर देखते देखते साल भर बीत गया संसद में आखिरकर नंदीग्राम पर चर्चा नहीं ही हो पाई। फिर दीमाग गलत दिशा में सोचने लगा। हमने कहा भैया ठीक दिशा में सोचो। हमने कहा जय सोनिया गाँधी। हमने फिर कहा यूपीए के ललबबुआ की जय हो। फिर हम राष्ट्रीय हित में और कौनो काम करने लगे।

शुक्रवार, 14 मार्च 2008

दस साल सोनिया के

कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने पार्टी अध्यक्ष के रूप में दस साल पूरे कर लिए हैं। पार्टी जनों और देश के विशिष्टजनों की तरफ से उन्हें बधाइयों से नवाज़ा जा रहा है। आज सुबह कांग्रेस मुख्यालय २४ अकबर रोड और उनके निवास स्थान पर उनको बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। मीडिया भी यूपीए की चैयरपर्सन और पर्सन अभेभ द पीएम के घर के बाहर सुबह से ही अपनी दुकान लगा कर बैठ गई। बहरहाल दस साल के उनके सफर में कई उतार चढ़ाव आए लेकिन मीडिया और अन्य लोगों के हाव भाव से ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस के जीवन में ये दस साल किसी स्वर्णकाल से कम नहीं रहे जिसका विश्वलेषण करना तो किसी पाप से कम नहीं। इस अवधि की तो सिर्फ तारीफ ही हो सकती है बहरहाल सभी लगे रहे। हम भी अपनी दुकान सजा कर बैठे और बेच रहे सोनिया के दस स्वर्णिम साल।

अगर सोनिया गाँधी के इन दस सालों के सफर पर एक नज़र डालें तो कई बातें खुल कर सामने आती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हृदय विदारक हत्या के बाद कांग्रेस की हालत वाकई नाज़ुक हो चुकी थी। राजीव गाँधी की मौत भी ऐसे वक्त हुई जब कांग्रेस अपने गौरवमयी अतीत के मुहाने पर खड़ी थी। बहरहाल पी वी नरसिम्हा राव और सीताराम केशरी जैसे कांग्रेसी नेताओं ने एक हद तक पार्टी को संभालने की कोशिश की। खासतौर पर पी वी नरसिम्हाराव ने जिस तरह से अल्पमत सरकार को पांच साल तक खिंचा उसकी तारीफ की जानी चाहिए थी लेकिन आज कोई भी कांग्रेसी उनका नाम लेना तक गँवारा नहीं समझता। बहरहाल राजीव गाँधी की मौत के तुरंत बाद कांग्रेस जनों की निगाहें नेहरू गाँधी परिवार की बहु सोनिया गाँधी की तरफ उठीं। लेकिन उन्होंने तत्काल राजनीति में आने से इंकार कर दिया। लिहाजा कांग्रेस के विश्वसनीय कोषाध्यक्ष सीताराम केशरी पार्टी अध्यक्ष बने लेकिन उनके नेतृत्व में कांग्रेस विखंडन के दौर में प्रवेश करने लगी। आलोचकों के जबान को एक बार फिर बल मिला कि कांग्रेस सिर्फ नेहरू गाँधी परिवार के नीचे ही एकजूट रह सकती है।

लेकिन तकरीबन सात साल बाद जब सोनिया गाँधी राजनीति में आईं और कांग्रेस का नेतृत्व संभाला तो कई पुराने कांग्रेसियों की जान में जान आई। तीन राज्यों की विधानसभा तक सीमट चुकी कांग्रेस में निश्चित तौर पर एक नई ऊर्ज़ा का संचार हुआ और कांग्रेस चौदह राज्यों में सत्ता पर काबिज हुई। वाजपेयी के नेतृत्व में छह साल के एनडीए शासनकाल के बाद जोड़ तोड़ कर कांग्रेस के नेतृत्व में केंद्र में यूपीए की सरकार भी बनी। लेकिन केंद्र में सरकार बनने के चार साल बाद आज फिर कांग्रेस चार राज्यों में सीमट चुकी है। राजनीतिक पंडित यूपीए सरकार की उल्टी गिनती शुरू कर चुके हैं। क्या वाकई सोनिया गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस के दस साल ऐतिहासिक माने जा सकते हैं ?
बहरहाल सोनिया गांधी ने अपने इस सफ़र में कई राजनीतिक दाँव पेंच आजमाए। सन २००४ के आम चुनाव के बाद सात सीटों के अंतर से कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई। गठबंधन से तौबा करने वाली कांग्रेस ने कुनबा जोड़ कर सरकार बनाई। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद ठुकराकर तुरूप का इक्का चलाया। विदेशी मुद्दे पर सीर मुंड़ाने वाली सुषमाओँ और भारतियों के उपर ऐसा लगा बिना सिर मुँड़ाए ओले पड़ गए। वाकई सोनिया जी ने झन्नाटेदार शाट चलाया था। एक झटके में सोनिया गांधी आजाद भारत में बापू और जेपी की श्रेणी में आकर खड़ी हो गईं। पूरा देश उनके इस त्याग के आगे नतमस्तक हो गया। विपक्ष की वाकई बोलती बंद हो गई। लेकिन लाभ के पद के मामले में हुई नौटंकी तक आते आते इस शाट की हवा निकल चुकी थी। अपना राजनीतिक कद विपक्ष से भी उपर कर चुकी सोनिया उन्हीं राजनीतिग्यों के बीच आकर खड़ी दिखीं जो दाँव चलने में माहिर थे। बहरहाल त्यागमयी का त्याग व्यर्थ गया।

लेकिन इन दस सालों में जो एक बात सबसे ज़्यादा चुभती सी दिखाई देती है वो ये कि आज राज्य स्तर पर या केंद्रीय स्तर पर सोनिया के मुकावले कांग्रेस में एक भी कोई ऐसा नेता दिखाई नहीं देता जिनमें पार्टी या सरकार संभालने का माद्दा हो। क्या दस साल का समय कम होता है कि नेतृत्व के लिए एक पूरी पीढ़ी को तैयार किया जा सके। बहरहाल ले देकर मामला फिर नेहरू परिवार के अगले हीरो राहुल गाँधी पर जाकर टिकती जो अब भी ठीक से राजनीति में लड़खड़ाना भी नहीं जानता। बहरहाला देर सबेर उनमें भी राजनीतिक समझ आ ही जाएगी। लेकिन तब भी कोई इस सवाल का जबाव देगा कि नेहरू गाँधी परिवार की विरासत के अलावा क्या कोई और चीज कांग्रेस को जोड़े नहीं रख सकती ? क्या देश की राजनीति के लिए ये अच्छा न होता कि कोई कांग्रेसी ही इस सवाल को उठाता ?

बहरहाल राजनीति में दस साल पूरे करने के लिए सोनिया गांधी को मेरी तरफ से भी बधाई।

गुरुवार, 13 मार्च 2008

कन्नूर - राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई


पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय से कन्नूर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी , और संघ परिवार के लिए राजनीतिक वर्चस्व का अखाड़ा बना हुआ हुआ है। उन्नीस सौ सत्तर के बाद से ही इलाके में संघ परिवार के बढ़ते वर्चस्व से निपटने के लिए हँशिया हथौड़ा रक्तरंजित झड़पों के औजार बने हुए हैं। पिछले एक सप्ताह में इसकी आंच से दिल्ली का राजनीतिक तापमान भी बढ़ा हुआ है। दिल्ली में इसकी शुरूआत माकपा के मुख्यालय पर हुई पत्थरबाजी के रूप में सामने आया। अगले दिन संसद में वामपंथियों दलों ने जम कर बवाल काटा। दोनों सदनों की कार्रवायी में पिछले दो दिनों से जम कर व्यवधान पैदा किया। कल भी दोनों सदनों में ये बवाल छाया रहा।

यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रही माकपा इस मुद्दे पर दिल्ली में पत्थरबाजी पर सदन में चर्चा करना चाहती थी जबकि भाजपा की माँग थी कि इस पर कन्नूर की घटनाओँ के साथ चर्चा की जाए जहाँ हिंसक राजनीतिक झड़पों में उसके एक सौ पच्चीस से भी ज्यादा कार्यकर्ता मौत के घाट उतारे गए और कईयों को जीवन भर के लिए अपंग होना पड़ा। माकपा का कहना है कि ये राज्यों के कानून व्यवस्था से जुड़ा मामला है इस पर सदन में चर्चा नहीं हो सकती। बहरहाल परसों इस मामले पर केरल हाईकोर्ट का भी एक आवजर्वेशन आया कि कन्नूर में हिंसा के इस नंगे नाच को खत्म करने के लिए केंद्र हस्तक्षेप करे और इलाके में केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल भेजे जाएं। खबर ये भी आई कि माकपा राज्य सचिव ने इसकी आलोचना भी की।
बहरहाल कल माकपा के सीताराम येचुरी ने पिछले एक साल में कन्नूर में कथित तौर पर मारे गए माकपा कार्यकर्ताओं की एक लिस्ट मीडिया के सामने ज़ारी करते हुए संघ परिवार और भाजपा पर आरोप लगाए कि कन्नूर में अपनी राजनीतिक ज़मीन की तलाश में हिंसा का नंगा नाच कर रहे हैं। गौरतलब है कि कन्नूर भारत में वामपंथी आंदोलन का मक्का माना जाता है। इलाके के थलेसरी विधानसभा से केरल के वर्तमान गृह मंत्री विधानसभा पहुँचते हैं। इसके साथ ही उन्होंने संघ परिवार पर ये भी आरोप लगाए कि न केवल केरल बल्कि देश के अन्य इलाकों में भी संघ परिवार के लोग माकपा कैडरों , प्रतिष्ठानों पर हमला करते रहे हैं और हाल के दिनों में इसमें काफी तेजी आई है। एकबारगी को ये तो माना जा सकता है देश के अन्य इलाकों में ऐसा हो सकता है। लेकिन केरल में जहाँ वामपंथियों की सरकार है जिस इलाके का प्रतिनिधित्व राज्य के गृहमंत्री करते हों वहाँ संघ परिवार उन पर हमला कर रहा है , बात कुछ हजम नहीं होती। उन्होंने आरोप लगाए कि पिछले एक साल में सिर्फ कन्नूर में संघ परिवार के उन्नतालिस हिंसक हमलों में माकपा के छियालिस कैडरों को जान से हाथ धोना पड़ा।
सीताराम जी आपकी राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी है। उनका जबाव था कि राज्य के गृह मंत्री संघ ने संघ परिवार को बैठ कर बातचीत के ज़रिए समस्या का हल निकालने का आमंत्रण दिया लेकिन संघ परिवार के लोग बैठकर बातचीत करने को तैयार नहीं। ऐसे में संघ परिवार अगर हमले करता है तो वो ये मान कर न चलें कि हम चूप रहेगें हमें भी मुँहतोड़ जबाव देना आता है।
भई वाह । अब भाजपा बातचीत के जरिए समाधान तलाशने को एक छलावा बताते हुए कहती है कि जिस गृहमंत्री के इशारे पर ही ये सारी कारिस्तानी हो रही है उससे बातचीत का क्या मतलब है। इलाके के राजनीतिक इतिहास को जानने वाले बताते हैं कि संघ परिवार की आशंका गलत भी नहीं है। और ऐसा भी नहीं है कि इलाके में सिर्फ संघ परिवार निशाने पर हो बल्कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता भी उसी तरह से निशाने पर हैं। बहरहाल कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे हुए है। हालांकि दिल्ली में पत्थरबाजी की घटना पर वो भाजपा और संघ परिवार की आलोचना ज़रूर कर रही है। हालांकि कांग्रेस प्रदेश इकाई के अध्यक्ष रमेश चेन्नीथाला भाजपा और संघ परिवार की ही बात दुहरा रहे हैं। लेकिन क्या करें केंद्रीय नेतृत्व की मजबूरी है। इस मजबूरी को पहले भी मूर्त में उस घटना में देखा गया जिसके तहत नंदीग्राम पर अब तक सदन में चर्चा नहीं हो पाई।
बहरहाल संघ परिवार भी इस पूरे मामले में पिछे हटने को तैयार नहीं दीख रही है। ईंट का जबाव पत्थर से देने के मुद्रा में संघ परिवार अपनी मुठ्ठियाँ ताने हुए है। माकपा की सोच है राज्य स्तर पर तो हम निपट लेगें लेकिन उनकी कोशिश है कि मामला को राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ने से उसकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बहरहाल इस मुद्दे पर न्यायालय सहित चौतरफा आलोचना के बाद अब माकपा बैकफुट पर है। इसके साथ ही इलाके में अपने वर्चस्व को भी वो किसी कीमत पर खोना नहीं चाहती।

बुधवार, 12 मार्च 2008

यूपीए के ललबबुआ ..................

केंद्र की कांग्रेस वाम ग‌ठबंधन वाली यूपीए सरकार अपने अंतिम साल में पहुँच चुकी है। पिछले चार सालों से यूपीए के लाल बबुआ विभिन्न मुद्दों पर जिस तरह से केंद्र सरकार की बाँह मरोड़ते रहे हैं वो लगातार जारी है। चाहे परमाणु करार का मुद्दा हो, कथित कल्याणकारी नीतियां हो, नंदीग्राम और सिंगूर का हो या हाल ही में भाजपा संघ कार्यकर्ताओं द्वारा सीपीएम मुख्यालय पर कथित हमले का रहा हो। कथित हमला इसलिए की घटनास्थल पर मौजूद कई पत्रकारों का कहना था कि पत्थरबाजी पहले गोपालन भवन ( माकपा मुख्यालय ) से शुरू हुआ। बाद में संघ कार्यकर्ताओं द्वारा जबाव दिया गया। बहरहाल पहले जिसने भी चलाया हो .... भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस तरह की अलोकतांत्रिक घटनाओं को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
लेकिन इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भले ही हम विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने का दावा करते रहे हों लेकिन वास्तव में ऐसा है ही नहीं। दरअसल हमारी आजादी के पहले ही हमारी लोकतांत्रिक मान्यताएं भीड़तंत्र और जिसकी लाठी उसकी भैंस में तब्दील हो चुकी थी। दरअसल माकपा मुख्यालय पर जो कुछ भी हुआ उससे देश के ललबबुओं की करतूतों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। संघ कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वो केरल की हिंसक घटनाएं जिसमें न केवल संघ और भाजपा बल्कि मुस्लिम लीग और यहाँ तक की केंद्र के यूपीए सरकार के बड़े भाई कांग्रेस कार्यकर्ताओं तक को सरेआम मौत के घाट उतारा जा रहा है, के विरोध में माकपा मुख्यालय पर धरना देने और उनके केंद्रीय नेतृत्व को ग्यापन देने हेतु गए थे।
चलिए इस बात की जाँच हो सकती है कि वो क्यों गए थे और शुरूआत किसकी तरफ से हुई लेकिन घटना के दूसरे ही दिन संसद में जो कुछ हुआ उससे एक बार साबित हुआ कि केंद्र में ललबबुआ खासे अहमियत रखते हैं। दूसरे ही दिन संसद के दोनों सदनों में इस घटना पर चर्चा हुई और भाजपा संघ कार्यकर्ताओं की निंदा की गई। बिना किसी जाँच के संघ कार्यकर्ताओं को दोषी करार दे दिया गया। बहरहाल मजा तो देखिए इस पूरी घटना के जद में जो वजह थी उस वजह पर चर्चा पर दोनों ही पीठासीन अधिकारियों ने इंकार कर दिया। अब इसको किस तरह से जायज ठहराया जा सकता मुझे नहीं पता। कम से कम केरल में राजनीतिक हिंसा और उसको काबू करने में राज्य सरकार की असफलता और केवल केरल ही क्यों बाँकि वामपंथी राज्यों में भी ऐसी घटनाएं लगातार होती रहती हैं उन सब पर चर्चा किया जाना वक्त की माँग थी। बहरहाल हमें पीठासीन अधिकारियों के फैसले पर तो शक करने का कोई अधिकार नहीं है लेकिन मुझे नहीं लगता है कि ये उचित है। जब भी वामपंथियों के खिलाफ कोई मुद्दा आता है उस पर उचित चर्चा नहीं हो पाती है। नंदीग्राम के मुद्दे को ही लें जिस पर पिछले दो तीन सत्रों से चर्चा नहीं हो पा रही है या नहीं होने दिया जा रहा है। लेकिन दिल्ली की घटना पर अगले ही दिन चर्चा हो गई। आखिर कौन नहीं जानता कि नंदीग्राम पर जिन तर्कों को लेकर शुरूआत में चरचा नहीं होने दी गई उसका कोई वजूद नहीं था। इस सत्र में उस पर चर्चा होनी है लेकिन अब तक नहीं हो पाई है। इन सब बातों पर आप क्या कहेंगे ?


भाजपा का आरोप है कि पिछले एक महीने में केरल के कन्नूर इलाके में उसके तीस से भी ज्यादा कार्यकर्ताओं की ह्त्या कर दी गई है। सदन में संघ परिवार और भाजपा की तो निंदा की गई लेकिन भाजपा के इस मांग को नहीं माना गया कि इस पूरे घटना की न्यायिक जाँच करा ली जाए और एक सर्वदलीय कमिटी केरल जा कर हमारे आरोपों की जाँच करे। आखिर राज्य की ही बात है तो फिर गुजरात दंगों के बाद एक सर्वदलीय कमिटी राज्य का दौरा करके आई थी। केरल के मामले में ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है। ज़ाहिर है कोई भी विवेकशील व्यक्ति इस बात से इंकार नहीं कर सकता है। लेकिन जब राजनीतिक मजबूरी हो तो भला विपक्ष को दाम देने की क्या जरूरत है। खैर चुनावी साल है भाजपा को ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है।लेकिन जिस तरह से लोकताँत्रिक प्रक्रियाओं और मर्यादाओं को ताक पर रखा जा रहा है उससे नुकसान किसी का नहीं भारत का है। वामपंथी दल राजनीतिक हिंसा के लिए पहले से ही बदनाम रहे हैं चाहे केरल हो या पश्चिम बंगाल विपक्ष का चेहरा वामपंथियों को लाल कर देता रहा है। ऐसे में भाजपा के आरोप में दम नहीं है ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। पश्चिम बंगाल में तो काँग्रेस और तृणमूल सब झेलते रहे हैं।
मजे की बात तो ये है कि कल तक देश की आजादी तक को स्वीकार न करने वाले लोकतंत्र की हँसी उड़ाने वाले ये वामपंथी आज सबसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं की बात करते हैं। केंद्र में सरकार चलाना है,,, कांग्रेस भी मजबूर है क्या करे। इससे क्या फर्क पड़ता है कि लाल हमेशा उन पर आंखे लाल किए रहे। लालबाबू मरोड़ते रहिए कांग्रेस की बाँह..... मौका मिले तो गरदन भी मिलेगा।

रविवार, 9 मार्च 2008

सशक्तिकरण -- अपनी डफली अपना राग

विश्व महिला दिवस के दिन दो कार्यक्रमों में जाने का मौका मिला। पहला था विरांगना सम्मेलन। भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के तत्वाधान में महिलाओं का सम्मेलन था। सम्मेलन की संयोजिका थी वाणी त्रिपाठी जो पहले धारावाहिकों में अभिनय करती रहीं हैं। बाद में राजनीति में हाथ आजमाने आई हैं । धारावाहिकों में बहुत अच्छा नाम कर पाईं हों ऐसा भी नहीं इसलिए पिछले दरबाजे राजनीति में आईं। बहरहाल आश्चर्य ये रहा कि इन्हें भाजयुमो में संगठन महामंत्री का दर्जा प्राप्त है। खैर सम्मेलन शुरू हुआ । महिला दिवस था इसलिए जो भी वक्ता आता महिलाओँ के गुणगाण करता जा रहा था। बहरहाल राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी आए और उन्होंने अपनी बात कहने से पहले बताया कि आखिर इस सम्मेलन का मकसद क्या है। साफ तौर पर उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी युवा मतदाताओं को खास तौर पर ध्यान में रखती है लेकिन उनकी जो बातें थी वो कहीं से भी नहीं लग रहा था कि महिला सशक्तिकरण को और मजबूत कर रही हैं या आज की महिलाएं उसे जरा भी पसंद करेगी। दो नमूने देखिए --
१ . हम स्त्री को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और इस उभरते हुए विश्व बाजार में स्त्री को एक बिकाऊ समान अथवा समान बेचने के माध्यम के रूप में स्थापित नहीं होने देगें क्योंकि हम उस विचार को मानते हैं जो वसुधैव कुटुम्ब के वाक्य को आदर्श मानती हैं। विश्व एक बाजार नहीं परिवार है और परिवार में स्त्रियों का गरिमापूर्ण स्थान है।
२- सौंदर्य प्रतियोगिताओं के आयोजन के पीछे मूल मानसिकता क्या है इसको समझने का प्रयास किया जाना चाहिए। यह कोई स्वस्थ्य प्रतियोगिता नहीं है बल्कि स्त्री को एक सजावट की वस्तु के रूप में दिखाने की मानसिकता है। मेरा मानना है कि सौंदर्य ईश्वर के द्वारा दिया गया उपहार है और ईश्वर के इस उपहार की प्रतियोगिता क्यों।
बहरहाल मुझे ये नहीं समझ में आता है कि भाजपा अगर युवा वोट बैंक पर ही नजर रखे हुए जैसा कि अध्यक्ष कह रहे थे और उसका सशक्तिकरण वगैरह से कुछ लेना देना नहीं है तो फिर इस तरह के बयानों से उसका क्या भला हो सकता है।
बहरहाल उसी दिन महिला सशक्तिकरण का एक चेहरा और देखा। दरअसल बिंदेश्वरी पाठक के सुलभ इंटरनेशनल के तत्वाधान में राजस्थान की कुछ महिलाओं को होटल इंटरकंटिनेंनटल में पत्रकारों के साथ भोज पर आमंत्रित किया गया था। ये वो महिलाएं थी जो कल तक मैला ढोने का काम करती थीं। एक तरह से एक अमानवीय कार्य को अंजाम दे रही ये महिलाएं एक तरह से नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त थीं। लेकिन अब इनके जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आ चुका है। सुलभ इंटरनेशनल के सहयोग से इन महिलाओं ने अपना एक स्वयंसहायता समूह गठित कर अपने जीवन के कृष्ण पक्ष को एक तरह से समाप्त कर दिया। छोटे छोटे समानों को बना कर बेच कर इन्होंने अपने लिए नए मुकाम तलाशने का काम शुरू किया। पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित विश्व स्वच्छता सम्मेलन में इनमें से एक महिला को पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जैसे लोगों के साथ एक ही मंच पर बैठने का मौका भी मिला और वहाँ मौजूद श्रोताओं को संबोधित करने का भी। अब संयुक्त राष्ट्र तक पहुँचने जा रही हैं। एक दिन में सशक्तिकरण के दो चेहरे सामने थे।
एक में सशक्तिकरण के साथ वोट बैंक की राजनीति और मध्यकालिन पुरूषवादी दंभ का चेहरा संस्कृति और परंपरा के साथ लिपटा पड़ा था। दूसरे में था शनै शनै समाज में आ रही बदलाव की क्रांतिकारी कहानी। नीचे के पोस्ट में इनकी कुछ तस्वीरें हैं।

महिला दिवस विशेष - सुलभ ज़िन्दगी

ये महिलाएं , जो देश की बेहतरीन माडलों के साथ आत्मविश्वास से लबरेज रैंप पर चहलकदमी कर रहीं हैं, कल तक सर पर मैला ढोने जैसा काम करती थीं। लेकिन आज सुलभ इंटरनेशनल के प्रयासों से इन्हें नवजीवन मिला है।

गुरुवार, 6 मार्च 2008

शिवरात्री विशेष - देवघर का महत्व

झारखंड स्थित देवघर का रावणेश्वर ज्योर्तिलिंग बैधनाथ महादेव कई मायने में महत्वपूर्ण है। कहते हैं देवघर साक्षात सिद्धपीठ है। अन्य बारह या सोलह ज्योर्तिलिंगों में इसका महत्व सबसे ज़्यादा इसलिए भी है क्योंकि यहाँ भोलेनाथ के साथ साथ माँ भगवती सती रूप में मौज़ूद हैं। ये सती का हृदय स्थल है। पार्वती के सती होने के बाद जब महादेव उनके शरीर को उठाकर तांडव कर रहे थे तो सती का हृदय देवघर में गिरा था। पूरी दुनिया में यही एक पीठ है जहाँ शिव और सती साक्षात विराजमान हैं। बावजूद इसके बनारस या उज्जैन की तुलना में राष्ट्रीय स्तर पर देवघर का ज़िक्र कम होता है। मीडिया में भी देवघर एक तरह से कम जगह पाता रहा है।

बहरहाल अगर शिव अराधना की बात की जाए तो दिल्ली के आस पास रहने वालों के कांवडियों से जरूर परिचित होंगे। दरअसल श्रावणी मास में तकरीबन एक सौ आठ किलोमीटर की अजगैबीनाथ ( सुल्तानगंज ) से बैधनाथ ( देवघर ) यात्रा करके शिवभक्त कांवडिए उत्तरवाहिनी गंगा के जल से बैधनाथ का जलाभिषेक करते हैं। सौ किलोमीटर से भी लंबी इस यात्रा में पूरा रास्ता तकरीबन एक महीने तक गेरूए वस्त्रधारी कांवरियों से पटा रहता है। आप कल्पना नहीं कर सकते श्रद्धालुओं की कितनी भीड़ होती है। कहते हैं कि रामायण के प्रतिनायक रावण ने तपस्या से प्रसन्न कर शिव को कैलाश से लंका चलने को मना लिया था लेकिन प्रजापालक विष्णु की होशियारी से रास्ते में ही रावण को देवघर में शिवलिंग की स्थापना करना पड़ा। बाद में बैजू नाम के गड़रिए ने जंगल में पड़े इस शिवलिंग की खोज की। इसकी भी एक दिलचस्प कहानी है। बहरहाल यही वजह रहा कि देवघर में रावणेश्वर शिवलिंग को बैजूनाथ या बैधनाथ के नाम से जाना जाता है। बाद में भी इसके साथ कई कहानियाँ जुड़ती रही जिसका साक्षात महसूस करने के लिए आपको कम से कम एक बार देवघर जाना होगा।

शाम को होने वाले संध्यापूजा या रूद्राभिषेक के दौरान देवघर जेल के कैदियों द्वारा बनाए गए पंचमुखी या सप्तमुखी नाग से शिवलिंग की पूजा की जाती है। इसके पीछे भी लंबी कहानी है। आज जब सारा देश एक तरह से धार्मिक उन्माद की गिरफ्त में है देवघर की कुछ बातें आपको सोचने पर विवश कर सकती हैं। आज भी यहाँ दिन का पहला पूजा मुसलमान के हाथों होता है। उसके बाद ही अन्य श्रद्धालू पूजा कर सकते हैं। कहते हैं जब से यहाँ पूजा की परंपरा शुरू हुई तब से इस नियम को निभाया जा रहा। हलिम साहब जिनके खानदान के लोग ये पूजा करते हैं उनके घर में आज भी शिव का मंदिर है। हलिम साहब का मकबरा भी शिवगंगा के बगल में बनाया गया है। शिवगंगा वो तालाब है जिसमें स्नान करके श्रद्धालू पूजा के लिए मंदिर में प्रवेश करते हैं।

देवघर के बारे में कहा जाता है कि ये तपोभूमि रही है। आज भी तपोवन नाम से एक जगह मौजूद है जहाँ पहुँच कर आप वाकई एक दूसरी दुनिया में पहुँच जाते हैं। इसके अलावा नंदन और त्रिकूटी पहाड़ जैसे जगहों पर जा कर आपको लगेगा कि वाकई तपोभूमि का गौरव देवघर को प्रदान किया जाना सही। मैं यहाँ की एक ओर खासियत आपको बताना चाहूँगा। देवघर में ठाकुर अनुकूल चंद्र जी एक आश्रम है जहाँ सभी धर्मों के अनुयायी के लिए एक मंदिर बनाया गया है जिसमें गिरज़ाघर , मस्जिद और मंदिर साथ साथ हैं। इसके अलावा बंगला साहित्याकारों और नेताओं के लिए भी देवघर प्रिय स्थल रहा है। चाहे रामकृष्ण परमहंस हों, स्वामी विवेकानंद हों, शरतचंद्र हों या रविन्द्र नाथ सबके जीवन में देवघर एक खास स्थल के रूप में मौजूद रहा है। देवघर से सटे कुमड़ाबाद रोहिणी में परमहंस का आश्रम, देवघर में रामकृष्ण मिशन उसी पहचान को संजोये हुए है। महाशिवरात्री के दिन शिव के बारात का आयोजन भी आपको दाँतो तले अंगूली दबाने को विवश कर देगा। और अगर मेरे जैसे आपने भी देवघर में अपने जीवन के कुछ पल बिताए हों तो शायद आपके मानसपटल पर देवघर का स्थान सबसे उपर रहेगा।

महाशिवरात्री पर विशेष ... ज्योर्तिलिंग रावणेश्वर वैधनाथ महादेव ....देवघर

सौराष्ट्रे सोमनाथमं च श्री शैले मल्लिकार्जुनम्।उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम्।।
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियान्यां भीमशंकरम्।वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।वैधनाथं चित्ताभूमौ नागेशं दारूकावने।सेतुबन्धे च रामेशं धुश्मेशं च शिवालये।।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय य पठेत्।सर्वयाय विनिर्मुक्त सर्व सिद्धि फलंलभेत।।







बुधवार, 5 मार्च 2008

परदेसिया ........ दरद न बूझे कोय

बंबई या यों कहें कि महाराष्र्ट में पूरब के लोगों के साथ जो कुछ हुआ उसे न तो संवैधानिक स्तर पर और न ही नैतिकता के स्तर पर सही ठहराया जा सकता है। राज ठाकरे ने जम कर जहर उगला पूरबियों के खिलाफ। देर से ही सही पुलिस कार्रवायी हुई। बहरहाल दो एक दिन मीडिया में छायी सनसनी के बाद ऐसा लगने लगा था कि मामला धीरे धीरे शांत होने लगा है। पूरब के लोगों के साथ ही कइयों ने चैन की पूरी सांस ली भी नहीं थी कि बूढ़े ठाकरे गरज़ पडे ..... सारी शांति काफ़ुर हो गई। मुद्दा फिर गरमाया। बुधवार को सुबह सुबह चैनलों पर ठाकरे पुराण जम कर परोसा गया। दस बजते बजते ठाकरे पुराण पर पुरबियों की प्रतिक्रिया धकाधक गिरने लगी। चैनल वाले भी ज़ालिम समझदार हैं। सबको पता था संसद सत्र में है। पुराण पेला जा सकता है। गरमा गरम प्रतिक्रियाओं की कमी नहीं रहेगी। सारे नेता जम कर बोलेगें........ एक दूसरे को गरियाएंगें ... अपना एकाध घंटे तो क‍ट ही जाएगा। बहरहाल हुआ भी वही। ठाकरे पुराण शुरू हुआ ...... आधे पौने घंटे में बिहारी सांसदों ने मोर्चा संभाल लिया। क्या मज़ाल ठाकरे की .... उसकी ये औकात.... पगला गया है .... सठिया गया है। लालू अपने अंदाज़ में बोले पगला गया है...... प्रभूनाथ बोले ठाकरे को जेल में होना चाहिए..... मकोका लगाओ। जय हो ... लालू और प्रभूनाथ जी... आप ही तो बिहारी और पूरबिया अस्मिता और प्रतिष्ठा को बचा सकते हैं। ये तो रही संसद के बाहर की हलचल। अंदर लोकसभा में अध्यक्ष जी पधारे .... किरकिट टीम को बधाई देने के बाद प्रश्नकाल शुरू ही होता कि अंदर राजद के देवेंद्र यादव गरज़े.... अध्यक्ष जी सांसद सदस्यों के खिलाफ ऐसा अनरगल ..... बरदाश्त कैसे किया जा सकता है। विशेषाधिकार हनन का मामला बनता है। भाजपा के विजय मल्होत्रा भी कुछ बुदबुदाये .... विपक्ष धरम याद आ गया होगा। बहरहाल खँखार के नहीं बोले .... आखिर शिवसेना भी तो दोस्त ही हैं..... इसलिए कुछ सुनाई नहीं दिया। दो दिन से संसद कोमोवेश ठीक ठाक चल रहा था। अध्यक्ष जी भी खुश थे। लिहाजा मामले को जल्दी निपटाने के मूड में उन्होंने भी एक तरह से देवेंन्द्र बाबू की पीठ थपथपाते हुए प्रक्रियागत ढंग से मुद्दा उठाने का आग्रह किया। कहा ठीक है विशेषाधिकार हनन का नोटिस दीजिए .... हम कार्रवायी करेंगे। बहरहाल अंदर तो मामला शांत हुआ .... देवेंद्र बाबू बैठ गए।
लेकिन बाहर प्रभूनाथ जी चैनलों पर गरजे पड़े थे। फिर याद आया लोकसभा की कार्रवायी शुरू होने की ... भागे भागे अंदर पहुंचे। अंदर प्रश्नकाल शुरू हो चुका था .... अकबकाए घुसे और लगे खड़े होकर बोलने। आखिर अस्मिता और प्रतिष्ठा का प्रश्न था। उन्हें अंदाज नहीं था मामले का निपटारा हो चुका है। बहरहाल कुछ और बोल पाते ... सोमनाथ दा ने कहा .... हाँ हाँ हमने इसे गंभीरता से लिया है। आप विशेषाधिकार का नोटिस दीजिए। ..... प्रभुनाथ खिसिया के रह गए। चेहरे पर झेंप लिए घप्प से बैठ गए। लगा साला चैनलों के चक्कर में सदन में विरोधियों ने पहले ही मैदान मार लिया। बहरहाल सोमनाथ उनकी झेंप समझ रहे थे। चूटकी ली आपकी प्रतिष्ठा की हर हाल में हिफाजत होगी। क्या करते गर्दन हिलाकर चूप बैठ गए बिहारी अस्मिता के रक्षक प्रभूनाथ जी।
बहरहाल मामला यहीं खत्म नहीं होने वाला था। सबको पता था देशमुख साहब आने वाले हैं सोनिया जी के दरबार में हाज़िरी लगानी है। कुर्सी का एक टाँग बार बार टूट जाता है। लिहाजा संभालने के लिए बार बार सोनिया माता के दर्शन ज़रूरी होता है। बेटे की भी शादी हो ही चुकी है..... कहीं कोप ग्रस्त न हो जाएं। नारायण राणे आरी लिए बाँकी टाँगे काटने में लगे ही रहते हैं। दूर खड़े शिंदे साहब भी मुस्कुराते ही रहते हैं। लिहाजा योजना आयोग के बहाने मैडम का भी हाल चाल जानना जरूरी है। लिहाज़ा दरबार में पहुँचे ..... चैनलों पर पट्टी दौड़ी। नाराज सोनिया को मनाने विलासराव की दस जनपथ में पेशी। बिहारी मुद्दे पर सोनिया भी नाराज हैं। कभी कभी हमें तो पता नहीं लगता है कि मैडम कब नाराज हो जाती हैं। बाँकि मुद्दों पर तो कभी कभी रिपोटरों से बात करती हैं। इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी की बात कभी बताई नहीं मुझे। खैर जब लोग कह रहे थे तो नाराज होगीं मान कर चला जाए। अरे वाह वाह राज्यपाल महोदय भी पहुंचे हैं दिल्ली दरबार में । घर वापसी की तैयारी हो रही है .... क्या कहा अरे कर्नाटक में कांग्रेस को संजीवनी जो देनी है। लिहाजा महाराष्ट्र से घर वापसी के दौरान जाते जाते विलासराव को नसीहत देने में क्या जाता है। लगे हाथ उवाच गए एक राष्ट्र , एक झंडे की रक्षा करना सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है। अरे जनाब इससे पहले ये बात मुख्यमंत्री को याद दिला देते। खैर चलिए राज्यपाल पद की मज़बूरी तो सभी समझते हैं।
दूसरे रिपोटरों ने विलासराव को दरबार में घुसने से पहले ही घेरा। घबराए देशमुख मुँह पर अंगूली रखते अंदर दाखिल हुए। अरे महोदय आपकी चूप्पी वाले विजुवल भी बिकेगें ... आपको पता ही नहीं। बाहर निकले तो कोर्ट का बहाना बना कर सरक लिए। मराठी बिहारी के चक्कर में फँसे रिपोटर पूछना ही भूल गए ... देशमुख सरकार आपकी कूर्सी का क्या हुआ। खैर जिस दिन जो बिके वही परोसो। इस क्रम में किसी ने न ये सोचा कि आखिर ठाकरे जैसे लोग ऐसा बयान दे कर भी नेता कैसे..... एक प्रश्न और है जिसे आप नज़रअंदाज करेंगे तो पुरबियों को आगे भी ये भुगतना पड़ेगा। आखिर लालू , नीतिश, प्रभूनाथ जैसे लोगों से कोई ठाकरे के इस सवाल का जबाव पूछेगा .... कि बिहारियों के लिए बिहार में ही रोजगार होता तो क्या इतनी भारी संख्या में पलायन होता। क्यों अपना देस (( परदेसिया ??? )) छोड़कर कोई बाहर गाली खाकर भी ....... नरक जैसे जीवन जीते हुए भी रहने को मज़बूर है। लालू जी नीतिश जी प्रभूनाथ जी राजनीति हो जाए तो ज़रा इसका जबाव भी दीजिएगा। क्या पता ईश्वर के दरबार में सचमुच ही पाप और पूण्य का फैसला होता हो ...............................