शुक्रवार, 28 मार्च 2008

माताओं के देश में तेरी यही औकात है ....

प्रस्तावित फिल्म हार्न ओके प्लीज़ के से‍ट पर चल रहे आइ‍टम सांग की शूटिंग के दौरान अभिनेत्री तनूश्री के साथ जो कुछ भी हुआ और बाद में ‍न्यूज़ मीडिया ने उसे जिस तरह चटखारे लेकर पेश किया उसे सभ्य समाज में किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है। हो सकता है कइयों के लिए ये मज़ेदार चटखारेदार खबर रही हो लेकिन सभ्यता का तो तकाजा यही है कि हम पूरे मामले में एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह व्यवहार कर सकते थे। घटना को जिस तरह से बताया गया ... माफ कीजिएगा जिस तरह से पेश किया गया उसमें कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा था कि हमें अपने हिन्दुस्तानी होने पर गर्व होना चाहिए।

एक अभिनेत्री फिल्म के सेट पर से एक वरिष्ठ कलाकार द्वारा की गई अभद्र आचरण की निंदा करते हुए बाहर चली आती है और हम लग जाते हैं उस पर मसाला लगाने। और तो और वहाँ मौजूद मीडिया कर्मियों का व्यवहार तो और भी माशा अल्लाह .... । एक लड़की जो अभी इंडस्ट्री में संघर्ष कर रही है ... एक स्थापित कलाकार पर ये आरोप लगाती है। उस वक्त उसकी हालात कितनी तनावपूर्ण रही होगी। और उससे सहानुभूति रखने की बजाए हम उसी का मजाक उड़ा रहे हैं। और तो और मीडिया कर्मी उसी लड़की को ज़लील करने पर उतारू हैं। क्यों ... वो बाइट दे या न दे ... तुम्हारे बाप का क्या ? धन्य हैं हम .... हमारा समाज... और हमारा प्रेस। इस तरह किसी नेता जी से बाइट माँग कर देखना भैय्या तुम्हें बता देगा तुम्हारी औकात ?
दरअसल हमारी पूरी मानसिकता में महिलाओं के प्रति सम्मान एक दिखावे के तौर पर ही मौजूद है या फिर इस डर से मौजूद है कि कोई हमारी माँ बहनों के साथ अमानुषिक व्यवहार न करे। हम दिल से औरत को पांव की जूती और खिलनिया ही समझते हैं और इसी में गौरवान्वित महसूस करते हैं। कार पर हमला करते लंबे बाल बाले उस कैमरामैन को देखकर कौन शख्स कहेगा कि ये उसी प्रेस का प्रतिनिधि जिसने आजादी के संघर्ष के दिनों में और बाद में राष्ट्रनिर्माण में महत्ती भूमिका निभाई है ? मर्दवादी सोच की हद तो देखिए सब तनूश्री की बाइट के पीछे भाग रहे थे, किसी ने नाना पाटेकर से इस आरोप पर सफाई मांगने की जरूरत भी नहीं समझी। और उस पर तुर्रा ये कि तमाम राष्ट्रीय मीडिया ने ..... माफ कीजिएगा नौटंकी मीडिया ने रगड़ कर इस खबर को हेडलाइन बनाई।

चौदह पंद्रह घंटे के बाद जब नाना पाटेकर से इस आरोप का जबाव मांगा तो वो भी हल्के फुल्के मूड में ऐसा जबाव दे रहे थे जैसा ये कोई मुद्दा ही नहीं हो। श्री मान नाना जी अगर ऐसे आरोप को आप अपने व्यक्तिव के हिसाब से ओछा मानते हैं तो कम से कम उसी उँचाई से जबाव भी देते। क्षण भर के लिए मान लेते हैं जान बूझकर नहीं ... सेट पर भीड़ की वजह से ही आपका काफी करीब चले गए हों तनूश्री के, तो इसे सहज भाव से कबूल करके , कह देते कि चलो भाई बात खत्म करो .... जाने अनजाने अगर ऐसा हो गया ... और तुम्हें बुरा लगा तो माफ करना। मेरी नियत खराब नहीं थी। आपका बड़प्पन सामने आता और बात आई गई हो जाती। आपने तो अपना बड़प्पन दिखाया ही नहीं।

वैसे भी मीडिया, साहित्य, कला, मनोरंजन आदि क्षेत्रों में रचनात्मकता की दलील पर ली जाने वाली छूट से कौन वाकिफ नहीं है ? ऐसे पेशों में शायद ही कोई लड़की आम तौर पर इस तरह की घटनाओँ को सार्वजनिक कर पाने का साहस कर पाती है। ऐसे में अगर तनूश्री ने ये हिम्मत की थी तो हमें भी जिम्मेदार व्यवहार करना चाहिए। पर न्यूज़ मीडिया से भला ऐसे व्यवहार की उम्मीद करना बेमानी ही है। जिसके खुद के घर शीशे के हैं वो भला क्या दूसरों को उपदेश दे पाएंगे।

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

इसी व्यवहार से तंग आकर कांशीराम ने लगभग दस साल पहले एक टी वी के क्र्यू के ऊपर चांटा जड़ा था. सभी टीवी वाले फुलफुला गये थे और धरने पर बैठ गये थे.

सहनशक्ति की भी एक सीमा होती है.
आपने जो लिखा वही मैंने महसूस किया था. मेरी अनुभूति को शब्द देने के लिये धन्यवाद